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हाउसफुल 3: फूहड़ता की चरम सीमा

‘‘एंटरटेनमेंट’’ जैसी असफल फिल्म के लेखक व निर्देशक तथा ‘‘दिलवाले’’ जैसी असफल फिल्म के लेखकद्वय फरहाद साजिद से किसी बेहतरीन हास्य फिल्म की उम्मीद लेकर ‘‘हाउसफुल 3’’ देखने के लिए थिएटर के अंदर घुसने पर सिर्फ निराशा ही हाथ लगनी है. मनोरंजन के नाम फूहड़ता, दो कौड़ी के पंच वाले संवाद, कलाकारों का स्तरहीन अभिनय, बेसिर पैर के गाने व मनोरंजन विहीन फिल्म का नाम है – ‘‘हाउसफुल 3’’, जो कि ‘‘हाउसफुल’’ फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म है.

फिल्म की कहानी साल 2000 से शुरू होती है, जब लंदन के सेंट्रल हाल से तीन चोर ज्वेलरी व बहुमूल्य नग चुराने में सफल हो जाते हैं, पर वह पकड़े जाते हैं और तीनो को सजा हो जाती है. इनके जेल पहुंचने के बाद कहानी वर्तमान में आ जाती है. बटुक पटेल (बोमन इरानी ) ने अपनी शिपिंग कंपनी की तरफ से भव्य पार्टी रखी है, जहां उनके एक पुराने मित्र अपने तीन बेटों के साथ वहां पहुंचते हैं, तब बटुक पटेल अपनी तीनों बेटियों गंगा उर्फ ग्रेसी पटेल (जैकलीन फर्नाडिस), जमुना उर्फ जेनी पटेल (लिसा हेडन) व सरस्वती उर्फ साराह पटेल (नरगिस फाखरी) से परिचय कराते हैं. पर बटुक पटेल अपने मित्र का अपमान कर भगा देते हैं और वह दावा करते हैं कि उनके परिवार में ऐसी घटनाएं होती रही हैं, जिनके चलते उन्होने अपनी बेटियों की शादी न कराने का निर्णय ले रखा है.

उधर बटुक की तीनों तथाकथित संस्कारी बेटियां रात के अंधेरे में शराब की पार्टियों में जाती हैं. तीनो के प्रेमी हैं. ग्रेसी पटेल का प्रेमी एक फुटबाल खिलाड़ी सैंडी (अक्षय कुमार) है, जो कि स्पिल्ट पर्सनालिटी वाला है. वह ‘इंडियन’ शब्द सुनकर ही भड़क जाता है और मारा मारी करने पर उतर आता है. रंगभेद के चलते सैंडी को फुटबाल टीम से जु़ड़ने का मौका नहीं मिलता. उधर साराह पटेल को रैपर बनने के प्रयास में लगे बंटी (अभिषेक बच्चन) से प्यार हो गया है. जबकि जेनी को कार रेसिंग में असफल टेडी (रितेश देशमुख) से प्यार है. तीनों अपने प्यार की बात अपने पिता बटुक पटेल को बताती है, तो बटुक उन्हें शादी न करने के लिए कहते हैं. तब बेटियां वजह जानना चाहती हैं. मगर बटुक असली वजह नहीं बताना चाहते.

इसलिए एक दिन बटुक पटेल एक पास्ता की दुकान चलाने वाले आखिरी पास्ता (चंकी पांडे) को ज्योतिषी बनाकर लाते हैं. ज्योतिषी तीनों बेटियों से शादी न करने की वजह बता देता है. तब तीनो बेटियां उस ज्योतिषी की बात का तोड़ लेकर आती हैं. ग्रेसी अपने प्रेमी सैंडी को व्हील चेअर पर पेश करती है,अब सैंडी का पैर घर की जमीन पर नहीं पड़ेगा,यानी कि ज्योतिषी के अनुसार बकुल पटेल की मौत भी नहीं होगी.इसी तरह जेनी अपने प्रेमी टेडी को अंधे तथा साराह अपने प्रेमी बंटी को गूंगे के रूप में पेश करती है. यह तीनों प्रेमी बटुक पटेल के ही महल में रहने लगते हैं. बटुक पटेल अपनी तरफ से तीनों की परीक्षा लेकर समझ लेता है कि बेटियों ने जो कहा वही सच है. तीनों बेटियां की शादी की तारीखें तय हो चुकी हैं.

तभी छह साल पहले जेल में बंद हुए तीनों चोर जेल से रिहा हो जाते हैं. इससे बटुक पटेल खुश हो जाते हैं, क्योंकि यह तीनों चोर वास्तव में बटुक के बेटे हैं और बटुक इन तीनों की शादी ग्रेसी, जेनी व साराह के साथ कराना चाहते हैं. यहां पता चलता है कि यह तीनों वास्तव में मुंबई के डॉन उर्जा नागरे (जैकी श्राफ) की बेटियां हैं. पता चलता है कि बटुक पटेल कभी मुंबई के डॉन उर्जा नागरे (जैकी श्राफ) के दाहिने हाथ हुआ करते थे. बटुक ने ही उर्जा के खिलाफ गद्दारी की थी और उर्जा नागरे को पुलिस ने पकड़ लिया था. उस वक्त उर्जा ने बटुक पर विश्वास कर उसे लंदन की प्रापर्टी का केयर टेकर बना कर भेजा था. उर्जा ने कहा था कि वह उर्जा की तीनों बेटियों को अपनी बेटियों की तरह पालेगा और बड़ी होने पर इनकी शादी कर पूरी धन दौलत तीनों बेटियों के पतियों में बांट देगा. अब बटुक, उर्जा की तीनो बेटियां की शादी अपने बेटों के संग करके पूरी संपत्ति हड़प जाना चाहता है.

इसी बीच उर्जा नागरे भी जेल से रिहा होकर लंदन पहुंच जाता है. फिर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः उर्जा नागरे के सामने सारा सच आ जाता है. ग्रेसी, जेनी, साराह को पता चल जाता है कि उर्जा नागरे उनके असली पिता हैं. तीनों की उनके प्रेमियों के साथ शादी के साथ फिल्म का सुखद अंत होता है.

फिल्म ‘‘हाउसफुल 3’’ में अपंग या दृष्टिहीन या गूंगे लोगों को जिस तरह मनोरंजन का पात्र बनाया गया है, वह बहुत ही घटिया सोच है. देश के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को सम्मान देते हुए इन्हे अपंग की बजाय ‘दिव्यांग’ कहने की बात करता है, पर फिल्म के लेखक व निर्देशक ने इन्हें महज घटिया स्तर के मनोरंजन का पात्र बनाकर पेश कर दिया. फिल्म के अंदर रंगभेदी बाते की गयी हैं. एक जगह अक्षय कुमार के पात्र सेंडी को ‘इंडियन’ होने के  नाते फुटबाल मैच के दौरान खिलाड़ियों को पानी पिलाने योग्य कहा गया. तो दूसरी जगह एक संवाद है-‘‘अपना मुंह काला किया नौकरानी के साथ’’. फिर कैमरा काले रंग की पोशाक पहने काले चेहरे वाली लड़कियों पर जाकर टिकता है. वाह यही है भारतीय संस्कृति व ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की परिभाषा.

उपर से अक्षय कुमार अपने इंटरव्यू कहते फिर रहे हैं कि उन्हें भी निजी जिंदगी में रंगभेद का शिकार होना पड़ा. कुछ साल पहले ‘‘रेसिजम अगेंस्ट इंडियन इन ऑस्ट्रेलिया’’ लेख लिख चुके अभिनेता रणदीप हुड्डा ने दो दिन पहले ही हमसे कहा था-‘‘मेरे ख्याल से रेसीजम /रंगभेद है ही नहीं. आज के जमाने में रेसीजम/रंगभेद बिलकुल नहीं है. अब कौन सा कलाकार क्या रंगभेद की बात कर रहा है,यह तो वही जाने.’’

