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पैसों से ज्यादा जरूरी ‘चंगी’ नौकरी

एक सर्वे के मुताबिक भारतीय कर्मचारी अमरीकी व ब्रिटेन के कर्मचारियों से ज्यादा सकारात्मक व लचीले होते हैं. इनमें से आधे तो अपनी आदर्श नौकरी को वरीयता देते हैं, फिर चाहे उसमें पैसा कम ही क्यों न मिले. एडोब की एक रिपोर्ट वर्क इन प्रोग्रेस में यह बात सामने आई है. इसके मुताबिक भारतीय अपने काम से इतना प्यार करते हैं कि 98 प्रतिशत लोग कोई लॉटरी लगने के बाद भी अपनी नौकरी नहीं छोड़ेंगे.

सर्वे के अनुसार 83 प्रतिशत भारतीय कर्मचारी अपनी नोकरियों से प्यार करते हैं, उनकी इस संतुष्टि में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तक पहुंच का बहुत बड़ा योगदान है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारतीय कर्मचारियों के लिए वेतन ही सबकुछ नहीं है.

लगभग आधे भारतीय कर्मचारी अपने लिए आदर्श नौकरी करेंगे चाहे वहां पैसा कम हो. यहा सर्वे विभिन्न कार्यालयों में कार्यरत 500 से अधिक भारतीय कार्यालय कर्मचारियों की राय पर आधारित है जो दैनिक रूप से कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं.

स्वामी ने राजन पर फिर से साधा निशाना

भारतीय जनता पार्टी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर एक बार फिर गंभीर आरोप लगाया है. स्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राजन के खिलाफ सीबीआई के अंतर्गत बनाई गई एसआईटी से जांच की मांग की है.

स्वामी ने आरोप लगाया है कि आरबीआई ने स्मॉल फाइनेंस बैंक (एसएफबी) के लिए लाइसेंस देने में धांधली की है. उनका कहना है कि सरकारी नीति के तहत जिन संस्थाओं ने बैंक लाइसेंस के लिए आवेदन किया और जिन संस्थाओं को लाइसेंस दिए गए, उनमें से किसी ने भी शर्तें पूरी नहीं की. बावजूद इसके उन्हें लाइसेंस दे दिए गए. स्वामी का कहना है कि इससे पता लगता है कि लाइसेंस देने में नियमों की अनदेखी की गई है, लिहाजा इरादे शक के घेरे में हैं. स्वामी का आरोप है कि पूरे मामले में भ्रष्टाचार हुआ है. इसकी जांच की जानी चाहिए.

स्मॉल फाइनेंस बैंक के लिए कुल 72 आवेदनों में से केवल 10 पात्र पाए गए. स्वामी का दावा है कि इनमें से आधे से ज्यादा तय शर्तें पूरी नहीं करते. स्वामी ने अपने पत्र में बताया है कि सफल आवेदकों में आरबीआई की गाइडलाइन के उलट विदेशी होल्डिंग वाले लोग हैं. कई तो पूरी तरह विदेशी हैं.

चिदंबरम भी निशाने पर

स्वामी ने कांग्रेस नेता और पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम पर भी निशाना साधा है. पीएम को लिखी चिट्ठी में उन्होंने कहा है कि वित्त मंत्रालय में अब भी कई अधिकारी चिदंबरम के पसंद के या फिर करीबी हैं. इस पूरे मामले में मनी लांड्रिंग की आशंका है. हो सकता है, इसके जरिए नेताओं और नौकरशाहों को फायदा पहुंचाया गया हो.

ऐसे चुनें स्मार्टफोन के लिए चार्जर

कुछ भी हो जाए स्मार्टफोन और टैबलेट जैसे डिवाइस में बैटरी खत्म हो जाए या कम हो जाए वो आज के युवा को बिलकुल पसंद नहीं है. इसीलिए गाड़ी में बढ़िया चार्जर रखना काफी काम की चीज होती है. इसके बाद गाड़ी से जब भी कहीं जा रहे हैं तो थोड़ी देर में बैटरी में थोड़ी जान फूंकी जा सकती है.

अगर सैमसंग या एप्पल का स्मार्टफोन है तो उसी कंपनी का चार्जर रखने वाले दिन अब लद गए हैं. माइक्रो यूएसबी चार्जर आने के कारण आपको अब पहले की तरह चार्जर ढूंढना नहीं पड़ेगा. ऐसे चार्जर या उसकी तार खरीदते समय आप किन बातों का ध्यान रख सकते हैं आइए आपको बताते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान

स्मार्टफोन के चार्जिंग के लिए कुछ चीजें अहम हैं.

– पावर या बिजली (वॉट में),

– करंट (एम्पीयर में)

– और वोल्टेज (वोल्ट में).

टैबलेट की बैटरी स्मार्टफोन से ज्यादा कैपेसिटी की होती है इसलिए उसके लिए जो तार या चार्जर चाहिए उसकी रेटिंग  ज्यादा  होनी चाहिए. इसीलिए चार्जर या उसकी तार की एम्पीयर की संख्या पर नजर जरूर रखिये. चार्जिंग के लिए सबसे बढ़िया तार वो होती है जो आपकी डिवाइस के साथ आती है.

आप कौन-सा चार्जर चाहते हैं

चार्जर तीन तरह के होते हैं.  

– फास्ट चार्जर

– रैपिड चार्जर

– ट्रिकल चार्जर

तीनों के अपने अपने फायदे हैं और चार्जिंग की रफ्तार उसी अनुसार अलग-अलग है. कोई भी स्मार्टफोन की बैटरी को सबसे जल्दी फास्ट चार्जर तैयार कर सकता है.

ट्रिकल चार्जर अपना काम काफी कम रफ्तार पर करता है लेकिन उसका फायदा ये है कि स्मार्टफोन गर्म नहीं होता है. चार्ज होने के बाद भी अगर ट्रिकल चार्जर से स्मार्टफोन कनेक्टेड रहता है तो उसकी बैटरी को कोई नुकसान नहीं होगा. अपनी जरुरत के अनुसार आप इन तीनों तरह में से एक चुन सकते हैं.

