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क्या कर रहे हैं राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता पार्थो गुप्ते..?

तीन साल की उम्र से अभिनय करते रहे पार्थो गुप्ते ने सात साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में 2011 में अपने पिता अमोल गुप्ते निर्देशित फिल्म ‘‘स्टेनली का डिब्बा’’ में मुख्य किरदार निभाकर जबरदस्त शोहरत बटोरी थी. इस फिल्म के लिए पार्थो गुप्ते को सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा फिल्मफेअर अवार्ड तथा जर्मनी के ‘‘शिंलगेल इंटरनेशनल फिल्म फेटिवल 2011’ में पूरे विश्व के 140 बच्चों के बीच सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का अवार्ड मिला था. उसके बाद उन्होंने फिल्म ‘‘हवा हवाई’’ में अभिनय किया था. पर अब अमोल गुप्ते ने अपनी नई फिल्म ‘‘स्निफ’’ में पार्थो गुप्ते की बजाय नए बाल कलाकार को खुशमित गिल को हीरो बनाया है.

पार्थो की बजाय खुषमित के साथ फिल्म बनाने के संदर्भ में अमोल गुप्ते कहते हैं-‘‘मेरा बेटा पार्थो अब साढ़े 15 साल का हो गया है. जबकि मेरी फिल्म ‘स्निफ’ का नायक आठ साल का है. इसलिए नए प्रतिभाशाली कलाकार खुशमीत गिल को इस फिल्म से जोड़ा है.

जब हमने अमोल गुप्ते से पूछा कि क्या उनके बेटे पार्थो गुप्ते ने अभिनय से दूरी बना ली है? तो अमोल गुप्ते ने कहा-‘‘वह बहुत कुछ रचनात्मक काम कर रहा है. वह कविता लिख रहा है. छोटी छोटी फिल्में बना रहा है. संगीत की धुनें बना रहा है. उसकी कविताएं किताब के रूप में छप चुकी हैं. उसकी कविताओं की किताबें इंग्लैड व अमरीका में में छप चुकी हैं. वह अपने गाने खुद लिखता है. संगीतकार है. नौ साल से वह गिटार सीख रहा है. वह अपने अलग संसार में जी रहा है.

जब मैं कभी कहता हूं कि बेटा एक फिल्म बनानी है, उस पर बात करनी है. तो कहता है,‘पिताजी अभी मैं एक फिल्म बना रहा हूं,उसे पूरी कर लूं. फिर सोचूंगा.’ अंतरराष्ट्रीय सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को लेकर उसकी समझ बहुत अच्छी है. उसे शोहरत या चमक दमक से कोई वास्ता नहीं है. वह यह सोचता है कि यदि कैमरे में साठ का लेंस लगाउंगा, तो चेहरा इस तरह से नजर आएगा. उसके पास अपना कैमरा है. अपने उपकरण हैं.’’

पार्थो गुप्ते किस तरह की फिल्में बनाते हैं? इस सवाल पर अमोल गुप्ते ने बताया-‘‘उसकी बहुत अनोखी सोच है. हमारे मकान की बालकनी में एक कबूतर ने दो बच्चे दिए, उस अंडे से उस बच्चे के उड़ने तक की पूरी फिल्म बना डाली. जब वह 5 वीं कक्षा में पढ़ता था, तब उसने घर पर बिल्ली ने बच्चे जन्म दिए. बच्चे पर फिल्म बना डाली थी. घर में वीडियो कैमरा था. वीडियो कैमरे में शूट करता था. उसकी मां दीपा भाटिया बालीवुड की बहुत बड़ी एडिटर हैं. अपनी मां की एडिटिंग मशीन पर बैठकर खुद ही एडिट कर लेता है. उसकी रूचि पूरी तरह से विश्व सिनेमा में है, बालीवुड में नहीं. उसे पता है कि पूरी दुनिया में सिनेमा जगत के महान लोग कौन हैं और वह क्यों महान हैं? उसके दिमाग में कोई कंफ्यूजन नही हैं. उसे राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. इससे वह अपने आपको बड़ा नहीं मानता. यह यह नहीं गिनता कि आज कितने लोगों ने उससे आटोग्राफ मांगा? मेरे बेटे पार्थो को फिल्म फेयर, स्क्रीन के अलावा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. जर्मनी में 140 बाल कलाकारों के बीच उसे सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार चुना गया था. हर अवार्ड को लाकर वह अलमारी में बंद करके भूल गया. उसने अपने कमरे में भी इन अवार्ड को नही सजाया. उसकार मानना है कि इन पुरस्कारों से उसे कोई फायदा नही होना है.’’   

जिस की बीवी काली…

बीवी काली हो या गोरी, यह एक बहस का मुद्दा न हो कर खोज की बात होनी चाहिए, ऐसा खयाल मेरे एक करीबी दोस्त का है. उस की पिछले दिनों नईनई शादी हुई थी. जब भी वह इस मुद्दे पर बात करता है, काली रंगत की जरूरत से ज्यादा वकालत करता है. एक बार मैं ने कहा, ‘‘यार, तुम भी कमाल के आदमी हो. सारी दुनिया गोरे रंग पर फिदा है और तुम हो कि कालीकलूटी पर जान छिड़कते हो.’’ इस पर वह दोस्त बोला, ‘‘भाई मेरे, काले रंग के कितने फायदे हैं, क्या तुम्हें मालूम है? काली बीवी पाना या ढूंढ़ कर लाना हमारे परिवार में सदियों से चला आ रहा है.

‘‘जब मेरी शादी की बात चली थी, तो पिताजी ने मुझे लड़की देखने के लिए मना कर दिया था. वह जानते थे कि मैं काली को नकार दूंगा.