फिल्म में गंगा,जमुना सरस्वती छोटे कपड़ों में नजर आती हैं और घटिया संवाद कहती हैं-‘‘वह मेरे सेब की आंखे हैं.’’क्या यही हास्य व व्यंग है? फिल्म की कहानी, पटकथा व निर्देशन में काफी गड़बड़ियां हैं. पर फिल्म को लंदन की अच्छी लोकेशन पर फिल्माया गया है. कैमरामैन ने बेहतरीन काम किया है. फिल्म में एक भी गाना नही है, जिसे आप दोहराना चाहें. अब अक्षय कुमार के प्रशंसकों के बल पर यह फिल्म बाक्स आफिस पर क्या गुल खिलाती है, यह तो बहुत जल्द पता चल जाएगा.

‘‘नाडियादवाला एंड संस’’ के बैनर तले बनी दो घंटे 14 मिनट की फिल्म ‘‘हाउसफुल 3’’ के निर्माता साजिद नाडियादवाला, लेखक व निर्देशक फरहाद साजिद, कलाकार हैं- अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख, बोमन ईरानी, जैकलीन फर्नाडिस, लिसा हेडन, नरगिस फाखरी, जैकी श्राफ व अन्य.

खो गया है आपका फोन, ऐसे करें ट्रैक

अक्सर होता है कि हम अपने एंड्रॉयड फोन को कहीं रख कर भूल जाते हैं या फिर रास्ते में चलते हुए कोई फोन को छीन कर ले जाता है. लेकिन अब इसके लिए आपको घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है. अगर कभी भी आपका फोन खो जाता है तो आप उसे ट्रैक कर सकते हैं.

उसके साथ ही अपने फोन के डाटा को भी मिटा सकते हैं ताकि कोई भी उसका दुरुपयोग ना कर सके. इसके लिए आपको अपने एंड्रॉयड फोन में एंड्रॉयड डिवाइस मैनेजर एप्लिकेशन को डाउनलोड करना होगा. इस एप्लिकेशन को आप गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर अपने फोन में इंस्टॉल कर सकते हैं.

यह ऐप आपके चोरी हुए एंड्रॉयड फोन को ट्रैक करने के साथ-साथ आपके फोन को लॉक करने और फोन का सारा डाटा मिटाने में मदद करता है. जब आप इस ऐप को लॉग इन करेंगे तो यह आपके डिवाइस को लोकेट करेगा और नक्शे पर आपका अंतिम ज्ञात स्थान दिखा देगा.

इस ऐप की मदद से आप अपने खोए हुए फोन के साथ बहुत कुछ कर सकते हैं जैसे कि मोबाइल रिंग देना, डिवाइस को लॉक करना, आप फोन पर से अपना सारा डाटा भी मिटा सकते हैं.

गूगल ने लॉन्च किया ‘टिल्ट ब्रश’ ऐप

पेंटिंग की दुनिया में एक नया अविश्वसनीय मुकाम हासिल किया गया है. गूगल ने हाल ही में 'टिल्ट ब्रश' ऐप लॉन्च किया है जिसके जरिये आप अपनी कलाकारी को एक नया अंदाज दे सकते हैं.

कैंवस पर, घर की दिवारों पर या कंप्यूटर पर पेंटब्रश के जरिये आपने मनपसंद डिजाइन तो बहुत बनाये होंगे, लेकिन अब इस नयी टेक्नोलॉजी ने पेंटिग का एक नया पैमाना सेट कर दिया है. इस अनोखे पेंट ब्रश के जरिये आप हवा में 3D पेंटिग करके किसी भी तरह का ऑब्जेंक्ट या कैरेक्टर बना सकते हैं. इस 'टिल्ट ब्रश' के जरिये एकदम असली दिखने वाले सुंदर घर, फर्नीचर या फिर पेड़-पौधे आदि जैसे कोई भी चीज बनाना और उन्हें महसूस करना वाकई दिलचस्प है.

इतना ही नहीं इस ऐप की मदद से आप कई और अनोखे और मजेदार काम कर सकते हैं, जैसे अपनी पेंटिंग के आस-पास चलना आदि. दरअसल, इस एप्प के साथ यूजर्स वर्चुअल रिएलिटी में पेंट कर सकते हैं और सिर्फ पेंट ही नहीं, बल्कि वीआर लेंस और एक कंसोल का इस्तेमाल करके आप एक वर्चुअल कैनवास पर भी पेंटिंग कर सकते हैं.

 

सत्ता, सरकार और बाबाओं का गठजोड़

एक के बाद एक बाबाओं की पोल खुल कर लोगों की आंखों के सामने आ रही हैं, उसके बाद भी शासन-प्रशासन, राजनीतिक दल और आम जनता से जुड़े लोगों का मोह ऐसे बाबाओं से टूट नहीं रहा है. मथुरा के जवाहर बाग पर कब्जा करने वाला रामवृक्ष यादव भी बाबा ही था. मथुरा जैसी ही घटना हरियाणा में रामपाल बाबा के साथ हुई थी. शासन-प्रशासन, राजनीतिक दल और आम जनता की शह पर ही यह बाबा इतने ताकतवर हो जाते हैं कि इनमें सामने पुलिस तक बौनी नजर आने लगती है.

मथुरा में एसपी और दरोगा की हत्या करने वाले लोगों को पूरे 2 साल तक उत्तर प्रदेश की सरकार से शह मिलती रही. मथुरा के जिला उद्यान विभाग के लोग थाने में मुकदमा पर मुकदमा करते रहे, पर मथुरा का जवाहर बाग खाली नहीं हो सका. जब अदालत ने कठोर रूख अपनाया, तब पुलिस को कड़े कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा. इसके बाद भी राजधानी लखनऊ से स्पष्ट संदेश नहीं मिला. आधी अधूरी तैयारी के साथ मथुरा के जवाहर बाग खाली कराने गये पुलिस को अपने अफसरो को खोना पड़ा. किसी भी तरह की सरकारी मदद देकर इस कमी को पूरा नहीं किया जा सकता है.

रामवृक्ष यादव बाबा जयगुरू देव का चेला था. बाबा जयगुरू देव की मृत्यु के बाद वह जयगुरूदेव आश्रम पर ही कब्जा करना चाहता था. जयगुरूदेव आश्रम पर कब्जा करने वालों में रामवृक्ष यादव अकेला नहीं था. जयगुरूदेव के दो अन्य शिष्य पंकज यादव और उमाकांत तिवारी भी इस कोशिश में थे. इसमें पंकज यादव को सफलता मिली. इससे परेशान रामवृक्ष यादव खुद की नई सरकार बनाने की कोशिश शुरू कर दी.

2014 में वह सत्याग्रह करने के लिये मध्य प्रदेश से दिल्ली के लिये 5 हजार लोगों के साथ चला. मथुरा पहुंच कर उसने 2 दिन रूकने के लिये जवाहर बाग में अनुमित मांगी. इसके बाद उसने 270 एकड के जवाहर बाग पर अपना कब्जा कर लिया. मथुरा पुलिस नेताओं के दबाव में थी, जिसकी वजह से वह रामवृक्ष यादव पर कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकी. जब भी मथुरा पुलिस ने कोई योजना बनाई, उसे रोक दिया गया, जिसके बाद रामवृक्ष यादव ने अपनी ताकत इतना बड़ी कर ली कि वह पुलिस से टकराने में लग गया. अदालत के आदेश पर जवाहर बाग खाली कराने गई पुलिस पर जब रामवृक्ष यादव के समर्थकों ने हमला किया, तो लगा कि अंदर कितनी तैयारी हो चुकी थी.

मथुरा में रहते पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे ऐसा काम इसीलिये संभव हो सका, क्योंकि रामवृक्ष यादव को नेताओं का संरक्षण हासिल था. जब भी किसी बाबा की ऐसी करतूतें सामने आती हैं, तो उनके सत्ता से गठजोड़ का गणित साफ दिखता है. एक के बाद एक बाबाओं की करतूतें सामने आने के बाद भी जनता और सरकार का ऐसे बाबाओं से मोह भंग नहीं हो रहा है. सत्ता, सरकार और प्रशासन के लोग जिस तरह से बाबाओं के सामने नतमस्तक होते है उससे जनता गुमराह होती है. सत्ता, सरकार और प्रशासन के लोग ऐसे बाबाओं के ब्रांड एम्बेसडर बन जाते हैं, जिसका लाभ उठाकर बाबा जनता को गुमराह करने में सफल हो जाते हैं.