पोर्ट का रखें ध्यान

घर के इस्तेमाल के लिए तीन या चार यूएसबी पोर्ट वाले चार्जर खरीद लें तो हर कोने के लिए अलग चार्जर की जरुरत नहीं होगी. उससे एक से  ज्यादा  डिवाइस आसानी से चार्ज किया जा सकता है. अगर दो पोर्ट वाले यूएसबी चार्जर खरीद रहे हैं तो हर पोर्ट के लिए कम से कम 2.1 एम्पीयर पावर जरूर होनी चाहिए.

गाड़ी की सिगरेट लाइटर की सॉकेट में जो भी चार्जर लगता है उसकी एम्पीयर  ज्यादा  होने पर आपके लिए बढ़िया होता. गाड़ी के लिए अगर दो पोर्ट वाला यूएसबी चार्जर 2.4 एम्पीयर वाली रेटिंग का है तो वो आपके स्मार्टफोन के लिए पूरा नहीं पड़ेगा.

आजकल कई लोग दो स्मार्टफोन या दो फोन रखते हैं. अगर चलती गाड़ी में दो स्मार्टफोन एक साथ चार्ज करना है तो कम से कम 4.8 एम्पीयर रेटिंग वाला चार्जर आपके लिए काम कर सकता है. इसीलिए एक  ज्यादा  पोर्ट वाले चार्जर गाड़ी के लिए बहुत ज़रूरी है. अगर गाड़ी में आपके साथ एक से  ज्यादा  दोस्त हैं तो ऐसी स्थिति को सोच कर आप तीन पोर्ट वाला चार्जर भी खरीदने की सोच सकते हैं.

छोटे तार की भी आपको जरुरत है क्योंकि जब आप डेस्क पर काम कर रहे हैं तो चार्जिंग के लिए वो एक फुट से कम लम्बी तार काफी बढ़िया होती है. स्मार्टफोन या टैबलेट को जब चार्ज करना है वैसी जरुरत के लिए आपको लम्बी तार चाहिए. हो सकता है आप एक दो ऐसी तार अपने पास बैकअप के लिए भी रखते हैं.

ज्यादा तर स्मार्टफोन के चार्जिंग केबल एक जैसे ही दिखते हैं. उनकी समानता बस वहीं खत्म हो जाती है और उनके अंदर कि इंजीनियरिंग के कारण चार्जिंग की रफ्तार अलग होती है. इसीलिए उन्हें खरीदते समय काफी सावधान रहना चाहिए ताकि वो तार  ज्यादा  दिन चले और स्मार्टफोन को नुकसान भी नहीं पहुंचाए.

स्मार्टफोन हो सकता है गर्म

गलत चार्जर से जो स्मार्टफोन दो घंटे में चार्ज होना चाहिए वो कहीं उससे दुगना समय नहीं ले. इसीलिए सभी डिवाइस के लिए अलग रेटिंग वाले चार्जर की जरुरत होती है. लेकिन अगर  ज्यादा  एम्पीयर वाले चार्जर आप अपने स्मार्टफोन के लिए इस्तेमाल करेंगे तो उससे कोई नुकसान नहीं होगा. हां, जल्दी चार्जिंग का मतलब है स्मार्टफोन थोड़ा गर्म हो जाएगा.

यूएसबी केबल है बढ़िया ऑप्शन

गाड़ी के लिए जो चार्जिंग केबल होता है वो चार्जर से जुड़ा नहीं हो तो बढ़िया होगा. इससे अगर तार खराब हो जाती है तो आपको चार्जर खरीदने की जरुरत नहीं पड़ेगी. चार्जर अगर बढ़िया हो और उसकी तार की क्वालिटी खराब हो तो चार्जिंग की रफ्तार धीमी हो जाती है. इसलिए जरूरी है कि बढ़िया चार्जिंग की तार साथ में खरीदें.

अगर आपको काम से एक शहर से दूसरे अक्सर जाना पड़ता है तो शायद आप ऐसे केबल रखना चाहेंगे जिन्हें मोड़ कर बढ़िया से रखा जा सकता है. अक्सर देखा गया है कि पतली तार वाले तार चार्जिंग की रफ्तार धीमी कर देते हैं. चार्जिंग की कम रफ्तार से अगर काम चल जाता है तो ऐसी तार आपके काम की चीज है.

वायरलेस चार्जर

आजकल महंगे स्मार्टफोन में वायरलेस चार्जिंग की भी सुविधा होती है. महंगी डिवाइस के लिए ये चार्जर भी काफी महंगे होते हैं. लेकिन परेशानी ये हैं कि अगर आपने स्मार्टफोन चार्जर पर ठीक से नहीं रखा तो वो चार्ज नहीं होगा.

कट्टरता में उड़ गई ‘लखनवी तहजीब’

उत्तर प्रदेश में फिल्मों की शूटिंग को लेकर प्रदेश सरकार बडे बडे दावे कर रही है. म्यूजिक एलबम ‘सांवरे’ की शूटिंग के समय राजधानी लखनऊ में ही इन दावों की पोल खुलती दिखी. यह एलबम बडे कलाकारों कुणाल खेमू, वर्तिका सिंह, पाकिस्तानी सिंगर राहत फतेह अली खान और अनुपमा राग जैसे बड़े कलाकारों को लेकर बन रहा है. इसकी शूंटिंग लखनऊ के इमामबाडा, नरही, अम्बेडकर पार्क जैसी जगहो पर होनी थी. शूटिंग की शुरूआत लखनऊ के मशहूर इमामबाडा के नौबतखाना के पास होनी थी. म्यूजिक एलबम के प्रोडयूसर निखिल द्विवेदी ने शूटिंग की अनुमति के लिये जिला प्रशासन को पत्र लिखा. अनुमति मिलने में देर लग रही थी.

शूटिंग में देर न हो बाहर से आये कलाकारों को परेशानी न हो इसलिये शूटिंग शुरू कर दी गई. इस बात का पता चलते ही कुछ कट्टरवादी तत्व शूटिंग बंद करने और वहां तोडफोड करने पहुंच गये. उन लोगों ने कलाकारों के साथ मारपीट की, शूटिंग बंद कराई और शूटिंग के लिये आई बस पर तोडफोड की, शूटिंग के लिये लगे स्टेज को तहसनहस कर दिया. इसके बाद पहुंची लखनऊ पुलिस ने ममाले को रफादफा कर दिया.

