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बिना एक्सपीरियंस के भी पा सकते हैं नौकरी

आज के समय में नौकरी हासिल करना बहुत मुश्किल हो गया है. दिनोंदिन बढ़ती प्रतियोगिता के कारण अपनी योग्यता के अनुसार जॉब मिलना नामुमकिन सा हो गया है. बहुत से लोगों को अपनी योग्यता साबित करने का मौका ही नहीं मिलता.  किसी भी इंडस्ट्री में नौकरी पाने के लिए आपके पास एक प्रवेश स्तर के काम की जरूरत होगी जहां पर आप अपनी योग्यता को और भी निखार सकें. बहुत से लोग अपनी योग्यता को निखारने के लिए इंटर्नशिप कर लेते हैं, पर सभी के पास ऐसे मौके नहीं आते. पर आप बिना किसी अनुभव के भी नौकरी पा सकते हैं. जानिए कैसे:

शुरू करें वॉलंटियर वर्क

1. सबसे पहले अपनी रूची पता करें. कुछ लोगों को तो शुरू से ही पता होता है कि उन्हें अपनी जिन्दगी में किस मंजिल को हासिल करना है. पर कुछ लोग उलझें ही रहते हैं. अच्छे से विचार कर लें कि आप किस इंडस्ट्री में काम करना चाहते हैं और कौन सी नौकरी करना चाहते हैं.

2. अपने इंट्रेस्ट के हिसाब से नौकरी चुनें और उसे पाने के तरीके पता करें.

3. नौकरी के लिए अगर आप इंटर्नशिप करतें हैं तो यह आपके लिए और भी अच्छा होगा. पेड या अनपेड इंटर्नशिप के लिए ऐप्लाई करें. ऐप्लाई करने से पहले कंपनी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठा कर लें.

4. अगर आपको किसी कारणवश इंटर्नशिप नहीं मिलती है तो आप वॉलंटियर वर्क भी कर सकते हैं. कुछ इंडस्ट्री, जैसे कि एनजीओ और हेल्थ सेक्टर में वॉलंटियर करना और इंटर्नशिप करना बराबर ही है. अगर आपने ये काम अच्छे से किया तो आपको बड़ी जिम्मेदारियां भी मिल सकती हैं.

अपनी स्किल्स को पहचानें

1. उन सभी स्किल्स की लिस्ट बनायें जो आपके फील्ड में काम कर रहे लोगों में होना आवश्यक है. अब ये तय करें कि उनमें से कितने स्किल्स आपमें हैं और कितने आपमें नहीं हैं.

अपनी सारी कंप्यूटर स्किल्स, कम्युनिकेशन स्किल्स, रिलेशन्स स्किल्स, मैनेजमेंट स्किल्स की लिस्ट तैयार करें. आपकी जो भी योग्यता है उसके बारे में लिखें.

2. अगर आपने पहले नौकरी, पार्ट टाइम जॉब की है या फिर किसी बिजनेस को सेट-अप करने के लिए अपने परिवार या दोस्तों की मदद की है तो इसे भी अपने स्किल्स में शामिल करें.

3. आपने जो भी स्किल्स लिखें हैं वो किसी भी कंपनी के किस तरह काम आ सकती हैं ये लिखना न भूलें.  

रिज्यूम बनायें

आप किस तरह से रिज्यूम बनाना चाह रहे हैं यह अच्छे से सोच लें. अलग अलग इंडस्ट्री के लिए अलग अलग रिज्यूम फोरमेट होता है.

पर रिज्यूम लिखते समय कुछ बातों का ध्यान जरूर रखें

– पर्सनल जानकारी से शुरूआत करें. अपना फोन नंबर और ई-मेल आईडी डालना न भूलें.

– एक्सपीरियंस के कॉलम को स्किल्स से भरें, पुरानी नौकरीयों से नहीं.

– रिज्यूम को नौकरी के हिसाब से बदलते रहें.

– अगर अंग्रेजी में रिज्यूम लिख रहे हैं, तो action verb का इस्तेमाल कर वाक्य बनायें.

– स्कूल, कॉलेज में प्राप्त पुरस्कारों की भी जानकारी दें.

– अगर आप किसी ऑर्गनाइजेशन के मेंमबर, प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी हैं तो इस बात को भी अपने रिज्यूम में डालें.

नौकरी की खोज को दें स्पीड

1. आप ऑनलाइन साइट्स पर भी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं.

2. पार्ट टाइम जॉब करें: जब तक आपको फुल टाइम नौकरियां नहीं मिलती है, तब तक पार्ट टाइम जॉब कर लें. ये आपके रिज्यूम में भी ऐड-ऑन हो जाएगा और आपका मेंटल प्रेशर भी कुछ कम हो जाएगा.

3. दूसरों के भरोसे न बैठें. लोग अपना उल्लू ही सीधा करेंगे. बहुत ज्यादा भरोसेमंद व्यक्ति से ही अपनी नौकरी लगवाने को कहें.

आत्मविश्वास के साथ अंदर जाएं, और कभी भी सामने वाले को ऐसा ना लगने दें कि आप के पास बिल्कुल भी अनुभव नहीं है. यदि आप अपनी स्किल्स को अन्य क्षेत्र में ढाल सकते हैं तो किसी क्षेत्र के अनुभव को अन्य किसी क्षेत्र के अनुभव के तौर पर लिया जाएगा. अगर आपमें हुनर है तो उसे पहचान जरूर मिलेगी.

बसपा पोस्टर से गायब हुये दलित महापुरुष

‘उपेक्षाओं को जाने दो, बहन जी को आने दो’ ऐसे स्लोगन लिखे पोस्टर सीरीज में बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनाव प्रचार के लिये तैयार कराये हैं. पोस्टर को सोशल मीडिया पर प्रचार के लिये पोस्ट कर दिया गया है. पोस्टर में लिखा है कि उत्तर प्रदेश की सुखशांति और प्रगतिशील भविष्य के लिये बहुजन समाज पार्टी को वोट दीजिये. नीले और काले रंग में तैयार इस पोस्टर में उत्तर प्रदेश के वर्तमान हालात को दिखाते एक फोटो और अलग अलग कैप्शन हैं. नीले रंग वाले हिस्से में मायावती की फोटो है. पोस्टर की सबसे खास बात यह है कि इसमें कहीं भी डाक्टर अम्बेडकर और कांशीराम का नाम या फोटो नहीं है. यह अपने आप में एक अलग बात है. बसपा में किसी भी नेता महापुरुष का नाम हो न हो पर कांशीराम और अम्बेडकर का नाम जरूरी होता है.

यह सच है कि नई पीढ़ी के नेताओं में पुरानी पीढी के नेताओं से आगे निकलने की होड हर दल में लगी है. भाजपा की लखनऊ रैली में स्टेज से अटल बिहारी वाजपेई की फोटो गायब हुई तो शोर मचने लगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में अटल जी का नाम लेकर उस कमी को पूरा किया. समाजवादी पार्टी में लोहिया और जनेश्वर मिश्र की बात कौन कहे अब तो मुलायम सिंह यादव तक को पीछे कर दिया गया है. बसपा की सोच इन दलों से अलग थी. मायावती हमेशा से अपने चुनाव प्रचार में कांशीराम और अंबेडकर का नाम सबसे आगे रखती थी. पहली बार चुनाव प्रचार के पोस्टर से बसपा के इन नेताओं का नाम गायब दिखा है.

