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पैतृक संपत्ति पर बेटियों का भी समान अधिकार

टैक्सी में बैठने से पहले कविता ने ‘स्नेह विला’ को नम आंखों से देखा, गेट पर आई अपनी मां उमा  के गले लगी. बराबर में दूसरे गेट पर भी नजर डाली. दोनों भाभियों और भाइयों का नामोनिशान भी नहीं था. वे उसे छोड़ने तक नहीं आए थे. ठीक है, कोई बात नहीं, यह दिन तो आना ही था. उस के लिए भाईभाभी की उपस्थित मां की ममता और अपने कर्तव्य की पूर्ति से बढ़ कर नहीं थी. मन ही मन दिल को समझाती हुई कविता टैक्सी में बैठ सहारनपुर की तरफ बढ़ गई.

55 वर्षीया कविता अपनी मां की परेशानियों का हल ढूंढ़ने के लिए एक हफ्ते से मेरठ आई हुई थी. सुंदर व चमकते ‘स्नेह विला’ में उस की मां अकेली रहती थीं. ऊपर के हिस्से में उस के दोनों भाई रहते थे. कविता सब से बड़ी थी, कई सालों से वह देख रही थी कि मां का ध्यान ठीक से नहीं रखा जा रहा है. अब तो कुछ समय से दोनों भाइयों ने अपनीअपनी रसोई भी अलग बनवा ली थी.

आर्थ्राइटिस की मरीज 75 वर्षीया उमा अपने काम, खाना, पीना आदि का प्रबंध स्वयं करती थीं, यह देख कर कविता को हमेशा बहुत दुख होता था. कविता ने उन्हें कईर् बार अपने साथ चलने को कहा. उमा का सारा जीवन इसी घर में बीता था, यहां उन के पति मोहन की यादें थीं, इसलिए वे कुछ दिनों के लिए तो कविता के पास चली जातीं पर घर की यादें उन्हें फिर वापस ले आतीं. पर अब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा था. अब कविता के दोनों भाई उमा पर यह जोर भी डालने लगे थे कि वे आधाआधा मकान उन के नाम कर दें. उमा हैरान थी अैर यह सुन कर कविता भी हैरान हो गई थी.

बीमार उमा को कोई एक गिलास पानी देने वाला भी नहीं था जबकि मकान के बंटवारे के लिए दोनों भाई तैयार खड़े थे. कविता ने कई बार स्नेहपूर्वक भाइयों को मां का ध्यान रखने को कहा, तो उन्होंने दुर्व्यवहार करते हुए अपशब्द कहे, ‘इतनी ही चिंता है तो मां को अपने साथ ले जाओ, उन की देखभाल करना, तुम्हारा भी तो फर्ज है.’

कविता ने अपने पति दिनेश से बात की. कविता ने तय किया कि वह लालची भाइयों को सबक सिखा कर रहेगी. एक वकील से मिलने के बाद पता चला कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, जिस में 9 सितंबर, 2005 से संशोधन हुआ है, के अनुसार, पिता की संपत्ति पर विवाहित बेटी का भी पूरा हक है. उसे संपत्ति का कोई लालच नहीं था. उसे व उस के पति दिनेश के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह अपने भाइयों को इस तरह सबक सिखाना चाहती थी कि वे मां का ध्यान रखें. उस ने फोन पर भाइयों से कहा, ‘‘ठीक है, मैं मां को अपने पास ले आऊंगी पर मुझे भी मकान में हिस्सा चाहिए.’’

दोनों भाइयों को सांप सूंघ गया, बोले, ‘‘तुम्हें क्या कमी है जो मायके का मकान चाहिए?’’ ‘‘क्यों, मैं मां की सेवा कर सकती हूं तो अपना हिस्सा क्यों नहीं ले सकती? यह तो अब मेरा कानूनन हक भी है. फिर मेरा मन कि मैं अपना हिस्सा बेचूं या उस में कोई किराएदार रखूं. मैं ने वकील से बात कर ली है, जल्दी ही कागजात बनवा कर तुम्हें कानूनी नोटिस भिजवाऊंगी.’’

कविता ने अपने मन की बात मां को बता दी थी. दोनों भाइयों का गुस्से के मारे बुरा हाल था. उन्होंने पड़ोसियों, रिश्तेदारों में जम कर कविता की बुराई करनी शुरू कर दी. लालची, खुदगर्ज बेटी को मकान में हिस्सा चाहिए. दोनों भाइयों ने काफी देर सोचा कि 3 हिस्से हो गए तो नुकसान ही नुकसान है और अगर कविता ने अपना हिस्सा बेच दिया तो और बुरा होगा.

दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ विचारविमर्श करते रहे. तय हुआ कि इस से अच्छा है कि मां की ही देखभाल कर ली जाए. दोनों ने मां से माफी मांग कर उन की हर जिम्मेदारी उठाने की बात की. दोनों ने मां के पास जा कर अपनी गलती स्वीकारी. उमा के दिल को बहुत संतोष मिला कि उन का शेष जीवन अपने घर में चैन से बीत जाएगा. कविता को भी अपने प्रयास की सफलता पर बहुत खुशी हुई. वह यही तो चाहती थी कि मां अपने घर में ससम्मान रहें, इसलिए वह मकान में हिस्से की बात कर बैठी थी. अगर कारण कोई और भी होता तो भी अपना हिस्सा मांगने में कोई बुराई नहीं थी.

दरअसल, जब कानून ने एक लड़की को हक दे दिया है तो पड़ोसी, रिश्तेदार इस मांग की निंदा करने वाले कौन होते हैं? आज जब कोई बेटी ससुराल में रह कर भी मातापिता के प्रति अपने कर्तव्य याद रखती है तो मायके की संपत्ति में उस को अपना हिस्सा मांगना बुरा क्यों समझा जाता है? और वह भी तब जब कानून उस के साथ है.

हिंदू उत्तराधिकार संशोधित अधिनियम 2005 के प्रावधान में यह साफ किया गया है कि पिता की संपत्ति पर एक बेटी भी बेटे के समान अधिकार रखती है. हिंदू परिवार में एक पुत्र को जो अधिकार प्राप्त हैं, वे अब बेटियों को भी समानरूप से मिलेंगे. यह प्रस्ताव 20 दिसंबर, 2004 से पहले हुए संपत्ति के बंटवारे पर लागू नहीं होगा.

गौरतलब है कि हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में बेटी के लिए पिता की संपत्ति में किसी तरह के कानूनी अधिकार की बात नहीं कही गई. बाद में 9 सितंबर, 2005 को इस में संशोधन कर पिता की संपत्ति में बेटी को भी बेटे के बराबर अधिकार दिया गया. इस में कानून की धारा 6 (5) में स्पष्टरूप से यह लिखा है कि इस कानून के पास होने के पूर्व में हो चुके बंटवारे इस नए कानून से अप्रभावित रहेंगे.

कानून की नजर में ‘संपत्ति के उत्तराधिकार’ के मामले में भले ही बेटे व बेटी में कोई भेद न हो परंतु क्या बेटियां यह हक पा रही हैं? और अगर नहीं, तो क्या वे अपने पिता या भाई से अपने हक की मांग सामने भी रख पा रही हैं? बेटियों के अधिकार के प्रति सामाजिक रवैया शायद ठीक नहीं है.

सामाजिक मानसिकता

हमारा तथाकथित सभ्य समाज, जो सदियों से रूढि़वादी परंपराओं के बोझ तले दबा हुआ है, आसानी से पैतृक संपत्ति पर बेटियों के हक को बरदाश्त नहीं कर पा रहा है. जहां बचपन से पलती हुई हर बेटी के मन में कूटकूट कर ये विचार विरासत में दिए जाते हों कि तुम पराए घर की हो, इस घर में किसी और की अमानत हो,

यह घर तुम्हारे लिए सिर्फ रैनबसेरा है,उस घर की बेटी इसी को मान बंटवारे की मानसिकता से कोसों दूर रहती है. खासकर, अपनी शादी के बाद पहली बार मायके आने पर वह खुद को मेहमान समझ इस तथ्य को स्वीकार कर लेती है कि अब उसे मायके से रस्मोरिवाज के नाम पर कुछ उपहार तो मिल सकते हैं, पर संपत्ति में बराबरी का हक कदापि नहीं.