‘‘शादी से एक महीना पहले ही मुझे काली लड़की की खूबियां सुनाना शुरू कर दिया गया. इस का नतीजा यह हुआ कि मुझे गोरे रंग से नफरत होने लगी.’’ मैं सोचने लगा कि कहीं यह दोस्त पागल तो नहीं हो गया है. ऐसे खयालों वाले कहीं दोचार और मिल जाएं, तो खूबसूरती का सामान बनाने वालों का दिवाला ही निकल जाएगा. मैं बोला, ‘‘देख यार, काली बीवी को ब्याह कर घर लाने के बावजूद तुम्हें कोई फायदा तो हुआ नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपना ऐब छिपाने के लिए डींगें हांके जा रहे हो?’’ मेरी बात पर वह दोस्त अपना सीना फुला कर बोला, ‘‘देखो भाई, सब से बड़ा फायदा तो यह है कि रोजरोज के फेस पाउडर, क्रीम वगैरह का झंझट ही खत्म हो गया है. नहाने के लिए किसी खास किस्म के साबुन की जरूरत ही नहीं पड़ती. वह तो कपड़े धोने के साबुन से कपड़ों के साथसाथ खुद को भी धो डालती है. काली रंगत पर कोई भी साड़ी मैच नहीं करती, इसलिए हम जो भी साड़ी खरीद कर ला देते हैं, वह चुपचाप पहन लेती है.

‘‘पार्टी में जाने या सैरसपाटे का सवाल ही नहीं उठता. इन्हें साथ ले जाने के खयाल से ही रूह कांपने लगती है. शादी के समय मेरे ससुर ने काफीकुछ दिया था, क्योंकि इस कोयल से कोई शादी ही नहीं कर रहा था.

‘‘जब भी मैं अपनी ससुराल जाता हूं, तो मेरी इतनी खातिरदारी होती है कि मैं एक दिन की जगह एक महीने तक टिका रहता हूं. वापसी के समय मेरा खाली पर्स नोटों से भरा रहता है.’’ थोड़ी देर के लिए वह दोस्त चुप हो गया और देखने लगा कि मैं उस की बातों पर गौर कर रहा हूं या नहीं. जब उसे यकीन हो गया कि मैं दिल लगा कर उस की बातें सुन रहा हूं, तो उस ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तू मेरा असली दोस्त है. तुझे एक गूढ़ बात बता रहा हूं.

‘‘तुम तो खैर शादी कर चुके हो, इसलिए यह बात तुम्हारे बेटे के काम आएगी.

‘‘जरा सोचो, अगर किसी हसीना के चेहरे पर काला तिल हो, तो वह खूबसूरत कहलाती है और यही तिल सफेद हो, तो वह कोढ़ या सफेद दाग कहलाता है.

‘‘देखा, काले रंग का कमाल. तुम ने भी अमिताभ बच्चन की वह फिल्म तो देखी होगी, जिस में वह गाता है…

‘‘जिस की बीवी काली, उस का भी बड़ा नाम है.

आंखों में लगा लो, सुरमे का क्या काम है.’’ फिर उस दोस्त ने मुझे अपने पास बुलाया. मेरे कान में फुसफुसा कर उस ने कहा, ‘‘काली बीवी का सब से बड़ा फायदा तो यही है कि कोई भी उस से छेड़छाड़ नहीं करता और न ही कोई उसे बहलाफुसला कर भगा ले जाने की जुर्रत करता है.’’ इस तरह उस दोस्त ने मुझे इतनी सारी खूबियां गिनाईं कि मैं दंग रह गया और सोचने लगा कि मैं क्यों गोरी रंगत के चक्कर में पड़ कर उस से शादी कर बैठा. अगर ये सज्जन मुझे शादी से पहले मिले होते, तो यकीनन मैं भी अपनी शादी के लिए कालीकलूटी लड़की ही पसंद करता…

एशिया कप में पाक के साथ खेलेगा भारत!

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के सूत्रों का दावा है कि महिला टी-20 एशिया कप में भारत और पाकिस्तान के बीच मैच खेला जाएगा. सूत्रों का दावा है कि थाइलैंड में होने वाले इस टूर्नामेंट में एक-दूसरे के साथ क्रिकेट खेलने पर दोनों देशों ने सहमति दे दी है.

भारत और पाकिस्तान के टूर्नामेंट में एक-दूसरे के खिलाफ खेलने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे थे. ऐसा इसलिए क्योंकि पूर्व में बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने कहा था कि वह आईसीसी से अपील करेंगे कि उनके टूर्नामेंट में भी भारत और पाकिस्तान के बीच मैच न रखे जाएं.

पीसीबी के एक सूत्र ने बताया, 'हमने केपटाउन में आईसीसी बैठक में यह मसला पूरी मजबूती से रखा. भारत ने कहा कि उसे द्विपक्षीय श्रृंखलाओं में हमारे साथ खेलने पर आपत्ति है, लेकिन आईसीसी टूर्नामेंट में वह पाक के साथ खेलने को तैयार है.'

जी हुजूरी, दलित की क्यों है मजबूरी

‘ऐ… इधर आ… कौन है तू? मैं तेरे बाप का नौकर हूं, जो तू ने मेरा नाम नहीं बोला. बताऊं क्या तुझे…’

5 सितंबर, 2016 को ये अल्फाज मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की दिमनी सीट से बहुजन समाज पार्टी के विधायक बलवीर दंडोतिया ने मंच से इस्तेमाल किए, तो सनाका सा खिंच गया था कि ये विधायकजी अचानक इतने उखड़ क्यों गए? ‘शिक्षक दिवस’ मनाए जाने के दौरान गर्ल्स कालेज में छात्राओं को सरकार की तरफ से स्मार्टफोन बांटे जा रहे थे, तब मंच पर राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया और खा- मंत्री रुस्तम सिंह भी मौजद थे. जलसे का संचालन कर रहे कालेज के प्रोफैसर जेके मिश्रा ने सकपका कर दोनों मंत्रियों की तरफ देखा, तो उन के चेहरों पर कोई तल्खी नहीं थी. उलटे बाद में जयभान सिंह पवैया ने कहा कि जनप्रतिनिधियों का नाम लेने से पहले उन्हें माननीय, सम्मानीय या आदरणीय कहा जाना चाहिए, तो बात आईगई हो गई, लेकिन कई सवाल एकसाथ छोड़ गई कि आखिरकार ऐसे हालात बने क्यों?

एक विधायक द्वारा प्रोफैसर की बेइज्जती का राज्यभर के प्रोफैसरों ने विरोध किया, लेकिन नेताओं खासतौर से बसपा ने हवा नहीं दी, तो वजह साफ है कि यह एक बसपा विधायक से जुड़ा मामला था. बलवीर दंडोतिया का यह कहना अपनी जगह वाजिब था कि संचालन करने वाले प्रोफैसर ने उन का नाम नहीं लिया, उन्हें न्योता दे कर बुलाया है, तो उन की बेइज्जती क्यों की गई?