बसपा की तरफ से इस संबंध में कुछ नहीं कहा गया है. बसपा के समर्थक और दूसरे दलित चिंतक हैरान हैं. विश्वशुद्र महासभा के चौधरी जगदीश पटेल कहते हैं ‘बसपा अपनी नीतियों से बहुत पहले हटकर चुनाव जीतने के समीकरण बना रही थी. सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर दलित-ब्राहमण गठजोड़े की दलित विचारधारा से पहले ही हट चुकी है. 2007 में बसपा की जब बहुमत से सरकार बनी थी उस समय दलितों के लिये काम करने वाले संगठनों को उम्मीद थी कि सरकार कुछ ठोस कदम दलित समाज के लिये उठायेगी. वह सरकार केवल मूर्तियां लगाने और घोटालों के नाम से जानी गई. अब बसपा को यह समझ आ गया है कि दलित सच को समझ गया है. दलित के लिये बसपा भी वैसे ही है जैसे दूसरे दल. ऐसे में बसपा के प्रचार में महापुरुषों का दरकिनार होना कोई बड़ी बात नहीं है.’

दलित चिंतक रामचन्द्र कटियार कहते हैं ‘मायावती ने बसपा को पूरी तरह से अपनी छवि के साथ जोड़ने का प्रयास बहुत पहले कर दिया था. यही वजह है कि कांशीराम के करीबी किसी नेता को आगे बढ़ने नहीं दिया गया. जीवित अवस्था में ही अपनी मूर्ति लगाकर मायावती ने नई पंरपरा की ही शुरुआत की थी. अब धीरेधीरे वह इससे एक कदम आगे बढते हुये पार्टी के प्रचार में केवल अपना चेहरा ही रखना चाहती है. बसपा के वोट बैंक का कम होना इस बात को दिखाता है कि पार्टी का जिस तरह से विस्तार होना चाहिये था वह नहीं हुआ. बसपा उत्तर प्रदेश से बाहर नहीं जा सकी. अब प्रदेश में भी उसका जनाधार कमजोर होता जा रहा है. सपा में घरेलू लड़ाई के बाद भी बसपा उसका लाभ उठा कर पिछडों को अपनी ओर करने में असफल दिख रही है. इस वजह से ही वह अपना फोकस मुसलिम वोटों पर कर रही है.’ 

मैं पति को अपने घर ले आउंगी : श्रद्धा कपूर

फिल्म ‘आशिकी 2’ से चर्चा में आई श्रद्धा कपूर अपने अभिनय और ‘सिंगिंग’ की वजह से आज एक मुकाम तक पहुंच चुकी हैं. उन्होंने साल 2010 में फिल्म ‘तीन पत्ती’ से अपने कैरियर की शुरुआत की थी. उन्होंने कई फिल्में की जिसमें कुछ सफल तो कुछ असफल रहीं. श्रद्धा इसे सहजता से लेती हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक असफल फिल्म ही उसे सफल फिल्म की ओर ले जाती है. स्वभाव से नम्र और हंसमुख श्रद्धा लाइट ब्लू कलर की ड्रेस में सामने आईं और अपनी नई रोमांटिक फिल्म ‘ओके जानू’ के बारे में बातचीत की. पेश है कुछ अंश.

प्र. इस फिल्म को चुनने की वजह क्या है?

यह एक ‘लिविंग रिलेशनशिप’ पर आधारित फिल्म है. जिसमें वे बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, वे अपनी मर्ज़ी से इस रिश्ते को अपनाते हैं. शादी नहीं करना चाहते हैं. यह आज का विषय है और दर्शक इसे पसंद करेंगे. इसके अलावा इस फिल्म का चुनाव अलग ढंग से हुआ, निर्देशक शाद अली ने पहले मुझे तमिल फिल्म ‘ओके कनमानी’ दिखाई और कहा कि अगर मुझे फिल्म पसंद आयेगी तो वे इसका रीमेक करेंगे. मैंने फिल्म देखी और बहुत पसंद आई. मैंने हां कर दी.

प्र. किसी फिल्म की ‘रीमेक’ में काम करना कितना मुश्किल होता है?

ये मुश्किल नहीं, क्योंकि अभिनेत्री नित्या मेनन और अभिनेता दुलकुएर ने तमिल फिल्म में बहुत अच्छा अभिनय किया है. फिल्म अच्छी तरह से लिखी गयी है, ऐसे में रीमेक में अपना टच लाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और वही मेरे लिए चुनौती थी. 

प्र. आप की नज़र में ऐसी सोच कितनी सही है?

मेरे कुछ दोस्त हैं, जो लिविंग रिलेशनशिप में रहते है तो कुछ शादी के बाद सोचते हैं. मेरे हिसाब से इसमें सही गलत कुछ भी नहीं है, जो जिसे सूट करे, ख़ुशी दे, उसे वह कर सकता है. देखना ये पड़ता है कि इसमें आप किसी को दुःख तो नहीं पहुंचा रहे. अगर सब मर्ज़ी से राज़ी ख़ुशी से होता है, तो कोई समस्या नहीं है.

प्र. खुद लिविंग रिलेशनशिप पर रहना चाहेंगी?

पर्सनली मैं अपने माता-पिता और भाई की संगत को बहुत एन्जॉय करती हूं. अगर मौका आयेगा तो घर को छोड़ना मुश्किल होगा, जिसमें मैं पली बड़ी हुई हूं, मेरा बहुत लगाव है. इसके साथ मैं यह भी सोचती हूं कि ऐसे विचार अगर मेरे मन में कभी आये तो बहुत सोचना पड़ेगा. हो सकता है कि मैं अपने पति को ही अपने घर ले आऊं.

प्र. क्या लिविंग रिलेशनशिप में कुछ मुश्किलें आती हैं?

मैं इस बारें में कुछ कह नहीं सकती, क्योंकि मैं इस रिश्ते में अभी पड़ी नहीं हूं. लेकिन इतना सही है कि घर पर रहने से जो खुशी आपको परिवार वालों से मिलती है, वह आपको किसी और रिश्ते में नहीं मिल सकती. सुबह से ही उस ख़ुशी का दौर चलता रहता है.

प्र. आदित्य के साथ दूसरी बार काम करने का अनुभव कैसा रहा?

आदित्य एक अच्छे कलाकर हैं. कुछ फिल्में उनकी नहीं चली, वो अलग बात है, क्योंकि ऐसा तो हर किसी के साथ होता ही रहता है. उन्होंने बहुत अच्छा काम इस बार भी किया है. वे अपनी भूमिका को लेकर बहुत ‘पैशनेट’ हैं. बहुत रिहर्सल और प्रैक्टिस करते हैं. ताकि अभिनय अच्छा हो. उनसे मैं बहुत प्रेरित होती हूं.

