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मैं सपने नहीं देखती: इलियाना डिक्रूज

तेलुगु फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली इलियाना डिक्रूज ने अब तक कई इश्तिहारों और फिल्मों में काम किया है. वैसे, उन्होंने मौडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत की थी, जिस की सलाह उन की मां ने दी थी. जब वे इश्तिहारों में काम कर रही थीं, तभी उन्हें तेलुगु फिल्म ‘देवदासु’ में काम करने का मौका मिला था. यह फिल्म ज्यादा नहीं चली थी, पर इस में इलियाना डिक्रूज को ‘बैस्ट डैब्यू’ अवार्ड मिला था. यहीं से उन की गाड़ी दक्षिण भारतीय फिल्मों में चल पड़ी थी. इलियान डिक्रूज के पिता का नाम रोनाल्डो डिक्रूज है और मां का नाम समायरा डिक्रूज है. जब इलियाना 10 साल की थीं, तब उन का परिवार मुंबई से गोवा चला गया था. उन्होंने वहीं रह कर अपनी पढ़ाई पूरी की थी.

बौलीवुड में इलियाना डिक्रूज को पहला ब्रेक अनुराग बासु ने अपनी फिल्म ‘बर्फी’ के लिए दिया था. फिल्म कामयाब रही थी. इस में इलियाना का मासूम चेहरा सब को पसंद आया. उन की ऐक्टिंग को तारीफ मिली. उन्हें ‘बैस्ट डैब्यू’ अवार्ड भी मिला. इस के बाद इलियाना फिल्म ‘मैं तेरा हीरो’ में अपनी अच्छी ऐक्टिंग के लिए सराही गई थीं. उन का नाम दक्षिण भारत के कई फिल्म सुपरस्टारों के साथ जुड़ा. उन के अफेयर के चर्चे भी सुने गए थे. उन्होंने स्वीकारा भी था कि वे एक हीरो के साथ रिलेशनशिप में थीं और उसे छोड़ने की वजह हीरो का वफादार न होना बताया था. इलियाना डिक्रूज की नई फिल्म ‘रुस्तम’ भी ठीकठाक रही. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

हिंदी फिल्मों में आने की वजह?

कोई खास वजह नहीं है. कोई भी कलाकार ज्यादा दिनों तक फिल्मों से दूर नहीं रहना चाहता.  मेरी फिल्म ‘रुस्तम’ बड़े परदे पर आ चुकी है. कई फिल्मों पर काम चल रहा है, क्योंकि फिल्म साइन करने से ले कर सिनेमाघर तक पहुंचने में समय लगता है.

फिल्म ‘रुस्तम’ में आप ने जो किरदार निभाया है, क्या उस का आप की निजी इमेज पर असर पड़ा?

मैं ऐसी नहीं हूं और इस फिल्म में बने हालात निजी जिंदगी में आने पर मैं क्या करूंगी, यह भी पता नहीं, क्योंकि मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ. मेरे हिसाब से मैं ने डायरैक्टर की सोच को परदे पर उतारा है. मेरे लिए हर फिल्म नया जोश लाती है.

फिल्म ‘रुस्तम’ करते वक्त आप के सामने क्याक्या मुश्किलें आई थीं?

इस फिल्म में ऐक्टिंग करना मुश्किल था, क्योंकि ऐसे हालात से मैं कभी गुजरी नहीं हूं. मैं इस में ग्लिसरीन ले कर आंसू निकालना नहीं चाहती थी. मैं रियल लगना चाहती थी. अक्षय कुमार की वजह से सब आसान हो गया.

दक्षिण भारत की फिल्मों और बौलीवुड की फिल्मों में काम करने में आप क्या अंतर पाती हैं?

वहां और यहां काफी समानता है, लेकिन कुछ अंतर भी है. वहां मैं ने बिंदास लड़की के किरदार निभाए, जिन्हें लोगों ने पसंद किया. वहां एक हीरो एक घूंसे से कइयों को मार गिराता है. बौलीवुड में ऐसा कम देखने को मिलता है. लेकिन वहां काम अनुशासित ढंग से होता है. समय पर शूटिंग खत्म हो जाती है. मैं ने वहां एक साल में 4 फिल्में भी की हैं. यहां लोग थोड़ा आराम से काम करते हैं. हां, अक्षय कुमार अनुशासित हैं और समय पर काम खत्म करते हैं.

आप का ड्रीम प्रोजैक्ट क्या है?

मैं सपने नहीं देखती. जो मिलता है, उसी में संतुष्ट रहती हूं. मैं कार्टून और कौमेडी फिल्में देखती हूं, इस से मेरा तनाव कम होता है.

तनाव होने पर आप और क्या करती हैं?

मेरा परिवार मुझे पूरी तरह सहयोग देता है. मातापिता, बहन सब का साथ मिलता है. मेरे चारों ओर अच्छे लोग हैं. इस से मुझे ताकत मिलती है.

आप के लिए आजादी का क्या मतलब है?

मेरे लिए आजादी का मतलब है कि जब मैं जो कहना चाहूं, लोगों के दखल के बिना कह पाऊं. मैं मर्द और औरत की समानता पर भरोसा करती हूं. किसी के साथ अगर कुछ गलत हो रहा है, उस बात को कहने की हिम्मत रखती हूं.

नई कौन सी फिल्में कर रही हैं?

अभी मैं फिल्म ‘बादशाहो’ कर रही हूं. इस के अलावा कुछ और फिल्में भी करने वाली हूं.

घूस से मचा घमासान

बेहिसाब पावर के नशे में एक आईएएस इस कदर बौराया कि उस ने अपनी पहली ही पोस्टिंग में घूस लेने की कोशिश शुरू कर दी. बिहार में अपनी पहली ही पोस्टिंग के दौरान 80 हजार रुपए घूस लेने के आरोप में आईएएस जितेंद्र गुप्ता दबोच लिया गया. साथ ही, उस के प्राइवेट ड्राइवर संजय तिवारी और हाउस गार्ड अशोक श्रीवास्तव को भी जेल भेज दिया गया. आईएएस जितेंद्र गुप्ता बिहार के कैमूर जिले के मोहनियां के एसडीओ के तौर पर तैनात था और 12 जुलाई, 2016 की रात साढ़े 9 बजे उसे उस के सरकारी क्वार्टर से गिरफ्तार किया गया. बिहार में घूसखोरी के मामले में किसी आईएएस को दबोचने और जेल भेजने की यह पहली घटना है.

निगरानी ब्यूरो के सूत्रों के मुताबिक, जितेंद्र गुप्ता गिरफ्तार होने के 10 दिन पहले से ही निगरानी ब्यूरो की रडार पर था. निगरानी महकमे के अफसर लगातार उस की हरकतों पर नजरें जमाए हुए थे. उस के मोबाइल फोन और लैंडलाइन फोन पर हो रही बातचीत रेकौर्ड की जा रही थी. उस की काल डिटेल को भी खंगाला जा रहा है. निगरानी इंस्पैक्टर के सामने ही जितेंद्र गुप्ता के ड्राइवर संजय तिवारी ने पैसे के लेनदेन की बात की थी. इंस्पैक्टर ने उस बातचीत को भी रेकौर्ड किया था. जितेंद्र गुप्ता के ड्राइवर संजय तिवारी हरियाणा के ट्रक ड्राइवर से हो रही बातचीत के बारे में उस से सहमति लेने के लिए बारबार कैंपस के अंदर जा रहा था.