सदियों पुराना सवाल

दरअसल, मुरैना के इस वाकिए में भी राजनीति कम जातिगत भेदभाव ज्यादा है, जिस के तहत एक विधायक को महज बसपा का होने के नाते जानबूझ कर सवर्णों के बराबर इज्जत नहीं दी जाती.

देश में कहीं भी देख लें, दलितों की एक आदत सी पड़ी हुई है कि वे ऊंची जाति वालों को अभी भी हुजूर, माईबाप, अन्नदाता, साहब या मालिक कह कर ही बुलाते हैं.

यह आदत पीढ़ी दर पीढ़ी दलित तबके के लोग गुलामी की तरह ढो रहे हैं, तो वजह साफ है कि उन में अपने नीची जाति होने का जज्बा कूटकूट कर भरा हुआ है. दूसरे, दबंगों का दबदबा अभी भी ज्यों का त्यों है. शहरों में थोड़ेबहुत हालात बदले हैं, पर वहां यह दिमागी गुलामी की सोच दूसरे तरीके से देखने में आ ही जाती है.

क्यों दलित ऊंचे तबके वालों को इज्जत से बुलाए जाने के लिए मजबूर हैं? इस सवाल का कोई एक नहीं, बल्कि सैकड़ों जवाब हैं. सार यही निकलता है कि दलित अभी भी दलित है. उस से इज्जत करवाना और उस की बेइज्जती करना 2 अलगअलग बातें हैं.

‘दरअसल, यह दिमागी गुलामी है…’ बहुजन संघर्ष दल के अध्यक्ष फूलसिंह बरैया बताते हैं कि दलित अगर ऊंची जाति वालों की जीहुजूरी नहीं करता, तो उसे तरहतरह से इतना तंग कर दिया जाता है कि वह जिंदगीभर किसी पंडित या ठाकुर को उस का नाम ले कर नहीं बुला पाता. उलटे पांय लागूं, पंडितजी या प्रणाम ठाकुर साहब ही कहता रहता है यानी दबंगों के जुल्मोसितम से बचने के लिए वह इज्जतदार लफ्जों से ऊंची जाति वालों को पुकारने को मजबूर रहता है.

दलित संघ, सोहागपुर के एक कार्यकर्ता रतन उमरे का कहना है कि ऐसे हालात जानबूझ कर बनाए गए थे, जिन्हें आज भी बरकरार रखा गया है. वजह, छोटी जाति वालों के दिलोदिमाग में दहशत और गुलामी की आदत बनी रहे. आज तक किसी इलाके में सुनने को नहीं आया कि किसी दलित ने ऊंची जाति वाले किसी शख्स को उस का नाम ले कर बुलाया हो.

हालांकि रतन उमरे दलितों को भी इस का जिम्मेदार यह कहते हुए मानते

हैं कि अब लोकतंत्र है और दलित किसी को साहब, हुजूर, भाई साहब, हुकुम, अन्नदाता या मालिक कहने के लिए कानूनन मजबूर नहीं है, लेकिन सामाजिक तौर पर कोई खास बदलाव देखने में नहीं आ रहे हैं.

दूसरी बात यह है कि तालीम हासिल करने और सरकारी नौकरियों में आने के बाद भी दलितों में उम्मीद और जरूरत के मुताबिक आत्मविश्वास नहीं आ पाया है, क्योंकि बारबार तरहतरह से धर्म और उस के उसूलों का हवाला दे कर उन्हें यह एहसास कराया जाता है कि तुम छोटी जाति के हो, जो ऊंची जाति वालों की सेवा और जीहुजूरी करने के लिए पैदा हुए थे. अगर ये उसूल तोड़े, तो तुम्हारा लोक तो दबंग बिगाड़ेंगे ही, परलोक भी भगवान बिगाड़ देंगे.

पहले यह एहसास लतिया कर कराया जाता था, तो अब बराबरी का ढिंढोरा पीट कर कराया जाता है.

इस के उलट दलितों को जानबूझ कर उन की जाति के हिसाब से पुकारा जाना आम है. इस पर हजार में से एक दलित कानून और संविधान का हवाला दे कर एतराज जताता है, लेकिन उस का असर सिस्टम या समाज पर नहीं पड़ता.

हरिजन ऐक्ट के तहत मामला दर्ज जरूर होता है, लेकिन बाद में उस का क्या होता है, यह किसी को पता नहीं चलता, क्योंकि 95 फीसदी मामलों में सुलह हो जाती है और इस बाबत  दलितों पर चौतरफा दबाव बनाया जाता है, जिस से वे घबरा जाते हैं.

भोपाल के एक पटवारी की मानें, तो वे कायस्थ हैं और ऊंची जाति के हैं. एक दफा दलित तबके के एक तहसीलदार उन के घर आए, तो चायनाश्ता करने में ऐसे हिचक रहे थे मानो किसी का कत्ल कर रहे हों.

ये पटवारी साहब कहते हैं, ‘‘मैं ने तो अपनी तरफ से अपने अफसर का पूरी तरह ध्यान रखा. उन्हें दूसरों के बराबर इज्जत दी और पूछपरख की, लेकिन वही अपनी जाति की हीनभावना को ले कर सिकुड़े जा रहे थे, तो मैं क्या करता?’’

फिर ढकोसला क्यों

केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा का अब देश के ज्यादातर राज्यों पर कब्जा है, जो इन दिनों दलित हिमायती होने का ढिंढोरा पीटने में सब से आगे है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दलितों के घर जा कर खाना खा रहे हैं, उन के साथ कुंभ में डुबकी लगा रहे हैं, पर दलितों की सोच बदलने के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा.

ऐसा इसलिए कि हकीकत में धर्म और समाज को हांकने व चलाने वाले लोग दलितों से भेदभाव के मामले में किसी पार्टी के नहीं हैं और अपना दबदबा कायम रखने के लिए हर टोटका आजमाते हैं.

अमित शाह या राहुल गांधी के दलितों के घर जाने, सोने और खाने से दलितों में गैरत नहीं आने वाली, क्योंकि जरूरत जहां सुधार की है, वहां कोई पहल नहीं हो रही है.