अंगूरलता के बाद निशाने पर प्रीति महापात्रा

देश और समाज बदल रहा है, पर उसकी सोच अभी भी पुरानी और दकियानूसी है. जहां महिला को पैर की जूती समझा जाता था. पैरों की जंजीरों और रूढिवादी सोच को तोड़कर जब कोई महिला समाज में आगे बढ़ती है तो उसको लेकर तमाम तरह की चुटीली बातें की जाती हैं. केवल आम लोग ही नहीं, मीडिया और दूसरे जिम्मेदार स्तंभ तक महिलाओं के विषयों पर बहुत संवेदनशील नजर नहीं आते हैं.

मौरल पुलिसिंग के बहाने पुरुषवादी दकियानूसी सोच को समाज में थोपने का पूरा काम होता है. इसके बहाने समाज की आधी आबादी को हाशिय पर ढकेलने का काम होता है. अपमानजनक बात यह है कि अपने बल पर तरक्की करने वाली महिलाओं के चरित्र पर हमला किया जाता है. सोशल मीडिया के जमाने में तो ऐसी घटनायें तेजी से बढ़ती जा रही हैं.

असम की विधायक अंगूरलता डेका की फोटो वायरल करते समय असल की जगह गलत फोटो वायरल कर दी गई. अंगूरलता डेका एक्टिंग की दुनिया से राजनीति में आई है. उनके ग्लैमरस फोटो कोई अनहोनी बात नहीं है. ऐसे में उनकी पुराने फोटो को दिखा कर क्या जताने की कोशिश की जा रही थी. यह सभ्य समाज की सोच नहीं हो सकती.

अंगूर लता डेका का मामला चल ही रहा था कि उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का निर्दलीय चुनाव लड़ने वाली समाजसेवी प्रीति महापात्रा को लेकर समाज की घटिया सोच सामने दिखने लगी. प्रीति महापात्रा कृष्ण लीला फांउडेशन चलाती है. वह टायलेट बनाने की मुहिम चला कर स्वच्छता के लिये काम कर रही हैं. प्रीति नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय विचार मंच की अध्यक्ष भी हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मे जब वह राज्यसभा का नामांकन करने आईं, तो सब कुछ उनके आसपास ही केन्द्रित हो गया. टीवी चैनलों से लेकर अंग्रेजी अखबारों तक ने उनकी योग्यता को नजरअंदाज कर उनके सबंधों को भाजपा नेताओं से जोड कर देखना शुरू कर दिया.

ऐसा किसी महिला के साथ पहली बार नहीं हुआ है. सोनिया गांधी से लेकर मायावती तक को ऐसी हालातों को सामना करना पड़ा है. महिला नेताओं को इस तरह की ओछी मानसिकता से रोज रूबरू होना पडता है.

उत्तर प्रदेश भाजपा की सदस्य प्रदेश कार्यसमिति अंजू सिंह कहती हैं ‘भारत की असल तरक्की के लिये हमें सबसे पहले औरतों का सम्मान करना सीखना होगा. भारत की आधी आबादी का सम्मान करना ही सही मायनों में तरक्की होती है. हमें उन महिलाओं का विशेष रूप से सम्मान करना होगा जो हिम्मत करके घरों से निकलती हैं. ऐसी औरतें मेहनत करके ही समाज में अपना मुकाम हासिल करती हैं. पुरूषवादी मानसिकता के लोग मौरल पुलिसिंग बंद कर महिलाओं के आगे बढ़ने में अपना योगदान दें. राजनीति और समाजसेवा में आने वाली महिलाओं पर लांछन लगाना बहुत सरल काम होता है. महिलाओं को इस तरह की सोच को नजरअंदाज कर आगे बढ़ना चाहिये. अपनी सफलता से ही वह समाज को सही तरह से जवाब दे सकती हैं.’         

GST लागू करने के लिए सरकार ने कसी कमर

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि भारत प्रस्तावित जीएसटी की दर यथासंभव कम रखने की कोशिश करेगा. उन्होंने कहा कि सरकार जीएसटी बिल को संसद के आगामी मॉनसून सत्र के दौरान पास कराने की कोशिश करेगी. कुछ अनुमानों में कहा गया है कि जीएसटी लागू होने से देश का जीडीपी 2% तक बढ़ जाएगा.

संविधान (122वां संशोधन) विधेयक, के अनुसार, जीएसटी काउंसिल टैक्स रेट की सिफारिश करेगी. काउंसिल में केंद्रीय वित्त मंत्री, राजस्व राज्य मंत्री और राज्यों के वित्त मंत्री होंगे. जेटली ने मेक इन इंडिया सेमिनार में जापानी निवेशकों से कहा, 'मैं नहीं जानता कि जीएसटी काउंसिल किस रेट की सिफारिश करेगी. फाइनेंस मिनिस्ट्री की एक एक्सपर्ट कमेटी सहित कुछ विशेषज्ञ समितियों ने अपनी सिफारिशें दी हैं. मुझे विश्वास है कि हम दरों को यथासंभव कम रखने की कोशिश करेंगे.'

इस सेमिनार का आयोजन डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री ने मिलकर किया था. यह सत्र अगले महीने शुरू होगा. विपक्षी कांग्रेस ने जीएसटी बिल को समर्थन देने के लिए तीन शर्तें रखी हैं. उसका कहना है कि जीएसटी रेट की लिमिट संविधान संशोधन विधेयक में 18% तय की जाए और इंटर-स्टेट सेल्स पर 1% के अतिरिक्त टैक्स को हटाया जाए.

कांग्रेस पर राज्यसभा में इस बिल की राह में रोड़ा डालने के आरोप लगते रहे हैं, हालांकि ऐसी ही हरकतें विपक्ष में रहते हुए बीजेपी ने भी इस बिल पर की थीं. जेटली ने कहा, 'मुझे उम्मीद है कि यह बिल पास हो जाएगा. आंकड़े जीएसटी के पक्ष में हैं. संविधान संशोधन पर मुहर लगने के बाद तीन और कानूनों को पास करने की जरूरत होगी, दो केंद्र सरकार से और एक राज्यों की विधानसभाओं से.'

भारत को निवेश के लिए आकर्षक बताते हुए जेटली ने कहा कि सरकार ने कई रिफॉर्म किए हैं और यह प्रक्रिया जारी रहेगी. उन्होंने कहा, 'अगले कुछ वर्षों में इंडिया में कई रिफॉर्म होने हैं.' जेटली ने कहा कि इस साल सामान्य से बेहतर मॉनसूनी बारिश होने का अनुमान है और ऐसा होने पर देश और तेजी से विकास करेगा. जेटली ने कहा कि सरकार ने देश में बिजनेस करने के नियम आसान किए हैं और नीतियों में निरंतरता की स्थिति बनाई है. उन्होंने कहा, 'सरकार ने वादा किया है कि किसी भी कानून को बीच में ही नहीं बदला जाएगा.'

ESPN वर्ल्ड फेम 100 में शामिल हुए ये भारतीय क्रिकेटर

हाल ही ईएसपीएन की ओर से दुनिया भर के टॉप 100 खिलाड़ियों की लिस्ट जारी हुई है. इस लिस्ट में 2 सिर्फ क्रिकेटर के नाम हैं और दिलचस्प बात ये है कि ये दोनों क्रिकेटर भारतीय हैं. टीम इंडिया के वनडे, टी-20 कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और टेस्ट कप्तान विराट कोहली इस लिस्ट में शामिल हैं.

ईएसपीएन वर्ल्ड फेम 100 रैंकिंग में कोहली 8वां स्थान हासिल किया तो वहीं धोनी 13वें नंबर पर काबिज रहे. तो वहीं क्रिकेट के अलावा भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा भी इस लिस्ट में शामिल हैं. सानिया इस रैकिंग में 41वें नंबर पर हैं.