आज भी महिलाएं पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने में हिचकती हैं. इंदौर में रह रही 2 बेटियों की मां शैलजा का कहना है कि इस में दोराय नहीं है कि पैतृक संपत्ति में बेटियों का भी हक दिए जाने से उन की स्थिति में सुधार होगा, पर खुद उन के लिए अपने पिता या भाई से संपत्ति में हक मांगना थोड़ा सा मुश्किल है, क्योंकि इस से अच्छेभले चलते रिश्तों में भी दरार आ सकती है.

देश की राजधानी दिल्ली की तमाम औरतों व लड़कियों से की गई बातचीत में सभी ने लगभग यही बताया कि कानून भले ही एक झटके में हमें बराबरी का हक दे दे लेकिन समाज में बदलाव एकाएक नहीं आते. यही वजह है कि वास्तविकता के धरातल पर इस फर्क को दूर होने में कुछ समय लगेगा. हमारा समाज संपत्ति के नाम पर भाईभाई में हुए झगड़े या फसाद को तो सामान्यरूप में ले सकता है, परंतु एक बहन के यही हक जताने पर उसे घोर आपत्ति होगी.

सुप्रीम कोर्ट के महत्त्वपूर्ण निर्णय

पिता की संपत्ति में बेटियों के हक के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सर्वोच्च अदालत द्वारा किया गया, जिस में उस ने कहा कि एक इंसान मरने के बाद अपना फ्लैट अपने बेटे या पत्नी को देने के बजाय अपनी शादीशुदा बेटी को भी दे सकता है.

कोर्ट ने यह फैसला बिस्वा रंजन सेनगुप्ता के मामले में सुनाया. इस केस में बिस्वा रंजन द्वारा अपनी शादीशुदा बेटी इंद्राणी वाही को कोलकाता के सौल्ट लेक सिटी में पूर्वांचल हाउसिंग स्टेट की मैनेजिंग कमेटी के फ्लैट का मालिकाना हक दिया गया. जिस पर कड़ी आपत्ति लेते हुए उन के बेटे और पत्नी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सोसाइटी के रजिस्ट्रार ने भी रंजन की बेटी का नाम उत्तराधिकारी के रूप में दर्ज करने से मना कर दिया था.

उपरोक्त मामले में बिस्वा रंजन अपनी पत्नी और बेटे के दुर्व्यवहार के कारण अपनी शादीशुदा बेटी के पास रह रहे थे. प्रतिवादी पक्षकारों द्वारा यह दावा किया गया कि संपत्ति के मालिक ने मकान के अंशधारकों व वारिस की सूची में सिर्फ पत्नी व बेटे को शामिल किया है, इसलिए वह बेटी को मकान का उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर सकता है. साथ ही, उत्तराधिकार नियमों के मुताबिक भी वादी के बेटे और पत्नी उक्त संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकते हैं क्योंकि बेटे को पिता की संपत्ति में हक लेने का कानूनी अधिकार प्राप्त है. पक्षकारों की तीसरी दलील बेटी के शादीशुदा होने की थी.

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर कहा कि अव्वल तो बेटा और पत्नी विवादित मकान को पैतृक संपत्ति नहीं कह सकते हैं क्योंकि यह प्रतिवादी ने खुद खरीदी थी. इसलिए इसे उत्तराधिकार के दायरे में नहीं रख सकते. जहां तक सोसाइटी ऐक्ट के प्रावधानों का सवाल है तो अदालत ने कहा कि संपत्ति के मालिक ने पत्नी और बेटे के गैर जिम्मेदाराना रवैए से तंग आ कर संपत्ति का उत्तराधिकार बेटी को दिया है. खरीदारी के समय नौमिनी बनाना इस बात का पुख्ता आधार नहीं है कि वे ही उत्तराधिकारी हैं. मालिक के चाहने पर नौमिनी कभी भी बदला जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानून के अलावा सामाजिक लिहाज से भी बेटियों के लिए खासा महत्त्व रखता है.

एक अन्य फैसले में अक्तूबर 2011 में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा और जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधित) अधिनियम 2005 के तहत बेटियां अन्य पुरुष सहोदरों के बराबर का अधिकार रखती हैं. उन्हें बराबरी से अपना उत्तरदायित्व भी निभाना पड़ेगा. इस फैसले में यह भी कहा गया कि अगर बेटियों को बेटों के बराबर उत्तराधिकार नहीं दिया जाता तो यह संविधान द्वारा दिए गए समानता के मौलिक अधिकारों का हनन भी होगा, और दूसरी ओर यह सामाजिक न्याय की भावना के भी विरुद्ध है.

पिता की संपत्ति पर बेटी के  अधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य फैसला सुनाते हुए इसे सीमित भी कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि अगर पिता की मृत्यु 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून के संशोधन से पहले हो चुकी है, तो ऐसी स्थिति में बेटियों को संपत्ति में बराबर का हक नहीं मिल सकता.

वैसे, देखा जाए तो इस नियम के लागू होने के बाद महिलाओं की स्थिति समाज में सुधार की तरफ बढ़ चली है. कानूनी रूप से हुआ यह बदलाव निश्चित ही औरत व आदमी के बीच अधिकारों की समानता की बात करता है. इस का फायदा हमें जल्दी ही निकट भविष्य में देखने

को मिलेगा जब महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन समाज व देश की प्रगति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकेंगी.   

– पूनम पाठक और पूनम अहमद

 

न्यूड मौडल : आसान नहीं राह

 आर्ट कालेज में चित्रकला के पाठ्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण विषय है न्यूड स्टडी. मानव शरीर की पेंटिंग या स्कैच बनाने के लिए शरीर की तमाम बारीकियों को जानना जरूरी है. महिला और पुरुष के शरीर के तमाम उतारचढ़ाव, उस का गठन, अलगअलग होते हैं. आर्ट कालेज में गठनगत बारीकियों का अध्ययन लाइफ स्टडी कहलाता है. इस के अलावा अलगअलग शारीरिक भावभंगिमाओं का भी अध्ययन लाइफ स्टडी या न्यूड स्टडी में शामिल है. इस के लिए आमतौर पर एक जीतेजागते नग्न पुरुष या नग्न महिला मौडल की मदद ली जाती है. तब न्यूड स्टडी होती है. एक समय था जब लाइफ  स्टडी के लिए मौडल मिलने मुश्किल हुआ करते थे. अब इस पेशे में जो भी लड़कियां या औरतें आती हैं, वे परिवार और समाज से छिप कर आती हैं और आमतौर पर गरीब घरों से होती हैं. ये मजबूरी में पेशे में आती हैं. कोलकाता आर्ट कालेज में बतौर न्यूड मौडल काम करने वाली कुछ गिनीचुनी ही मौडल हैं.

लतिका कर्मकार (बदला हुआ नाम) कोलकाता के चित्रकारों के लिए न्यूड पोज देने वाली मौडल है. वह एक निजी कंपनी में चायपानी पिलाने का काम करती है. कभीकभार कोलकाता के कुछ चित्रकारों के लिए न्यूड पोज भी देती है. पर यह काम लतिका किसी छुट्टी वाले दिन ‘प्राइवेटली’ ही करती है. वह बताती है कि मौडलिंग की एक सिटिंग में उसे 1,000-5,000 रुपए मिल जाते हैं. उस के घर पर मातापिता के साथ उस की एक बेटी है. उस का पति 5 महीने की बेटी के साथ उसे छोड़ कर जा चुका है. पिता निजी कंपनी के दफ्तर में चपरासी थे. अब रिटायर्ड हैं. अपना और अपनी बेटी का खर्च चलाने के लिए वह एक निजी कंपनी में काम करती है. किसी पेंटर के आमंत्रण पर वह न्यूड पोज देती है.

बीना पुरकायस्त (बदला हुआ नाम) भी एक न्यूड मौडल है. और इस काम का उसे बहुत लंबा अनुभव है. 19 साल की उम्र से वह न्यूड पोज देती आ रही है. इस पेशे में उसे 23 साल हो गए हैं. बंगाल के कई नामीगिरामी पेंटरों के लिए उस ने न्यूड पोज दिए हैं. बीना का मानना है कि यह काम बहुत कठिन होता है. कई बार एकजैसे पोज में बैठे रहने पर पैर सुन्न हो जाते हैं. आमतौर पर पेंटर मौडल को बीचबीच में 15 मिनट का ब्रैक देते हैं.