कभी किसी पार्टी के नेता ने इस बाबत नहीं सोचा कि समाज की खासतौर से गांवदेहातों की हालत अब भी पुराने जमाने की हिंदी फिल्मों सरीखी है. इन में दलित ऊंची जाति वालों की ड्यौढ़ी पर उकड़ू ही बैठता है. उन के यहां उन्हें पानी को भी कोई नहीं पूछता और जब भी दलित सवर्ण से कुछ कहता है, तो सब से पहला लफ्ज हुजूर माईबाप, अन्नदाता या मालिक वगैरह ही होता है.

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र नेता कन्हैया कुमार और गुजरात के ऊना में दलितों की गैरत की लड़ाई लड़ रहे जिग्नेश मेवाणी जैसे नौजवान इस तरफ पहल जरूर कर रहे हैं, पर उन का भी दायरा सिमटता जा रहा है.

दरअसल, ये नेता शहरों में बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि जरूरत देहातों में लड़ाई लड़ने की है और लड़ाई का यह मतलब नहीं कि लाठियां चलें, सिर फूटें, बल्कि यह है कि दलितों को चेताया जाए कि वे किसी के गुलाम या सेवक नहीं हैं, बल्कि एक आजाद देश के बाशिंदे हैं, जिन्हें संविधान ने बराबरी का दर्जा दिया हुआ है.

दरअसल, दलितों से लफ्जों का भेदभाव स्कूल से ही शुरू हो जाता है, सवर्णों के बच्चे दलित बच्चों के लिए उन्हीं जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो उन्हें घर से सीखने को मिलते हैं यानी सवर्णों में जाति के लिहाज से बड़ा होने की ठसक बचपन से ही भर दी जाती है और दलितों को भी बचपन से ही समझ आ जाता है कि अगर जूतों की मार और बेइज्जती से बचना है, तो ऊंची जाति वालों को साहबमालिक वगैरह कहते रहो, नहीं तो इस का खमियाजा कब किस शक्ल में भुगतना पड़ जाए, इस की कोई गारंटी नहीं.

यह गारंटी कोई नेता या अफसर नहीं ले सकता, जो मंच पर ही इज्जत से न बुलाने पर झगड़ पड़ते हों और जिस का असर पूरे राज्य पर पड़ता हो.

भोपाल के एक सरकारी कालेज के एक दलित प्रोफैसर की मानें, तो यह सच है कि दलितों के खानपान और रहनसहन में बदलाव आया है, पर बोलचाल के मामले में वे अभी भी सदियों पुरानी जगह खड़े हैं. यहां ऊंची जाति वाला उन के लिए आदरणीय और पूजनीय होता है, इस ओछी सोच से छुटकारा पाने के लिए तो खुद दलितों को पहल करनी पड़ेगी कि वे ऊंची जाति वालों को जीहुजूरी वाले संबोधनों से बुलाना बंद करें.

इस बारे में विदिशा के एक गांव के स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर का कहना है कि आरक्षण के जरीए जिन दलित नौजवानों में गैरत आ रही है, वे जब गांव आते हैं, तो उन्हें कोई सवर्ण पूछता नहीं और कहा यह जाता है कि माया तेरे तीन नाम परशु, परसा, परशुराम यानी दलित, पिछड़ा और सवर्ण.               

सोशल मीडिया पर मोदी भक्त

‘अच्छे दिन कभी नहीं आते. भारत असंतुष्ट आत्माओं का महासागर है. इस की वजह से कभी भी किसी को किसी चीज में समाधान नहीं मिलता. जिस के पास साइकिल है, उसे गाड़ी चाहिए. जिस के पास गाड़ी है, उसे कुछ और. वही पूछता है कि अच्छे दिन कब आएंगे…’

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ये शब्द मुंबई में 13 सितंबर, 2016 को उद्योग जगत से जुड़े एक समारोह में कहे थे. उन की आवाज में कसक भी थी और मीडिया के लिए चेतावनी भी थी कि वह अच्छे दिनों को गलत रूप में पेश न करे. चूंकि वे खुद ही सच बोलने पर आमादा हो आए थे, इसलिए उन्होंने यह भी ईमानदारी से मान लिया कि यह अच्छे दिनों का नारा तो सरकार के गले की हड्डी बन गया है.

इस हड्डी को निगलते तो नहीं बन रहा, पर नितिन गडकरी ने इसे उगलने की कोशिश यह कहते हुए जरूर की कि दरअसल, अच्छे दिनों का नारा पहले के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीयों के एक कार्यक्रम में दिया था. नरेंद्र मोदी ने तो इस के जवाब में यह कहा था कि अगर हमारी सरकार आएगी, तो अच्छे दिन आएंगे, इसलिए इस का मतलब प्रगतिशील या तरक्की के रास्ते से लगाना चाहिए, न कि इस को शाब्दिक अर्थ से आंका जाना चाहिए.

नितिन गडकरी से काफी पहले 5 फरवरी, 2015 को ही भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह इसे एक जुमला करार देते हुए यह कह चुके थे कि हर परिवार के खाते में 15-15 लाख रुपए जमा होने की बात भाषण में वजन डालने के लिए बोली गई थी.

इस पर मीडिया और खासतौर से सोशल मीडिया पर भाजपा के अमित शाह की खासी खिल्ली उड़ी थी. बाद में फिर 13 जुलाई, 2015 को उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिनों का जो वादा किया है, उसे पूरा करने में 25 साल लग जाएंगे.

गिरती साख और शोहरत

दरअसल, नरेंद्र मोदी और उन की सरकार पर सोशल मीडिया का खासा दबाव अच्छे दिनों के बाबत है. नितिन गडकरी और अमित शाह भले ही हकीकत से मुकरते रहें, लेकिन लोगों को याद है कि ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा भाजपा के साल 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार मुहिम की शान था. खुद नरेंद्र मोदी ने अपनी कई चुनावी सभाओं में इसे दोहराया था.

ढाई साल पूरे होतेहोते हालत यह है कि जब भी कोई बहस सोशल मीडिया पर छिड़ती है, तो लोग सीधेसीधे 2 गुटों में बंट जाते हैं. इन में से एक नरेंद्र मोदी की वकालत और बचाव करता हुआ होता है, तो दूसरा बेहद आक्रामक ढंग से ताना मारते हुए पूछता है कि क्या यही अच्छे दिन हैं?