प्र. ओके जानू की शूटिंग कहां हुई? कहीं कोई मुश्किल थी?

पूरी शूटिंग मुंबई और अहमदाबाद में हुई. बाइक पर काफी दृश्य है. पूरी फिल्म में मज़ा आया. कई बार मुंबई में स्ट्रीट पर शूट करते हुए मुश्किल आई, क्योंकि लोग जमा हो जाते थे. अहमदाबाद में शूटिंग अच्छी थी, पर गर्मी बहुत थी.

प्र. खाली समय में क्या करना पसंद करती हैं?

मैंने पिछले साल 4 फिल्मों की शूटिंग की थी. बहुत व्यस्त थी, लेकिन जब मुझे थोड़ा ब्रेक मिला, तो मैं घर पर थी. मोबाइल को ‘स्विच ऑफ’ कर दिया था, ताकि किसी की फ़ोन मुझे न आये. जब मन में चाहा सो गयी, जब मन चाहा उठ गयी, अपनी डॉग शायलो के साथ रही. मेरे मम्मी पापा के साथ रही और तीन साल बाद मैंने अपने रूम को साफ़ किया.

प्र. घर से इतना लगाव होने की वजह क्या है?

घर मेरे लिए मेरा दिल है जहां मैं बड़ी हुई हूं. मेरा कमरा वहीं है, जहां मेरा जन्म हुआ था और तब से लेकर आज तक वही रहती हूं. पहले मैं और मेरा भाई शेयर करते थे, बड़े होने पर अलग कमरा मिला. मुझे अपना घर बहुत पसंद है. इसके अलावा मुझे प्लांट्स से बहुत लगाव है, मैं खुद प्लांट्स लगाती हूं.

प्र. फिल्में जब सफल नहीं होती तो उसका असर आप पर कितना पड़ता है? उस दौर से आप कैसे निकलती हैं?

असर तो पड़ता है. मैं फील करती हूं, क्योंकि मेरे कैरियर की शुरुआत मेरी दो नाकामयाब फिल्मों से हुई थी. इसलिए उसका असर काफी था. मैं अपसेट थी. दरअसल हम फिल्में इसलिए करते हैं, क्योंकि हमें इसके प्रोसेस में मज़ा आता है. आशा रहती है कि फिल्म चले, पर न चलने पर कुछ कर नहीं सकती. करीब कुछ महीने बाद मैं उससे निकल पायी.

प्र. सेलेब्रिटी होने के बाद आप क्या ‘मिस’ करती हैं?

मैं एक नार्मल लड़की की तरह जीवन व्यतीत नहीं कर सकती. मैं सड़क पर जाकर पानी पुरी नहीं खा सकती, समुद्री तट पर अपनी डॉग शायलो को लेकर घूम नहीं सकती. उसे मैं मिस करती हूं.

प्र. कंट्रोवर्सी को आप कैसे लेती हैं?

कभी-कभी लोग गॉसिप के लिए कुछ भी बिना तथ्यों की परख किये लिख देते है, वह गलत होता है. खासकर परिवार वालों को लेकर अगर कुछ लिखा जाय तो मुझे बहुत ही ख़राब लगता है. बिना जांच परख किये आत्मविश्वास के साथ लिख देने को मैं गलत मानती हूं, जरुरी है कि रिपोर्टर अपनी जिम्मेदारी को समझ कर सही बातें लिखने की कोशिश करें. फरहान को मेरे साथ जोड़कर जो आर्टिकल लिखी गयी उसमें कही भी सच्चाई नहीं है.

प्र. आपकी आगे आने वाली फिल्में कौन सी हैं?

अभी मेरी फिल्म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ की शूटिंग खत्म हो चुकी है और फिल्म ‘हसीना’ पर काम चल रहा है.

हरामखोर : घटिया स्तर की रचनात्मकता का प्रतीक

बेसिर पैर की कहानी, बेतुका प्रेम संबंध, बेतुकी पटकथा और बेतुका निर्देशन यानी कि फिल्म ‘‘हरामखोर’’. फिल्मकार दावा कर रहे हैं कि यह फिल्म शिक्षक व छात्रा के बीच की प्रेम कहानी है, पर इसे शिक्षक व छात्रा के बीच हवस पर आधारित बोल्ड फिल्म कहना ज्यादा उचित होगा.

यह फिल्म एक चौदह वर्षीय लड़की और उसके शिक्षक के बीच प्रेम कहानी है. मगर पूरी फिल्म में फिल्म निर्देशक शिक्षक व छात्रा की प्रेम कहानी को स्थापित नहीं कर पाए, बल्कि यह प्रेम की बजाय महज वासना ही नजर आयी. निर्देशक व पटकथा की कमजोरी के चलते शिक्षक अर्थात श्याम महज सेक्स के हवसी नजर आते हैं.

फिल्म ‘‘हरामखोर’’ की कहानी के केंद्र में मध्यप्रदेश के एक गांव में अपने पुलिस अफसर पिता के साथ रह रही नौंवी कक्षा की छात्रा संध्या (श्वेता त्रिपाठी) और उसके शिक्षक श्याम सर (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) हैं. संध्या की मां बचपन में ही उसे छोड़कर चली गयी थी, श्याम सर ने अपनी छात्रा रही सुनीता (त्रिमाला अधिकारी) से ही शादी कर रखी है, पर उनकी कोई संतान नहीं है. श्याम सर स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ अपने घर पर भी ट्यूशन लेते हैं. श्याम सर अपनी छात्राओं व छात्र छात्राओं की माताओं पर डोरे डालते रहते हैं. संध्या का सहपाठी कमल (बाल कलाकार इरफान खान) भी संध्या के संग शादी रचाने का सपना देख रहा है. उसके इस सपने को पूरा करने में मदद की बात संध्या व कमल का सहपाठी मिंटू (बाल कलाकार मो.समद) करता है. कमल व मिंटू, दोनों ही श्याम सर व संध्या की गतिविधियों पर नजर रखते हैं.

संध्या व श्याम सर के बीच भी प्रेम संबंध हैं. एक दिन संध्या के पिता अपनी प्रेमिका मीनू से मिलने जाते हैं, तब रात में डर का बहाना कर संध्या, श्याम सर के घर पहुंच जाती हैं. फिर श्याम सर के बेडरूम के दरवाजे को खिसका कर श्याम सर को अपनी पत्नी के साथ सेक्स संबंध बनाते हुए देखती है. श्याम सर भी देखते हैं कि संध्या उनके इस कृत्य को देख रही है. मगर श्याम सर जानकर भी अनजान बने रहते हुए अपनी पत्नी के साथ सेक्स सुख का आनंद लेते रहते हैं. फिर कुछ समय बाद श्याम सर, संध्या के पास जाकर उसके शरीर को हाथ लगाते हैं. दूसरे दिन स्कूल में संध्या उनसे पन बिजली के पास सुनसान इलाके में मिलने के लिए कहती है. जहां श्याम सर पहुंच कर संध्या के साथ अपनी हवस मिटाते हैं.