वह बताती है कि कई बार आर्टिस्ट अपने काम में कुछ इतने मगन हो जाते हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि एक जीताजागता इंसान एक ही भावभंगिमा में कितनी देर तक बैठे रह सकता है. वहीं, वह यह भी बताती है कि अगर पोज देते हुए मौडल सकुचाए, शर्माए, हिलतीडुलती रहे तो ऐसी मौडलों को अगली बार काम मिलने में परेशानी होती है. कभीकभी आर्टिस्ट की सहूलियत के अनुसार मौडल को बारबार पोज बदलना भी पड़ता है. वह बताती है कि आजकल एस्कौर्ट के पेशे में आई लड़कियां भी न्यूड पोज देने को तैयार हो जाती हैं. लेकिन इस के लिए वे मोटा मेहनताना वसूलती हैं. इसीलिए, आम न्यूड मौडल की अब भी मांग है.

कोलकाता के जानेमाने आर्टिस्ट जोगेन चौधुरी कहते हैं कि हमारे देश में न्यूड स्टडी का चलन यूरोपीय पेंटिंग के प्रभाव में शुरू हुआ. वे कहते हैं, ‘‘मजेदार बात यह है कि हमारे देश में जब किसी पुरुष मौडल को न्यूड स्टडी के लिए बुलाया जाता है तो वह पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं होता है.’’ महिला मौडल को ज्यादातर न्यूड पोज देना होता है, ऐसा क्यों? उन का कहना है कि कला और नारीदेह सौंदर्य की दृष्टि से न्यूड पुरुष मौडल की अपेक्षा महिला मौडल कहीं अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं. आर्ट कालेज में अपने पहली लाइफ स्टडी के बारे में बताते हुए जोगेन चौधुरी अपनी फाइन आर्ट के तीसरे वर्ष की छात्रावस्था के दिनों में लौट जाते हैं. ‘न्यूड स्टडी की वह पहली क्लास थी. बहुत तनाव में थे सारे छात्र. क्लास में एक दुबलीपतली 14-15 साल की मौडल आई. क्लास के बाहर उस के मातापिता बैठे थे. हमारे प्रोफैसर थे देवकुमार राय चौधुरी, लाइफ स्टडी के विशेषज्ञ. हाल ही में इटली से लौटे थे. क्लास में केवल प्रोफैसर ही मौडल के बदन को हाथ लगा सकते थे. लड़की के बदन को छू कर प्रोफैसर ने उस के पोज को ठीक किया.’

जोगेन बताते हैं कि मौडल की मनोस्थिति को वे बखूबी समझ रहे थे. इसीलिए उन्हें उस की चिंता भी हो रही थी कि इतने सारे लड़कों के सामने बेचारी मौडल कैसे न्यूड बैठेगी? कितनी देर तक बैठना होगा? मन ही मन उस के प्रति बड़ी सहानुभूति हो रही थी. पर किया कुछ नहीं जा सका. 5 सालों के पाठ्यक्रम में बीचबीच में लाइफ  स्टडी चलती रही.

वे यह भी बताते हैं कि उस समय मौडल मिलना बहुत मुश्किल होता था. ज्यादातर बदनाम गलियों की लड़कियां या औरतें इस काम के लिए उपलब्ध हो पाती थीं. गौरतलब है कि जोगेन चौधुरी की एक विख्यात लाइफ  स्टडी है – सुंदरी. यह पेंटिंग ललित कला अकादमी से प्रकाशित हुई थी. पर आज यह आउट औफ  प्रिंट है. बंगाल के बहुत सारे पेंटर न्यूड स्टडी में महारतप्राप्त हैं. उन की न्यूड स्टडी की शैली भी अलगअलग हैं. प्रकाश कर्मकार ‘इरोटिक’ न्यूड पेंटिंग के लिए जाने जाते हैं तो परितोष सेन क्युबिस्टिक शैली के लिए.

एलिना बनिक कोलकाता की जानीमानी पेंटर हैं. आर्ट कालेज में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि यह उन दिनों की बात थी जब उन्होंने स्कूल से सीधे आर्ट कालेज में दाखिला लिया था. लाइफ  स्टडी की क्लास में महिला और पुरुष मौडल के बीच होने वाले भेदभाव को ले कर वे अकसर मुखर हो जाया करती थीं. वे कहती हैं कि पुरुषदेह के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. समझ भी नहीं थी. लेकिन एक बार बहस के दौरान सहपाठी मित्र ने आ कर कान में झल्लाते हुए कहा कि पुरुष मौडल पूरी तरह से न्यूड नहीं हो सकता है. अरे, पुरुषांग कभी भी हिलडुल सकता है. एलिना को बात समझ नहीं आई और वे अपनी बात पर अड़ी रहीं कि महिला मौडल की तरह पुरुष मौडल को भी पूरी तरह से न्यूड रहना होगा और वह दिन तकरार में ही बीत गया. आज इस बात को याद कर के वे मुसकरा देती हैं.

बहरहाल, यह तो हुई लाइफ स्टडी में एक महिला पेंटर के सामने आने वाली दिक्कतों की बात. इसी तरह महिला मौडल भी कई तरह की परेशानियों से जूझती हैं. यहां कुछेक घटनाओं का जिक्र जरूरी समझती हूं ताकि समझा जा सके कि ये मौडल किस तरह की विपरीत परिस्थितियों में काम करती हैं.

नारीदेह की समस्याएं

कोलकाता आर्ट कालेज. एक बड़े कमरे में बहुत सारे आर्ट स्टूडैंट्स अपनेअपने कैनवस के साथ तैयार बैठे हैं. यह क्लास न्यूड स्टडी की है. क्लास में केवल एक स्टूडैंट लड़की के अलावा बाकी सभी लड़के हैं. क्लास चालू है. क्लास में एक नग्न महिला एक खास भावभंगिमा में बैठी है. उसे देखदेख कर स्टडी करने के साथ स्केचिंग की क्लास जारी है. अचानक क्लास में मौजूद लड़की ने देखा कि मौडल के लिए अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठे रहना संभव नहीं हो पा रहा है. वह कुछकुछ सकुचा सी रही है, सिमटती चली जा रही है.

आमतौर पर स्टडी क्लास में नियमानुसार मौडल को बुत बन कर बैठे रहना होता है. कहीं कुछ तो था कि मौडल सामान्य आचरण नहीं कर पा रही थी. और उस के सकुचानेसिमटने से क्लास में बैठे स्टूडैंट्स एक हद तक परेशान व नाराज हो रहे थे. पर मौडल थी कि बारबार भावभंगिमा से डिगती चली जा रही थी. ऐसे में तमाम स्टूडैंट्स के साथ क्लास में बैठी लड़की उठती है और मौडल के पास जाती है. कुछ देर मौडल के साथ फुसफुसाने के बाद वह लौट कर आती है और क्लास के तमाम स्टूडैंट्स से मुखातिब हो कर कहती है, ‘तुम लोग जरा क्लास से बाहर जाओ.’

क्लास के स्टूडैंट्स भौचक रह जाते हैं और कुछ तो झल्ला तक जाते हैं. ‘क्यों, अब क्या हुआ? पहले ही इतना समय बरबाद हो चुका है.’

क्लास की वह स्टूडैंट बौखला कर अपने साथी स्टूडैंट को डपटते हुए कहती है, ‘मैं ने कहा, तुम लोग अभी क्लास से बाहर जाओ, तो बाहर जाओ, बिना बहस किए.’ धीरेधीरे क्लास खाली हो गई. इस के बाद उस लड़की ने क्लास का दरवाजा बंद किया.

दरअसल, निर्वस्त्र मौडल का अचानक पीरियड शुरू हो गया था. और ऐसे में वह अपनी लज्जा को भला कैसे ढकती. वहीं, क्लास में मौजूद इतनी सारी निगाहें केवल उस पर और उसी पर टिकी हुई थीं. इस कारण वह अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठी नहीं रह पा रही थी. जाहिर है, उस दिन न्यूड स्टडी की क्लास नहीं हुई. मौडल अपने घर लौट गई.