अगले दिन शूटिंग अम्बेडकर पार्क और बाकी जगहो पर शुरू हो पाई. जिला और पुलिस प्रशासन ऐसे कार्यक्रमों की अनुमित देने में अनावश्यक देर लगाता है. इस तरह का उपद्रव करने वालों के खिलाफ कोई कडी सजा नही दी जाती जिससे कटटरवादी तत्वों के हौसले बढते है.ऐसी घटनाओं के चलते उत्तर प्रदेश में सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी अच्छी फिल्मों की शूटिंग शुरू नहीं हो पायेगी. अगर शूटिंग की अनुमित नहीं थी ओर शूटिंग हो रही थी तो उसको रोकने के लिये पुलिस में शिकायत की जा सकती थी. कानून को अपने हाथ मे लेने का अधिकार किसी भी सभ्य समाज में नहीं होती. पूरी दुनिया में लखनवी अदब और तहजीब की चर्चा होती है. लोग उसकी तारीफ करते है. दूसरी तरफ लखनऊ में ही इस तहजीब और अदब की बखिया उधेडी जा रही है. इमामबाडा लखनऊ की बहुत बडी पहचान है. फिल्मों में इमामबाडा को दिखाने को प्रयास शूटिंग में किया जाता है. कट्टरवादी लोग कई बार इस तरह के काम कर चुके है जिससे लोग अब इमामबाडा आने से बचने लगे है. अगर यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो लोग इमामबाडा भूल जायेगे.

एलबम ‘सांवरे’ में पाकिस्तानी सिंगर राहत फतेहअली खान ने गाने गाये है. यह गाने लखनऊ की अनुपमा राग ने लिखे और कम्पोज किये है. एलबम में वर्तिका सिंह और कुणाल खेमू ने अपने अभिनय को दिखाया है. पाकिस्तान से लखनऊ आये राहत फतेहअली खान पर इन घटनाओं का प्रभाव पडा. वह जो सोच कर लखनऊ आये थे यहां उसका उल्टा देखने को मिला. उत्तर प्रदेश सरकार अगर यह चाहती है कि लोग फिल्मों की शूटिंग करने आये तो उनकी सुरक्षा और सम्मान की तरफ ध्यान देना होगा. ऐसे कट्टरवादी तत्वों से सख्ती से पेश आना होगा, नहीं तो किसी न किसी बहाने ऐसे लोगो की भावनायें आहत होती रहेंगी. जिससे वह तोडफोड करते रहेगे. लखनऊ और उत्तर प्रदेश सरकार दोनो की छवि के लिये यह सही नहीं है.   

बच्चों को सिखाएं शेयरिंग की आदत

आजकल अधिकतर परिवार एकाकी होते हैं. परिवार में बच्चों की संख्या भी कम होती है. अधिकतर मातापिता की 1-2 संताने ही होती हैं. देखा जाए तो परिवार नियोजन के तहत यह अच्छा भी है, लेकिन बच्चों के व्यक्तिगत विकास की बात की जाए, तो एकाकी परिवारों में बच्चों को सामाजिक व्यवहार सीखने बहुत कठिनाइयां होती हैं. खासतौर पर बात जब शेयरिंग की होती है, तो ऐसे परिवार के बच्चे जल्दी अपनी वस्तुओं को दूसरे बच्चों के साथ शेयर करने के लिए तैयार नहीं हो पाते कयोंकि घर में उन्हें इतनी प्राइवेसी मिल चुकी होती है और अपने प्रत्येक सामान के वे अकेले मालिक हो चुके होते हैं कि उन को अपने सामान को किसी और द्वारा इस्तेमाल किया जाना स्वीकार नहीं होता.

कहने के लिए तो शेयरिंग की आदत बच्चों में डलवाना बहुत छोटी सी बात है. लेकिन यही छोटीछोटी बातें बच्चों के विकास में बहुत एहमियत रखती हैं. ज्यादातर मातापिता इस बात पर ध्यान नहीं देते, जबकि बच्चे के 3 वर्ष के होने के बाद से उन में अच्छी आदतों का प्रवाह करना बहुत जरूरी है. इन आदतों में शेयरिंग की आदत सब से अव्वल है क्योंकि यही वह उम्र होती है जब मातापिता बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाते हैं.

दरअसल, स्कूल एक ऐसा स्थान होता है जहां बच्चों को अपनी जगह से ले कर कौपीकिताबें यहां तक की खानेपीने का सामान तक सभी कुछ साथी बच्चों से शेयर करना पड़ता है. ऐसे में यदि मातापिता ने अपने बच्चे में पहले से यह आदत नहीं डलवाई है, तो उसे बहुत ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. बच्चों को किसी भी तरह की दिक्कतों का सामना न करना पड़े और उन के व्यक्तित्व विकास में कोई रुकावट न आए, इस के लिए मातापिता अपने बच्चों में छोटेछोटे प्रयासों से शेयरिंग की आदत डलवा सकते हैं. इस के लिए आप को घर से ही शुरुआत करनी होगी. आइए, हम आपको बताते हैं कैसे डालें बच्चों में शेयरिंग की आदत:

1. घर पर माहौल खुशनुमा बनाएं:  घर बच्चों का पहला स्कूल होता है और मातापिता पहले अध्यापक होते हैं . इसलिए घर पर ही बच्चों को अपना सामान दूसरों से शेयर करने की आदत डलवाएं. खासतौर पर खानेपीने की वस्तुओं में शेयरिंग की भावना का बहुत महत्व है. यदि घर में 2 बच्चे हैं, तो दोनों को अलगअलग एक ही सामान देने की जगह एक सामान ही दें और दोनों को बारीबारी से उसे शेयर करने को कहें. इस से बच्चे में किसी भी सामान पर अपना अधिकार जमाने और उस के लिए लड़ने जैसी भावना विकसित नहीं हो पाएगी और यदि घर में एक ही बच्चा है, तो उसे परिवार के बाकी सदस्यों के साथ अपना सामान शेयर करने की आदत डलवाएं. उदाहरण के तौर पर, बच्चे को एक चिप्स का पैकेट दिलाने के बाद उस से कहें कि वह इसे खाने से पहले घर के सभी सदस्यों को पूछे. इतना ही नहीं, बच्चे द्वारा पूछने पर औपचारिकता ही सही एक चिप्स पैकेट में से जरूर लें और उसे इस के लिए शुक्रिया भी कहें ताकि बच्चें को एहसास हो जाए की वह कुछ अच्छा काम कर रहा है.