फिर यह सिलसिला चल पड़ता है. कभी कभी संध्या के पिता की गैरमौजूदगी में श्याम सर, संध्या के घर के अंदर ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं. एक दिन संध्या कहती है कि इस बार उसका मासिक धर्म नहीं हुआ. तो श्याम सर उसे शहर डाक्टर के पास ले जाते हैं, जहां संध्या के पिता की प्रेमिका मीनू नर्स  के रूप में मिल जाती है, जो कि संध्या का साथ देती है. इसके एवज में  अब मीनू, संध्या के घर रहने लगती है.

मीनू का साथ मिलने के बाद संध्या व श्याम सर के बीच का कुकृत्य ज्यादा तेज गति से चलने लगता है. पर एक दिन इसका पता श्याम सर की पत्नी सुनीता को लग जाता है. सुनीता घर छोड़कर चल देती है. श्याम सर, संध्या के घर जाकर उसे बुलाते हैं और उसे सुनसान जगह पर ले जाकर कहते हैं कि उसकी वजह से उनकी पत्नी चली गयी..इधर कमल व मिंटू, श्याम सर के घर में घुसकर खाते पीते, उधम मचाने के बाद श्याम सर के कुछ कपड़े चुराकर चले जाते हैं.

जब श्याम सर घर वापस लौटते हैं, तो उनकी पत्नी वापस आ चुकी होती हैं. अब श्याम सर को यह पता लगाना है कि उनके घर चोरी किसने की. एक दिन वह कमल व मिंटू को अपने कपड़ों में देख लेते हैं. गुस्से में वह कमल की हत्या कर देते हैं, यह देख मिंटू भी बड़ा पत्थर उठाकर श्याम सर के सिर पर मारता है. श्याम सर की भी मौत हो जाती है. खुद मिंटू, संध्या के घर जाकर बता देता है. यहीं से फिल्म खत्म.

16 दिन में फिल्मायी गयी फिल्म ‘‘हरामखोर’’ के लेखक व निर्देशक के तौर पर श्लोक शर्मा बहुत बुरी तरह से असफल रहे. यह फिल्म उनके अंदर की रचनात्मकता की बजाय उनके दिमागी दिवालियापन का चित्रण करती है. कई जगह तो लगता है कि उन्होंने बिना पटकथा के कुछ दृश्यों को फिल्माकर जोड़ दिया है. श्याम सर की पत्नी सुनीता को श्याम व संध्या के रिश्ते के बारे में कैसे पता चला? सुनीता वापस श्याम सर के ही पास क्यों आयी? श्याम सर व संध्या के बीच प्यार या चाहत कैसे पैदा हुई? श्याम सर का रवैया खौफनाक व भयावह है, मगर संध्या के मन में क्या चल रहा है, यह साफ नहीं होता. यानी कि शिक्षक व छात्रा की प्रेम कहानी स्थापित ही नहीं होती. यह तमाम अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनका जवाब फिल्म में नहीं है. पिता व पुत्री का रिश्ता भी उभरा नहीं. यह खामी पूर्णरूपेण पटकथा लेखक व निर्देशक के दिमागी खालीपन का ही परिचायक है. कथा कथन में भी काफी त्रुटियां हैं. जिस तरह से फिल्म के दो अलग अलग धुरी के लोगों की मौत के साथ फिल्म खत्म की गयी, उससे भी पता चलता है कि निर्देशक की समझ में नही आ रहा था कि वह फिल्म का अंत किस मोड़ पर करें. बची कुची कसर फिल्म के एडीटर  ने फिल्म की एडीटिंग तितर बितर तरीके से कर फिल्म को चौपट कर दिया. पूरी फिल्म बोर करने के अलावा कुछ नहीं करती.

जहां तक अभिनय का सवाल है. तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अच्छी परफार्मेंस दी है, मगर उन्हे खुद को दोहराने से बचना चाहिए. फिल्म हरामखोर में श्याम सर के किरदार में उन्हे देखकर उनकी पुरानी फिल्मों के कई किरदारों के मैनेरिजम याद आ जाते हैं. ‘रमन राघव 2’ की ही तरह ‘हरामखोर’ में भी वह कई जगह बहुत खौफनाक लगते हैं. ‘हरामखोर’ के कई दृश्यों में नवाजुद्दीन ने ‘रमन राघव 2’ के अपने किरदार के ही मैनेरिज्म को दोहराया है. यदि नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपनी अभिनय शैली पर ध्यान नहीं दिया, तो वह हर फिल्म में इसी तरह खुद को दोहराते नजर आएंगे. 14 वर्षीय छात्रा लड़की संध्या के किरदार में श्वेता त्रिपाठी ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

एक घंटे 34 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हरामखोर’’ का निर्माण गुनीत मोंगा, अनुराग कश्यप, फिरोज अलामीर व अचिन जैन तथा निर्देशन श्लोक शर्मा ने किया है. फिल्म के संगीतकार जसलीन रायल तथा कलाकार हैं- नवाजुद्दीन सिद्दिकी, श्वेता त्रिपाठी, त्रिमाला अधिकारी, मा.इरफान खान, मा.मो.समद व अन्य.

2019 विश्व कप से बाहर हो सकता है पाक!

पूर्व विश्व चैंपियन पाकिस्तान पर 2019 में इंग्लैंड में होने वाली आईसीसी विश्व कप में सीधे क्वॉलिफाई करने से वंचित रहने का खतरा मंडरा रहा है. पाकिस्तान जिस तरह से वनडे रैंकिंग में फिसलता जा रहा है उससे हो सकता है वह इंग्लैंड में होने वाले विश्व कप 2019 के लिए क्वालिफाई न कर पाए.

एकदिवसीय टीम रैंकिंग में सबसे निचले पायदान पर मौजूद पाकिस्तान का मुकाबला ब्रिसबेन में शुरू हो रही पांच मैचों की वनडे सीरीज में मौजूदा विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया से होना है. पाकिस्तान इस सीरीज में अच्छा प्रदर्शन कर अपनी रैंकिंग सुधारते हुए विश्व कप के लिए सीधे क्वॉलिफाई करना चाहेगा जो ऑस्ट्रेलियाई टीम की फॉर्म को देखते हुए कठिन लग रहा है.

1992 विश्व कप विजेता पाकिस्तान के पास विश्व कप 2019 के लिए सीधे क्वालिफाई करने का मौका है क्योंकि ब्रिस्बेन में उसे ऑस्ट्रेलिया के साथ वनडे सिरीज खेलनी है लेकिन नंबर वन टीम को हराना उसके लिए टेढ़ी खीर होगी. सिरीज शुरु होने के पहले जो रैंकिंग पाकिस्तान की है उसे बरकरार रखने के लिए उसे सिरीज में एक मैच जीतना होगा और अगर वह और मैच जीतता है तो उसे महत्वपूर्ण अंक मिल जाएंगे.