मुश्किलभरा पेशा

एक न्यूड मौडल को अपने पेशे के लिए काम करते हुए क्याक्या नहीं करना पड़ता है. वाकेआ ऋतुपर्णो घोष की फिल्म ‘चोखेर बाली’ का भी है. कहानी की मांग पर शूटिंग के दौरान एक न्यूड मौडल की जरूरत पड़ी. दरअसल, फिल्म का सहनायक महेंद्र डाक्टरी पढ़ रहा था. एनोटौमी के क्लास का एक दृश्य था, जिस में एक मृतक महिला को टेबल पर सोना था. फिल्म के सहयोगी कला निर्देशक को एक न्यूड मौडल की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई. एक मौडल मिली, पर इस शर्त पर कि फिल्म में किसी भी सूरत में उस का चेहरा न दिखाया जाए और वह मौडल थी कांचन मित्रा (बदला हुआ नाम). कांचन कहती है कि मृत शरीर यानी मृतक को मेकअप की कोई जरूरत नहीं थी लेकिन एनोटौमी की क्लास दिखानी थी तो मौडल के लिए मृतक का मेकअप जरूरी था. मृत दिखाने के लिए मौडल के शरीर का मेकअप करवाया गया. यह मौडल के लिए सब से कठिन काम था. वहीं, फिल्म में लाइट की एक अहम भूमिका होती है. किस एंगल से कितनी रोशनी मृतक के शरीर पर पड़नी चाहिए, ताकि फिल्मांकन अच्छा हो, इस की जांच के लिए मौडल को बारबार मेकअप कर के एनोटौमी टेबल पर सोना जरूरी था. उस के नग्न शरीर को बारबार टचअप करना जरूरी हो जाता था. जाहिर है न्यूड मौडल को बहुत परेशानी पेश आ रही थी.

कांचन को 4 बजे घर जाना था. लेकिन शूटिंग अभी पूरी नहीं हुई थी. और उस के बेटे के स्कूल से आने का समय हो रहा था. कांचन ने सोचा था कि मृत शरीर की शूटिंग होनी है, इस में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा पर सुबह से ले कर 4 बज गए. ऋतुपर्णो घोष को जब पता चला कि मौडल घर जाना चाहती है तो वे एकदम से उखड़ गए. आखिर मौडल को छुट्टी नहीं मिली. काम पूरा होने के बाद ही उसे घर जाने दिया गया.

कुल मिला कर मौडलिंग पेशे की यह लाइन यानी न्यूड मौडलिंग अपना कर पैसा कमाना बहुत ही मुश्किलभरा काम है. वैसे, प्रकाशन या प्रसारण में मौडल का चेहरा तो नहीं दिखाया जाता लेकिन शूटिंग के दौरान स्टूडैंट्स, संबंधित विज्ञापन या फिल्म की यूनिट के सदस्य तो मौडल को साक्षात देखते ही हैं. बहरहाल, महिलाओं के लिए यह भी एक पेचीदा व अजीबोगरीब पेशा है.      

 

एक साल से चल रही थी नोटबंदी की तैयारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल्दबाजी और बिना तैयारी के नोटबंदी की घोषणा की लेकिन हकीकत यह है कि इस की तैयारी एक साल से पहले से चल रही थी. विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल्दबाजी और बिना तैयारी के नोटबंदी की घोषणा की लेकिन हकीकत यह है कि इस की तैयारी एक साल से पहले से चल रही थी. यह अत्यंत गोपनीय ढंग से चल रही थी. इस की तैयारी राजस्व सचिव हंसमुख अधिया और 5 अन्य लोग प्रधानमंत्री कार्यालय में एक कमरे में बैठ कर कर रहे थे, वहीं रणनीति बनाई गई कि किस तरह से इस योजना को अंजाम देना है.

टीम के सदस्यों को पहले गोपनीयता की शपथ दिलाई गई. उन पर कोई संदेह नहीं करे, इस संबंध में उन्हें अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा गया. यह टीम तय कर रही थी कि किस तरह से नए नोटों को छापा जाना है, नोटबंदी की घोषणा के बाद नए नोटों को कैसे बैंकों तक पहुंचाना है, जन सामान्य को पुराने नोट बदलने के लिए किस तरह की व्यवस्था की जानी है आदि. अत्यधिक सावधानी बरतने के बावजूद 2,000 रुपए के नए नोट के बाजार में आने की खबर मई में आ गई थी और अगस्त में इस की मंजूरी मिलने की मीडिया ने खबर दे दी थी.

मीडिया में खबरें आने के बाद अक्तूबर से 2,000 रुपए के नोट की छपाई शुरू हो गई थी. तब तक यह अनुमान लगाना कठिन था कि सरकार नोटबंदी की घोषणा करने जा रही है. नवंबर में दल के सदस्यों से सलाह करने के बाद 18 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा करने की तारीख तय की गई लेकिन यह आशंका बढ़ गई थी कि नोटबंदी की योजना लीक हो सकती है, इसलिए 10 दिन पहले यानी 8 नवंबर को रात 8 बजे प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में अचानक नोटबंदी की घोषणा कर दी.

योजना में सीमित लोगों के ही शामिल होने की वजह से कई खामियां रह गईं. इसलिए घोषणा के बाद नई नई दिक्कतें सामने आती रहीं और उन से निबटने के लिए समय समय पर नियम बदलने पड़े.

आपके स्मार्टफोन की बैट्री खराब कर सकते हैं ये ऐप

स्मार्टफोन यूजर्स बैट्री जल्दी खत्म होने की समस्या से परेशान रहते हैं. बैट्री कितनी देर तक टिकती है, यह बात फोन के स्पेसिफिकेशंस और इस्तेमाल पर निर्भर करती है.

स्मार्टफोन्स के जरिए हम कई सारे काम करते हैं. गाने सुनते हैं, विडियो देखते हैं, गेम्स खेलते हैं और कई तरह के ऐप्स इस्तेमाल करते हैं. जाहिर है कि सब तरह के ऐप्स इस्तेमाल करने से बैट्री खर्च होती है, मगर इस मामले में कुछ ऐप्स का प्रदर्शन ज्यादा ही खराब है.

आगे जानें, किस तरह के ऐप्स ज्यादा बैट्री खर्च करते हैं. अगर आप ज्यादा बैट्री लाइफ चाहते हैं तो इन ऐप्स को अनइंस्टॉल कर सकते है.

बैट्री सेवर ऐप्स

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि रैम क्लीन करने वाले या बैट्री सेव करने वाले ऐप्स भी ज्यादा बैट्री खर्च करते हैं. दरअसल ये ऐप्स बैकग्राउंड पर रन करते रहते हैं. तब भी, जब आप फोन को इस्तेमाल न कर रहे हों. ये ऐप्स हेंडसैट को लगातार स्कैन करते रहते हैं और जंक फाइल्स वगैरह को क्लीन करते रहते हैं.

गेमिंग ऐप्स

अगर आप गेम्स खेलना पसंद करते हैं तो इन ऐप्स को हटाना शायद आप न पसंद करें. जितने हेवी ऐप्स होंगे, उतनी ही ज्यादा बैट्री खर्च होगी. 3डी ऐनिमेशन वाले ऐप्स बैट्री को जल्दी खत्म करते हैं. अगर आप इंस्टॉल नहीं करना चाहते तो उन्हें फोर्स स्टॉप कर सकते हैं. ये तब तक इनऐक्टिव रहेंगे, जब तक आप इनपर टैप नहीं करेंगे.

ऐंटी वाइरस ऐप्स

बैट्री सेवर और रैम मैनेजमेंट ऐप्स की तरह ऐंटी-वाइरस ऐप्स भी बैकग्राउंड में रन करते रहते हैं, ताकि मोबाइल को खतरों से बचा सकें. स्कैन करने में ये जितना ज्यादा वक्त लेंगे, बैट्री उतनी ही तेजी से खर्च होगी. कुछ ऐंटी वाइरस ऐप्स तो कैमरा का भी ऐक्सस हासिल कर लेते हैं, ताकि आपका हैंडसेट अनलॉक करने की कोशिश करने वाली की तस्वीर ले सके. यह अच्छा फीचर तो है, मगर बैट्री को जल्दी खत्म करता है.

सोशल मीडिया ऐप्स

फेसबुक सबसे पॉप्युलर स्मार्टफोन ऐप है, मगर यह बैट्री भी ज्यादा खर्च करता है. यह ऐप बैकग्राउंड में रन करता रहता है, ताकि आपको नोटिफिकेशंस वगैरह भेज सके. फेसबुक ही नहीं, मेसेंजर ऐप भी फोन की बैट्री को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाता है. स्नैपचैट, स्काइप और इंस्टाग्राम जैसे हेवी सोशल मीडिया ऐप्स भी यही करते हैं.