जम्मूकश्मीर में उड़ी आतंकी हमले में 18 सैनिक मारे गए, तो सोशल मीडिया की हलचल बड़ी दिलचस्प थी. लोग प्रधानमंत्री का रुख जानना चाह रहे थे कि वह कैसा होगा, जो पहले की सरकार के जैसा निकला, तो एक बार फिर सोशल मीडिया पर सक्रिय मोदी भक्त औफलाइन होते नजर आए.

एक न्यूज चैनल को दिया गया नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू काफी वायरल हुआ, जिस में वे कह रहे हैं कि पाकिस्तान को उस की ही भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए. अगर 26-11 के हमलों के वक्त वे प्रधानमंत्री होते, तो वही करते, जो गोधरा के समय किया था.

गोधरा कांड के वक्त नरेंद्र मोदी ने ऐसा क्या किया था, जो वे उड़ी के आतंकी हमले पर नहीं कर पाए? यह बात उतनी अहम नहीं रही है, जितनी यह है कि नरेंद्र मोदी की चमत्कारी इमेज  उम्मीद से कम समय में ही बिगड़ रही है.

जिस तरह सोशल मीडिया पर राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहा जाता है, उसी तर्ज पर मोदी को ‘फेंकू’ कहा जाता है. अब से 30-40 साल पहले जो चर्चाएं पान की गुमटियों और चाय के ठेलों या फिर कौफी हाउसों में होती थीं, अब वे डिजिटल हो कर सोशल मीडिया पर होने लगी हैं.

प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद तक नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर छाए रहे थे. एक समय तो ऐसा आया, जब उन्हें सोशल मीडिया का बादशाह कहा जाने लगा था. देश में ट्विटर के तकरीबन ढाई करोड़ लोगों में डेढ़ करोड़ उन के फौलोअर हुआ करते थे. तब मोदी के आलोचकों की तादाद न के बराबर थी, जो इन डेढ़ करोड़ लोगों को मोदी भक्त कहते थे.

तब सोशल मीडिया खासतौर से ट्विटर और फेसबुक पर नरेंद्र मोदी का मुकाबला कांग्रेसी नेता शशि थरूर से था, जो काफी तीखे और दिलचस्प ट्वीट करते थे. साल 2009 में शशि थरूर के ट्विटर अकाउंट पर 6 हजार फौलोअर थे, जो उस समय का रिकौर्ड था, लेकिन जब नरेंद्र मोदी ट्विटर पर सक्रिय हुए, तो उन्होंने देखते ही देखते शशि थरूर को काफी पीछे छोड़ दिया.

अब शशि थरूर का सोशल मीडिया पर कहीं अतापता नहीं है, लेकिन लोकप्रिय होने और प्रधानमंत्री बनने के लिए नरेंद्र मोदी का सोशल मीडिया पर सक्रिय होना काफी कारगर साबित हुआ था. नौजवानों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया था, क्योंकि वे बड़ी लुभावनी और सौफ्ट हिंदुत्व की बातें करते थे.

अपने प्रचार अभियान में नरेंद्र मोदी ने जम कर सोशल मीडिया का सहारा लिया था, लेकिन अब जब हर हाथ में स्मार्टफोन और उस में भी ह्वाट्सऐप है, तो नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज हो रही है. इस के पीछे वजह सिर्फ अच्छे दिनों के जुमले की नहीं है, बल्कि दोहरी बातों पर उन की बिगड़ती इमेज भी है.

30 सितंबर, 2016 को दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए एक समारोह में नरेंद्र मोदी ने जब सत्याग्रह की तर्ज पर स्वच्छता आंदोलन की जरूरत की बात कही, तो उस का जिक्र तक सोशल मीडिया पर नहीं हुआ.

आम लोगों ने वाकई अब नरेंद्र मोदी से किसी चमत्कार की उम्मीद छोड़ दी है. कश्मीर में आतंकी हमले ने इस खयाल को और पुख्ता ही किया कि आखिरकार उन के और पहले के प्रधानमंत्रियों में फर्क क्या है? लोग पूछ रहे हैं कि आप भी तो पाकिस्तान को लव लैटर ही लिख रहे हैं और वह खुद ले कर जाते हैं, इसलिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जन्मदिन पर बधाई देने पाकिस्तान भी गुपचुप गए थे.

हालांकि 28 सितंबर, 2016 को फिर सोशल मीडिया ने उन्हें हाथोंहाथ लिया, जब भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए पाकिस्तान में आतंकी जगहों पर हमला बोला, लेकिन यह भी चार दिन की चांदनी जैसी बात साबित हुई और लोग जल्द ही सेना का गुणगान करने लगे यानी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब लौन टैनिस के खिलाडि़यों के वरियताक्रम जैसी हो चली है, जिस में उन का कम, बल्कि विरोधियों मसलन अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी का योगदान ज्यादा रहता है.

जैसे ही 4 अक्तूबर, 2016 को अरविंद केजरीवाल ने सर्जिकल स्ट्राइक के बाबत सफाई मांगी, तो मोदी भक्त उन्हें गंदी गालियां देते नजर आए, जिस से साफ हो गया कि सोशल मीडिया अब स्वस्थ बहस का जरीया न हो कर गालीगलौज का अड्डा बनता जा रहा है, इसलिए भले लोग इस पचड़े से दूर ही रहें.

तकनीकको सब से पहले अपनाते हुए नरेंद्र मोदी ने 90 के दशक में ही लैपटौप का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था, जो उन दिनों हर कोई नहीं करता था.

डिजिटल इंडिया के नारे से ले कर रोहित वेमुला की खुदकुशी, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी और गुजरात के ऊना कांड में दलित अत्याचारों तक सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने वालों के निशाने पर वे रहे और आज भी कश्मीर जैसे मुद्दे को ले कर रहते हैं, पर अब उन के पक्ष में बोलने और पोस्ट करने वालों की तादाद काफी कम हो चली है.

नुक्कड़ गुमटियां और चौराहे अब छोटी स्क्रीन में समा चले हैं, जिस में दिनरात बहस होती रहती है कि आखिर नरेंद्र मोदी चाहते क्या हैं? वे कैसा देश बना रहे हैं? यह उन्हें साफ करना चाहिए. जवाब में मोदी भक्त जब यह गिनाने बैठ जाते हैं कि इनइन वजहों से पाकिस्तान पर हमला करना या अच्छे दिन लाना मुमकिन नहीं, तो मानो और आफत आ जाती है.