पाकिस्तान अगर दो मैच जीतता है तो उसके 91 हो जाएंगे और वह बांग्लादेश की बराबरी कर लेगा लेकिन रैंकिंग नीचे ही रहेगी. अगर वह सिरीज जीत जाता है तो बांग्लादेश से आगे निकल जाएगा और उसके सीधे क्वालिफाई करने की संभावना भी बढ़ जाएंगी.

दूसरी तरफ अगर ऑस्ट्रेलिया ये सिरीज 4-1 से जीतता है तो वह अपनी रैंकिंग बरकरार रखेगा जबकि 3-2 से जीतने पर उसे एक अंक का नुकसान होगा. लेकिन रिकार्ड दूसरी ही कहानी बयां करते हैं. ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान को अपने देश में 33 बार हराया है जबकि 16 बार पाकिस्तान जीता है. इस दशक में ऑस्ट्रेलिया ने 19 वनडे में से 15 वनडे में पाकिस्तान को हराया.

टॉप टीमों को मिलती है सीधे एंट्री

वनडे रैंकिंग में टॉप 8 टीमें सीधे वर्ल्ड कप के लिए क्वॉलिफाई कर लेती हैं. उसके बाद की रैंकिंग वाली टीमों के लिए क्वॉलिफाइंग मैच खेलने पड़ते हैं. पाकिस्तान पर इसी राउंड में खेलने का खतरा मंडरा रहा है.

यह है पाक की मौजूदा स्थिति

पाकिस्तान अभी 89 अंक के साथ आठवें पायदान पर है.

पाक 89 अंक के साथ बांग्लादेश से दो अंक पीछे और वेस्टइंडीज से दो अंक आगे है.

पाक अगर दो मैच जीतता है तो उसके बांग्लादेश के बराबर 91 अंक हो जाएंगे.

बराबरी के बावजूद दशमलव गणना में वह बांग्लादेश से पीछे रहेगा.

ऐसे होंगे क्वॉलिफाई

30 सितंबर 2017 की आईसीसी वनडे टीम रैंकिंग से होगा फैसला.

07 शीर्ष टीम और विश्व कप का मेजबान इंग्लैंड वर्ल्ड कप में सीधे क्वॉलिफाई करेंगे.

30 मई से 15 जुलाई, 2019 तक होने वाली विश्व कप में ये 8 टीम होंगी.

04 निचली रैंकिंग की टीमें 2018 में विश्व कप क्वॉलिफायर में हिस्सा लेंगी.

06 एसोसिएट देश की टीम भी आईसीसी विश्व क्रिकेट लीग से क्वॉलिफायर में आएंगी.

02 टीम इस क्वॉलिफायर में शीर्ष पर रहते हुए विश्व कप में क्वॉलिफाई करेंगी.

भारत की रैंकिंग भी खतरे में

दूसरी तरफ वनडे में तीसरे नंबर की टीम भारत भी 15 जनवरी से पुणे में पांचवें नंबर की टीम इंग्लैंड से भिड़ेगा. भारत अगर इस सीरीज में क्लीन स्वीप करता है तो वह 114 अंक तक पहुंचा सकता है, जबकि इसके उलट नतीजा रहने पर इंग्लैंड एक स्थान के फायदे से चौथे स्थान पर पहुंचेगा और भारत पांचवें स्थान पर खिसक जाएगा.

विद्या बालन ने छोड़ी कमलादास की बायोपिक फिल्म ‘अमी’

लगभग तीन साल की खामोशी के बाद विद्या बालन की वापसी वाली फिल्म ‘‘कहानी 2’’ ने बाक्स आफिस पर कोई खास करिश्मा नहीं दिखलाया, इससे अब विद्या बालन अपने करियर पर काफी गंभीरता से विचार करने लगी हैं. जिसकी वजह से उन्होंने मलयालम फिल्म ‘‘अमी’’ करने से इंकार कर दिया. फिल्म ‘अमी’ मशहूर विवादास्पद कवि कमलादास की बायोपिक फिल्म है. जिसे करने के लिए विद्या बालन ने अग्रीमेंट भी साइन किया था. उन्होंने इस फिल्म के लिए लुक टेस्ट दिया था. विद्या बालन ने अपनी तरफ से इस फिल्म को लेकर काफी तैयारी कर ली थी. विद्या बालन ने इस फिल्म में अभिनय करने के लिए कमलादास की आटोबायोग्राफी भी पढ़ी है. विद्या बालन के अनुसार कमला दास को लोग सही ढंग से समझ नहीं पाए थे. यानी कि काफी तैयारी करने के बाद भी विद्या बालन इस फिल्म की शूटिंग शुरू करने से हिचकती रही हैं. वह दो बार शूटिंग शिड्यूल बदलवा चुकी हैं. अंततः अब विद्या बालन ने खुद को इस फिल्म से अलग कर लिया है.

सूत्रों के अनुसार इसकी मूल वजह फिल्म निर्देशक कमलुद्दीन मोहम्मद उर्फ कमल के साथ उनके रचनात्मक मतभेद हैं. सूत्र बताते हैं कि विद्या बलान इस फिल्म के कंटेंट को लेकर निर्देशक के साथ कई बैठकें कर विचार विमर्श करना चाहती थीं, पर निर्देशक उतना समय उन्हें नहीं देना चाहते थे, इसलिए विद्या बालन ने फिल्म छोड़ दी.

तो दूसरी तरफ राष्ट्रगीत का सिनेमाघर के अंदर अपमान करने को लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और अब तक 48 फिल्में बना चुके फिल्म के निर्देशक कमल केरला में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी के निशाने पर हैं. कुछ दिन पहले केरला राज्य की भाजपा के महासचिप ए एन राधाकृष्णन ने कमल से राष्ट्रगीत का अपमान करने के कारण देश छोड़ने के लिए भी कहा था.

निर्देशक कमलुद्दीन मोहम्मद उर्फ कमल का दावा है कि विद्या बालन ने हिंदू संगठनों से डर कर उनकी फिल्म छोड़ी है. ज्ञातब्य है कि कमलादास ने अपने जीवन के अंतिम चरण में मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया था. तो वहीं एक सूत्र का दावा है कि शिवसेना पार्टी से चेतावनी मिलने के बाद विद्या बालन ने इस विवादास्पद फिल्म से  खुद को दूर कर लिया.

विद्या बालन तो चुप हैं. मगर विद्या बालन के प्रवक्ता का दावा है कि रचनात्मक मतभेदों के चलते विद्या बालन ने यह फिल्म छोड़ी है. निर्देशक जिस तरह से इस फिल्म को बनाना चाहते हैं, उससे विद्या बालन सहमत नही हैं. पर निर्देशक कमल का दावा है कि विद्या बालन ने यह निर्णय राष्ट्रीय स्वयं सवेक संघ के दबाव में लिया है.