ब्यूरो का दावा है कि इस आईएएस की गिरफ्तारी में तमाम नियमों का पालन किया गया है. उस के सरकारी क्वार्टर में घुसने से पहले हर तरह की कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई, जिस से आईएएस के क्वार्टर में घुसने में काफी देरी भी हो गई थी. निगरानी ब्यूरो के जाल में फंसे एसडीओ की परेशानी और फजीहत बढ़ती ही जा रही है. समेकित चैकपोस्ट स्थित परिवहन दफ्तर से जुर्माना रसीद ले कर हिसाब नहीं देने के मामले में परिवहन विभाग ने भी उस के खिलाफ कागजी कार्यवाही शुरू कर दी है. जिला परिवहन पदाधिकारी शहनवाज अहमद नियाजी के मुताबिक, समेकित चैकपोस्ट और दफ्तर पर निगरानी ब्यूरो ने 16 मार्च, 2016 को छापा मारा था. 3 दिन बाद यानी 19 मार्च, 2016 को एसडीओ ने चैकपोस्ट पहुंच कर एक बंडल जुर्माना रसीद ली थी.

कई दिनों तक जब एसडीओ ने रसीद के बारे में हिसाबकिताब नहीं दिया, तो अप्रैल में इस के बारे में चिट्ठी लिखी गई. उस के बाद उस ने चिट्ठी के जरीए सूचना दी कि रसीद और उस का हिसाब वह जल्द दे देगा. उस के 3 महीने गुजर जाने के बाद भी महकमे को रसीद और उस का हिसाब नहीं मिल सका. 20 जुलाई, 2016 को जितेंद्र गुप्ता को सस्पैंड कर दिया गया. प्रशासन विभाग ने इस की अधिसूचना जारी की. 15 अगस्त, 1982 को जनमे बिहार कैडर के 2013 बैच के आईएएस डाक्टर जितेंद्र गुप्ता को निगरानी ब्यूरो की टीम ने एक ट्रक ड्राइवर से 80 हजार रुपए घूस लेते हुए दबोचा था. सस्पैंड किए जाने के बाद अब उसे केवल जीवनभर गुजारा भत्ता ही मिलेगा. निगरानी महकमे के महानिदेशक रवींद्र कुमार ने साफ कहा कि उसे घूसखोरी के मामले में गिरफ्तार किया गया है.

जितेंद्र गुप्ता की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही आईएएस लौबी पूरे तैश में आ गई. 13 जुलाई, 2016 को जितेंद्र गुप्ता की गिरफ्तारी के बाद 3-4 दिनों तक सत्ता के गलियारों और आईएएस लौबी में हाई वोल्टेज ड्रामा चलता रहा. निगरानी ब्यूरो पर भरपूर दबाव बनाया गया.

बिहार आईएएस एसोसिएशन के सचिव विवेक कुमार सिंह और दीपक कुमार सिंह निगरानी ब्यूरो के दफ्तर पहुंचे और महानिदेशक से देर तक बात की. उस के बाद एसोसिएशन के पदाधिकारियों और सदस्यों की लंबी बैठक चली, जिस में जितेंद्र गुप्ता की गिरफ्तारी का विरोध किया गया.

एसोसिएशन ने अपने अफसर को बचाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक से भी मुलाकात की, पर बात नहीं बन सकी. आईएएस लौबी इस बात से खफा थी कि जितेंद्र गुप्ता को घूस लेते रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया है, तो फिर उन्हें जेल क्यों भेजा गया है? वह सुबूत मिटाने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे? उन्हें बगैर किसी सुबूत के क्यों गिरफ्तार किया गया?

वहीं निगरानी ब्यूरो का कहना है कि मोहनियां में ओवरलोडिंग के आरोप में जिन 4 ट्रकों को 3 जुलाई, 2016 को रोक कर रखा गया था, उन ट्रकों के कागजात जितेंद्र के सरकारी क्वार्टर में लगी उन की गाड़ी से बरामद किए गए हैं.

जब ट्रक को जब्त किया गया, तो उस के कागजात को एसडीओ ने 10 दिनों तक अपने पास क्यों रखा? उस की सीजर लिस्ट क्यों नहीं बनवाई गई? सीजर लिस्ट की एक कौपी ट्रक ड्राइवर और दूसरी कौपी लोकल थाने में क्यों नहीं भेजी गई? नैशनल हाईवे पर ओवरलोडेड ट्रकों की जांच के दौरान एसडीओ ने डीटीओ और एमवीआई टीम को साथ क्यों नहीं लिया? ट्रक को जब्त करने के 10 दिन बीत गए, पर उस पर कोई जुर्माना क्यों नहीं लगाया गया?

उन्हीं चारों ट्रकों को छोड़ने के लिए उन्हें 80 हजार रुपए की घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, वहीं जितेंद्र गुप्ता बारबार यही रट लगा रहा था कि केवल आरोप लगाने से ही कोई गुनाहगार नहीं हो जाता है. निगरानी ब्यूरो के सूत्रों की मानें, तो जितेंद्र गुप्ता के ड्राइवर संजय तिवारी ने पूछताछ के दौरान कई राज उगल दिए हैं, जिस से उस की मुश्किलें बढ़नी तय हैं. ड्राइवर संजय तिवारी ने बयान दिया है कि वह एसडीओ के इशारे पर ही ट्रक ड्राइवर से लेनदेन की बात कर रहा था. गौरतलब है कि संजय तिवारी सरकारी ड्राइवर नहीं है.

डाक्टर जितेंद्र गुप्ता को दिसंबर, 2015 में मोहनियां का एसडीओ बनाया गया था. उस पर घूस लेने के आरोप में आईपीसी की धारा 8, 7, 10 और भ्रष्टाचार निवारण निरोध अधिनियम की धारा-13(2) और 1(डी) के तहत कार्यवाही की गई है.

वहीं आईएएस ने अपने मातहत काम करने वाले एसपी पर उसे फंसाने का आरोप लगा कर मामले को घुमाने की पुरजोर कोशिश की है. जितेंद्र गुप्ता ने अपनी जमानत अर्जी में कहा है कि उस ने कैमूर के एसपी को एक चिट्ठी भेजी थी, जिस में कहा गया था कि एनएच पर ट्रकों और उस के कागजातों की जांच का हक पुलिस का नहीं है. इसी से एसपी ने ट्रक ड्राइवरों के साथ साजिश रच कर उसे फंसाने की कोशिश की है. इस के बारे में जब एसपी हरप्रीत कौर से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि इस मामले से उन का कोई लेनादेना नहीं है. एसडीओ ने निगरानी ब्यूरो को क्या कहा है, इसे निगरानी ब्यूरो देखेगा और आगे का काम करेगा.              

‘हावड़ा पटना लव ऐक्सप्रैस’ वाया फेसबुक

‘तुम क्या काम करते हो? तुम्हारा घर कहां है?’ लड़की ने अपने फेसबुक फ्रैंड के चैट बौक्स में मैसेज डाला.

लड़के ने तुरंत जवाब दिया, ‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरा घर पटना में है. तुम कहां रहती हो?’

लड़की ने भी पलट कर जवाब दिया, ‘मैं कोलकाता में रहती हूं. तुम भी मुझे काफी अच्छे लगते हो.’

लड़के ने मैसेज टाइप किया, ‘कोलकाता में कहां रहती हो? मैं तुम से मिलना चाहता हूं. हमारा मिलन कैसे होगा? मैं तुम्हारे बगैर जिंदा नहीं रह सकता हूं.’

लड़की ने लिखा, ‘‘मैं हावड़ा में रहती हूं. मैं भी तुम्हारे बिना जिंदगी की सोच नहीं सकती हूं….’’