ईएसपीएन की इस वैश्विक 100 खिलाड़ियों की सूची को ईएसपीएन के खेल समीक्षा निदेशक बेन अलामार द्वारा तैयार फॉर्मूले के आधार पर बनाया गया है. इसमें खिलाड़ियों को वेतन और प्रायोजन से मिलने वाले भुगतान, सर्च इंजन गुगल पर उन्हें प्रशंसकों द्वारा ढूंढे जाने की संख्या और सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता को आधार बनाया गया है.

दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों में पुर्तगाल के फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो दुनिया में सबसे अधिक कमाई करने वाले फुटबॉलर हैं जो इस सूची में नंबर वन पर हैं. दूसरे नंबर पर अमेरिकी बास्केटबॉल स्टार ली ब्रोन जेम्स के बाद अर्जेंटीना के फुटबॉलर लियोनल मैसी और ब्राजील के नेमार शामिल हैं. यह दोनों एफसी बार्सिलोना क्लब में टीम साथी हैं. स्विटजरलैंड के रॉजर फेडरर और 17 बार के ग्रैंड स्लेम चैंपियन भी इस सूची में शीर्ष पांच में शामिल हैं. इस लिस्ट में शारापोवा का नाम भी शामिल है.

सूची के टॉप 10 एथलीट

1. क्रिस्टियानो रोनाल्डो (फुटबॉल)

2. लेबरॉन जेम्स (बास्केटबॉल)

3. लियोनल मैसी (फुटबॉल)

4. नेमार (फुटबॉल)

5. रॉजर फेडरर (टेनिस)

6. केविन डुरांट (बास्केटबॉल)

7. टाइगर वुड्स (गोल्फ)

8.विराट कोहली (क्रिकेट)

9. जेम्स रॉड्रिग्ज (फुटबॉल)

10. राफेल नडाल (टेनिस)

अनुपम खेर: हिंदुत्व के नए (खल) नायक

निर्देशक सुभाष घई की 1986 में प्रदर्शित फिल्म ‘कर्मा’ के हिट होने की वजहों में एक यह अहम थी कि यह फिल्म राष्ट्रद्रोह और देशभक्ति जैसे संवेदनशील विषय पर बनी थी. यह हिंदी फिल्मों का वह दौर था जिस में मनोज कुमार छाप राष्ट्रभक्ति वाली फिल्मों मसलन ‘उपकार’, ‘पूरब पश्चिम’ और ‘क्रांति’ को लोग भूल  चले थे जिन में हिंदू धर्म और उस की परंपराओं का हद से ज्यादा प्रचार देशप्रेम की आड़ में किया गया था. कर्मा में देखा जाए तो केंद्रीय पात्र खलनायक डाक्टर डेंग नाम का शख्स ही था जो भारत को तोड़ने के लिए हथियारों और भटके युवकों का सहारा लेता रहता है. डाक्टर डेंग की चर्चित भूमिका को कला फिल्म ‘सारांश’ से अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवा चुके अनुपम खेर ने निभाया था. फिल्म में उन के सामने दिलीप कुमार और नसीरुद्दीन शाह जैसे मंझे व सधे अभिनेता थे.

तब फिल्म समीक्षकों ने गलत नहीं माना था कि अनुपम खेर ने एक बार फिर अच्छा काम किया है. आज भी फिल्म समीक्षक गलत नहीं मान रहे हैं कि हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘ए बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ में भी उन्होंने स्वाभाविक अभिनय किया है. ‘ए बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ को ले कर अनुपम खेर की उत्सुकता और बेसब्री बेवजह नहीं थे. एक वर्गविशेष के लिए बनाई गई इस फिल्म में वे एक प्रोफैसर रंजन बटकी की भूमिका में हैं जिस का चहेता छात्र विक्रम पंडित वामपंथियों से प्रभावित है. अकसर उस की चर्चा नक्सलवाद पर प्रोफैसर बटकी से होती रहती है.

विक्रम मूलतया उन युवाओं में से एक है जो धर्म और राजनीति को सारे फसादों की जड़ मानता है. गौरतलब है कि यह भूमिका अरुणोदय सिंह ने निभाई है जो गए कल के दिग्गज कांगे्रसी नेता अर्जुन सिंह का पोता और मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रहे अजय सिंह का बेटा है. नक्सलवाद को गलत ठहराती इस फिल्म की स्क्रीनिंग जानबूझ कर देशभर के शैक्षणिक संस्थानों में की गई लेकिन बीती 6 मई को जब फिल्म के डायरैक्टर विवेक अग्निहोत्री पश्चिम बंगाल की जादवपुर यूनिवर्सिटी पहुंचे तो लैफ्ट समर्थक छात्रों ने उन्हें खदेड़ दिया. एबीवीपी और उन के बीच जम कर हाथापाई और हिंसा हुई. इस विरोध पर तिलमिलाए विवेक अग्निहोत्री ने ‘ए बुद्धा…’ का विरोध करने वालों को ही नक्सली करार दे दिया. दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष ने तो जादवपुर विश्वविद्यालय की छात्राओं को बेहया कहते उन्हें पुरुषों का संग चाहने को बेचैन रहने वाली कह कर जता दिया कि दरअसल धर्म, उस की भाषा और मानसिकता क्या हैं.

कहने भर को ही यह फिल्म बौद्धिक आतंकवाद पर बनी है वरन इस का असल मकसद नए तरीकों से पनप रहे भगवावाद का प्रचारप्रसार करना है जिस के नए पाठ भारत माता की जय और सहिष्णुता हैं. अनुपम खेर प्रोफैसर की भूमिका में फिट बैठे हैं जो विक्रम जैसे युवाओं का ब्रेनवाश करने में माहिर होते हैं. वे लिखते भी हैं और जोरदार तरीके से बोलते भी हैं. ऐसा लगता नहीं कि उन्हें अभिनय करने के लिए ज्यादा कोशिश करनी पड़ी होगी. विचारधाराओं की लड़ाई परदे पर दिखाना हर्ज या एतराज की बात नहीं. हर्ज और एतराज की बातें हैं वास्तविकता में बोलने वालों का गला पकड़ना जो ‘ए बुद्धा…’ के प्रमोशन के दौरान कई जगह देखा गया. इस से सहज समझा जा सकता है कि देश में किस तरह का आतंकवाद पसर रहा है.

क्या चाहते हैं अनुपम

अब अनुपम खेर का देशप्रेम उमड़ रहा है और तरहतरह से उमड़ रहा है तो बात हैरानी की नहीं, बल्कि समझने की है कि दरअसल वे आज भी देश तोड़ने की ही बातें कह रहे हैं. बस, हथियारों की जगह शब्दों और विचारों ने ले ली है और इस हद तक ले ली है कि बीती 10 अप्रैल को वे जम्मूकश्मीर पुलिस द्वारा श्रीनगर एअरपोर्ट पर रोक लिए गए. और जब रोक लिए गए तो अनुपम खेर यह कहते बिफरे भी कि वे तो यहां एनआईटी के छात्रों को नैतिक समर्थन देने आए हैं, किसी तरह का विवाद पैदा करने नहीं. जाहिर है जम्मूकश्मीर पुलिस की नजर में अनुपम कानून व्यवस्था और शांति के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके हैं, इसलिए उन्हें एनआईटी नहीं जाने दिया गया. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हकीकत में वे उस भगवा ब्रिगेड के खासमखास सिपहसालार बन चुके हैं जो यह परिभाषा गढ़ने में लगी है कि दरअसल राष्ट्र ही धर्म और धर्म ही राष्ट्र है. और यह धर्म, हिंदू धर्म ही है.