साइकिल, पोशाक और भोजन में फंसी तालीम

बिहार में तालीम को मुफ्तखोरी में फंसा कर रख दिया गया है. हर सरकार स्कूलों और पढ़ाईलिखाई के बरगद को जड़ से दुरुस्त करने के बजाय उस की शाखाओं व पत्तों का रंगरोगन कर के ही अपनी जवाबदेही का पूरा होना मान लेती है. स्कूलों में बच्चों की हाजिरी अच्छी हो, इस के लिए सरकार कभी बच्चों को दोपहर का खाना खिलाती है तो कभी स्कूल ड्रैस बांटती है. लड़कियों को स्कूल जाने के लिए मुफ्त में साइकिल बांटने की योजना भी चलाई जा रही है. कभी सरकार ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि सरकारी स्कूलों में मास्टर हैं या नहीं? मास्टर स्कूल आते हैं या नहीं? ब्लैकबोर्ड और चौक हैं या नहीं? स्कूलों में बैंच और टेबल दुरुस्त हैं या नहीं?

इस साल मैट्रिक की परीक्षा में आधे से ज्यादा स्टूडैंट फेल हो गए तो उस के बाद से लगातार राज्य की तालीम सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं. पिछले साल कुल 15 लाख 47 हजार 83 छात्रों ने मैट्रिक की परीक्षा में हिस्सा लिया. इस में 8 लाख 32 हजार 332 लड़के और 7 लाख 14 हजार 751 लड़कियां थीं. इस में से कुल 46.66 फीसदी छात्र ही पास हो सके. लड़कों में कुल 54.44 फीसदी और लड़कियों में 37.61 फीसदी ही कामयाब हो सके. 10.86 फीसदी फर्स्ट डिवीजन, 25.46 फीसदी सैकंड डिवीजन और 10.32 फीसदी थर्ड डिवीजन से पास हुए. इस के अलावा 0.009 फीसदी छात्र जैसेतैसे केवल पास होने लायक अंक ला सके.

इतने खराब नतीजों के बाद भी अफसोस करने और अपनी खामियों को दूर करने के बजाय शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी यह कहते हुए अपनी पीठ थपथपाने में मशगूल हैं कि नकल रोकने की वजह से ही नतीजे खराब हुए हैं.

सरकारी स्कूलों और पढ़ाई की गुणवत्ता ही दुरुस्त न हो तो विद्यार्थी क्या और कैसे पढ़ें? बिहार के सरकारी स्कूलों में 2 लाख 15 हजार मास्टरों की कमी है. एक लाख 70 हजार प्राइमरी स्कूलों और 45 हजार मिडिल व हायर मिडिल स्कूलों में मास्टर के पद खाली हैं. उन खाली पदों पर बहाली के लिए केवल तारीख दर तारीख का ही ऐलान होता रहा है. शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 35 विद्यार्थियों पर एक मास्टर होना है पर अभी 48 विद्यार्थियों पर एक मास्टर है. उस के बाद भी ज्यादातर मास्टरों को ‘मिड-डे मील’ योजना में लगा दिया गया है. ऐसे में ज्यादातर मास्टर रसोइया बन कर रह गए हैं.

पटना के ही एक सरकारी स्कूल के मास्टर दबी जबान में कहते हैं कि सरकारी स्कूल में शिक्षा के स्तर को गाली देना एक फैशन सा बन गया है. राज्य में ज्यादातर स्कूलों का न अपना भवन है, न ही सुविधाएं हैं. जितने मास्टरों की जरूरत है, उस के आधे भी नहीं हैं. उस के ऊपर से, मास्टरों को कभी जनगणना, कभी वोटर आईडी, कभी पल्स पोलियो मुहिम तो कभी बच्चों को दोपहर का खाना खिलाने के काम में लगा दिया जाता है. ऐसे में मास्टर क्या और कब पढ़ाएं? विद्यार्थी ऐसे में क्या खाक पढ़ेंगे? जब स्कूलों में पूरे सिलेबस की पढ़ाई ही नहीं हुई है तो बच्चे क्या करेंगे? उन्हें और उन के अभिभावक किसी भी तरह से अपने बच्चों को पास कराने व बढि़या अंक दिलाने की जुगाड़ में लग जाते हैं, क्योंकि अंकों के आधार पर ही कालेजों में दाखिला मिलता है.

राहत की एक बात यह है कि पिछले कुछेक सालों में ड्रौपआउट छात्रों में थोड़ी ही सही, पर कमी आई है. लेकिन सरकार तालीम की गुणवत्ता को दुरुस्त करने में नाकाम रही है. साल 2011 से हाई स्कूलों में गणित और विज्ञान के मास्टरों की बहाली का काम लटका हुआ है. पटना जिले के ही फतुहा इंटर स्कूल की बानगी देखिए. साल 1937 में चालू हुए इस स्कूल में 2,500 लड़के और 1,168 लड़कियां हैं. इतने छात्रों को पढ़ाने के लिए केवल 18 मास्टर हैं. मास्टरों के कुल 22 पद 1980 से ही स्वीकृत हैं. इस के बाद भी मास्टरों की बहाली नहीं की जा रही है. ऐसे में बच्चे कैसे और क्या पढ़ते होंगे, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है.

सरकार मिडिल स्कूल के एक छात्र पर औसतन साढ़े 4 हजार रुपए सालाना खर्च करती है. हर साल मैट्रिक के छात्रों पर 731 करोड़ रुपया फूंक दिया जाता है. लड़कियों को साइकिल के साथ कई योजनाओं का लाभ दिया जाता है. इस के बाद भी रिजल्ट 44 फीसदी ही है.

बिहार में 72 हजार प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में 2 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील योजना के तहत दोपहर का खाना दिया जाता है. इस के लिए केंद्र सरकार से हर साल 1,400 करोड़ रुपया मुहैया कराया जाता है. स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के मकसद से शुरू की गई इस योजना के तहत हर दिन

खाने का अलगअलग मैन्यू होता है, पर ज्यादातर स्कूलों में खाने के नाम पर बच्चों को खिचड़ी ही खिलाई जाती है. काफी पैसा स्कूल प्रशासन हजम कर जाता है.

मिड-डे मील योजना के राज्य प्रभारी ने 26 मार्च, 2012 को सभी स्कूलों के लिए यह हिदायत जारी की थी कि खाना बनने के बाद उसे प्रिंसिपल, मास्टर और रसोइया चखेंगे. उस के बाद ही उसे बच्चों को परोसा जाएगा. इस का कहीं भी पालन नहीं होता है. अगर इस का पालन होता तो छपरा में इतने बच्चों की मौत नहीं होती.

इस फर्जीवाड़े से सरकार के उस दावे की भी हवा निकल गई है जिस में कहा जाता रहा है कि पिछले 5-6 सालों में स्कूलों में बच्चों के दाखिला लेने का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है. सर्वशिक्षा अभियान के बिहार में तेजी से कामयाबी मिलने का ढिंढोरा पीटने वाले सरकारी आंकड़ेबाजी की असलियत सामने आ गई है.