नरेंद्र मोदी की असली इमेज से दुखीपरेशान लोग यह कहने से नहीं चूकते कि मोदीजी, हमें बुनियादी सहूलियतें नहीं, बल्कि शहीदों की शहादत का बदला चाहिए, आप विदेशों में मत घूमिए, कुछ दिन भारत में भी गुजारिए, तो आसानी से समझ आता है कि क्यों नितिन गडकरी और अमित शाह की छाती में अच्छे दिनों का नारा नश्तर की तरह चुभता है.

सोशल मीडिया का कांटा

नरेंद्र मोदी की जादुई इमेज और लोकप्रियता के दिनों के बाद जिस सोशल मीडिया को मोदी भक्तों का जमावड़ा समझ लिया गया था, अब वही उन के खिलाफ पोस्ट उगलने लगा है, क्योंकि इस में गंभीर सोच वाले लोग भी शामिल हैं, जो तथ्यों और तर्कों पर नरेंद्र मोदी की कमजोरियां गिनाते हैं.

मोदी भक्तों की पोस्टों पर आम लोग पहले जैसी तवज्जुह नहीं दे रहे हैं यानी व्यक्ति पूजा से परहेज करने लगे हैं, जो बात कतई हैरत की नहीं, क्योंकि सोशल मीडिया पर सक्रिय तकरीबन 80 फीसदी लोग किसी राजनीतिक सोच से इत्तिफाक नहीं रखते. सब्र खोता यह तबका समझने लगा है कि मोदी भक्तों ने खूब सोशल मीडिया पर लोगों को गुमराह किया. मसलन, इस तरह की पोस्ट कि देश का पहला प्रधानमंत्री जिस का कोई सगा उस के पद और प्रभाव का लाभ नहीं ले रहा, जो अपना वेतन तक दान कर देता है, जिसे बेहद सादगी पसंद है और सिर्फ देश की तरक्की के बारे में सोचता रहता है. 60 सालों में कांग्रेस और नेहरूगांधी परिवार ने जितना देश को खोखला किया, उस की भरपाई कैसे वे ढाई साल में कर सकते हैं, वगैरह.

इस तरह की पोस्टें अब अपना असर खो रही हैं, उलटे लोग यह कहने लगे हैं कि हम ने आप को कुरसी और सत्ता नेहरूगांधी खानदान को कोसते रहने के लिए नहीं सौंपी है, बल्कि काम करने के लिए सौंपी है. वे वादे पूरा करने की छूट दी है, जो आप ने साल 2014 में किए थे.

सोशल मीडिया पर जब धीरेधीरे मोदी विरोधी असंगठित मंच तैयार हो गया, तो नरेंद्र मोदी को भगवान और देवता का दर्जा देने वाली नेता उमा भारती, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दूसरे कई संतमहंत चुप हैं.

इस देश में किसी को भी रातोंरात भगवान बनाना जितना आसान है, उस से भी ज्यादा आसान काम हो चला है, उस पर से भगवान होने का चोला उतारना. सोशल मीडिया नाम के इस डिजिटल चौराहे पर चल रही चर्चाओं पर एतराज तो भाजपाई जता सकते हैं, लेकिन लोगों का मुंह नहीं पकड़ सकते.

ऐसे में नितिन गडकरी अच्छे दिनों की आड़ में सोशल मीडिया को कोस रहे होते हैं कि यह जरूर सरकार के गले की हड्डी बन गया है. मोदी समर्थक और भक्त अब कम हो चले हैं और जो हैं, वे भाजपाई हैं. इन की मोदी समर्थक पोस्ट अब लोग पहले की तरह फौरवर्ड नहीं करते, तो बात भाजपा सरकार और नरेंद्र मोदी की इमेज के लिहाज से चिंता की तो है. रहीसही कसर दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी नेता यह ट्वीट करते पूरी कर देते हैं कि बोया नरेंद्र मोदी निकला मनमोहन सिंह, तो लोग उस की साफगोई को भी हाथोंहाथ लेते हैं.                 

व्हाट्सऐप फेसबुक के साथ नहीं करेगा डेटा शेयर

व्हाट्सऐप दुनिया की सबसे पॉपुलर मैसेजिंग ऐप है. फेसबुक ने 2014 में व्हाट्सएप का अधिग्रहण कर लिया था.

वाट्सएप ने निजता संबंधी चिंताओं के मद्देनजर अपनी मूल कंपनी फेसबुक को यूरोप में लोगों के विशेष समूह तक विज्ञापन पहुंचाने के लिए अपने यूजर की जानकारी देना बंद कर दिया है. इस मामले के एक निकटवर्ती सूत्र ने यह जानकारी दी है. यूरोप में अधिकारियों के साथ पिछले कुछ महीनों से चल रही बातचीत के बाद सोशल नेटवर्क ने निर्णय लिया है वह केवल स्पैम का मुकाबला करने जैसे मकसदों के लिए ही वाट्सएैप यूजर डेटा का लाभ उठाएगा. इसे नियामकों को निजी चिंताएं साझा करने और फेसबुक को इनसे निपटने के तरीकों पर विचार करने का समय देने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है. जर्मनी के डेटा संरक्षण अधिकारियों ने फेसबुक को वहां वाट्सऐप से सब्सक्राइबर डेटा एकत्र करने से रोकने के लिए सितंबर में निजी चिंताओं का हवाला दिया था.

हैमबर्ग के कमिशनर फॉर डेटा प्रोटेक्शन एंड फ्रीडम ऑफ इनफॉरमेशन जोहानेस कैस्पर से कहा था, ‘यह यूजर का निर्णय होना चाहिए कि वह अपने अकाउंट को फेसबुक के साथ जोड़ना चाहता है या नहीं. फेसबुक को पहले से उनकी अनुमति मांगनी होगी.’ वाट्सऐप ने अगस्त में घोषणा की थी कि वह विशेष समूह तक विज्ञापन पहुंचाने की प्रक्रिया को बेहतर करने और इस मंच पर स्पैम को रोकने की कोशिश के तहत फेसबुक के साथ डेटा साझा करना आरंभ करेगा. यूरोपीयन डेटा संरक्षण समूह जी29 ने अक्तूबर के अंत में अपनी चिंताएं व्यक्त की थी और फेसबुक एवं वाटसऐप से उचित कानूनी सुरक्षा प्रावधान होने तक तक डेटा साझा नहीं करने को कहा था. उल्लेखनीय है कि फेसबुक ने करीब 19 अरब डॉलर का सौदा करके दो वर्ष पहले वाट्सऐप को खरीदा था.