2. बच्चों को बताएं किस वस्तु को कर सकते हैं शेयरः  इस बात से आप भी वाकिफ हैं कि हर चीज को दूसरों से शेयर नहीं किया जा सकता है. मगर वह कौनकौन सी चीजें हैं, जिन्हें शेयर किया जा सकता है, इस की जानकारी आप को बच्चे को देनी पड़ेगी. बच्चे अपने उस सामान को किसी से भी शेयर नहीं कर सकते जो उन के पास एक ही हो और सिर्फ उन के लिए ही लिया गया हो. आप को उन्हें यह भी बताना पड़ेगा कि किस वस्तु को किस के साथ शेयर करना है और इस से उन्हें क्या लाभ मिलेगा. जैसे बच्चों को बताएं कि अपने खिलौनों को अकेले खेलने से ज्यादा किसी दोस्त के साथ खेलने में ज्यादा मजा आएगा. दरअसल, जो बच्चे अकेले रहते हैं उन्हें अकेले खेलने में ही मजा आता है. लेकिन अकेले खेलना उन की मानसिक, शारीरिक और व्यक्तिगत विकास पर बुरा प्रभाव डालता है.

3. क्यों जरूरी है शेयरिंगः  बच्चे अपने सामान को लेकर बहुत ही पजेसिव होते हैं. अपने सामान के साथ वह एक अपना अलग ही कंफर्ट जोन बना लेते हैं. यह कंफर्ट जोन उन्हें विपरीत परिस्थितियों का सामना करने में असमर्थ बना देता है. जैसे घर में 2 बच्चे हैं, दोनों के पास अपनेअपने क्रियोन कलर्स हैं. एक बच्चे के पास कुछ कलर्स कम हो जाते हैं. ऐसे में दूसरे बच्चे को जब उस के कलर्स को शेयर करने के लिए कहा जाता है तो वह तुरंत ही तुनकते हुए कहता है कि मैं क्यों दूं, ये तो मम्मीपापा ने मुझे दिलाया है. मैं नहीं दूंगा/दूंगी. इस स्थिति में आपको नए कलर्स खरीद कर ही दूसरे बच्चे को देने पड़ेंगे. अब खुद सोचिए, बच्चों में शेयरिंग की आदत होती तो आप के पैसे बच सकते थे.

वैसे बात सिर्फ पैसों की नहीं है. शेयरिंग की भावना  बच्चों में अहंकार जैसी गलत भावना को भी प्रवेश नहीं करने देती. इतना ही नहीं, शेयरिंग हैबिट रखने वाले बच्चे ही बड़े हो कर व्यवहारकुशल और सहयोगी प्रवृत्ति के बनते हैं. साथ ही उन में अपनों का खयाल रखने और उन की जरूरत समझने की समझ भी आती है. ऐसे बच्चे अपनी पर्सनल और प्रोफैशनल दोनों ही जीवन में सफल रहते हैं.

4. कैसे डलवाएं आदतः  शेयरिंग की आदत डलवाने के लिए सब से बेहतर तरीका है बच्चों को ऐसी सिचुऐशन दें जिस में उसे सभी से सामान शेयर करने के लिए खुद ही पूछना पड़े. उदाहरण के तौर पर दो बच्चे हैं, तो एक को बैट और एक को बौल दिलाएं. अब बैट के इस्तेमाल के लिए बौल का होना जरूरी है इसलिए बैट वाले बच्चे को बौल के लिए अपना बैट बौल वाले बच्चे से शेयर करना ही पड़ेगा. इसी तरह यदि बच्चा एक ही है तो उसे दूसरे तरीके से शयरिंग करना सिखया जा सकता है. जैसे, आप ने आईस्क्रीम खाने का प्लान बनाया है, तो आप तीनों (माता, पिता और बच्चे) अलगअलग फ्लैवर की आईस्क्रीम लें. जाहिर है,  बच्चे का मन चलेगा की वह आप की आइस्क्रीम भी टेस्ट करे. ऐसे में उस से कहें कि पहले वह भी अपनी आईस्क्रीम शेयर करे. इस तरह बच्चा समझ पाएगा की दूसरे से उन के सामान की अपेक्षा तब ही की जा सकती है, जब खुद भी सामान को शेयर करने के लिए तैयार हों.

भावनाएं भी करें शेयर

बच्चों को सिर्फ सामान की शेयरिंग ही न सिखाएं बल्कि उन्हें खुद से और अपने दोस्तों से भावनाओं को जाहिर करने का तरीका भी सिखाएं. कई बार बच्चे संकोची स्वभाव के होते हैं. चाहते हुए भी किसी से सहयोग मांगने में हिचकिचाते हैं. लेकिन बच्चों को सिखाएं कि सहयोग देना और लेना दोनों ही अनिवार्य है.

न करें जबरदस्तीः

बच्चों को डांट कर उन के सामान को शेयर करने के लिए विवश न करें. इस से बच्चा चिड़चिड़ा हो जाएगा. बच्चों को समझाएं कि यदि वह अपना सामान किसी और से शेयर करेगे तो दूसरे लोग भी जरूरत पड़ने पर अपना सामान उन को इस्तेमाल करने के लिए देंगे.

लुढ़कता सेंसर बोर्ड और उड़ता पंजाब

फिल्म उड़ता पंजाब को लेकर बीते महीने से सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सेंसर बोर्ड) ने काफी हल्ला मचा रखा थाकरीब 90 कट्स के साथ फिल्म को क्लियर करने की जिद पर अड़े सेंसर बोर्ड के खिलाफ फिल्म के निर्माताओं ने भी मोर्चा खोला और अदालत का दरवाजा भी खटखटाया. अदालत के दखल के बाद मामला कुछ इस तरह सुलझा कि अब पंजाब तो उड़ता नजर आ रहा है साथ ही सेंसर बोर्ड के पर भी क़तर दिए हैं जिससे वह लुढ़कता नजर आ रहा है.