इस तरह की मुहब्बत से भरी चैटिंग का सिलसिला चलता रहा. इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल फोन नंबर मांगा. दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला भी चल पड़ा. उन दोनों की मुहब्बत इतनी परवान चढ़ी कि वे मिलने के लिए बेताब हो उठे. दोनों मिले भी. शादी भी कर ली. उस के बाद लड़की के साथ जो कुछ घटा, वह रूह कंपा देने वाला था. दरअसल, पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले की रहने वाली 22 साल की लड़की सुलेखा को फेसबुक और ह्वाट्सऐप के जरीए बिहार के एक लड़के आसिफ से दोस्ती हुई. सोशल साइटों के जरीए शुरू हुई उन की प्रेमकहानी इस कदर परवान चढ़ने लगी कि लड़की अपने फेसबुकिया आशिक से मिलने पटना पहुंच गई. मुहब्बत की आस में हावड़ा से पटना पहुंची सुलेखा को पटना में उस के प्रेमी से छलावा और ब्लैकमेलिंग के सिवा कुछ नहीं मिला. प्रेम में पागल उस लड़की ने अपने बदमाश प्रेमी को काफी समझाने की कोशिश की, पर बात नहीं बनी. प्रेमी की खातिर लड़की ने अपना धर्म भी बदलवा लिया, पर उस के बाद भी उस के हाथ कुछ नहीं आया. थकहार कर उस ने पुलिस और अदालत का दरवाजा खटखटाया.

सुलेखा ने 13 जून, 2016 की रात को पटना के महिला थाने में दुष्कर्म, धोखेबाजी और साइबर क्राइम का मामला दर्ज कराया. इस में उस ने पटना के फुलवारीशरीफ के हारुननगर के रहने वाले आसिफ के साथसाथ 5 लड़कों को आरोपी बनाया. इस लड़की की शिकायत मिलने के बाद छापामारी कर पुलिस ने 2 लड़कों रिजवी और फैज को गिरफ्तार कर लिया. सुलेखा ने बताया कि अप्रैल, 2015 में उसे फुलवारीशरीफ के एक लड़के का फोन आया और उस के बाद ह्वाट्सऐप पर भी मैसेज आए. दोनों फेसबुक फ्रैंड थे. उस ने बताया कि उसे किसी काम से पटना आना था, तो उस ने अपने फेसबुक फ्रैंड को फोन किया. वह उस से मिलने मीठापुर महल्ले में आया. सुलेखा मीठापुर के ही ‘सौरभगौरव’ होटल में ठहरी हुई थी. होटल में बातचीत और नाश्ते के दौरान आसिफ ने सुलेखा की कोल्ड ड्रिंक में नशीली चीज मिला दी. जब वह बेहोश हो गई, तो उस लड़के ने उस के साथ बलात्कार किया और उस का वीडियो भी बना लिया. इस के बाद वह सुलेखा को वीडियो दिखा कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

ब्लैकमेलिंग से परेशान सुलेखा

28 जनवरी, 2016 को पटना आई और लड़के से मिल कर मामले को खत्म करने की कोशिश की. आसिफ ने उस से शादी करने का भरोसा दे कर अपने जाल में फिर फंसा लिया. उस ने उसे पटना कालेज के पास के एक गर्ल्स होस्टल में ठहराया. उस के बाद गांधी मैदान के आसपास के पार्क में उस का जबरन धर्म बदलवा कर निकाह कराया गया. निकाह के बाद वे दोनों एनआईटी कालेज के पास नफीस कालोनी में रहने लगे. सुलेखा को लगा कि अब आसिफ सुधर गया है और उस की जिंदगी पटरी पर लौट आई है. कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चला, पर 15-16 दिनों के बाद ही आसिफ फिर अपने पुराने रंग में आ गया.

निकाह के 25 दिनों के बाद अचानक आसिफ गायब हो गया. उस ने अपना मोबाइल फोन भी स्विच औफ कर दिया. सुलेखा ने 5 दिनों तक अपने शौहर के आने का इंतजार किया, लेकिन जब वह कई दिनों तक नहीं लौटा, तो सुलेखा आसिफ के फुलवारीशरीफ वाले घर पर पहुंच गई.पहले तो आसिफ के घर वालों ने उसे जलील किया और चले जाने को कहा. जब वह आसिफ से मिलने और उस के ही घर में रहने की जिद पर अड़ी रही, तो लड़के के भाई ने उसे अपने दोस्त के मकान में किराए पर रहने का इंतजाम करा दिया. सुलेखा ने बताया कि उस के बाद उसे यह कह कर जलील किया जाता था कि उस ने सही तरीके से इसलाम नहीं अपनाया है. अच्छी तरह से सीखने के लिए उसे एक मदरसे में रख दिया गया. वहां भी उस के साथ बदसलूकी की गई. जब वह पेट से हुई, तो जबरन उस का बच्चा गिरा दिया गया.

14 जून, 2016 को अदालत में सुलेखा का बयान दर्ज कराया गया. आसिफ और उस के दोस्तों के खिलाफ किसी के धर्म को ठेस पहुंचाने के लिए धारा 295/ए, पेट गिराने के लिए धारा 313, मारपीट के लिए धारा 323, बंधक बनाने के लिए धारा 344, बलात्कार के लिए धारा 376, नशा कराने के लिए धारा 328, हत्या करने की धमकी देने के लिए धारा 387, धोखाधड़ी करने के लिए धारा 420, धोखे से शादी करने के लिए धारा 496 और धमकी देने के लिए धारा 506 के तहत केस दर्ज किया गया है.       

तारतार यह फेसबुकिया प्यार

बिहार के भागलपुर शहर की रहने वाली सीमा (बदला हुआ नाम) बनारस के चेतगंज के इंटर कालेज में पढ़ती थी. पढ़ाई के दौरान ही फेसबुक के जरीए उस की दोस्ती रोहित नाम के लड़के से हुई. वह बनारस के धोरौया थाने के लोहरिया गांव का रहने वाला था. फेसबुक के जरीए ही रोहित ने सीमा को बताया कि वह ‘मनमोहिनी’ नाम की फिल्म बना रहा है. उस ने सीमा को अपनी फिल्म में हीरोइन बनने का लालच दिया. इस के बाद उन दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई.

जब वे दोनों चैटिंग के जरीए गहरे दोस्त बन गए, तो एक दिन सीमा रोहित से मिलने पहुंच गई. रोहित ने स्क्रीन टैस्ट के बहाने उस के जिस्म को खूब सहलाया और उस से लिपटने की कोशिश की. सीमा को उस की हरकत पसंद नहीं आई और वह वहां से जाने लगी. रोहित ने उसे समझाया कि फिल्मों में काम करने के लिए बहुतकुछ करना पड़ता है और बहुतकुछ सहना भी पड़ता है. इस के बाद रोहित ने उस से कहा कि पटना में शूटिंग होनी है, इसलिए वह पटना में उस से मिले. पटना पहुंचने से पहले सीमा ने रोहित से फोन पर बात की और ठहरने का ठिकाना पूछा. रोहित ने उसे एक होटल का पता बताया. पटना पहुंच कर सीमा उसी होटल में ठहरी. सीमा को यह पता नहीं चला कि कब उसे गहरी नींद लग गई. कुछ देर बाद रोहित उस के कमरे में पहुंचा और उस के जिस्म से खेलने लगा. उस ने सीमा के साथ बलात्कार किया और उस की वीडियो फिल्म भी बना ली.

रोहित ने उसे धमकाया कि अगर वह किसी को कुछ बताएगी, तो उस की ब्लू फिल्म इंटरनैट पर डाल दी जाएगी. सीमा रोतेबिलखते बनारस लौट गई. सीमा की तकलीफों का यहीं खात्मा नहीं हुआ. इस के बाद रोहित फोन कर के बताई हुई जगह पर आने के लिए उस पर दबाव बनाने लगा. सीमा ने उस की बात नहीं मानी, तो उस ने उस के साथ बलात्कार के वीडियो को इंटरनैट पर डाल दिया. रोहित ने सीमा को इस बारे में बता भी दिया.