भाजपा नेता और सूबे के उपमुख्यमंत्री रह चुके सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि तरक्की का ढोल पीटने वाली सरकार की पोल उस की ही कारगुजारियों से खुल गई है. स्कूलों में बच्चों के दाखिले और उपस्थिति के अंतर के घपले की जांच सीबीआई से कराने पर ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा. पढ़ाईलिखाई की व्यवस्था को पूरी तरह से दुरुस्त किए बगैर तालीम की हालत सुधरनी मुमकिन नहीं है.

बिहार में सरकारी स्कूलों और कालेजों में पढ़ाईलिखाई की बदहाली की वजह से ही कोचिंग संस्थानों का धंधा फलफूल रहा है. राज्य में 6,000 बड़ेछोटे कोचिंग इंस्टिट्यूट हैं और उन का सालाना टर्नओवर 1,500 हजार करोड़ रुपए का है. राज्य सरकार शिक्षा प्रणाली की सुध कब लेगी, इस का इंतजार ही किया जा सकता है.  

अपनी तलाकशुदा पत्नी से विवाह

शायद ही कभी किसी ने देखासुना हो कि तलाक के 4 साल और अलगाव व खटपट के 12 वर्षों बाद पतिपत्नी ने दोबारा शादी कर ली. मामला कुछकुछ विचित्र किंतु सत्य है जिस के बारे में जान कर महसूस होने लगा है कि तलाक के बाद पतिपत्नियों की हालत या मानसिकता पर कोई एजेंसी अगर सर्वे व काउंसलिंग करे तो पतिपत्नी का दोबारा मिल कर उजड़ी गृहस्थी को संवार लेना एक संभव काम है. तलाक व्यक्तिगत, कानूनी, सामाजिक, पारिवारिक हर लिहाज से एक तकलीफदेह प्रक्रिया है जिस की मानसिक यंत्रणा के बारे में शायद भुक्तभोगी भी ठीक से न बता पाएं. इस के बाद भी तलाक के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं. इस से यही उजागर होता है कि अकसर पतिपत्नी या तो गलतफहमी का शिकार रहते हैं या फिर मारे गुस्से के अपना भलाबुरा नहीं सोच पाते. तलाक में नजदीकी लोगों की भूमिका कहीं ज्यादा अहम हो जाती है जो बजाय बात संभालने के, बिगाड़ते ज्यादा हैं.

यह ठीक है कि कुछ मामलों में तलाक अनिवार्य सा हो जाता है पर अधिकांश मामलों में यह जिद व अहं का नतीजा होता है जो खासतौर से पत्नी के हक में अच्छा नहीं होता. समाज के लिहाज से यह दौर बदलाव का है जिस में महिलाएं पहले सी दोयम दरजे की नहीं रह गई हैं. वे हर स्तर पर समर्थ, सक्षम और जागरूक हुई हैं लेकिन तलाक के बाद ये सभी बातें हवा हो जाती हैं जब उन्हें अपने अकेलेपन का एहसास होता है और वे एक स्थायी असुरक्षा में जीने को मजबूर हो जाती हैं.

मुमकिन है कभीकभी उन्हें लगता हो कि तलाक बेहद जरूरी भी नहीं था. इस से बच कर तलाक के बाद की दुश्वारियों से भी बचा जा सकता था लेकिन बात ‘अब पछताए होत का जब चिडि़या चुग गई खेत’ सरीखी हो जाती है. तलाक का कागज उन्हें नए माहौल और हालत में जीना सिखा देता है, इसलिए चाह कर भी वापस नहीं मुड़ा जा सकता क्योंकि तलाक के बाद पति दूसरी शादी कर नई पत्नी के साथ शान से गुजर कर रहा होता है. वहीं, अधिकांश पत्नियां, जो भारतीय संस्कारों से ग्रस्त ही कही जाएंगी, किसी दूसरे को सहज तरीके से पति मानने या स्वीकारने के लिए खुद को तैयार या सहमत नहीं कर पातीं और जब तक खुद को तैयार कर पाती हैं तब तक उम्र का सुनहरा हिस्सा उन के हाथों से फिसल चुका होता है.

शशिकांत संग वंदना

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के इस दिलचस्प मामले को बतौर मिसाल लिया जाए तो तलाकशुदाओं के लिहाज से यह एक अच्छी पहल सिद्ध हो सकती है. वंदना और शशिकांत की शादी साल 2001 में हुई थी. ये दोनों साधारण खातेपीते कायस्थ परिवार के हैं और दोनों के ही पिता पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं. शादी के बाद वंदना ससुराल आई तो उसे नया कुछ खास नहीं लगा क्योंकि उस का मायका भी भिंड में ही है. संयुक्त परिवार से संयुक्त परिवार में आने से उसे तालमेल बैठाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई. शशिकांत प्राइवेट नौकरी करता था. उस की कोई खास आमदनी नहीं थी. संयुक्त परिवारों में खर्चे का पता नहीं चलता, न ही कोई कमी महसूस होती. देखते ही देखते एक साल गुजर गया और वंदना ने एक बच्ची को जन्म दिया जिस का नाम घर वालों ने प्रिया रखा.

शायद आपसी समझ का अभाव था या फिर संयुक्त परिवार की बंदिशें थीं कि दोनों एकदूसरे से असंतुष्ट रहने लगे और जल्द ही आरोपोंप्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो गया जिन में कोई खास दम नहीं था. यह बात वक्त रहते दोनों समझ नहीं पाए, लिहाजा रोजरोज की खटपट शुरू हो गई. पतिपत्नी के बीच का तनाव और विवाद उजागर हुए तो दोनों के घर वालों ने दखल देते समझाया पर बजाय समझने के दोनों भड़कने लगे और आखिरकार अपना फैसला भी सुना दिया कि अब हम साथ नहीं रह सकते. लिहाजा, हमारा तलाक करा दिया जाए.

दोनों ही परिवारों की भिंड में इज्जत है, इसलिए घर वाले कतराए, लेकिन तमाम समझाइशें बेकार साबित हो चुकी थीं. दोनों कुछ समझने को तैयार नहीं थे. एक दिन वंदना प्रिया को ले कर अपने मायके चली गई तो शशिकांत ने भी आपा खो दिया और तलाक का मुकदमा दायर कर दिया. 8 साल मुकदमा चला. तारीखें पड़ीं, पेशियां हुईं और आखिरकार 2012 में तलाक यानी कानूनन विवाहविच्छेद इस शर्त पर हुआ कि पत्नी व बेटी को गुजारे के एवज शशिकांत 2 हजार रुपए महीने देगा जो कि कुछ साल उस ने दिए भी. 2014 में शशिकांत ने अदालत में एक अर्जी दाखिल कर अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते भरणपोषण राशि देने में असमर्थता जताई तो अदालत ने भरणपोषण का आदेश रद्द कर दिया. अब तक घर और समाज वालों की दिलचस्पी इन दोनों से खत्म हो गई थी. वंदना मायके में थी लेकिन सहज तरीके से नहीं रह पा रही थी. उधर, शशिकांत को भी लग रहा था कि जो कुछ भी हुआ वह ठीक नहीं हुआ.