यह पहली बार नहीं हुआ है जब कोर्ट से सेंसर को फटकार मिली हो. बंबई हाई कोर्ट का जिस फिल्म पर सेंसर इतनी कैंची चलने को बेताब था, उस फिल्म को सिर्फ एक कट के साथ रिलीज करने का फैसला बताता है कि सेंसर की जिद कितनी बेमानी थी. इस से पहले भी सेंसर बोर्ड की जेम्स बांड समेत कई फिल्मों में जबरन कांटछांट को लेकर फजीहत हो चुकी है.

गौरतलब है कि सेंसर बोर्ड से मतभेद के बाद विवादों में घिरी अनुराग कश्यप की फिल्म 'उड़ता पंजाब' को बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिलीज की मंजूरी दे दी है. अभिषेक चौबे के निर्देशन में बनी फिल्म और शाहिद कपूर, आलिया भट्ट, करीना कपूर और दिलजीत दोसांज स्टारर 17 जून को रिलीज होगी. सेंसर बोर्ड ने पहले फिल्म में कुल 89 कट लगाए थे और फिल्म के 73 फीसदी हिस्से को मंजूरी दी थी. लेकिन अब मामला पूरी तरह से उलट गया है. सबसे बड़ी जीत तो निर्माताओं फिल्म के टाइटल पर मिली है. कोर्ट ने फिल्म से पंजाब शब्द को हटाने की सेंसर बोर्ड की दलील खारिज कर दी है और अब फिल्म उड़ता पंजाब के नाम से ही रिलीज होगी.

कोर्ट ने कहा कि फिल्म की स्क्रिप्ट और नाम में ऐसा कुछ भी नहीं है कि देश की एकता या संप्रभुता को चोट पहुंचे. कोर्ट ने ने हर उस पॉइंट पर सेंसर को लताड़ लगाईं जिस के आधार पर वह फिल्म की रिलीज पर टांग अड़ा रही थी, मसलन न तो फिल्म ड्रग्स का गुणगान कर रही है और न ही किसी राज्य या देश के खिलाफ कोई टिप्पड़ी करती है.

बता दें की फिल्म के कई सीन्स पर सेंसर को ऐतराज था जैसे एमपी और एमएलए और चुनाव वाली सीन. इस पर कोर्ट ने कहा कि ये सामान्य राजनीतिक चीजों को दिखलाते हैं. और नशा लेने वाले क्लोज अप सीन हटाने पर कोर्ट का कहना था कि ड्रग लेने के एक मात्र सीन से किसी आदेश का उल्लंघन नहीं होता है. जिस फिल्म में ड्रग्स जैसे विषय को फोकस कर युवाओं को चेताया जा रहा है उस विषय को प्रोतसाहन मिलना चाहिए. कोर्ट भी कहता है कि राज्य में जितनी आसानी से ड्रग उपलब्ध है और इसे रोकने के लिए तैनात किए गए लोग अपना काम सही से नहीं कर पा रहे वह चिंता का विषय है. फिल्म के सभी किरदार इस समस्या को बखूबी पेश करते हैं.

हालांकि फिल्म ने उस सीन को हटाने पर मुहर लगा दी है जिस सीन में टॉमी सिंह यानी शाहिद कपूर का किरदार स्टेज से भीड़ के सामने पेशाब करता नजर आता है. सिर्फ यही एक कट है जो कोर्ट ने मंजूर किया है. इसके साथ ही 3 डिस्क्लेमर लगाने का भी आदेश दिया है. इसके अलावा जमीन बंजर तो औलाद कंजर संवाद पर भी कोर्ट ने कोई कैंची चलने से इनकार करते हुए कहा कि पंजाब की जमीन कितनी उपजाऊ है, बताने की जरूरत नहीं है और इस तरह के डायलोग से राज्य की छवि बदल नहीं जायेगी.

हालांकि कोर्ट ने फिल्म में जबरन गाली डालने पर ऐतराज जताया है. कोर्ट के मुताबिक़ बोर्ड को किसी फिल्म को सेंसर करने का कोई अधिकार नहीं है. फिल्मकार को कैसी फिल्म बनानी चाहिए, यह उसे कोई नहीं बता सकता है.

जिस तरह से फिल्म के समर्थन में बौलीवुड उतरा है उसी सार्थक संकेत यह जाता है कि सेंसर बोर्ड की मनमानी हर समय नहीं चलेगी. खुद कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि दर्शकों को पता होता है कि उसे कौन सी फिल्म देखनी है. और कौन सी नहीं. उनके विवेक पर भरोसा रखें और सेंसर शब्द मीडिया का बनाया हुआ है, आपका काम फिल्मों को सर्टिफिकेट देना है. इरफ़ान भी यही बात दोहराते हुए कहते हैं की लोगों को यही नहीं पता कि यह सेंसर बोर्ड है या प्रमाणन संस्था. जब कभी कोई मुद्दा उठाया जाता है तो पूरा देश ही सेंसर बोर्ड बन जाता है. फिल्म इंडस्ट्री सरकार को 4000 करोड़ से ज्यादा की कर अदा करती है. फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी को लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री को एक साथ मिलकर सेंसर बोर्ड के खिलाफ खड़ा होना चाहिए.

बहरहाल कोर्ट की फटकार के बाद लगता है कि सैंसर बोर्ड की मनमानी पर अंकुश लगेगा.

तंबाकू के धुएं में दम तोड़ता इंसान

क्या आप जानते हैं, धूम्रपान के कारण भारत में हर साल तकरीबन 10 लाख लोगों की जान चली जाती है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे – 4 के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में 13 राज्यों में कराए गए सर्वे के मुताबिक तंबाकू खाने वालों की संख्या 47% के करीब है. वैश्विक स्तर पर लगभग 60 लाख लोग हर साल तंबाकू की बलि चढ़ते हैं, जिन में 10% यानि 6 लाख लोग नौन स्मोकर होने के बावजूद पैसिव स्मोकिंग का शिकार होते हैं.