अनुपम खेर क्या और क्यों कर रहे हैं, इस का उन के बचपन से गहरा नाता साफ दिखता है. कश्मीरी ब्राह्मण मूल के अनुपम के पिता शिमला में वन विभाग में क्लर्क थे जिन के परिवार को साल 1953 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था. एक टीवी शो में जब अनुपम खेर ने यह बात बताई थी तो अपने चेहरे पर आए क्षणिक विषाद और घृणा को न तो छिपाने की उन्होंने कोशिश की थी न ही इस की जरूरत समझी थी. निम्नमध्यवर्गीय परिवार में जन्मे अनुपम घाटी की हिंसा भूल गए हों, ऐसा लगता नहीं, मुमकिन है कि इस के जिम्मेदार वे स्वाभाविक तौर पर आतंकियों और मुसलमानों को मानते हों. जब उन्हें यह याद है कि पिता की 90 रुपए महीने की तनख्वाह से मुश्किल से 14 सदस्यों वाले परिवार का गुजारा हो पाता था तो तय है कि उन्हें यह भी याद है कि कश्मीरी पंडितों ने कैसीकैसी परेशानियां झेलीं और अपनी जड़ें छोड़ कर वे इधरउधर हो कर दरदर भटके. इधरउधर हो कर भी अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर जो अपना मुकाम बना पाए, बिलाशक अनुपम खेर का नाम उन में से एक है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी एनएसडी में दाखिला लेना और उन का स्नातक हो जाना दोनों गैरमामूली बातें हैं. आमतौर पर लोग, जिन में अनुपम खेर के प्रशंसक और उन्हें नजदीक से जानने वाले शामिल हैं, यह मानते रहे थे कि इस बेहतरीन मंझे हुए अभिनेता का राजनीति और किसी विचारधारा विशेष से जुड़े होने का कोई संबंध नहीं. लेकिन उन की अभिनेत्री पत्नी किरण खेर ने बीता लोकसभा चुनाव मोदी लहर में भाजपा के टिकट पर चंडीगढ़ सीट से लड़ा और जीता तो लोगों को लगा था कि अनुपम खेर भाजपा से प्रभावित हो चले हैं.

पत्नी के सांसद बनने का असर अनुपम खेर पर इस तरह पड़ा कि जब देश में असहिष्णुता और देशभक्ति पर बड़े पैमाने पर बहस छिड़ी तो धीरेधीरे अनुपम खेर उस का अहम हिस्सा और किरदार बन गए. धर्म और देशभक्ति जैसे संवेदनशील होते जा रहे विषयों पर आमतौर से चुप रहने वाले अनुपम ने नरेंद्र मोदी की तारीफों में कसीदे गढ़ने शुरू कर दिए. लेकिन यह उन का असल मकसद नहीं था, असल मकसद था मोदी की आड़ में भजभज मंडली का हिस्सा बनते जाना. नयनतारा सहगल द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार की वापसी से ज्यादा भगवा खेमा और भाजपा सरकार उस वक्त सन्न रह गए थे जब आईआईएफटी के छात्रों ने थोपे गए भगवा चेयरमैन गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में लंबी हड़ताल की थी. इन और ऐसे मामलों पर उन्हें बुद्धिजीवी कलाकारों की जरूरत थी. बुद्धिजीवी कलाकार होने की छवि पहले ही गढ़ चुके अनुपम खेर इस पैमाने पर खरे उतर रहे थे वरना भगवा खेमे के पास कलाकारों के नाम पर बेहद छोटे नाम ही थे जिन के बोलने पर लोग ध्यान ही नहीं देते.

दूसरी परेशानी ऐक्टर शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद सरीखे क्रिकेटर खड़ी कर रहे थे जो लगातार अपनी ही पार्टी भाजपा और भगवा खेमे के खिलाफ बोले जा रहे थे. दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार यह तथ्य स्थापित कर गई थी कि बुद्धिजीवी वर्ग उस के साथ नहीं है क्योंकि वह किसी भी शर्त पर अल्पसंख्यकों और दलितों की अनदेखी व उन के साथ की जा रही ज्यादतियों पर भजभज मंडली का साथ देने वाला नहीं. लोकतांत्रिक राजनीति में अकसर ऐसा होता है कि मतदाता बजाय राजनीतिक दलों के, बुद्धिजीवियों पर ज्यादा भरोसा करता है. अनुपम खेर भाजपा सरकार के समर्थन में और सरकार के बुद्धिजीवी विरोधियों के विरोध में 6 मार्च को दिल्ली में रैली निकाल कर मोदी की खूब तारीफ की. भाजपा में बुद्धिजीवी कलाकार की खाली जगह को अनुपम ने अधिकृत तौर पर 18 मार्च को भरा जब वे जेएनयू विवाद के बाद जेएनयू कैंपस में गए. कहने को मौका था उन की फिल्म ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’ के प्रमोशन का, जहां फिल्म पर बोलने के बजाय वे कन्हैया कुमार पर ज्यादा बरसे. यहां अनुपम खेर ने जम कर अपनी भड़ास निकाली और कन्हैया पर निशाना साधते कहा कि जो शख्स जमानत पर आया है उस का स्वागत क्यों किया जाए, जो देश के खिलाफ बातें करता है वह हीरो नहीं हो सकता. कन्हैया को अनुपम ने जम कर लताड़ लगाई. इस के ठीक पहले एक टीवी शो में उन का राष्ट्रभक्ति पर दिया भाषण सोशल मीडिया में काफी वायरल हुआ था.

कन्हैया अनुपम खेर के मुकाबले बहुत कम बोला, सिर्फ इतना ही कि, ‘अनुपमजी जेएनयू आए हैं तो आएं लेकिन कृपा कर के कोई ज्ञान का पाठ न पढ़ाएं.’

अनुपम का ज्ञान

शायद ही नहीं, तय है कि खुद अनुपम खेर या कोई और बता पाए कि जेएनयू कैंपस में फिल्म के प्रमोशन के नाम पर भगवा विचारधारा के प्रचार के माने और जरूरत क्या थे. और कन्हैया कौन सा ज्ञान न बांटे जाने का आग्रह कर रहा था जिस की नजर में अनुपम खेर उतने ही महत्त्वहीन व्यक्ति थे जितने कि अनुपम खेर की नजर में वह महत्त्वपूर्ण हो चला था. अदालत और आम लोगों का फैसला कन्हैया के बारे में जब आएगा तब आएगा पर अनुपम खेर इस दिन खुल कर हिंदूवादी संगठनों की भाषा में छात्रों को राष्ट्रद्रोह और राष्ट्रप्रेम के माने बताने की कोशिश में लगे रहे जिस का एक मतलब यह था कि जो कट्टर पौराणिकवादी हिंदू है वही देशभक्त है, बाकी सब देश के गद्दार हैं.

यानी भजभज मंडली की तरह अनुपम खेर की नजर में भी हिंदू वही है जो वर्णवाद स्वीकारे, भारत माता की जय बोले पर तमाम धार्मिक, सरकारी व सामाजिक ज्यादतियां बरदाश्त कर ले यानी कमजोर, कायर, सहिष्णु बन जाए. इसीलिए हिंदू धर्म के पैरोकार कहते भी रहते हैं कि देखो, हम कितने उदार और सब्र वाले हैं जो सब को यानी मुसलमानों सहित दूसरे अल्पसंख्यकों व दलितों को भी सहज स्वीकार लेते हैं बावजूद इस के कि यह देश, धरती, आकाश और पानी सब हमारा है. इसलिए हम जैसा कहते और चाहते हैं वैसा करो वरना देश छोड़ कर चले जाओ. यह ज्ञान भाजपा को थोड़ी देर यानी बिहार चुनाव के नतीजों के बाद मिला कि दलितों और आदिवासियों की अनदेखी नहीं की जा सकती, इसलिए उन्हें उन के हिंदू होने का एहसास कराया जाना जरूरी है. लिहाजा, बुद्ध जयंती सरकारी तौर पर मनाने की घोषणा कर दी गई. और हैरत की बात यह है कि भाजपा और आरएसएस ने संत रविदास जयंती के बाद 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती भी धूमधाम से मनाई. प्रसंगवश इस दिन यह साफ हुआ कि कल तक जिन्हें चरणों की धूल से भी गयागुजरा समझा जाता था, उन्हें चंदन की तरह माथे पर लगाने में ही भजभज मंडली को फायदा दिखा.