फोटो-एडिटिंग ऐप्स

अगर आपको तस्वीरें लेकर एडिट करने का शौक है तो आपके स्मार्टफोन में जरूर फोटोएडिटिंग ऐप्स होंगे. ये ऐप्स हेवी होते हैं और इमेज वगैरह प्रोसेस करने में बहुत पावर इस्तेमाल करते हैं. इसलिए या तो इन ऐप्स को कम इस्तेमाल करें या फिर पावरबैंक लेकर चलें.

इंटरनेट ब्राउजर ऐप्स

अगर आपके स्मार्टफोन में एक्स्ट्रा ब्राउजर ऐप्स हैं तो उन्हें हटा दीजिए. एक ही ब्राउजर ऐप रखिए. कुछ ब्राउजर न्यूज या अन्य तरह की नोटिफिकेशन के लिए नेट से जुड़े रहते हैं, जिस वजह से बैट्री खर्च हो जाती है.

फ्रूट बुके : तोहफा सेहतभरा

हमारे यहां शुरू से चाहे बर्थडे पार्टी हो, मैरिज एनिवर्सरी हो, फूलों का बुके देने का चलन है. लेकिन जहां फ्लावर बुके की शोभा कुछ घंटों तक सीमित रहती है, वहीं फ्रूट बुके आकर्षक होने के साथ हैल्दी औप्शन भी देता है. खास मौकों पर फ्रूट बुके भेजने का यह एक यूनिक आइडिया है 28 वर्षीया नेहा अग्रवाल का. नेहा कुछ हट कर करना चाहती थीं, जिस में नयापन हो और लोगों के लिए हैल्दी भी हो. चूंकि नेहा के पास फूड टैक्नौलौजिस्ट की डिगरी थी, सो उन्होंने लोगों के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए सोचा क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों को सेहतभरा तोहफा मिले और उन्होंने ‘फ्रूट्ज कौंसैप्ट्स’ के नाम से फ्रूट बुके का काम शुरू किया.

आज नेहा के फ्रूट बुके पसंद करने वालों की लिस्ट दिनबदिन लंबी होती जा रही है. फलों की कलात्मकता के साथ पेश करने का यह आइडिया लोगों को खासा पसंद आ रहा है. फ्रूट बुके में ताजा फलों के साथ चौकलेट्स व ड्राईफ्रूट्स को शामिल किया जाता है. फ्रूट बुके बनाते समय फलों की ताजगी का पूरा ध्यान रखा जाता है. आप चाहें तो अपनी पसंद के अनुसार मनचाहे आकार और फलों का बुके बनवा सकते हैं. यानी आप अपनी पसंद का फ्रूट बुके और्डर कर सकते हैं.

नेहा बताती हैं कि फ्रूट बुके बनाते समय फलों की क्वालिटी व ताजगी का पूरा ध्यान रखा जाता है. बुके होम डिलीवरी करने से कुछ घंटे पहले ही तैयार किया जाता है. फलों का बुके सजाते समय साफसफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है. फलों को निर्धारित तापमान पर रखा जाता है, ताकि उन की ताजगी बरकरार रहे. बुके को बनाने के बाद उसे हाइजीनिक और जर्मफ्री रखने के लिए जर्म प्रोटैक्ट शील्ड से कवर किया जाता है.

फ्रूट बुके को आकर्षक बनाने के लिए किस्मकिस्म की टोकरियों और वासेज का प्रयोग किया जाता है. कटर की सहायता से फलों को हार्ट फ्लावर्स आदि की आकर्षक शेप दी जाती है और फलों को इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वे बुके का रूप ले लें. फ्रूट बुके 3 साइज में उपलब्ध होते हैं — स्मौल, मीडियम और लार्ज. स्मौल फ्रूट बुके 5 लोगों के लिए काफी होता है, मीडियम बुके 8 लोगों के लिए और लार्ज बुके 12 लोगों के लिए काफी होता है. आप सप्ताह के सातों दिन चौबीसों घंटे 24 3 7 औनलाइन और्डर कर सकते हैं. आप बुके में अपनी पसंद के फलों का चुनाव कर सकते हैं. बुके के पेमैंट आप क्रैडिट कार्ड, डैबिट कार्ड, नैट बैंकिंग द्वारा कर सकते हैं.

पेटीएम का सरकारी विकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के एक दिन बाद पेटीएम जैसी निजी कंपनी ने अखबारों के पहले पेज पर बड़े विज्ञापन दिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के एक दिन बाद पेटीएम जैसी निजी कंपनी ने अखबारों के पहले पेज पर बड़े विज्ञापन दिए तो कई लोग तत्काल समझ नहीं पाए कि उन विज्ञापनों का आशय क्या है.

लेकिन यह जल्दी से समझ आ गया कि यह औनलाइन कारोबार करने वाली कंपनी नकदी की कमी का फायदा उठाना चाहती है. इस के साथ ही मोबिक्विक, फ्रीचार्ज तथा इट्जकैश जैसी कंपनियों का कारोबार रातोंरात बढ़ने लगा. पेटीएम ने सर्वाधिक फायदा कमाया और उस के ग्राहकों की संख्या देश के सब से बड़े स्टेट बैंक औफ इंडिया के ग्राहकों से आगे निकल गई.

औनलाइन कंपनियों में लाभ कमाने की होड़ लग गई लेकिन नैशनल पेमैंट कौर्पोरेशन औफ इंडिया यानी एनपीसीआई की औनलाइन भुगतान कंपनी यूनाइटेड पेमैंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई में उस का ज्यादा असर नहीं हुआ. यह पेटीएम की तरह सरकारी क्षेत्र की औनलाइन भुगतान कंपनी है जिस के जरिए सरकार सारे भुगतान औनलाइन करने की प्रक्रिया अपनाना चाहती है.

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के दिमाग की यह कल्पना इस वर्ष अप्रैल में सामने आई और अगस्त में उस की शुरुआत कर दी गई लेकिन औनलाइन भुगतान का यह सरकारी उपक्रम अब तक कोई रंग नहीं दिखा सका. यूपीआई, दरअसल, सरकारी क्षेत्र का सफेद हाथी है जिस पर रंग सरकारी योजनाओं के अनुसार चढ़ सकता है. इस कंपनी में सबकुछ है लेकिन कर्मचारियों को काम नहीं करना पड़े और यूपीआई सफेद हाथी बना रहे, कंपनी के अधिकारी इसी फिराक में जुटे हैं. वरना ई-कौमर्स के इस दौर में यह कंपनी भी दौड़ती होती और सरकार को फायदा दे रही होती, साथ ही आम नागरिक के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा विश्वसनीय भी बनती.

औनलाइन भुगतान व्यवस्था वाले 15 देशों में, विश्वस्तर पर औनलाइन भुगतान करने वाली सब से बड़ी कंपनी मास्टर कार्ड ने कैशलैस व्यवस्था वाले दुनिया के 15 देशों का एक डाटा पेश किया है जिस में भारत सब से निचले पायदान पर है. इन देशों में सर्वाधिक 61 प्रतिशत औनलाइन काम सिंगापुर में होता है जबकि नीदरलैंड 60 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान, 59 प्रतिशत के साथ फ्रांस तीसरे, इतने ही प्रतिशत के साथ स्वीडन चौथे और 57 प्रतिशत के साथ कनाडा 5वें स्थान पर है. दुनिया की महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका 45 प्रतिशत के साथ 8वें, ब्रिटेन 52 प्रतिशत के साथ 7वें और 56 प्रतिशत के साथ बैल्जियम छठे स्थान पर है जबकि आस्ट्रेलिया 35 फीसदी के साथ नवें और दक्षिण कोरिया 29 प्रतिशत के साथ 10वें स्थान पर है.

इस क्रम में 16 प्रतिशत के साथ स्पेन 11वें, 5 प्रतिशत के साथ ब्राजील 12वें, 14 फीसदी के साथ जापान 13वें, 10 फीसदी के साथ चीन 14वें और 2 फीसदी के साथ भारत 15वें स्थान पर है. इसी तरह से एटीएम में भारत 7 प्रमुख देशों में आखिरी पायदान पर है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 1 लाख लोगों पर महज 20 एटीएम हैं जबकि इतनी ही आबादी पर चीन में 254, कनाडा में 221, अमेरिका में 173, रूस में 173, आस्ट्रेलिया में 165, ब्रिटेन में 132, ब्राजील में 129 तथा जापान में 128 एटीएम हैं. ऐसी स्थिति में देश में कैशलैस व्यवस्था को लागू करना कितना मुश्किल है, यह सरकार भी जानती है. मोदी सरकार ने देश को कैशलैस व्यवस्था में लाने का जो संकल्प लिया उस का लाभ बड़ी आबादी को मिलेगा.