सीमा ने तुरंत चेतनगंज थाने में रोहित के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. पुलिस ने रोहित को वाराणसी कैंट स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया. अब रोहित जेल की हवा खा रहा है और पुलिस उस के पुराने रिकौर्ड को खंगालने में लगी हुई है.

मुंहबोला भाई नौकर नहीं तुम्हारा

‘तू  मेरा भाई मैं तेरी बहन, जब बनी हूं तेरी बहन तो उठा ले मेरे सारे नखरे.’

अकसर जब लड़कियां मुंहबोला भाई बनाती हैं तो उस से यह उम्मीद करती हैं कि वह उन के हर नखरे को सहेगा. शौपिंग करनी हो, घूमने जाना हो, अपना किसी भी तरह का काम निबटाना हो, तो एक फोन कौल पर हाजिर हो जाने वाले मुंहबोले भाई से ही सारी उम्मीदें रहती हैं. यहां तक कि अपने स्कूलकालेज के नोट्स बनवाने हों, किताबें खरीदने तक की जिम्मेदारी भी उसे सौंप देती हैं और यह भूल जाती हैं कि वह आप का मुंहबोला भाई है न कि नौकर. ऐसे में बेचारा भाई बहन के प्यार में चुपचाप हर बात मानता चला जाता है. अगर आप ने भी अपना कोई मुंहबोला भाई बनाया है तो उस के सामने अपनी फरमाइशों की लिस्ट न रखें और न ही उसे नौकर समझें बल्कि जरूरत के समय ही उसे जिम्मेदारी सौंपें ताकि वह इस रिश्ते को मिसाल बनाए न कि बोझ समझ कर ढोए.

भाई पर न डालें फोन रिचार्ज का बोझ

अपनी पौकेट ढीली न हो इसलिए हर बार कोई बहाना बना कर मुंहबोले भाई से फोन रिचार्ज करवा लेना ठीक नहीं है. कभीकभार अगर आप के पास समय नहीं है या आप बाहर नहीं जा सकतीं तो मुंहबोले भाई से फोन रिचार्ज करवाने की रिक्वैस्ट कर सकती हैं लेकिन हमेशा ऐसा न करें.

अपने रिश्तेदारों की जिम्मेदारी खुद उठाएं

अगर आप के घर में आप के रिलेटिव आ रहे हैं और आप उन्हें स्टेशन से पिक करने और घुमानेफिराने की जिम्मेदारी अपने मुंहबोले भाई को सौंप रही हैं तो सही नहीं है. भई, जब रिश्तेदार आप के हैं तो जिम्मेदारी भी आप की ही बनती है ना, उन्हें लाने, ले जाने व घुमाने की. भाई के पास गाड़ी होने का मतलब यह नहीं कि वह आप का ड्राइवर हो गया और आधी रात को भी आप के लिए हाजिर हो जाए.

शौपिंग का लुत्फ उठाएं आप, बैग उठाए भाई

शौपिंग करवाने के लिए आप ने अपने भाई को मना तो लिया और उस ने आप की खुशी के लिए आप की पसंद की ढेरों चीजें भी दिलवा दीं, लेकिन जब बैग पकड़ने की बारी आई तो झट से अपने मुंहबोले भाई को पकड़ा दिए बैग और खुद मजे से चलने लगीं.

शौपिंग के दौरान एक बार भी नहीं सोचा कि भाई के लिए भी कुछ ले लूं, बस अपने लिए ही खरीदारी की. सोचिए, ऐसे में भाई को कितना बुरा लगेगा? यह न भूलें कि वह आप का मुंहबोला भाई है न कि नौकर कि उस से जैसे मरजी काम करवाओ. इस रिश्ते की गरिमा को बना कर रखें.

अपनी शर्तें मुंहबोले भाई पर न थोपें

भाई बनाने का मतलब यह तो नहीं कि आप ने उस की जिंदगी खरीद ली और आप जैसे चाहें उस से अपनी बात मनवाएं. हो सकता है आप की भाई के किसी फ्रैंड से न बनती हो लेकिन इस का मतलब यह तो नहीं कि वह भी उस से बात करनी छोड़ दे और सिर्फ आप के कहे फ्रैंड्स से ही दोस्ती निभाए. अगर उस की आप के प्रति जिम्मेदारी है तो अपनी फैमिली, अपने दोस्तों के प्रति भी, जिन से वह सिर्फ आप के कारण मुंह नहीं मोड़ सकता. इसलिए उस पर अपनी शर्तें न थोपें.

आंसुओं से उल्लू बनाना

अगर आप को अपनी फ्रैंड की बर्थडे पार्टी में जाना है और आप की मम्मी ड्रैस दिलवाने के लिए तैयार नहीं हो रहीं तो आप अपने भाई के सामने रोने का नाटक करने लगें ताकि भाई आप की मनपसंद ड्रैस दिलवा दे, तो यह सही नहीं होगा. आप को यह समझना होगा कि उस के भी अपने खर्चे हैं और हर बार आंसू बहा कर अपनी बात मनवा लेना भी उचित नहीं.

मुंह पर भाई, पीछे बुराई

भाई बनाना है तो उस की हर अच्छाईबुराई को दिल से ऐक्सैप्ट करें. यह न हो कि मुंह पर तो भाईभाई कहती न थकें और जैसे ही वह नजरों से दूर हुआ कि आप ने उस की बुराई करनी शुरू कर दी.

अगर उस में कोई बुराई है भी तो उसे प्यार से समझा कर दूर करने की कोशिश करें न कि उस की कमियों का ढोल पीटपीट कर उसे नीचा दिखाएं.

गलती करें खुद, फंसा दें उसे

पूरे दिन मौजमस्ती करने के कारण अगर आप ने स्कूल का होमवर्क नहीं किया और टीचर की डांट से बचने के लिए फंसा दिया भाई को कि यह मेरी कौपी घर ले गया था जिस कारण मैं अपना होमवर्क नहीं कर पाई. ऐसे में आप तो चालाकी से बच जाएंगी लेकिन जो गलती उस ने की ही नहीं, उस के लिए उसे डांट खानी पड़ेगी. ऐसे ही अगर आप किसी पार्टी में जा रही हैं और आप किसी कारण वहां लेट पहुंचीं तो झट बोल दिया कि भाई की गाड़ी खराब होने के कारण लेट हो गई. इस से आप के भाई को बेवजह नीचा देखना पड़ेगा. आप का ऐसा बिहेव आप के भाई को दुख पहुंचाएगा और वह मन ही मन यही सोचेगा कि उस ने आप से रिश्ता जोड़ कर गलती की.

सिर्फ अपने काम को महत्त्व देना

अगर आप दोनों एक ही स्कूल और एक ही क्लास में पढ़ते हैं और दोनों को ही प्रोजैक्ट वर्क मिला हो. ऐसे में आप पूरे दिन उस पर प्रैशर डालें कि पहले मेरा प्रोजैक्ट पूरा करो तो यह सही नहीं है. आप को उस से कहना चाहिए कि पहले अपना प्रोजैक्ट तैयार कर लो फिर मेरा प्रोजैक्ट पूरा कर देना. अच्छा तो यही रहेगा कि आप भी उस के प्रोजैक्ट में उस की मदद करें.