इस पूरी पिक्चर में अनुपम खेर एक पौराणिक पात्र की तरह फिट हुए जिस ने बचपन में ब्राह्मणों का तिरस्कार देखा है. लिहाजा, उस के मन में कूटकूट कर बदले की भावना भरी पड़ी है जिस को प्रदर्शित होने का मौका मिला तो श्रीनगर एअरपोर्ट पर उन्हें रोक लिया गया. वहां की मुख्यमंत्री महबूबा एनआईटी के मामले में अपने गठबंधन सहयोगी दल भाजपा को चेतावनी दे चुकी थीं कि इस विवाद को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश न की जाए. जाहिर है जम्मूकश्मीर में पीडीपी सत्ता में न होती और महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री न होतीं तो अनुपम खेर एनआईटी कश्मीर में भी नैतिक समर्थन के नाम पर राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रभक्ति के नए रचे जा रहे पुराण का यह अध्याय वांच कर आते कि बच्चों, देशभक्त सिर्फ हिंदू होता है, इसलिए देशद्रोहियों से डरो नहीं, उन से लड़ो, उन का सामना करो, नैतिक समर्थन वगैरा हम देंगे. यानी इस देश में रहना होगा तो हिंदू कर्मकांड की महिमा करने वाला वंदेमातरम कहना होगा जैसे भड़काऊ प्रवचन उस घाटी, जिस के वे मूल निवासी हैं, में वांच कर जरूर आते.

वैसे भी ब्राह्मण होने के नाते उन्हें मालूम है कि जन्मना ब्राह्मण किसी ऋषिमुनि से कमतर नहीं होता जिस का कभी पूजापाठ किया जाता था. अब इस पौराणिक धर्म का पतन हो रहा है, इसलिए नई पीढ़ी को यह भी बताया जाए कि भारत माता की जय दरअसल दुर्गा की जय है. कल्पना यह भी की जा सकती है कि अगर 10 अप्रैल को वे एनआईटी पहुंच पाते तो कैंपस के साथसाथ घाटी में भी क्या कुछ नहीं होता. दिख यह भी रहा है कि अनुपम खेर महज नाम या फिल्मी लोकप्रियता की खातिर हिंदूवादी मुहिम और सोच का हिस्सा नहीं बने हैं. वे दरअसल शुरू से ही हिंदूवादी और पौराणिक मानसिकता के रहे हैं. अब तो उन्हें अपनी बात कहने के लिए मौका, मंच और छूट मिल गई है, सरकार जो उन के विचारों वाली है. पौराणिक हिंदुत्व और देशप्रेम की व्याख्या करने वालों की सूची में अपना पंजीकरण करा चुके अनुपम खेर की यह शुरुआत है. तय है वे अभी और बोलेंगे तो जाहिर है ‘कर्मा’ फिल्म का डाक्टर डेंग एक नए अवतार में सामने आ रहा है जिसे लोकतंत्र या धर्मनिरपेक्षता से कोई सरोकार नहीं. वह तो हिंदू राष्ट्र की स्थापना चाहता है. बुद्धि तो अनुपम में है पर विवेक उन का साथ छोड़ रहा है.

देश के लिहाज से यह चिंता की बात है कि अनुपम खेर वास्तविक जीवन में भी भटके हुए युवाओं को नैतिक समर्थन के नाम पर बरगला रहे हैं. शायद इसीलिए फिल्म इंडस्ट्री के उन के मित्र और शुभचिंतक उन से कन्नी काटने लगे हैं. इन में अनिल कपूर, अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट और ऋषि कपूर जैसे अभिनेता प्रमुखता से शामिल हैं. इन कलाकारों को समझ आ रहा है कि अनुपम खेर अब ‘सारांश’ फिल्म का वह जुझारू शिक्षक नहीं रहा जो भ्रष्टाचार और घूसखोर व्यवस्था से लड़ता है, बल्कि वह अब अपनी वास्तविक भूमिका में है जहां पूजापाठ, घंटेघडि़याल, वेदपुराण और हिंदुत्व ही उस की लड़ाई के मुद्दे हैं. अब अनुपम खेर सधे ढंग से संवाद नहीं बोल रहे, बल्कि एक कट्टर हिंदूवादी की तरह प्रवचन कर रहे हैं और इस के लिए वे शिक्षण संस्थानों को टारगेट कर रहे हैं.

नी रिप्लेसमैंट से मिलेगा घुटने के हर दर्द से छुटकारा

दुनिया में 50 या इस से अधिक उम्र की 63 प्रतिशत महिलाएं घुटनों की समस्या से परेशान हैं. 12 साल तक चले एक अध्ययन में यह सामने आया कि मानव किसी न किसी कारण से घुटनों के दर्द से परेशान हैं. इस की वजह घुटनों में किसी प्रकार की चोट, मोटापा या औस्टियोआर्थ्राइटिस होता है. अध्ययन में शामिल औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. निगेल एर्डन के अनुसार, यह पहला अध्ययन है जिस में सिर्फ महिलाओं को शामिल किया गया. इस अध्ययन में 44 से 57 साल आयुवर्ग की 1,000 से ज्यादा महिलाओं को लिया गया. 44 प्रतिशत महिलाओं को कभीकभार यह दर्द उठता ही है. जबकि 23 प्रतिशत को माह के आखिरी दिनों में यह दर्द होता है. कभीकभार और ज्यादातर दिनों में घुटनों के दर्द की शिकायत वाले मरीजों में क्रमश: 9 और 2 प्रतिशत का अनुपात है. रिसर्च के अनुसार, जिन का बीएमआई (बौडी मास इंडैक्स) अधिक यानी मोटापा अधिक है, उन में घुटनों के दर्द की शिकायत ज्यादा रहती है. जब दर्द बहुत ही ज्यादा हो जाता है तो घुटने का प्रत्यारोपण कराना पड़ता है.

क्या है नी रिप्लेसमैंट

घुटनों में आर्थ्राइटिस होने से कई बार विकलांगता की स्थिति तक आ जाती है. जैसेजैसे घुटने जवाब देने लगते हैं, चलनाफिरना, उठनाबैठना, यहां तक कि बिस्तर से उठ पाना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति में नी रिप्लेसमैंट यानी घुटनों का प्रत्यारोपण एक विकल्प के तौर पर मौजूद है.

कब पड़ती है जरूरत

यदि एक्सरे में आप को घुटना या उस के अंदर के भाग अधिक विकारग्रस्त होते दिख रहे हों या आप घुटनों से लाचार महसूस कर रहे हों, जैसे बेपनाह दर्द, उठनेबैठने में तकलीफ, चलने में दिक्कत, घुटने में कड़ापन, सूजन, लाल होना, तो आप घुटना प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं. हर वर्ष पूरे विश्व में लगभग 6.5 लाख लोग अपना घुटना बदलवाते हैं. वैसे, घुटना बदलवाने की उम्र 65 से 70 की उपयुक्त मानी गई है लेकिन यह व्यक्तिगत तौर पर भिन्न भी हो सकती है.

औपरेशन की प्रक्रिया

घुटने के प्रत्यारोपण के औपरेशन में जांघ वाली हड्डी, जो घुटने के पास जुड़ती है और घुटने को जोड़ने वाली पैर वाली हड्डी, इन दोनों के कार्टिलेज काट कर उच्च स्तरीय तकनीक से प्लास्टिक फिट किया जाता है. कुछ समय में ही दोनों हड्डियों की ऊपरी परत एकदम चिकनी हो जाती है और मरीज चलनाफिरना शुरू कर देता है. साधारणतया मरीज औपरेशन के 2 दिनों के भीतर ही किसी सहारे से चलने लगता है. फिर 20-25 दिन में सीढ़ी भी चढ़ना शुरू कर देता है.

घुटना प्रत्यारोपण के द्वारा ग्रसित भाग को या फिर पूरे घुटने को बदलना संभव है. घुटना प्रत्यारोपण 2 प्रकार से किया जाता है.

टोटल नी रिप्लेसमैंट

टोटल नी रिप्लेसमैंट सर्जरी के दौरान पूरे घुटने को बदला जाता है जबकि यूनीकंपार्टमैंटल नी रिप्लेसमैंट के दौरान घुटने के ऊपरी व मध्य भाग बदले

जाते हैं.