जो लोग भुगतान के लिए ई-कौमर्स व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकते हैं उन्हें तो इस सिस्टम से जोड़ा ही जा सकता है. एक अनुमान के अनुसार, 32 करोड़ लोग हमारे यहां इंटरनैट का इस्तेमाल कर रहे हैं और अगर 32 करोड़ की यह आबादी नैट बैंकिंग जैसी भुगतान प्रणाली से जुड़ जाती है तो इसे बड़ी उपलब्धि माना जाएगा.

अस्थिरता के बीच मजबूती पर टिके रहे बाजार

नोटबंदी की घोषणा के बाद से बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक में उथलपुथल मची है. यह स्वाभाविक भी है. देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालने वाले निर्णय के बाद बाजार में अनिश्चितता तो आनी ही थी लेकिन नकदी की किल्लत के कारण यह संकट और बढ़ गया. अगर नकदी का संकट गहराता नहीं तो सूचकांक के लंबी छलांग लगाने के आसार थे. नोटबंदी पर संसद से सड़क तक जो गतिरोध पैदा हुआ उस ने शेयर सूचकांक को ज्यादा अस्थिर कर दिया. रि

जर्व बैंक ने इस बीच ब्याज दरों में उम्मीद के विपरीत कटौती नहीं की, बावजूद उस के रुपया दिसंबर के पहले सप्ताह लगभग 5 सत्र तक मजबूती पर रहा और उस में सुधार देखा गया.

शेयर बाजार भी 4 दिसंबर से पहले लगातार 4 दिन तक तेजी पर रहा. दूसरे बाकी भी बाजारों में मामूली गिरावट के बाद तेजी का ही रुख रहा. जानकारों के मुताबिक भारतीय बाजार में यह रुख वैश्विक स्तर पर शेयर बाजारों में तेजी के माहौल से आया.

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आंतरिक स्थितियों से प्रभावित होने के बजाय सूचकांक एक पैंडुलम की तरह नजर आया जिस की दोलन गति दुनिया के बाजारों में उत्पन्न हालात पर आधारित रही है. इन सब परिस्थितियों के बावजूद दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक बाजार में तेजी का माहौल रहा और सूचकांक मजबूती पर बंद हुआ. 

पासवर्ड की भूलभुलैया

राकेश सचान पूरे परिवार के साथ छुट्टियां मनाने के लिए औनलाइन टिकट बुक करा रहे थे कि ऐन मौके पर अपने वीजा कार्ड का पासवर्ड भूल गए. नतीजतन, सारी प्रक्रिया लगभग पूरी होने के बावजूद टिकटें बुक नहीं हो सकीं. हारकर उन्हें टिकटें बुक कराने के लिए रेलवे काउंटर पर जाना पड़ा लेकिन तब तक सीटें फुल हो चुकी थीं.

कुलवंत सिंह के साथ तो इस से भी बुरा तब हुआ जब वे अपना फेसबुक अकाउंट खोल रहे थे और अचानक पासवर्ड भूल गए. इस वजह से उन्हें एक जरूरी सूचना कई घंटों बाद मिल सकी जब उन्होंने आखिरकार अपने फेसबुक अकाउंट का पासवर्ड बदला.

आजकल की व्यस्त जीवनशैली में परेशान करने वाली ऐसी तकनीकी घटनाएं काफी आम हो गई हैं. एक साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मोबाइल, इंटरनैट, इंटरनैट बैंकिंग, एटीएम जैसी तमाम तकनीकी सुविधाओं का लाभ उठाने वाले हर 10 में से 3 लोग अपना पासवर्ड भूल जाने या उन के पासवर्ड सार्वजनिक या लीक हो जाने की समस्या से पीडि़त रहते हैं. एक पत्रिका ने अपने विश्वव्यापी सर्वेक्षण में पाया है कि तमाम तरह की तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले लोगों में से 30 फीसदी लोग कभी न कभी अपना पासवर्ड भूल जाने की समस्या का सामना करते हैं.

तकनीकी बोझ

पासवर्ड आधुनिक जीवनशैली का एक तकनीकी बोझ है. दोढाई दशकों पहले लोग इस तरह के बोझों से मुक्त थे क्योंकि जिंदगी के सरोकार इतने मशीनी व तकनीक पर आधारित नहीं थे. लेकिन आज पासवर्ड जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं. इस कारण इन की कोई अनदेखी करने की नहीं सोच सकता खासकर ऐसे लोग जो प्लास्टिक मनी, मोबाइल बैंकिग, ईमेल, इंटरनैट जैसी सुविधाओं का हर समय इस्तेमाल करते हैं. आज सक्रिय जीवनशैली जीने वाला कोई व्यक्ति अमूमन 3 से 4 पासवर्ड हर समय ढोता है. लेकिन अगर जैनरेशन एक्स और वाई की बात करें तो यह तो औसतन 5 से 6 पासवर्ड से लैस रहती है. बड़े शहरों से ले कर छोटे और मझोले शहरों तक में रहने वाले लोग इस लत का शिकार हैं. हर गुजरते दिन के साथ लोग पासवर्ड्स के चक्रव्यूह में फंसने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं. तमाम आधुनिक संचार साधनों मसलन ईमेल, इंटरनैट का तो बिना पासवर्ड इस्तेमाल संभव ही नहीं है. जिस तरह जिंदगी के सरोकारों में तकनीकी उपकरणों की भूमिका बढ़ती जा रही है, उसी रफ्तार से पासवर्ड्स का बोझ भी बढ़ता जा रहा है.

पासवर्ड और आप

पासवर्ड क्या है? वास्तव में पासवर्ड वह गुप्त तकनीकी चाबी है जिस की बदौलत आप साइबर दुनिया के अपने ठिकानों/खातों में प्रवेश कर सकते हैं. यह चाबी कोई और नहीं बनाता, आमतौर पर इसे आप खुद ही बनाते हैं. पासवर्ड कोईर् गुप्त शब्द या कैरेक्टर हो सकता है जो आप और आप की दुनिया के बीच उस विश्वसनीयता का सुबूत होता है जो यहां तक पहुंचने के लिए जरूरी होता है. इसी चाबी के जरिए आप साबित करते हैं कि आप वही हैं जिस का दावा कर रहे हैं और जब मशीनी तकनीक आप के उस दावे को सही पाती है तो आप की पूरी दुनिया आप के सामने खुली किताब की तरह आ धमकती है. कहने का मतलब यह है कि आप के बैंक में लाखों रुपए हों लेकिन इन रुपयों को आप एटीएम कार्ड के जरिए तब तक नहीं निकाल सकते जब तक मशीन द्वारा पूछे गए पासवर्ड को आप बता न सकें और उस पासवर्ड के जरिए मशीन आप की सत्यता को स्वीकार न कर ले.

पासवर्ड आज की जीवनशैली का एक ऐसा जरूरी माध्यम बन गया है जिस के बिना आप क्रैडिट और डैबिट कार्ड से शौपिंग नहीं कर सकते, रैस्टोरैंट में खाने के बाद बिल नहीं अदा कर सकते और सफर के लिए टिकट नहीं खरीद सकते. पासवर्ड हर जगह आप को, ‘आप’  साबित करता है.

आज की तारीख में पूरी दुनिया में अरबों की संख्या में पासवर्ड हैं. महानगरों में रहने वाला शायद ही कोई सक्रिय व्यक्ति हो जो अपने पास कई तरह के पासवर्ड न रखता हो. पासवर्ड सुरक्षा का तकनीकी उपाय है. यह आप को जहां एक तरफ सुविधाएं हासिल करने के लिए योग्य बनाता है वहीं दूसरी ओर आप की उस निजी दुनिया को उन लोगों से दूर रखता है जो इस का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, इस समय हिंदुस्तान में ही अकेले 4 से 5 अरब पासवर्ड मौजूद हैं जिन का हर दिन 40 करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. सब से ज्यादा पासवर्ड ईमेल सुविधाओं, बैंकिंग सुविधाओं और मोबाइल व एटीएम के लिए इस्तेमाल होता है. पासवर्ड के बिना आजकल आप अपनी ही वैयक्तिक दुनिया में मनचाहे ढंग से विचरण नहीं कर सकते.