नयति सुपर स्पेशिएलिटी हौस्पीटल, मथुरा द्वारा कराए गए एक रिसर्च के मुताबिक अकेले प. उत्तर प्रदेश की करीब 21% आबादी तंबाकू के  लत की शिकार है. यह भी पाया गया कि 45 साल या अधिक की आयुवर्ग के लोगों में तंबाकू का प्रयोग आम है जबकि युवा आबादी धूम्रपान की गिरफ्त में है. धूम्रपान करने वाली 55% आबादी की उम्र 25 से 45 साल पाई गई.

बी एल के सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टर तपस्विनी शर्मा के मुताबिक़ तंबाकू की लत ओरल कैविटी, कंठनली, ग्रासनली, पेनक्रियाज, आंत और किडनी तथा फेफड़ों के कैंसर का कारण बनती है. तंबाकू की लत का सीधा संबंध सभी तरह के कैंसर से होने वाली लगभग 30 प्रतिशत मौत से होता है. धूम्रपान करने वाले धूम्रपान नहीं करने वालों की तुलना में औसतन 15 साल पहले काल का ग्रास बन जाते हैं. सिगरेट, पाइप, सिगार, हुक्का, शीशा पीने और तंबाकू चबाने और सूंघने जैसे तंबाकू सेवन के अन्य तरीके खतरनाक और व्यसनी होते हैं. तंबाकू में मौजूद निकोटिन मस्तिष्क में डोपामाइन एवं एंड्रोफाइन जैसे केमिकल्स का स्तर बढ़ा देता है जिस से इस की लत लग जाती है. ये केमिकल्स आनंद का अहसास कराते हैं और इसलिए तंबाकू उत्पादें की ललक बढ़ जाती है. यदि कोई व्यक्ति इस लत को छोड़ना भी चाहता है तो उसे चिड़चिड़ाहट, बेचैनी, अवसाद और एकाग्रता की कमी जैसी परेशानियों से गुजरना पड़ता है.

तंबाकू और तंबाकू के धुएं में लगभग 4,000 केमिकल्स पाए जाते हैं, जिन में से 250 केमिकल्स जहरीले होते हैं और 60 केमिकल्स कैंसर (कैंसरकारी तत्त्व) का कारण बनते हैं. तंबाकू के धुएं रक्त नलिकाओं को सख्त बना देते हैं जिस से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. इस में कार्बन मोनो आक्साइड भी होता है जो रक्त में आक्सीजन की मात्रा घटा देता है. आम तौर पर सिगरेट नहीं पीने वालों के मुकाबले सिगरेट पीने वालों में कोरोनरी आर्टरी रोगों से होने वाली मृत्यु दर 70 प्रतिशत अधिक रहती है. गर्भकाल के दौरान मां के धूम्रपान की लत के कारण समय पूर्व बच्चे का जन्म, बारबार गर्भपात की घटनाएं, मृत शिशु का जन्म और बच्चे का वजन कम होने का खतरा रहता है.

धूम्रपान के कारण पुरुषों में फेफड़े के कैंसर के 90 प्रतिशत मामले जबकि महिलाओं में 80 प्रतिशत मामले देखे गए हैं. तंबाकू का धुआं  नानस्मोकर्स और खास कर बच्चों के लिए भी उतना ही खतरनाक होता है. धूम्रपान करने वाला कोई व्यक्ति न सिर्फ खुद की सेहत को खतरे में डालता है बल्कि उस के आसपास मौजूद लोगों, मसलन सहकर्मियों और परिवार के सदस्यों, की जिंदगी भी खतरे में डाल देता है और उन्हें कैंसर, हृदय रोग तथा स्ट्रोक एवं फेफड़े का संक्रमण का खतरा बहुत ज्यादा रहता है. धूम्रपान करने वालों के बच्चों में अस्थमा, ब्रोनकाइटिस, साइनस संक्रमण और मानसिक थकान जैसी समस्याएं बढ़ने का खतरा अधिक रहता है. धूम्रपान करने की लत अमूमन किशोरावस्था में ही लगती है और वयस्क होतेहोते लोग इस के आदी हो जाते हैं. इस की लत की चपेट में आने वाले व्यक्तियों को इस बात का एहसास नहीं होता कि वे क्या कर रहे हैं या किस चीज का इस्तेमाल कर रहे हैं. उन की लत इस हद तक पहुंच जाती है  कि यह उन के शरीर के लिए नुकसानदेह बन जाती है.

बाद में देखा गया कि धूम्रपान की लत प्रोफेशनल्स में बढ़ी है. संभवतः वे बहुत ज्यादा तनाव और काम के दबाव में रहने तथा आर्थिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं से घिरे होने के कारण ऐसा करते हैं. भले ही वे कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन खुद का और अपने परिवार का भरणपोषण करने के लिए उन के पास धन पर्याप्त नहीं होता है. कुछ लोगों को गलत शादियां या गलत संबंधों के कारण शारीरिक एवं या जुबानी तकलीफ झेलनी पड़ती है. अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए अपना लक्ष्य पूरा करने का दबाव भी उन पर अधिक रहता है. वे देर रात तक काम करते हैं या शिफ्ट में नौकरी करते हैं इसलिए उन की नींद भी पूरी नहीं हो पाती है. इन में से कई प्रोफेशनल्स औफिस जौब करते हैं और ज्यादातर वक्त औफिस के अंदर ही सिमटे रहते हैं. ऐसे लोगों में सुकून का एहसास पाने या कठिन दौर से उबरने के लिए धूम्रपान की प्रवृत्ति देखी गई है.

तंबाकू छोड़ने के उपाय

अगर एक बार किसी व्यक्ति को तंबाकू की लत लग जाती है तो उस व्यक्ति के लिए इसे छोड़ पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. व्यक्ति यदि इस को छोड़ने का प्रयास भी करता है तो उसे सिरदर्द, अनिद्रा, तनाव, बेचैनी, हाथपैर कांपने और भूख न लगने की शिकायत या खून की उलटी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. तंबाकू छोड़ने के इन प्रयासों को अंग्रेजी में विड्रावल लक्षण कहा जाता है.तब व्यक्ति स्वयं को एक तरह के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाता है.

ऐसे छोड़ें तंबाकू की लत

·         तंबाकू छोड़ने के लिए सब से जरूरी है, इसे छोड़ने का पक्का फैसला करना.

·         तंबाकू एक झटके में छोड़ना मुश्किल है. धीरेधीरे मात्रा कम करते हुए छोड़ें.