दरअसल, घुटने के प्रत्यारोपण के समय घुटने में एक 4-6 सैंटीमीटर का चीरा लगाया जाता है. फिर विकारग्रस्त भाग को हटा कर उस के स्थान पर नई धातु, जिसे प्रोस्थेसिस के नाम से जाना जाता है, को प्रत्यारोपित कर दिया जाता है. इस प्रोस्थेसिस को हड्डियों से सटा कर लगाया जाता है. ये प्रोस्थेसिस कोबाल्ट क्रोम, टाइटेनियम और पोलिथिलीन की मदद से निर्मित किए जाते हैं. फिर घुटने की त्वचा को सिल कर बंद कर दिया जाता है.

इस प्रक्रिया के दौरान मरीज को एनेस्थीसिया दिया जाता है. मरीज को अतिरिक्त खून चढ़ाने की भी आवश्यकता होती है. औपरेशन के बाद मरीज को लगभग 5-7 दिन तक अस्पताल में रुकना पड़ता है. औपरेशन के एकदो दिन बाद तक घुटने पर पानी आदि नहीं पड़ना चाहिए जब तक कि वह घाव सूख न जाए. सर्जरी के बाद 4 से 6 सप्ताह के बाद पीडि़त धीरेधीरे अपनी नियमित दिनचर्या को अपना सकता है. औपरेशन के बाद व्यायाम करने व आयरन से भरपूर भोजन करने से पीडि़त को ठीक होने में मदद मिलती है. औपरेशन के 6 सप्ताह के बाद पीडि़त गाड़ी चलाने के लिए समर्थ हो जाते हैं.

तकनीकों द्वारा इलाज आसान

मैडिकल क्षेत्र में विकास के चलते कई अत्याधुनिक तकनीकों ने सर्जरी को काफी आसान, सुरक्षित व कारगर बना दिया है. घुटने के प्रत्यारोपण में गोलाकार तकनीक ने इस तरह की सर्जरियों को नया आयाम दिया है. हालांकि गोलाकार तकनीक यूके, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में पहले से सफलतापूर्वक इस्तेमाल की जा रही है लेकिन भारत में यह तकनीक हाल ही में शुरू की गई है.

गौरतलब है कि इंसानों के घुटने गोलाकार तरीके से घूमते हैं. हालांकि कई लोग सोचते हैं कि घुटने का काम सिर्फ मोड़ना व सीधा करना ही है लेकिन हमारी 90 प्रतिशत से ज्यादा गतिविधियां, जैसे कि चलना, सीढि़यां चढ़नाउतरना, कुरसी पर बैठना और तैराकी करना इत्यादि, 10 से 110 डिगरी की रेंज में होती हैं. यह गति की ऐक्टिव रेंज है. कुछ गतिविधियों, जैसे जमीन पर पैर मोड़ कर बैठने, इंडियन टौयलेट का इस्तेमाल करने आदि में 110 डिगरी से ज्यादा घुटने मुड़ते हैं. 10 से 110 डिगरी की गतिशीलता की रेंज में मानवीय घुटने गोलाकार एक ही केंद्रबिंदु पर घूमते हैं, जिस तरह से चक्र घूमता है.

प्राकृतिक रूप से एक ही केंद्रबिंदू पर घुटने गोलाकार तरीके से घूमते हैं और इसी सिद्धांत पर आधारित सिंगल रेडियस डिजाइन, ट्रायथलौन बेहद कारगर व सुरक्षित प्रत्यारोपण है. ट्रायथलौन प्रत्यारोपण से दुनियाभर में लाखों रोगियों को दर्द से राहत मिलती है और वे अपनी पसंदीदा गतिविधियां करने में सक्षम होते हैं.

टोटल नी रिप्लेसमैंट सर्जरी का मुख्य उद्देश्य ही आप की जिंदगी को दर्दमुक्त करना है. आजकल घुटने के प्रत्यारोपण की तकनीक काफी एडवांस हो गई है जिस से दुनियाभर में आर्थ्राइटिस के रोगियों का दोबारा सामान्य जिंदगी जीना संभव हो पाया है. इस से घुटने की विकृति जैसी समस्याएं हल हो जाती हैं. सर्जरी के बाद जिंदगी की गुणवत्ता बढ़ जाती है. इस में जीवन में शारीरिक व मानसिक तौर पर गुणवत्ता में इजाफा होता है. सर्जरी के बाद आप सभी तरह की गतिविधियां, जैसे कि सीढि़यां चढ़नेउतरने, व्यायाम करने और ड्राइविंग आदि आसानी से कर सकते हैं. अपने रोजमर्रा के कामों के लिए परिवार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. जब रोगी दर्दमुक्त होते हैं तो सुकून की नींद सो भी पाते हैं. 

टोटल नी रिप्लेसमैंट का खर्चा

टोटल नी रिप्लेसमैंट का खर्चा इस पर निर्भर करता है कि रिप्लेसमैंट कहां पर किया जा रहा है. अगर अमेरिका की बात करें तो इस का कुल खर्च 40 हजार डौलर के आसपास है. भारत में 6 हजार डौलर, कोस्टा रीका में 11,500 डौलर व मैक्सिको में यही खर्च तकरीबन 9 हजार डौलर तक होता है. इसीलिए ऐसा कहा जा सकता है कि अमेरिका जैसे विकसित देशों की अपेक्षा भारत जैसे विकासशील देशों में घुटना प्रत्यारोपण कराने का कुल खर्च लगभग 70 प्रतिशत तक कम होता है.

जीवन में बदलाव

घुटना प्रत्यारोपण तकनीक के आने से उन लोगों के जीवन में बेहद बदलाव आया है जो अपने घुटनों को मोड़ने में असमर्थ थे. अब इन लोगों के लिए सभी प्रकार की संभावनाएं, जैसे चौकड़ी मार कर बैठना व गोल्फ खेलना जैसी क्रियाएं करना आसान हो जाता है.

घुटना प्रत्यारोपण के क्षेत्र में दिनोंदिन हो रहे विकास के चलते अब घुटनों पर अधिक भार भी सहन किया जा सकता है व इस से ज्यादा लोचशीलता आ जाती है. घुटने में गहराई से लचीलापन आने से मरीज को इस बात का विश्वास हो जाता है कि वह बहुत अच्छे ढंग से लंबे समय तक स्वस्थ रहेगा. इस सुधार की अवधि कम से कम 10 से 15 साल तक आंकी गई है.

यह ठीक है कि अब कृत्रिम जोड़ों का प्रत्यारोपण संभव हो गया है लेकिन यदि आप प्रौढ़ावस्था में हड्डियों के रोगों से बचना चाहते हैं तो अपनी जीवनचर्या में थोड़ा सुधार कर लें. घी, चीनी, चिकनाई कम खाएं. संतुलित आहार लें. खाने में कैल्शियम की मात्रा पर्याप्त रखें, सागसब्जी अवश्य खाएं और थोड़ाबहुत व्यायाम करें तो सेहत के लिए फायदेमंद होगा और जोड़ों के प्रत्यारोपण कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

 

(लेखक नई दिल्ली स्थित सरोज सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल के सैंटर फौर जौइंट रिप्लेसमैंट विभाग के एचओडी हैं.)      

                   

पिनलैस कंप्यूटर द्वारा घुटने का इलाज

कंप्यूटर प्रौद्योगिकी का सदुपयोग करते हुए सर्जन और शोधकर्ता लगातार प्रत्येक सर्जरी में परफैक्शन पाने की दिशा में काम कर रहे हैं. ऐसा ही एक उदाहरण है कंप्यूटर के मार्गनिर्देशन में घुटने बदलने की शल्य क्रिया. पूर्ण घुटने बदलने की प्रक्रिया में क्षतिग्रस्त घुटने की जुड़ी सतह को बदल कर कृत्रिम अंग यानी कृत्रिम घुटने लगाए जाते हैं.

प्रत्यारोपण के लिए कंप्यूटर नेविगेटेड सिस्टम एक अतिरिक्त जांच भी है जोकि प्रत्यारोपण के उचित होने व उस के बैलेंस को जांचता है.