प्रौब्लम्स में अकेले छोड़ कर न भागें

अगर आप उम्मीद करती हैं कि वह आप की हर प्रौब्लम में आप का साथ निभाए तो आप का भी यह फर्ज बनता है कि आप भी उस की प्रौब्लम को अपनी प्रौब्लम समझ कर उसे हल करने की कोशिश करें. ऐसा न हो कि अगर आप उस के साथ कहीं गई हुई हैं और वहां से आते वक्त उस की गाड़ी खराब हो जाए तो आप उस का साथ देने के बजाय उसे मुसीबत में अकेले छोड़ कर भाग जाएं. भले ही वह कुछ न बोले लेकिन उसे आप का ऐसा करना अच्छा नहीं लगेगा. इस से उस के मन में आप के प्रति दरार पड़ सकती है. इसलिए ऐसे वक्त भाई को अकेला न छोड़ें बल्कि उसे परेशानी से बाहर निकाल कर ही दम लें. इस तरह आप मुंहबोले भाई से रिश्ते को हमेशा निभा पाएंगी.

युवतियों की आजादी को खतरा

युवतियों को मिलने वाले हकों ने अब एक अनयूजुअल सिचुएशन पैदा कर दी है.  उदाहरण है आम आदमी पार्टी का आदेश कि उस का कोई एमएलए किसी युवती से अकेले में और दफ्तर के समय के बाद नहीं मिलेगा. उस के 2 विधायकों पर महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें मोलैस्ट किया गया है. एमएलए दिनेश मोहनिया को 6 दिन बाद जमानत मिली और प्रकाश जरवल के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है.

यह रिऐक्शन युवतियों की आजादी को खतरा है. वीमन हैरेस्मैंट के केस जिस तरह दायर किए जा रहे हैं इन से महिलाओं को स्वतंत्रता मिलेगी या नहीं कहा नहीं जा सकता, लेकिन उन्हें अपना साथी ढूंढ़ने में मुश्किल जरूर होने लगेगी. किसी भी स्मार्ट, यंग लड़की का हक है कि वह अपनी पर्सनैलिटी का इस्तेमाल अपने मनसूबों को पाने में करे. आखिर शादी में भी तो ऐसा ही होता है. तो कैरियर में यदि पर्सनैलिटी का भरपूर उपयोग हो, तो हर्ज क्या है?

पर अगर माहौल ऐसा बन जाए कि हर युवक या आदमी उसे लगे कि किसी यंग स्मार्ट की स्माइल कल को खंजर बन कर उस के जीवन के सुखों की हत्या कर देगी, तो क्या होगा? हर स्मार्ट युवा लड़की को देख कर वह दूर हो जाएगा. यदि वह पास नहीं आएगा तो कैसे दोस्ती बढ़ेगी, कैसे प्रेम होगा, कैसे सैक्स, विवाह या दूसरे मतलब सिद्ध होंगे.

ज्यादातर वीमन हैरेस्मैंट के मामलों में पहले युवतियों की कंसैंट होती है. वे यदि चाय पर चलने को तैयार हो जाएं बिना किसी खास वजह के, तो उसे दोस्ती नहीं, आगे कुछ करने का इनविटेशन ही माना जाएगा. पर यदि हजारों में से एकदो ने भी इनविटेशन को ऐक्सैप्ट कर के बाद में उस व्यक्ति के खिलाफ पुलिस कंप्लेंट कर दी, तो बाकी हजारों भी डर जाएंगे.

जेंडर इक्वैलिटी का मतलब यह भी है कि जेंडर मिक्सिंग आराम से हो. युवकयुवतियां खुल कर साथसाथ काम करें, मजाक करें. चाय पीएं, पिकनिक पर जाएं और रजामंदी और चाहत हो तो बिस्तर तक जाएं. नैतिकता का तकाजा है कि जब दोनों की बहुत हद तक सहमति है तो किसी पौइंट पर उस सहमति को जोरजबरदस्ती न समझा जाए.

विकिलीक्स के जूलियन असांजे 2-3 साल से अपने ही जेल में लंदन स्थित इक्वाडोर की ऐंबैसी में रह रहे हैं, क्योंकि यदि वे बाहर आए तो स्वीडन और अमेरिका के कहने पर पुलिस उन्हें पकड़ कर इन देशों को सौंप देगी. जूलियन असांजे का दोष यह था कि वे अपनी गर्लफ्रैंड के घर में रहते हुए बिस्तर पर तब भी सैक्स करने से नहीं रुके जब बीच में गर्लफ्रैंड ने मना कर दिया, दोनों में गंभीर झगड़ा हुआ और गर्लफ्रैंड ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. स्वीडन का कानून भारत के कानून से सख्त है. वैसे भी दुनिया भर की सरकार विकिलीक्स के भंडाफोड़ से परेशान थी और उन्होंने किसी तरह जूलियन असांजे से छुटकारा पाने के लिए इस शिकायत का भरपूर उपयोग किया.

यही हमारे यहां हो रहा है. वीमन सैल महिलाओं के लिए मर्दों को परेशान करने का टूल बन रहे हैं. ठीक है इस से गर्ल्स की सेफ्टी बढ़ी है पर साथ ही अब डर भी बैठने लगा है कि न जाने आज प्रेम का ऐक्सप्रैशन करने वाली कल जेल का प्रैशर बना दे.

मेलफीमेल संबंध कंसैंट और फेथ पर तय होने चाहिए न कि सोसायटी के रूल्स या कानूनों के बल पर. अगर ऐसा हुआ तो मेलफीमेल फिर बंट जाएंगे. दफ्तरों, बसों, कक्षाओं, बागबगीचों व अकेले में साथ रहने पर युवकों को डर लगेगा और वे भागेंगे और नुकसान युवतियों को ज्यादा होगा.

यह सोचना कि कानून के बल पर सोसायटी में बदलाव लाया जा सकता है एक गलतफहमी है. कानून तो जब झगड़ा हो तो बीच में आता है. उस से पहले का बिहेवियर सोसायटी को खुद तय करना होगा.

रेव पार्टियों में खुलेआम डांस, हगिंग, सैक्स पर कुछ लोग औब्जैक्ट करें पर ये असल में युवकयुवतियों को बराबरी का हक देती हैं. अगर फीमेल प्रोटैक्शन कानून ज्यादा जोरजबरदस्ती से लागू किया गया तो पता चलेगा ओनली मेल रेव पार्टियां हो रही हैं, जिन में केवल बाजारू पेशेवर युवतियों को बुलाया जाएगा जिन से डर न हो.                                                     

दो जासूस और अनोखा रहस्य (भाग-6)

अभी तक आप ने पढ़ा…

अजय के कातिल की तफ्तीश करते हुए कवितारूपी पंक्तियों वाले कोड के अनुसार अनवर, इंस्पैक्टर रमेश, साहिल और फैजल शंकर गली पहुंचे और आगे की पंक्तियों के अनुसार रिमझिम ब्यूटी पार्लर ढूंढ़ा, वहां उन्हें धर्मपुत्री यानी ईशा नामक एक लड़की मिली. उन्होंने उस लड़की को बुलाया और धीरे से पासवर्ड बताया. लेकिन उस ने बताया कि यह पासवर्ड बता कर अभीअभी कोई उस से सामान ले गया है. वे यह जान कर हैरान हुए. पूछने पर पता चला कि अजयजी उसे अपनी पुत्री की तरह मानते थे व उसे एक टैनिस बौल दे कर उन्होंने कहा था कि जो पासवर्ड बताए उसे दे देना अत: उस ने उस बाइक वाले के पासवर्ड बताने पर बौल उसे दे दी. इंस्पैक्टर ने उस से बाइक वाले का हुलिया जाना और दोनों जीपें दौड़ा दीं. कुछ दूर जा कर उन्होंने बाइक वाले को पकड़ लिया लेकिन उस ने कहा कि हम यहां सुरक्षित नहीं हैं, मुझे पुलिस स्टेशन ले चलिए, मैं वहां सब बताऊंगा मेरी जान को यहां खतरा है. अत: वे उसे पुलिस स्टेशन ले आए.