·         अपने मित्रों, परिचितों व रिश्तेदारों को भी बता दें कि आप ने नशा छोड़ दिया है और वे आप को नशा करने के लिए बाध्य न करें.

·         अपने पास सिगरेट, तंबाकू, गुटका, माचिस आदि रखना छोड़ दें.

·         जब आप खुद को सारा दिन व्यस्त रखते हो, तो आप का ध्यान तंबाकू की तरफ जाता ही नहीं.

·         थोड़ा वक्त योगा और प्राणायाम को दें.

·         अच्छा आहार और समय पर आराम जैसी बातों का खयाल रखें.

·         नशा करने वाले दोस्तों की संगत छोड़ दें.

·         तंबाकू छोड़ने के लिए आप बिना शुगर वाली चुइंगम/मुलेठी आदि चबाते रहे. फिर आप को तंबाकू की तलब नहीं लगेगी.

·         जब भी सिगरेट पीने की इच्छा हो तो जीभ पर थोड़ा नमक रख लें.

डॉक्टर तपस्विनी कहती हैं किधूम्रपान से छुटकारा पाने के लिए दवाइयां और व्यवहार थेरापी भी एक उपचार विकल्प हो सकता है. हालांकि धूम्रपान त्यागने में सफलता पाने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति सब से जरूरी होती है. इन सभी बातों को देखा जाए तो इस बुराई से लड़ने का सब से अच्छा तरीका इस से बचना ही है. जागरूकता बढ़ाने के लिए एक मजबूत एंटीस्मोकिंग मीडिया कैंपेन एक अच्छा प्लेटफार्म हो सकता है.

स्कूलों में धूम्रपान न करने की शिक्षा भी दी जानी चाहिए जहां बच्चे बड़ी आसानी से प्रभावित हो जाते हैं. अपने घरों, सार्वजनिक स्थलों, सिनेमाघरों, रेस्तराओं, सार्वजनिक वाहनों में धूम्रपान पर प्रतिबंध जैसी सामाजिक पहल से जागरूकता बढ़ाई जा सकती है कि तंबाकू का सेवन एक लत है और इस से धूम्रपान के सेवन में कमी लाई जा सकती है. हमें धूम्रपान त्यागने की शपथ खुद के लिए, अपने देश के लिए और अपनी आगामी पीढ़ी के लिए जरूर लेनी चाहिए.

सरकारी प्रयास

नाबालिगों को धूम्रपान, तंबाकू और गुटके के नुकसान से बचाने के लिए भारत सरकार ने इन्हें बेचना गंभीर अपराध घोषित किया है. दिसंबर 2015 में भारतीय संसद में पास हुए नए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के मुताबिक़ किसी नाबालिग को तंबाकू के उत्पाद बेचना  दंडनीय अपराध माना जाएगा और दोषी को 7 लाख तक की जेल व अधिकतम 1 लाख तक  का जुर्माना लगेगा.

तंबाकू उत्पादों की बढ़ती खपत पर अंकुश लगाना अब जरूरी हो गया है. फिजिशियनों की सलाह पर धूम्रपान त्यागने की सफलता दर बढ़ी है और धूम्रपान करने वालों की काउंसिलिंग तथा उन्हें सहयोगी संस्थाओं और कार्यक्रमों से जोड़ने पर भी सफलता मिली है.

सिनेमा को नई परिभाषा देने जा रहे हैं इरफान

बौलीवुड में सिनेमा को लेकर एक नई बहस शुरू हो गयी है. कुछ लोगों का मानना है कि सिनेमा विशुद्ध रूप से मनोरंजन का साधन है. कुछ लोग मानते हैं कि सिनेमा कला व अर्थशास्त्र का मिश्रण है. जबकि कुछ लोग सिनेमा में सामाजिक बदलाव की ताकत मानते हैं. इस बहस के बीच ही कई तरह का सिनेमा बन रहा है. कुछ लोग यथार्थ परक सिनेमा परोसने के नाम पर सेक्स से भरपूर या अतिशुष्क सिनेमा बना रहे हैं. तो कुछ लोग विचारवान सिनेमा बना रहे हैं. यानी कि सभी की अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग चल रहा है.

जबकि अक्सर देखा गया है कि किसी विचारोत्तेजक फिल्म को देखते समय दर्शक प्रभावित जरुर होता है, पर बाद में वह सोचता है कि ऐसा यथार्थ में नहीं हो सकता. यह तो फिल्म में दिखाया गया है. यही वजह है कि अब कुछ लोग यह कहने लगे है कि सिनेमा दर्शक को प्रभावित करने में नाकाम हो रहा है.

मगर इस बात से बौलीवुड के साथ साथ हालीवुड में अभिनय कर रहे अभिनेता इरफान सहमत नही हैं. उनकी राय में सिनेमा के अंदर समाज को नई दिशा देने व लोगो की सोच को बदलने की भी ताकत रहती है. वह लोगों को जगाने के मकसद से ही सिस्टम पर चोट करने वाली रोमांचक फिल्म ‘‘मदारी’’ लेकर आ रहे हैं. जिसके वह सहनिर्माता भी हैं और मुख्य भूमिका भी निभायी है.

हाल ही ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए इरफान ने कहा-‘‘सिनेमा चाहे मोहब्बत की बात करे या सिस्टम की बात करे. वह इमोशन कहीं न कहीं इंसान तक पहुंचता है. जो इंसान को इंस्पायर करता है. इंसान को इमोशनली भले ही इंवाल्ब न करे, पर सोचने पर मजबूर जरुर करता है. अभी सिनेमा ग्रो हो रहा है. अब विविधतापूर्ण सिनेमा बन रहा है. अब सिनेमा में नए नए आयाम आएंगे. ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि एक आवाज लोगों के अंदर पनप रही है. ऐसा सिनेमा देखने वाले लोग हैं. अब लोगों की सिनेमा को लेकर रूचि बदली है. अब दर्शक चाहता है कि सिनेमा उसकी बुद्धिमत्ता को चुनौती दे. दर्शक चाहता है कि सिनेमा में ऐसा कुछ हो, कि जब वह सिनेमा देखकर थिएटर से बाहर निकले, तो कुछ उसके साथ जाए, वह सोचने पर मजबूर हो.’’