घुटने की विकृति और पैर में विकृति के दौर से गुजरने वाले रोगियों के लिए घुटने प्रतिस्थापन की यह क्रिया बहुत ही लाभकारी है. कंप्यूटर नेविगेटेड द्वारा घुटने को बदल कर उस की विकृति में पूरे सुधार का आश्वासन दिया जाता है.

कंप्यूटर नेविगेटेड घुटना प्रत्यारोपण में वसा ऊतकों के जीवन के प्रति खतरा भी कम होता है क्योंकि इस में जांघ की हड्डी में छेद करने की जरूरत नहीं होती.

घुटने बदलने के लिए कंप्यूटर नेविगेटेड प्रणाली में कैमरे की मदद से कंप्यूटर में 3डी मौडल बनाया जाता है और सर्जरी के दौरान विभिन्न भागों तक पहुंच कर विशेष जांच की जाती है. कंप्यूटर के मार्गदर्शन में घुटने बदलने की नेविगेटेड प्रणाली के साथ घुटना बदल दिया जाता है.

पिन कंप्यूटर नेविगेशन प्रौद्योगिकी तकरीबन एक दशक पहले व्यवहार में आई थी. लेकिन इस में कई गंभीर कमियों के चलते यह लोकप्रिय नहीं बनी. कंप्यूटर असिस्टेड प्रतिस्थापन के पिछले संस्करण में जांघ और पैरों में ड्रिल से अतिरिक्त छेद कर के गाइड को जोड़ा जाता था. जांघ और पैरों में अतिरिक्त छेद करने से कई बार कौंप्लीकेशन होने की संभावना होती थी, मसलन हड्डियों में फ्रैक्चर, पिन से इन्फैक्शन, ड्रिल से छेद करने पर इन्फैक्शन आदि. कंप्यूटर नेविगेशन के पहले संस्करण के फायदे थे लेकिन कुछ अतिरिक्त जटिलताओं की संभावना के साथ.

पिनलैस नेविगेशन के नवीनतम स्टेट में जांघ और पैर की हड्डियों में ड्रिलिंग कर अतिरिक्त छेद करने की आवश्यकता नहीं है. आधुनिक पिनलैस माध्यम को पहले के कंप्यूटर नेविगेशन की तुलना में बेहतर बता कर इस की सिफारिश की गई है. पिनलैस कंप्यूटर नेविगेशन में पहले संस्करण की तुलना में कौंप्लीकेशन और रिस्क न के बराबर हैं.

पिनलैस नेविगेशन एक प्रभावी उपकरण है जो सर्जरी और उस के जोखिम को कम कर देता है. यह जटिलताओं के जोखिम में वृद्धि के बिना बेहतर लाभ देता है. यह उत्तर भारत में पहली पिनलैस प्रणाली है जो बहुत अच्छा परिणाम दे रही है.

कंप्यूटर नेविगटेड सर्जरी एक अत्याधुनिक शल्य चिकित्सा तकनीक है. कंप्यूटर असिस्टेड सर्जरी द्वारा प्रत्यारोपण करने के दौरान रोगी की हड्डियों और जोड़ों के सूक्ष्म बिंदु तक नजर आते हैं जिन्हें नंगी आंखों द्वारा देख पाना संभव नहीं. जिन पर काम किया जाना है वे कौन से बिंदु हैं, इस का अनुमान लगाने के बजाय 1 या 2 डिगरी के अंदर ही कप्यूटर हमें बताता है कि कौन से बिंदु हैं जिन पर काम करना है. जिस तरह कार के टायर पर लगे कवर उस की रक्षा करते हैं उसी तरह इस घुटने प्रत्यारोपण में लंबे समय तक कुल घुटने बदलने की अधिकतम दीर्घायु का आश्वासन दिया जाता है.            

(डा. अनिल अरोड़ा, एचओडी, और्थोपैडिक्स विभाग, मैक्स सुपर स्पैशलिटी अस्पताल, नई दिल्ली )

गोलाकार प्रत्यारोपण के फायदे

तेजी से रिकवरी, प्राकृतिक घुटनों का एहसास, स्थिरता प्रदान होती है, प्रत्यारोपण लंबे समय तक चलता है और सुरक्षित व कारगर तकनीक है.

जौइंट रिप्लेसमैंट यानी जोड़ बदलने की सर्जरी

बौल ऐंड सौकेट हिप जौइंट में फिमोरल नेक, बौल (या सिर) के ठीक नीचे है. इस तरह के फ्रैक्चर में कई बार हड्डी के टूटे हुए हिस्से में खून का प्रवाह कम या बंद हो जाता है. इसलिए, तकरीबन ऐसे सभी मामलों में सर्जरी की जाती है ताकि इसे ठीक किया जा सके. कूल्हे को आंशिक रूप से बदलना हेमिआथ्रोप्लास्टी कहलाता है. इस में बौल और फिमोरल नेक को धातु के एक प्रोस्थेसिस से बदल दिया जाता है. यह स्टेनलैस स्टील या क्रोम कोबाल्ट अलौय का बना होता है. मरीज को पूरी तरह बेहोश किया जाता है या फिर रीढ़ की हड्डी से नीचे के हिस्से को सुन्न कर के डाक्टर एक सुराख बनाते हैं और उस के जरिए उपकरण डाल कर हिप सौकेट से टूटे हुए हैड को निकाला जाता है. कार्टिलेज तथा क्षतिग्रस्त हड्डी को हटा कर नया सौकेट लगाया जाता है. इस में एक बौल स्टेम होता है जिसे सही जगह पर लगा दिया जाता है. मांसपेशियों आदि को सही जगह पर सैट कर दिया जाता है और सुराख को बंद कर दिया जाता है. अगर मरीज को आर्थ्राइटिस या पहले का कोई जख्म हो जिस से जोड़ क्षतिग्रस्त हो गया हो तथा बाकी सब ठीक हो, तो पूरे फिमोरल नेक फ्रैक्चर के लिए कूल्हे को बदला जा सकता है.

टोटल नी रिप्लेसमैंट सर्जरी से घुटने की विकृति जैसी समस्याएं न केवल हल हो सकती हैं बल्कि जिंदगी की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है.

 

‘सहारा समूह’ की संपत्ति होगी नीलाम

समस्याओं में घिरे सहारा समूह की 5 संपत्तियों की ई-नीलामी 4 जुलाई को एचडीएफसी रीयल्टी द्बारा की जाएगी. इन संपत्तियों के लिए आरक्षित आधार मूल्य 722 करोड़ रुपए रखा गया है. सेबी ने कंपनी को सहारा की संपत्ति बेचने का काम सौंपा है।

एचडीएफसी रीयल्टी को 31 भूखंड 2,400 करोड़ रुपए में जबकि एसबीआई कैप को 30 भूखंड करीब 4,100 करोड़ रुपए के अनुमानित बाजार मूल्य पर बेचने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद एचडीएफसी रीयल्टी तथा एसबीआई कैप को सहारा की संपत्ति बेचने का जिम्मा सौंपा है. इन संपत्तियों के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज समूह ने उच्चतम न्यायालय के पास जमा कराये हैं. न्यायालय से अनुमति मिलने के बाद दोनों इकाइयों ने इन संपत्तियों की नीलामी के लिए कदम उठाए हैं.

एक सार्वजनिक नोटिस में एचडीएफसी रीयल्टी ने कहा कि वह 4 जुलाई को पूर्वाह्न 11 बजे से 12 बजे तक 5 भूखंडों की नीलामी करेगी. इन संपत्तियों से करीब 722 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है.

ये संपत्तियां आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा उत्तरप्रदेश में स्थित हैं. इसमें कृषि एवं गैर-कृषि भूखंड शामिल हैं. नीलामी में रुचि रखने वाले बोलीदाता 10 जून को भूखंड का निरीक्षण कर सकते हैं. न्यायालय के आदेश के अनुसार इन संपत्तियों को सर्कल दर के 90% से कम भाव पर नहीं बेचा जा सकता है.

2 साल जेल में रहने के बाद सहारा प्रमुख सुब्रत राय इस समय पैरोल पर हैं. उन्हें सेबी के साथ लंबे समय से जारी विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय ने जेल भेजा था.

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