संकट में सरहदी पहरेदार

पाकिस्तान से सटी भारत की पश्चिमी सरहद पर पहरे के लिए हम सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ और ‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊंट पर निर्भर हैं, लेकिन हमारी बीएसएफ को कमजोर करने के लिए पिछले कुछ सालों से ऊंटों को खत्म करने की साजिश चल रही है. इस सदी की शुरुआत में देश में 10 लाख ऊंट थे, जो अब साढ़े 3 लाख ही बचे हैं. यही वजह है कि कई इंटरनैशनल एजेंसियां तो औपचारिक रूप से भारतीय ऊंट को लुप्त होती प्रजाति घोषित कर चुकी हैं.

यह बात भी गौर करने लायक है कि क्या इस मामले में बड़े पैमाने पर विदेशी ताकत का हाथ है, जो हमारे देश में अपने लोगों के जरीए बहुत ही सोचीसमझी चाल के तहत हमारे देश के रक्षा तंत्र को कमजोर करने में लगी हैं, ताकि वे आसानी से देश में घुस सकें? बीएसएफ केवल लड़ाई ही नहीं लड़ती, बल्कि उसे घुसपैठियों से भी निबटना होता है. सरहद पर हथियारों और नशीली चीजों की तस्करी होना तो आम बात है.

गुजरात और राजस्थान से लगती पाकिस्तान की सरहद तकरीबन 1,040 किलोमीटर लंबी है. जहां तक राजस्थान का सवाल है, तो यहां मीलों तक 30-30 फुट की ऊंचाई के टीले हैं. गरमियों में तापमान 50 डिगरी सैल्सियस तक पहुंच जाता है. ज्यादातर इलाका रेतीला है और छोटीछोटी कंटीली झाडि़यों से भरा है. इस पर पानी मुहैया होना भी मुश्किल है, जो संकरे कुओं में ही मिलता है. इस इलाके में केवल ऊंटों के दम पर ही सरहद की निगरानी कर पाना  मुमकिन है. ऊंट दिनभर में कम से कम 4 से 5 किलोमीटर तक चल लेता है. ऊंट की ज्यादा ऊंचाई के चलते इस पर बैठा सवार दूर तक देख सकता है. रेतीली जमीन पर भी यह आसानी से दौड़ सकता है. सब से बड़ी बात यह है कि ऊंट को दिशा की जबरदस्त जानकारी होती है और इसीलिए इसे रात के समय चौकसी के लिए सब से बेहतर समझा जाता है.

देश की हिफाजत करने वाली बीएसएफ के लिए ऊंट बहुत ही अहम पशु है. इस का इस्तेमाल केवल सवारी या चौकसी करने के लिए ही नहीं होता, बल्कि इस का इस्तेमाल सरहद पर बनी चौकियों तक जवानों को खाना पहुंचाने के लिए भी होता है.

इस के अलावा यह बहुत से सामान जैसे चिट्ठियां, दवाएं, सिलैंडर वगैरह पहुंचाने के काम आता है. ऊंट उन रेतीले इलाकों में भी पहुंच सकता है, जहां दूसरे वाहन नहीं पहुंच पाते. ऊंट की इन्हीं खासीयतों के चलते राजस्थान के रेतीले इलाकों और गुजरात की दलदली जमीन पर बीएसएफ इसे इस्तेमाल करती है.

बीएसएफ की जरूरत

कच्छ और सिंध के निकट 7 सौ किलोमीटर की सरहद में आपराधिक हरकतें बहुत ज्यादा होती हैं. बीएसएफ इस से निबटने के लिए कैमल सफारी का आयोजन भी करती है. इस में वह स्थानीय लोगों को सरहद के पास तक ले कर जाती है और सरहद पर होने वाले अपराधों के बारे में बताती है. इस से बीएसएफ को गांव वालों की ओर से काफी मदद भी मिलती है. तस्करों और घुसपैठियों को कई बार हमारे जवानों ने ऊंटों पर बैठ कर ही पकड़ा है. गुजरात में साल 2001 में जब भूकंप आया, तो ऊंटों पर सवार जवान ही सब से पहले पहुंच पाए थे, पर अब ऊंटों को ले कर बीएसएफ और गृह मंत्रालय के लिए चेतावनी की घंटी बज चुकी है. ऊंटों के प्रजनन का काम न तो कोई सरकारी एजेंसी और न ही बीएसएफ देखती है. बीएसएफ तो गांव वालों से या फिर मेलों से 5 से 10 साल की उम्र के ऊंटों को खरीदती है. खरीदने के बाद इन ऊंटों को 21 दिन तक अलग रखा जाता है और इन्हें होने वाली बीमारियां खासकर सुर्रा बीमारी के टीके लगाए जाते हैं. इस के बाद इन को जोधपुर के सब्सिडरी ट्रेनिंग सैंटर में ट्रेनिंग दी जाती है. बीएसएफ एक ऊंट को 16 सालों तक इस्तेमाल में लेती है, फिर उस की नीलामी कर देती है.

ऊंटों की तस्करी

राजस्थान सरकार ने ऊंटों को राज्य से बाहर ले जाने पर पाबंदी लगा रखी है. इस के बावजूद हर रोज कम से कम 2 सौ ऊंटों की तस्करी राजस्थान से हो रही है. यह सारी तस्करी बागपत, उत्तर प्रदेश के एक गिरोह द्वारा की जा रही है, जिस में राजस्थान और हरियाणा के बहुत से पुलिस वालों की मदद ली जाती है. सवाल उठता है कि ये ‘गरीब किसान’ सैकड़ों ऊंटों को खरीदने के लिए पैसा कहां से लाते हैं? एकएक ऊंट की कीमत लाखों रुपए में होती है और जैसेजैसे इन की तादाद कम हो रही है, इन की कीमत में इजाफा ही हो रहा है. कौन इन्हें पैसा दे रहा है?