जब उनसे हमने पूछा कि उनकी फिल्म ‘‘मदारी’’ इसे किस तरह से पूरा करेगी? तो इरफान ने कहा-‘‘अभी हम कुछ नहीं कहना चाहते. जब फिल्म आएगी, तो अपने आप पता चल जाएगा. फिल्म में जो ड्रामा है, वह पहले कभी नहीं आया. इसमें सिनेमा का नया रूप नजर आएगा. इसमें रहस्य, मनोरंजन, यथार्थ नजर आएगा. इस फिल्म की कहानी के कई अलग अलग आयाम निकल कर आए हैं. इसे हम किसी एक परिभाषा के अंदर नहीं बांध सकते. फिल्म में कुछ समस्याओं से उपजा हुआ ड्रामा है.’’

नरगिस के लिए काल्पनिक किरदार निभाना आसान

जब से बायोपिक फिल्में बनना शुरू हुई हैं, तब से एक सवाल उठने लगा है कि क्या बायोपिक फिल्मो के वास्तविक किरदार को निभाना कलाकार आसान नहीं होता है. तमाम कलाकार इसे आसान मानते हैं. जबकि फिल्म ‘अजहर’ में संगीता बिजलानी का किरदार निभा चुकी अदाकारा नरगिस फाखरी कहती हैं- ‘‘काल्पनिक किरदार निभाना ज्यादा आसान होता है. ऐसे किरदारों की तुलना किसी से नहीं की जाती. काल्पनिक किरदार निभाते समय कलाकार के तौर पर हम अपनी तरफ से उसमें कुछ नया जोड़ सकते हैं.

हम लेखक व निर्देशक की मदद से उस किरदार को अमली जामा पहनाते है. हम किरदार को रचते हैं. किरदार का एटीट्यूड क्या होगा, वह किरदार कहां से आया है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है, उसकी सोच किस तरह की है, इन सारी बातों पर गौर कर हम खुद ही एक नया किरदार रचते हैं. पर जब रीयल लाइफ का वास्तविक किरदार हो, तो हम पर काफी जिम्मेदारियां होती हैं. ऐसे किरदार से लोग परिचित होते हैं, तो उससे तुलना भी होती है.’’

उड़ता पंजाब: किसकी जीत किसकी हार

फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ को उच्च न्यायलय से मिली जीत का जश्न तो ‘उड़ता पंजाब’ से जुड़े सभी लोग मना रहे हैं. अपनी जीत की खुशी का इजहार करने के लिए फिल्म के निर्माताओं व कलाकारों ने 14 जून की दोपहर मीडिया को एक पांच सितारा हाटल में बुलाया. इस प्रेस कांफ्रेंस में एकता कपूर, विकास बहल, अनुराग कश्यप, मधु मेनटेना, अभिषेक चौबे, आलिया भट्ट, शाहिद कपूर, दिलजीत दोसांज शामिल हुए. मगर फिल्म में डाक्टर की अहम भूमिका निभाने वाली अदाकारा करीना कपूर खान गायब रहीं. इस प्रेस काफ्रेंस में अनुराग कश्यप ने दावा किया कि उनकी फिल्म की कहानी चार किरदारों की हैं. और इन चार किरदारों को शाहिद कपूर, करीना कपूर, आलिया भट्ट और दिलजीत दोसांज ने निभाया है. पर प्रेस कांफ्रेंस में चौथा किरदार गायब रहा. जब करीना के मौजूद न रहने पर सवाल पूछा गया, तो अपनी आदत के अनुसार अनुराग कश्यप प्रेस कांफ्रेंस को खत्म कर भाग खडे़ हुए. उसके बाद किसी ने इस सवाल का जवाब देना उचित नही समझा.

पर इस प्रेस कांफ्रेंस में अनुराग कश्यप ने साफ तौर पर कहा कि, ‘‘अदालत के आदेश से उनकी जीत हुई है. पर अदालत के आदेश से यह बात स्पष्ट हो गयी है कि यहां सेंट्रल बोर्ड आफ फिल्म सर्टीफिकेशन को अपने काम को सही ढंग से करना चाहिए और इसमें बदलाव की जरूरत हैं. वही हम फिल्मकारों की जिम्मेदारी भी बढ़ गयी है. फिल्मकारों की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने आप पर सेल्फ सेंसरशिप लागू करते हुए बेहतरीन फिल्में बनाए.’’

एक तरफ ‘‘उड़ता पंजाब’’ की टीम मुंबई अदालत के आदेश को अपनी जीत बता रही है और उनका दावा है कि उनकी यह जीत फिल्म इंडस्ट्री के सभी निर्माता व निर्देशकों के एकजुट होने की वजह से मिली है. मगर अनुराग कश्यप इस बात को नजरंदाज कर रहे हैं कि तमाम निर्माता निर्देशक उनके साथ नही हैं. फिल्म ‘‘बु्ढ्ढा इन ट्रैफिक जाम’’ तथा ‘‘जुनूनियत’’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने साफ तौर पर कहा हैं कि यह जीत नहीं है. विवेक अग्निहोत्री कहते हैं-‘‘अनुराग कश्यप ने दावा किया था कि वह अपनी फिल्म को जिस रूप में बनाया है, उसी रूपमें रिलीज करेंगे. पर अदालत ने एक कट दिया है. एक कट का अर्थ 100 कट के बराबर है.’’

तो दूसरी तरफ तमाम फिल्मकार कह रहे हैं कि यह पहली बार होगा, जब कोई फिल्म एक ही नहीं, बल्कि तीन तीन डिस्केलमर के साथ रिलीज होगी. क्या यह जीत हैं?

बहरहाल, 14 जून की ‘उड़ता पंजाब’ की प्रेस कांफ्रेस की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि अनुराग कश्यप बहुत संयत होकर बात कर रहे थे. जब उनसे पूछा गया कि पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट में उनकी फिल्म के खिलाफ याचिका दायर की गयी हैं. इसका क्या होगा? तो उन्होंने कहा -‘‘देखिए, अदालत द्वारा नियुक्त एक वकील शाम चार बजे फिल्म को देखेगा और वह अपनी रिपोर्ट अदालत को सौपेंगा. उसके बाद अदालत अपना निर्णय देगी.’’

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