कैसे आया पासवर्ड

वैसे, पासवर्ड कोई बिलकुल नई खोज नहीं है. पासवर्ड या वाचवर्ड वास्तव में बहुत पुरानी व्यवस्था है जिस का इस्तेमाल प्राचीनकाल में रोमन सेनाओं को व्यवस्थित रखने के लिए किया जाता था. रात में जब रोमन सेनाएं अपने किसी अभियान के लिए मार्च करती थीं तो वे एक विशेष कोडवर्ड या पासवर्ड के जरिए ही अपने रास्ते में आने  वाली बाधाओं को दूर करती थीं. इसी के जरिए सैनिक शिविर खाली करते थे. इसी तरह किसी विशेष पासवर्ड के जरिए ही शिवाजी की सेनाएं मुगलों पर टूट पड़ने का आपस में संदेश प्रेषित करती थीं. पासवर्ड के जरिए ही अतीत में सेनाएं अपनी सुरक्षा, रखवाली और दुश्मन को जांचनेपरखने का काम करती रही हैं.

लेकिन आधुनिक जमाने में पासवर्ड का यह समाजशास्त्र बदल गया है. आज पासवर्ड सेनाओं या महज तकनीकी दुनिया तक ही सीमित नहीं रह गया बल्कि यह रोजमर्रा की जिंदगी की सुविधाओं को हासिल करने का एक तकनीकी उपाय बन गया है. आज पासवर्ड वह व्यवस्था है जिस के जरिए आप अपनी दुनिया को बहुत मोबाइल बना सकते हैं. दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए अपने बैंक अकाउंट का इस्तेमाल कर सकते हैं, पैसे निकाल सकते हैं, जमा कर सकते हैं और यह जांच सकते हैं कि उस की वास्तविक स्थिति क्या है. पासवर्ड के जरिए ही आप एक तरफ जहां तकनीकी विकास का फायदा उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी के जरिए ही आप इस जटिल दुनिया में अपनी सुरक्षा भी करते हैं.

अपराधियों की पहुंच

लोगों के निजी पासवर्ड तक घुसपैठ कर सकने वाले शातिर अपराधियों की संख्या दिनपरदिन बढ़ती जा रही है, जिस के चलते हर दिन पूरी दुनिया में औसतन 10 लाख पासवर्ड नए बनते हैं. शातिर अपराधी पारंपरिक ढंग से बनाए गए पासवर्डों को अपनी तेजतर्रार तकनीकी जानकारियों की बदौलत तोड़ डालते हैं और आप की दुनिया में घुस कर आप को आर्थिक व सामाजिक नुकसान पहुंचाते हैं. याद करिए डेढ़ दशक पहले का वह वाकेआ जब स्वीडन के एक किशोर लासे लुजान माइक्रोसौफ्ट के पासवर्ड को जान गया था और इस जानकारी के चलते उस ने कंप्यूटर जगत का पर्याय समझी जाने वाली इस कंपनी को कंपा दिया था. हालांकि लासे लुजान ने माइक्रोसौफ्ट को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचाया था, न ही उस ने इसे किसी तरह के नुकसान पहुंचाने का इरादा ही जाहिर किया था. लेकिन अपनी इस हरकत के जरिए उस ने बिल गेट्स और पौल एलेन के माथे पर चिंताओं की लकीरें ला दी थीं.

सुरक्षा व्यवस्था का कोड

आज पासवर्ड बहुत नाजुक किस्म की हमेशा चितिंत करने वाली सुरक्षा व्यवस्था बन कर रह गईर् है. हिंदुस्तान में 10 करोड़ से ज्यादा लोग हर दिन इंटरनैट का इस्तेमाल करते हैं. 2 करोड़ से ज्यादा लोग सप्ताह में 1 से 3 दिन इंटरनैट के जरिए शौपिंग करते हैं. रैस्टोरैंट में खाना खाने और सफर के लिए टिकट खरीदने का काम भी चूंकि बड़े पैमाने पर प्लास्टिक मनी के जरिए संपन्न होता है, इसलिए हर पल करोड़ों लोगों की जिंदगी पासवर्ड के दायरे में रहती है.

देश में 8 करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल और इंटरनैट बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं तथा 40 करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं. ये तमाम गतिविधियां बिना पासवर्ड के संभव ही नहीं हैं. यही कारण है कि आज महानगरों में रहने वाली युवा पीढ़ी एकसाथ 5 से 7 पासवर्ड का बोझ ढो रही है.

सवाल है ऐसी स्थिति में क्या पासवर्ड्स का यह चक्रव्यूह उन्हें परेशान भी करता है? उत्तर है, हां. जिस तरह से पासवर्ड्स की संख्या एक कामकाजी आधुनिक, तकनीकीप्रिय युवा के पास बढ़ रही है, उसी तरह पासवर्ड उन के लिए एक सिरदर्द भी बनता जा रहा है. 5-5 पासवर्ड अपने पास रखना और अलगअलग जगहों पर अलगअलग पासवर्ड्स का सफलतापूर्वक सही उपयोग सुनिश्चित करना आसान नहीं है. यही कारण है कि तमाम संचार सुविधाओं के केयर सैंटर्स में हर दिन पासवर्ड खो जाने और नया पासवर्ड बनाने के लिए फोन कौल्स की लाइन लगी रहती है.

पासवर्ड की दुनिया जितनी तेजी से विभिन्न तरह की सुविधाएं हमारे पास लाती है, उतनी ही तेजी से हमें उस खतरे के नजदीक ले जाती है जिस के हम पलक झपकते शिकार हो सकते हैं.

पासवर्ड तक कोई पहुंच न बना सके, इस के लिए हर कोई होशियारी बरतता है और विभिन्न तरह की तकनीकी सुविधाएं देने वाली कंपनियां लगातार लोगों को सजग भी करती हैं. वे समयसमय पर पासवर्ड को जटिल और दुर्लभ बनाने की कवायद भी करती रहती हैं. लेकिन अपराध की दुनिया में एक जुमला हमेशा से इस्तेमाल होता रहा है ‘पुलिस डालडाल तो चोर पांतपांत’ यानी अपराधी, तकनीकी सुविधाओं को सुरक्षित बनाने वालों से हमेशा चार कदम आगे रहते हैं. इसलिए पासवर्ड्स के इस्तेमाल में चाहे जितनी सजगता बरती जाए, कभी न कभी कोई न कोई गलती हो ही जाती है. तकनीक का यह चक्रव्यूह सबकुछ के बावजूद जटिल है.

बहरहाल, पासवर्ड की दुनिया जितने जादुई अंदाज में हमारे सामने सुविधाओं का पिटारा खोलती है, उतनी ही खतरनाक मुश्किलें भी खड़ी कर देती है. लेकिन चाहे फायदे के साथ नुकसान कितने भी हों, कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन के बिना हम जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते. ऐसी ही चीजें या सुविधाओं में पासवर्ड की सुविधा भी है. इसलिए भले यह समस्याओं का चक्रव्यूह हो, इस चक्रव्यूह से बचना कोई अक्लमंदी नहीं है बल्कि अभिमन्यु की तरह बेहतर यही है कि गर्भ में रहते हुए इसे भेदने की कला सीख लेनी चाहिए. लेकिन दूसरों के पासवर्ड भेदने की नहीं, बल्कि अपने पासवर्ड को सुरक्षित बनाए रखने की कला.         