सैकड़ों ऊंट बंगलादेश जा रहे हैं. तमाम ऊंट बागपत, मेरठ और हैदराबाद में मारे जा रहे हैं. दर्जनों ऊंट दिल्ली से सटे मेवात इलाके में लाए जाते हैं और मारे जाते हैं. जरा सोचिए कि क्या यह केवल ऊंटों के मांस के लिए हो रहा है? इन्हें दिल्ली या आसपास के इलाकों में क्यों लाया जा रहा है? क्या कुछ लोगों ने पिछले 10 सालों में अचानक ऊंट के मांस का स्वाद चख लिया है? ऊंट का मांस सूखा, कड़ा, तेज गंध वाला होता है. इसे खा पाना और पचाना बहुत ही मुश्किल होता है. ऊंट के मीट को पकाने में ही बहुत अधिक समय लगता है. खाने के लिहाज से कोई अच्छी पसंद नहीं कहा जा सकता, तो फिर कहां और क्यों जा रहे हैं ऊंट?

बीएसएफ अगर अपने बेड़े में आधे ऊंट ही शामिल कर पाई, तब अगले 5 सालों में क्या हालात होंगे? ऊंटों के हिमायती एक संगठन ने पिछले 3 सालों में 15 सौ से ज्यादा ऊंट पकड़े हैं, जो तस्करी के लिए ले जाए जा रहे थे. बड़ा सवाल यही है कि ऐसे हालात में ऊंटों को बचाने के लिए राजस्थान और हरियाणा की सरकारें क्या उपाय कर रही हैं?

बढ़ गया है एलआईसी प्रीमियम भरने का समय

जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने पॉलिसीधारकों के लिए नवीकरण प्रीमियम भुगतान का समय बढ़ा दिया है. बड़े नोटों पर प्रतिबंध की वजह से लोगों को आ रही दिक्कतों के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है.

सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी ने एक बयान में कहा, 'पॉलिसीधारकों को किसी तरह की परेशानी से बचाने के लिए तथा नवीकरण प्रीमियम के भुगतान को एलआईसी ने कुछ रियायतें देने की घोषणा की है.'

कंपनी ने कहा कि यह सुविधा उन पॉलिसियां पर दी जाएगी, जिनमें ग्रेस की अवधि 9 नवंबर से 30 नवंबर तक है, अब उनका भुगतान बिना किसी जुर्माने के 30 नवंबर तक किया जा सकेगा.

INDvsWI: जीतकर भी हार गई भारतीय महिला टीम

आईसीसी महिला चैम्पियनशिप के तहत भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वेस्टइंडीज को तीसरे और अंतिम मैच में 15 रनों से हरा दिया. इस जीत के साथ भारतीय टीम ने तीन मैचों की सीरीज 3-0 से अपने नाम कर ली.

मुलापदु के गोकाराजु लैला गंगाराजू एसीए क्रिकेट ग्राउंड में खेले गए अंतिम मैच में टॉस हारकर बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम ने छह विकेट के नुकसान पर वेस्टइंडीज के सामने 200 रनों का लक्ष्य रखा. इसके बाद भारतीय गेंदबाजों ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए मेहमान टीम को 49.1 ओवरों में 184 के स्कोर पर ऑल आउट कर दिया.

भारत के लिए वेदा कृष्णमूर्ति (71) ने सबसे अधिक रन बनाए, जबकि सलामी बल्लेबाज दीप्ति शर्मा ने 23 रनों का अहम योगदान दिया. देविका वैद्य 32 रन बनाकर अंत तक नाबाद रहीं. भारत की ओर से एकमात्र छक्का झूलन गोस्वामी (18) ने लगाया.

भारत से मिले लक्ष्य का पीछा करने उतरी वेस्टइंडीज की टीम को केसिया नाइट (55) ने और हैली मैथ्यू (44) ने अच्छी शुरुआत दिलाई.

कैरेबियाई टीम एक समय पांच विकेट पर 166 रन बना चुकी थी और उसे आखिरी की 32 गेंदों में सिर्फ 34 रन चाहिए थे. लेकिन राजेश्वरी गायकवाड के नेतृत्व में भारतीय गेंदबाजों ने यहां से बेहतरीन वापसी की और बेहद कसी हुई गेंदबाजी करते हुए लगातार विकेट हासिल किए.

राजेश्वरी को सबसे अधिक चार विकेट मिले, जबकि दीप्ति शर्मा, हरमनप्रीत कौर और विद्या ने एक-एक विकेट चटकाए. फील्डिंग में भी बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए भारतीय खिलाड़ियों ने वेस्टइंडीज के तीन बल्लेबाजों को रन आउट किया.

भारत के लिए डेब्यू मैच खेल रहीं सुकन्या कलाकर कोई विकेट तो नहीं ले सकीं लेकिन उन्होंने बेहद कसी हुई गेंदबाजी करते हुए 2.8 की इकॉनमी से रन दिए. दीप्ति, हरमनप्रीत और वैद्य को एक-एक विकेट मिला.

हालांकि इस जीत के बावजूद भारतीय टीम आईसीसी चैम्पियनशिप की अंकतालिका में 18 मैचों में 9 जीत हासिल करते हुए 19 अंक लेकर पांचवां स्थान ही हासिल कर सकी और अगले वर्ष होने वाले आईसीसी विश्व कप में सीधे प्रवेश हासिल करने से चूक गई.

अब भारतीय महिला टीम को विश्व कप में प्रवेश हासिल करने के लिए क्वालिफायर खेलना पड़ेगा.

बिना पैसे के करें ओला से सफर

कैब कंपनी ओला ने 'ओला क्रेडिट' पोस्टपेड सर्विस लॉन्च की. इससे रुकावट मुक्त आवाजाही में मदद मिलेगी और लोग अपने सफर का भुगतान बाद में सुविधानुसार कर सकेंगे. इंडस्ट्री में सबसे पहले यह सुविधा देने का दावा करते हुए कंपनी ने कहा है कि यह ऐसे समय में किया जा रहा है कि जब कैश बचाना बहुत से लोगों के लिए जरूरी है.

ब्लैक मनी के खिलाफ लड़ाई के तहत सरकार ने पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद कर दिए हैं. ऐसे समय में ओला ने यह पेशकश की है. ओला ने बयान जारी कर कहा है कि यह अपने कस्टमर्स को भुगदान के लिए सात दिन का समय देगी, ताकि वे कैश ना होते हुए भी बिना रुकावट बुकिंग करते रहें. ओला को नेटबैंकिंग, डेबिट और क्रेडिट कार्ड से ओला मनी ई-वॉलेट के जरिए आसानी से भुगतान किया जा सकता है. यह ओला ऐप के साथ उपलब्ध है.

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