अब आगे…

अब बोलो, क्या कहना है तुम्हें?’’

‘‘अंकल सब से पहले इस से पूछिए कि बौल कहां है?’’

उस ने किसी के बोलने से पहले ही जेब से बौल निकाल कर मेज पर रख दी और बोला, ‘‘मेरा नाम यूसुफ है. अजय और मैं साथ काम करते थे. मैं ने टीवी पर न्यूज में अजय का फोटो और उस के कत्ल की खबर देखी तो मुझ से रहा नहीं गया और मैं उस के कातिल का पता लगाने यहां आ गया. तभी से मैं आप लोगों के पीछे घूम रहा हूं.’’

‘‘तो हम से पहले इस बौल तक कैसे पहुंच गए तुम?’’

‘‘क्योंकि मैं ने अजय की आखिरी पहेली आप से पहले हल कर ली थी.’’

‘‘ओह…तो आप जेम्स बांड की औलाद हैं?’’ व्यंग्य से इंस्पैक्टर रमेश बोले.

यूसुफ ने एक ठंडी सांस भरी और आगे झुकते हुए धीमी आवाज में बोला, ‘‘मैं यह बात आप को कभी न बताता, लेकिन हालात कुछ ऐसे हो गए हैं कि मुझे सबकुछ बताना पड़ेगा. दरअसल, अजय और मैं सीक्रेट एजैंट्स थे. हम दोनों ने कई केसों पर एकसाथ काम किया. शादी कर के जल्दी रिटायरमैंट लेने के बाद अजय यहां आ कर बस गए और मैं अभी एक साल पहले ही रिटायर हुआ हूं. अजय के कत्ल के बारे में सुन कर मैं चुप कैसे बैठ सकता था? न्यूज में दिखाए गए उन के फोटो में उन का लिखा सीजर कोड पढ़ते ही मैं समझ गया था कि जरूर वे गुपचुप तरीके से किसी गैरकानूनी गतिविधि के खिलाफ काम कर रहे होंगे और उन्हीं लोगों ने उन का कत्ल कर दिया है. सारी बात का पता लगाने मैं यहां आया. सब जगह घूमघूम कर और आप लोगों का पीछा करतेकरते आप की बातें सुनसुन कर मैं सारे कोड हल करता गया और आप से पहले ईशा से बौल लेने में सफल हो गया.

‘‘अजय और मैं ने तो अपनी सारी जिंदगी कोड बनाने और तोड़ने में ही बिताई, तो हमें तो इन का ऐक्सपर्ट होना ही था, लेकिन इन दोनों किशोरों ने जिस अक्लमंदी और होशियारी से उन्हें हल किया, वह वाकई काबिलेतारीफ है,’’ कहते हुए युसूफ ने साहिल और फैजल की पीठ थपथपाई.

‘‘और हां इंस्पैक्टर साहब, जिस फुरती से आप ने मेरा पीछा कर के मुझे ढूंढ़ा और रुकने पर मजबूर किया, उस के लिए आप की भी तारीफ करनी होगी.’’

‘‘धन्यवाद,’’ मुसकराते हुए इंस्पैक्टर बोले.

‘‘लेकिन हमारा पीछा करते हुए कातिल ने आप को भी देखा होगा, तो उस ने आप को पकड़ने या मारने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ साहिल ने पूछा.

‘‘मैं उन्हें पता लगने देता तब न हां, लेकिन आज आप के मेरा पीछा करने और मुझे यहां पकड़ कर लाने से जरूर मैं उन की नजरों में आ गया हूं.’’

‘‘क्या आप को पता है कि इस बौल में क्या है?’’

‘‘नहीं, आप ने पता लगाने का मौका ही कहां दिया? कातिल के आदमी बराबर आप लोगों के पीछे लगे हैं, इसलिए जल्दी से जल्दी इस का राज जान कर कातिल को पकड़वा कर किस्सा खत्म कीजिए. इस के अंदर कोई चीज है. बौल को काट कर उसे बाहर निकालना होगा.’’

बौल को काटने पर उस के अंदर से एक मैमोरी कार्ड बरामद हुआ.

‘‘मैं अपने फोन में इसे लगा कर देखता हूं,’’ फैजल बोला. फोन में कार्ड लगाने पर उस ने पाया कि उस में एक वीडियो क्लिपिंग की रिकौर्डिंग है. उस रिकौर्डिंग को देखते ही उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस में कुछ लोग एक तहखाने में बैठे बम बनाते हुए नजर आ रहे थे. एक कोने में बंदूकों, राइफलों और तैयार छोटेबड़े बमों के ढेर लगे हुए थे. उन की अस्पष्ट आवाज को ध्यान से सुनने पर पता चला कि वह कुल 17 लोगों की यूनिट है, जो कई साल से यह काम करते आ रहे हैं.

‘‘ये सब क्या है? देखने में तो यह जगह हमारे गांव की ही लग रही है, लेकिन यहां ये सबकुछ हो रहा है?’’ इंस्पैक्टर रमेश की आवाज में अविश्वास और घबराहट के भाव साफ झलक रहे थे. ‘‘ओह नो,’’ कुरसी पर बेचैनी से पहलू बदलते हुए यूसुफ बोला, ‘‘मेरे रिटायर होने से कुछ महीने पहले हमें खबर मिली थी कि आसपास के एरिया में कहीं आतंकवादियों का एक बड़ा अड्डा है, जहां बड़े पैमाने पर बम बना कर देश के अन्य भागों में ब्लास्ट करने के लिए सप्लाई किए जा रहे हैं. हमारा डिपार्टमैंट तभी से पड़ोसी देश की मदद से बनी इस यूनिट को ढूंढ़ने में लगा हुआ था, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल पाई थी.

‘‘अजय चूंकि काफी पहले रिटायर हो चुके थे, अत: उन्हें इस औपरेशन के बारे में कुछ पता नहीं था. 3 साल से इस छोटी सी जगह में रहते हुए अजय को यहां चलती इन खतरनाक ऐक्टिविटीज के बारे में पता न चलता, ऐसा तो संभव ही नहीं था. उन्होंने साबित कर दिया कि वे भारत के एक सच्चे सिपाही हैं. न जाने कितने दिन से वे इन के पीछे लगे थे. मौका मिलते ही उन्होंने यह रिकौर्डिंग कर ली होगी लेकिन उन लोगों को पता चल गया और उन्होंने उस का कत्ल कर दिया. मरतेमरते भी वे इतना पक्का इंतजाम कर गए कि यह सुबूत बिलकुल सुरक्षित है.’’

‘‘लेकिन जब अजय के पास पक्के सुबूत थे तो उन्होंने इन्हें पकड़वाया क्यों नहीं? कार्ड को ऐसे छिपा कर क्यों रखा और एक हफ्ता गांव में छिपतेछिपाते क्यों घूमते रहे?’’

‘‘यह बात मुझे भी थोड़ी अजीब लग रही है, लेकिन इतना तो पक्का है कि उस की जरूर कोई मजबूरी रही होगी. मैं तो यहां नया हूं, अत: आप लोग ही इस जगह की पहचान कीजिए. तभी हम इन लोगों को पकड़वा पाएंगे.’’

2-3 बार और रिकौर्डिंग देखने के बाद इंस्पैक्टर पहचान गए कि वह नदी के उस पार का एक छोटा सा पथरीला इलाका है, जो चारों तरफ से कंटीली झाडि़यों से घिरा हुआ है.

‘‘ऐसी जगह और इतने खतरनाक लोगों से निबटने के लिए हमारे पास न तो पुलिस फोर्स है और न ही इतने हथियार. मुझे अपने सीनियर औफिसर्स से बात करनी पड़ेगी.’’  