कमजोर पासवर्ड, आसान शिकार

पासवर्ड कभी पूरी तरह से न्यूमेरिक यानी संख्या में होते हैं जैसे कि पर्सनल आइडैंटिफिकेशन नंबर या पिन नंबर जो आमतौर पर एटीएम और मोबाइल के लिए उपयोगी सैटिंग सुलभ कराते हैं तो कई बार ये संख्या और शब्दों के मेल से बनाए जाते हैं. कई बार ये संक्षिप्त होते हैं तो कई बार कुछ बड़े होते हैं. आमतौर पर लोग ऐसे अंकों, नामों या चीजों को पासवर्ड का रूप देना चाहते हैं जो उन के लिए याद करने में आसान हो और दूसरे के लिए जटिल. लेकिन दिक्कत यह होती है कि अकसर जो पासवर्ड उपयोगकर्ता के लिए आसान होता है, वही पासवर्ड हैकर के लिए भी आसान हो जाता है. नतीजतन, आसान पासवर्ड उपयोगकर्ता का सिरदर्द बन जाता है. यही कारण है कि आजकल वो तमाम सुविधाएं जो पासवर्ड के जरिए हासिल होती हैं, उन्हें उपलब्ध कराने वाली कंपनियां जोर डालती हैं कि आप का पासवर्ड आप के लिए सरल मगर दूसरे के लिए बेहद जटिल होना चाहिए. उदाहरण के लिए 3 संख्या वाले पासवर्ड को 7 संख्या वाले पासवर्ड के मुकाबले अनुमान लगाना ज्यादा आसान है. इस के अलावा व्यक्तिगत तथ्यों और ब्योरों पर आधारित पासवर्ड कहीं ज्यादा जटिल होता है. विशेषज्ञों का सुझाव है कि हमेशा ऐसे पासवर्ड विकसित किए जाने चाहिए जो आप की याददाश्त के लिए आसान और अपराधी के लिए बहुत मुश्किल हों.

पासवर्ड की उलझन से कैसे निबटें

पासवर्ड की उलझनें कई तरह की होती हैं. पहली उलझन अलगअलग कामों के लिए जरूरी अलगअलग पासवर्ड इस्तेमाल किए जाने की हो सकती है. मगर इस में दिक्कत यह आती है कि उन्हें याद रखना कठिन होता है और कहीं लिख कर स्टोर करने में खतरा इन के किसी और के हाथ में पड़ जाने का होता है. ऐसे में विशेषज्ञों की मानें तो अगर पासवर्ड की संख्या एक से ज्यादा हो तो उन्हें स्टोर करने के लिए एक फाइल बना लें और एक आसान पासवर्ड से उस फाइल को सुरक्षित रखें. सुरक्षित किए हुए पासवर्ड का बैकअप अपनी पैनड्राइव या डिस्क अथवा कौपी में ले लें जिस से एक से दूसरी जगह रखने के कारण इस के खो जाने की आशंका कम रहे. हालांकि औनलाइन पासवर्ड स्टोर करने का तरीका अभी काफी विवादास्पद है मगर एक अच्छा औनलाइन पासवर्ड मैनेजर चुन कर भी पासवर्ड को सुरक्षित रखा जा सकता है.

पासवर्ड का नाम अपने कुत्ते, प्रेमिका या पत्नी के नाम पर न रखें. अपनी जन्मतिथि, कार के नंबर या ड्राइविंग लाइसैंस का भी इस के लिए इस्तेमाल करने से बचें. क्योंकि पासवर्ड बनाने के ये अनुमानित तरीके हैं और इन अनुमानित तरीकों से बचना ही बेहतर है. वरना आसानी से आप हैकर के अनुमानजाल में फंस जाएंगे और इस से आप को आर्थिक व सामाजिक नुकसान उठाने पड़ सकते हैं.

पासवर्ड को हमेशा मिश्रित संख्याओं और शब्दों के अनुपात में बनाएं यानी इस में कुछ शब्द हों और कुछ संख्याएं. जिस के चलते तब तक किसी को यहां तक पहुंचना मुश्किल होगा जब आप खुद उसे नहीं बताएंगे. पासवर्ड बनाने का एक तरीका यह भी है कि आप किसी ऐसी चीज को पासवर्ड का रूप दें जिस की कल्पना ही न की जा सके. मसलन, बचपन में आप स्कूल जिस बस से जाते थे अगर उस बस का नंबर और रूट नंबर याद हो तो उस का इस्तेमाल करें. हैकर सोच भी नहीं सकता कि ऐसा भी पासवर्ड हो सकता है. अपने किसी पसंदीदा हीरो और उस की किसी खूबी को पासवर्ड की शक्ल में डाल सकते हैं और अनुमान लगाने वालों के लिए मुश्किल होगी.              

हौकी के अच्छे दिन

भारतीय हौकी पिछले कुछ महीनों से सुर्खियों में है. सुर्खियों में रहने का कारण कोई विवाद नहीं है बल्कि भारतीय टीम फिलहाल शानदार खेल का प्रदर्शन कर रही है. वह अपने सुनहरे दिनों को हासिल करने के लिए लगातार प्रयासरत है और एशियाई चैंपियंस टूर्नामैंट में यह देखने को मिल भी चुका है जिस में पाकिस्तान को धूल चटा कर उस ने अपने खेल का लोहा मनवाया.

फिलहाल जूनियर हौकी वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत दूसरी बार कर रहा है और जूनियर खिलाडि़यों में भारतीय टीम के कप्तान हरजीत सिंह, स्ट्राइकर मनदीप सिंह, ड्रैग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह और गोलकीपर विकास दहिया जैसे ऐसे युवा खिलाड़ी हैं जो विपक्षी टीम को धूल चटाने का माद्दा रखते हैं. इस से पहले भारत ने 2001 में आस्ट्रेलिया के हौबर्ट में फाइनल में अर्जेंटीना को 6-1 से हरा कर विश्वकप जीत कर देश का नाम रोशन किया था. उस दौर के कई खिलाड़ी भारतीय हौकी टीम में भी अपना नाम कमा चुके हैं.

उम्मीद है कि इस बार भी भारतीय हौकी की जूनियर टीम से कुछ ऐसे खिलाड़ी भी उभर कर निकलेंगे जो खेल को बुलंदियों तक पहुंचाने में भूमिका निभाएंगे.

भारतीय हौकी टीम के खिलाडि़यों को अपनी फिटनैस पर ध्यान देना होगा, उन्हें चुस्तदुरुस्त रहना होगा. भारतीय टीम को यदि आगे ले जाना है तो खिलाडि़यों को कड़ी मेहनत करनी होगी क्योंकि इन दिनों दुनिया की कई बड़ी टीमें लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं.

आस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और जरमनी जैसी टीमों से मुकाबला करने के लिए खास रणनीति बनानी होगी. खेल संघों में एकजुटता दिखानी होगी. हौकी के नाम से राजनीति करने

वाले पदाधिकारियों को हौकी के हित के लिए सोचना होगा क्योंकि बहुत सालों बाद हौकी का प्रदर्शन पहले के मुकाबले अच्छा हो रहा है.    

क्रिकेट का एक चेहरा यह भी

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने छठी बार एशिया कप अपने नाम किया लेकिन न ही अखबार की सुर्खी बनी और न ही खबरिया चैनलों ने तवज्जुह दी. क्रिकेट को धर्म की तरह मानने वाले इस देश में पुरुष और महिला खिलाडि़यों के बीच भेदभाव देखने को मिलता है तो चिंता होती है. भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिताबी जीत को जनसामान्य में उतनी जगह नहीं मिल पाती जितनी पुरुष टीम को मिलती है. महेंद्र सिंह धौनी कौन हैं, इस बात को तकरीबन सभी जानते होंगे मगर मिताली राज कौन हैं, हो सकता है कि बहुत से लोगों ने इस नाम को पहली बार ही सुना हो.

दरअसल, भेदभाव क्रिकेट का नहीं बल्कि लैंगिक का है. पुरुष खिलाडि़यों के मुकाबले महिला खिलाडि़यों को सारी सुविधाएं नहीं मिलतीं. एक मैच खेलने के लिए पुरुष खिलाड़ी को जितना पैसा दिया जाता है उतना पैसा एक महिला खिलाड़ी को नहीं मिलता. यहां तक कि महिला टीम जब मैच खेलती है तो दर्शकों को मामूली रेट पर टिकट मिलते हैं. बावजूद इस के, स्टेडियम में दर्शक नहीं जुटते. वहीं, जब पुरुष टीम खेलती है तो स्टेडियम खचाखच भर जाते हैं जबकि टिकटों के रेट भी अधिक होते हैं.

महिला टीम की मिताली राज इस मुद्दे को कई बार उठा चुकी हैं. महिला क्रिकेट के एक कोच ने भी एक बार गंभीर सवाल उठाए थे कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पुरुष क्रिकेट टीम पर पानी की तरह पैसा बहाता है जबकि महिला क्रिकेट को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं करता.

महिला क्रिकेट टीम में भी विराट कोहली और महेंद्र सिंह धौनी जैसे धुरंधरों की कमी नहीं है.

 

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