‘‘एक बात का ध्यान रखिएगा. सारा काम बिलकुल गुपचुप तरीके से जल्दी से जल्दी होना चाहिए. उन्हें यदि यह भनक लग गई कि हम उन के बारे में जान चुके हैं तो सब गड़बड़ हो जाएगा,’’ यूसुफ ने आगाह किया.

कुछ फोन इंस्पैक्टर रमेश ने किए और कुछ यूसुफ ने. खबर इतनी बड़ी थी कि एक घंटे में ही पूरी सरकारी मशीनरी हरकत में आ गई. शाम का धुंधलका होते ही सेना के जवानों को पैराशूट से उस इलाके में उतार कर छापा मारने का प्लान बना लिया गया. गांव के लोगों की सुरक्षा के लिए भी पक्के इंतजाम किए गए. गलती से ब्लास्ट हो जाने की स्थिति में फायरब्रिगेड की गाडि़यों और बचावकर्मियों को बैकअप के रूप में तैयार कर के साथ वाले गांव में रखा गया. सारा काम इतनी शांति और सफाई से हुआ कि गांव में किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई.

उधर आर्मी के जवानों ने अपने मकसद को अंजाम देना शुरू किया और इधर पुलिस स्टेशन के बाहर छिपे, किसी हलचल का इंतजार करते हरी औल्टो के काले चश्मे वाले और उस के दूसरे साथी को पुलिस ने धरदबोचा.

पुलिस स्टेशन में बैठ कर इंतजार करते हुए सब लोगों के चेहरे उस वक्त खुशी से खिल गए जब उन्हें कामयाब होने की सूचना मिली. नदी पार के अड्डे पर जितने लोग और हथियार थे, बिना किसी खास संघर्ष और खूनखराबे के सेना ने अपने कब्जे में ले लिए.

पकड़े गए 15 आदमी और हथियार हैलीकौप्टर्स द्वारा सीधे दिल्ली भेज दिए गए थे. औपरेशन पूरा होने के 10 मिनट बाद ही इंस्पैक्टर रमेश के प्रमोशन की खबर आ गई. साहिल और फैजल को उन की बुद्धिमत्ता के लिए राज्य सरकार की तरफ से 10-10 हजार रुपए के नकद पुरस्कार की भी घोषणा की गई. इंस्पैक्टर रमेश के चेहरे पर खुशी झलक रही थी और यूसुफ के चेहरे पर संतोष.

‘‘मुझे भी इजाजत दीजिए. जिस काम के लिए मैं यहां आया था, वह तो पूरा हो गया. कल सुबह मैं भी घर वापस चला जाऊंगा,’’ कहते हुए यूसुफ खड़ा हो गया.

सब खुश थे कि केस सौल्व हो गया लेकिन फैजल कुछ दुविधा में था, ‘‘बाकी सब तो ठीकठाक हो गया पर अजय मर्डर से पहले लापता क्यों हुए और उन्होंने यह लौकर, चाकू वगैरा का सारा सैटअप कब और कैसे किया. ये बातें तो राज ही रह गईं.’’

‘‘हां, ये राज तो उन के साथ ही चले गए, लेकिन अब क्या फर्क पड़ता है, केस तो हल हो ही गया न. अब कल हम नदी में मछलियां पकड़ने चलेंगे. जब से यहां आए हैं इस केस में ही उलझे हुए हैं.’’

सुबह 6 बजे फोन की घंटी बजी. अनवर मामू ने फोन उठाया. उधर से इंस्पैक्टर रमेश की घबराई आवाज सुनाई दी, ‘‘साहिल और फैजल कहां हैं डाक्टर साहब?’’

‘‘सो रहे हैं, क्यों क्या हुआ?’’

‘‘उन्हें घर से कहीं बाहर मत निकलने दीजिएगा. मैं ने अभी कुछ सिपाही आप के घर भेजे हैं, जो वहां पहरे पर रहेंगे.’’

‘‘अरे, आखिर हुआ क्या है?’’ अनवर मामू की आवाज में दहशत के साथ हैरानी भरी थी.

‘‘कल रात किसी ने बड़ी बेदर्दी से यूसुफ का कत्ल कर दिया है. मुझे लगता है साहिल और फैजल की जान भी खतरे में है.’’

‘‘क्या? क्या यह वही कल वाले लोग हैं? लेकिन वे सब तो पकड़े जा चुके हैं न?’’

‘‘मेरे खयाल से हम से कहीं कोई चूक हुई है. मैं कुछ देर में आप के पास पहुंच कर सारी बात बताऊंगा. तब तक कोई बाहर न निकले,’’ कह कर इंस्पैक्टर रमेश ने फोन रख दिया.                

सुचित्रा कृष्णमूर्ति चलीं थिएटर की तरफ

बहुमुखी प्रतिभा की धनी सुचित्रा कृष्णमूर्ति फिल्म अभिनेत्री होने के साथ लेखक, गायक, पेंटर और मोमबत्ती निर्माता भी हैं. अब वह ‘‘ड्रामा क्वीन’’ नामक नाटक में अभिनय करते हुए थिएटर में भी कदम रखने जा रही हैं. ‘‘एजीपवी वर्ल्ड’’ निर्मित यह नाटक सुचित्रा कृष्णमूर्ति की ही जीवनी से लिए गए कुछ तथ्यों के आधार पर इस नाटक में उन्हे एक नए रूप में पेश करेगा. यह एक हास्य प्रधान भावनाओं से ओतप्रोत नाटक है.

नाटक ‘‘ड्रामा क्वीन’’ के निर्देशक इनायत अली सामी कहते हैं-‘‘यह एक ऐसा नाटक है, जिसे देखते समय लोग अपने आंसू नहीं रोक पाएंगे, तो वही हंसेंगे भी. यह नाटक आधुनिक औरत के नए रूप व उसकी ताकत को रेखांकित करता है. सुचित्रा बेहतरीन अदाकारा हैं. वह इस किरदार के साथ न्याय कर सकेंगी. वह उस सुचित्रा को नाटक में पेश करेंगी, जिसे लोग नहीं जानते हैं.’’

टैबलेट के लौलीपॉप के बाद समाजवादी स्मार्टफोन

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा नेता अखिलेश यादव ने हाईस्कूल पास करने वाले सभी छात्रों को टैबलेट और इंटरमीडिएट पास करने वाले सभी छात्रों को लैपटौप देने का वादा किया. युवाओं ने बडी संख्या में वोट देकर समाजवादी पार्टी को बहुमत से सरकार बनाने का मौका दिया. मुख्यमंत्री बनने के बाद यह वादा पूरा करना मुश्किल काम होने लगा तो सरकार ने शर्तों के साथ अपना वादा पूरा करने की कोशिश शुरू की. साल 2012 के इंटरपास उन बच्चों को लैपटौप दिया गया जिन्होने इंटरपास करने के बाद अगली क्लास में प्रवेश लिया था. जो बच्चे इंजीनियरिंग, डाक्टरी और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये अगली क्लास में प्रवेश नहीं लिया, उनको लैपटौप नहीं दिये गये. साल 2012 के बाद तो केवल चुने गये बच्चों को ही लैपटौप दिये गये.

इंटरपास बच्चों को तो कुछ शर्तो के साथ लैपटौप दिया भी गया, हाईस्कूल पास बच्चे तो टैबलेट के वादे के पूरा होने का इंतजार ही करते रह गये. यह बच्चे उस समय भले ही वोटर नहीं थे, पर अब 2017 के विधानसभा चुनाव में यह वोटर बन चुके हैं. ऐसे में उनको समाजवादी स्मार्टफोन के बादे पर यकीन कैसे होगा समझने वाली बात है. अखिलेश सरकार 2017 के विधानसभा चुनाव में सभी को स्मार्टफोन देने की बात कर रही है. उसमें भी सभी के लिये यह फोन नहीं है. यह फोन हाईस्कूल पास करने वाले उन लोगों के लिये है जिनके माता पिता सरकारी नौकरी में नहीं होगे. जिनकी सालाना आय 2 लाख रूपये से कम होगी.

2012 में लैपटौप और टैबलेट की योजना बनाते समय हाईस्कूल और इंटर पास करने वाले बच्चों की संख्या और इसमें खर्च होने वाले बजट का कोई ध्यान नहीं रखा गया था. उत्तर प्रदेश में हर साल 26 लाख बच्चे हाईस्कूल और 18 लाख बच्चे इंटर पास करते हैं. इस तरह हर साल 44 लाख लैपटौप और टैबलेट की जरूरत थी. इतनी बडी तादाद में लैपटौप या टैबलेट देना संभव नहीं था. तब सरकार ने हाईस्कूल के बच्चों को योजना से बाहर कर दिया, क्योंकि वह वोटर नहीं थे. इंटर पास करने वाले बच्चों को भी कटौती के साथ एक साल लैपटौप बांटे गये. 5 साल तक लैपटौप बांटना सरकार के लिये मुश्किल हो गया तब केवल मेधावी बच्चों को ही यह बांटे जाने लगे.

समाजवादी स्मार्टफोन देने की घोषणा के पहले सरकार ने एक बार फिर से इस बात का अनुमान नहीं लगाया है कि कितने लोगों को यह स्मार्टफोन देना पडेगा. अखिलेश सरकार स्मार्टफोन देने की पूरी प्रक्रिया समझा रही है पर यह नहीं बता रही कि अनुमानन कितने फोन देने होंगे. सरकार ने इसके लिये अभी किसी तरह के बजट का प्रावधान भी नहीं किया है. यह कहा जा रहा है कि जून 2017 के बाद यह फोन बांटे जायेंगे. इसके पहले उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होंगे, उसके परिणाम तय करेंगे कि प्रदेश में किस पार्टी की सरकार बनेगी. मुफ्त समाजवादी स्मार्ट फोन दिये जाने की घोषणा ने हाईस्कूल और इंटरपास करने वाले बच्चों के दर्द को ताजा कर दिया है, जिनसे मुफ्त लैपटौप और टैबलेट का वादा कर 2012 में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की सरकार बनाई.  

मैग्जीन कवर विवाद में धोनी को मिली SC से राहत

क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक भावना आहत करने के आरोप में धोनी के ऊपर चल रहे केस को रद्द कर दिया है.

मामला एक मैग्जीन में धोनी को भगवान विष्णु की तरह दिखाए जाने से जुड़ा है. बिजनेस टुडे मैगजीन के कवर पेज पर छपी इस तस्वीर में विष्णु बने धोनी के आठ हाथों में कई तरह के उत्पाद दिखाए गए थे. इनमें एक जूता भी शामिल था.

दरअसल, पत्रिका ने विज्ञापनों में धोनी की लोकप्रियता के बारे में खबर लिखी थी. इसमें ये बताया गया था कि धोनी विज्ञापन देने वालों की पहली पसंद हैं. खबर का शीर्षक था, ‘गॉड ऑफ बिग डील्स’. इस कवर फोटो में धोनी के हाथ में कई ब्रांड्स की चीजें नजर आ रही थीं, जिसमें रिबॉक का जूता भी शामिल था.

इस तस्वीर को लेकर धोनी के खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगा. एक वकील ने बेंगलुरु के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की कोर्ट में आईपीसी की धारा 295 के तहत मुकदमा दर्ज कराया. इसके बाद, मजिस्ट्रेट ने इस मामले में धोनी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का समन जारी कर दिया.

इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे धोनी ने दलील दी कि इस मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है. मैगजीन ने अपनी मर्जी से उनकी तस्वीर का इस्तेमाल किया.

धोनी की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि उनकी तस्वीर को भगवान की तरह पेश करने का फैसला मैगजीन के संपादकों था. उन्होंने अपनी फोटो के लिए मैगजीन से कोई पैसा नहीं लिया. ऐसे में उन्हें इस मामले में पक्ष बनाना बिलकुल गलत है.

अब सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मजिस्ट्रेट ने समन जारी करते वक्त सही कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया.

नए स्मार्टफोन पर कर सकते हैं व्हाट्सऐप डेटा ट्रांसफर

हमने कई लोगों को जो व्हाट्सऐप मैसेज, वीडियो और फोटो भेजे हैं उसको ट्रांसफर करना सबसे बड़ा सवाल है. खैरियत है कि ऐसा करना अब पहले से बहुत आसान हो गया है.

जो भी जीमेल अकाउंट किसी के भी एंड्रायड स्मार्टफोन से जुड़ा हुआ है, व्हाट्सऐप हर रात दो बजे सभी डेटा का बैकअप ले लेता है. इससे गूगल ड्राइव पर पिछले दिन तक का डेटा आपको बड़ी आसानी से नए फोन पर डाउनलोड किया जा सकता है. जब भी ये बैकअप होता है तो पुराने डेटा को व्हाट्सऐप नए डेटा से अपडेट कर देता है.

जैसे ही नए स्मार्टफोन पर अपने जीमेल अकाउंट पर लॉग इन करेंगे और व्हाट्सऐप डाउनलोड कर लेंगे, पुराने अकाउंट से डेटा को उस स्मार्टफोन पर ट्रांसफर करने के लिए स्क्रीन पर एक पॉप-अप विंडो आएगा.

गूगल ड्राइव के जरिये डेटा ट्रांसफर करना बहुत आसान है और अगर व्हाट्सऐप पर ये सवाल नहीं पूछा जाता है तो उसका मतलब है कि आपने उस गूगल अकाउंट में नहीं लॉग इन किया है या फिर अपने फोन नंबर बदल दिया है.

स्मार्टफोन पर भी पिछले सात दिन तक का डेटा स्टोर होता है और उसे रिस्टोर किया जा सकता है. अगर उनमें से कोई एक फाइल को स्मार्टफोन पर डाउनलोड करना है तो वो भी संभव है. इसके लिए यहां से कोई एक फाइल एक्स्प्लोरर डाउनलोड कर लीजिये.

जो डेटा स्मार्टफोन के एसडी कार्ड पर स्टोर किया है उसके लिए इस लिंक पर जाकर अपने व्हाट्सऐप के डेटा को देख सकते हैं.

उसके बाद आपको व्हाट्सऐप को अनइन्सटॉल करके एक बार फिर से इनस्टॉल करना होगा. फिर से इनस्टॉल करने के बाद जैसे ही स्क्रीन पर रिस्टोर का विकल्प दिखाई देता है तो उसे चुन लीजिये.

गूगल ड्राइव पर सेव करने के लिए व्हाट्सऐप के मेनू बटन से 'सेटिंग', फिर 'चैट' और फिर 'चैट बैक अप' चुनिए. वहां पर 'बैक अप टू गूगल ड्राइव' चुन लीजिये.

कितनी देर के बाद ये बैकअप होगा वो आप तय कर सकते हैं. बैकअप की सेटिंग ऐसी रखिये कि वो वाई फाई नेटवर्क पर ही हो नहीं तो हर दिन डेटा की खपत बढ़ जायेगी. अगर रात को वाई फाई ऑफ करके सोने की आदत है तो व्हाट्सऐप के बैकअप के लिए सुबह के समय तय कीजिये.

जब भी ऐसी सेटिंग कर रहे हैं एक बात का ध्यान रखिये. एसडी कार्ड में स्टोरेज के लिए जगह में कमी नहीं होनी चाहिए.

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