शशिकांत और वंदना दोनों कशमकश की जिंदगी जी रहे थे. बेटी प्रिया का भी कोई भविष्य नहीं था और सब से ज्यादा तकलीफदेह बात दोनों का एकदूसरे को न भूल पाना थी. झूठा अहं, गुस्सा और ठसक दम तोड़ रहे थे. दोनों को ही बराबर से समझ आ रहा था कि वे जानेअनजाने  जिंदगी की सब से बड़ी गलती या बेवकूफी कर चुके हैं, पर अब कुछ हो नहीं सकता था, इसलिए कसमसा कर रह जाते थे.

जब सब्र टूटा

बीती 9 अक्तूबर को वंदना बेटी प्रिया को ले कर भिंड के एएसपी अमृत मीणा के दफ्तर पहुंची और बगैर किसी हिचक के उन से कहा कि अब उस के सामने खुदकुशी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. अमृत मीणा ने सब्र से उस की पूरी बात सुनी और तुरंत शशिकांत को तलब किया. थाने में ही उन्होंने दोनों को साथ बैठा कर चर्चा की. 14 साल की होने जा रही प्रिया का हवाला दिया और जमानेभर की ऊंचनीच समझाई तो वंदना और शशिकांत हद से ज्यादा जज्बाती हो उठे और फिर से साथ रहने को तैयार हो गए. अमृत मीणा भी अपनी पहल और समझाइश का वाजिब असर देखते उत्साहित थे. लिहाजा, उन्होंने इन दोनों की हिचक दूर करते तुरंत दफ्तर में ही उन की दोबारा शादी का इंतजाम कर डाला. दोनों 14 साल का गुबार और भड़ास निकाल चुके थे, इसलिए दोनों शादी के लिए तैयार हो गए ताकि तलाक और अलगाव का एहसास खत्म हो जाए.

एएसपी के रीडर रविशंकर मिश्रा ने पंडित की भूमिका निभाई और मंत्र पढ़ते हुए दोनों की शादी करा दी. 14 साल बाद इन पतिपत्नी ने दोबारा एकदूसरे को जयमाला पहनाई और शशिकांत वंदना को घर ले कर आ गया. बाकायदा विदाई भी हुई, अमृत मीणा अपनी गाड़ी से दोनों को घर छोड़ कर आए. बहुत कम मौकों और मामलों पर पुलिस वालों का मानवीय पहलू देखने में आता है, जो इस मामले में दिखा. दोबारा विवाह का यह अनूठा मामला था. इस प्रतिनिधि ने बीती 25 नवंबर को वंदना और शशिकांत से बात की. दोनों खुश थे. वे बीती बातें नहीं करना चाहते थे जिन में उन्होंने बेहद तनाव झेला था. वंदना की चहक और शशिकांत की परिपक्वता बता रही थी कि वे इस नई जिंदगी से खुश हैं और चाहते हैं कि दूसरे तलाकशुदा पतिपत्नी भी गुस्सा और पूर्वाग्रह छोड़ कर शादी करें. अगर वे ऐसा करते हैं तो पहले जो खो चुके हैं उसे वे मय ब्याज के हासिल कर सकते हैं.

जल्दबाजी, गुस्सा, अहं, जिद और अपनों के ही भड़काने पर पतिपत्नी तलाक तो ले लेते हैं पर इन में से अधिकांश बाद में पछताते हैं. वजह, दूसरी शादी आसान नहीं होती और अगर हो भी जाए तो तलाक का धब्बा सहज तरीके से जीने नहीं देता और इस पर भी, दूसरे जीवनसाथी के मनमाफिक होने की गारंटी नहीं रहती. तो फिर तलाक के बाद क्यों न पहले जीवनसाथी की तरफ सुलह का हाथ बढ़ाया जाए, इस अहम सवाल पर वंदना और शशिकांत के मामले से सोचा जाए तो बात बन सकती है. तलाक के बाद अधिकांश पतिपत्नी अवसाद में ही जीते नजर आते हैं खासतर से उस सूरत में जब तलाक की कोई ठोस वजह न हो. ज्यादातर तलाकों की वजह बेहद हलकी होती है. ऐसा आएदिन के मामलों से उजागर भी होता रहता है. अगर शादी के बाद एक साल या उस से भी ज्यादा का वक्त पतिपत्नी ने एकसाथ गुजारा है तो एकदूसरे को भुला देना उन के लिए आसान नहीं होता.

तलाक के पहले परिवार परामर्श केंद्र, अदालत और काउंसलर सोचने के लिए वक्त देते हैं लेकिन उस वक्त पतिपत्नी दोनों के दिलोदिमाग में इतना गुस्सा व नफरत का गुबार भरा होता है कि वे सोचते कम, झल्लाते ज्यादा हैं. तलाक के बाद की दुश्वारियां, अकेलापन, अपनों की अनदेखी वगैरा उन्हें समझ आने लगती हैं. पर चूंकि तलाकशुदा पतिपत्नी की दोबारा शादी की पहल किसी भी स्तर पर नहीं होती, इसलिए सुलह की गुंजाइशें होते हुए भी बात नहीं बन पाती. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि भिंड के इस प्रयोग को दोहराया जाए क्योंकि संभव है पति और पत्नी अपनी गलतियां महसूस करते हुए दोबारा साथ रहना चाहते हों.          

गे क्लब की आड़ में ब्लैकमेलिंग का खेल

पुलिस हिरासत में बैठे उन चारों नौजवानों के चेहरों पर बेबसी के भाव झलक रहे थे. बेबसी इसलिए भी क्योंकि खुद को पाकसाफ बताने के लिए उन के पास कोई सुबूत नहीं था. उन्हें चौंकाने वाले गुनाह में गिरफ्तार किया गया था. वे समलैंगिक लोगों को गुपचुप अपना शिकार बनाते थे. इस के लिए वे अपना जाल बिछाते थे कि अपने जैसे जिस्म की चाह रखने वाले खुद ही उस में फंस जाते थे. जो एक बार उन के जाल में फंसता था, फिर उन की इजाजत के बिना निकल नहीं पाता था. ब्लैकमेलिंग उन का प्रमुख हथियार होता था. शिकार होने वाले अपने समलैंगिक होने पर पछताते थे. उन्हें लगता था कि उन की प्रवृत्ति ऐसी नहीं होती, तो ऐसा अपराध उन के साथ घटित न हुआ होता.

यों बिछाते थे अपना जाल

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की पुलिस ने 22 नवंबर 2016 को जिन 4 युवकों को गिरफ्तार किया उन में सुमित, सोनू, नितिन व देवेंद्र शामिल थे. इन में सोनू व नितिन एक ही गांव के थे जबकि सुमित और देवेंद्र अलगअलग गांवों के रहने वाले थे. सुमित व सोनू बीए सैकंड ईयर के छात्र थे जबकि उस के साथी देवेंद्र 12वीं कक्षा का व नितिन 8वीं कक्षा का. चारों के बीच गहरी दोस्ती थी.

सुमित अकसर सोशल नैटवर्किंग साइट फेसबुक पर ऐक्टिव रहता था. शातिर दिमाग सुमित शौर्टकट से पैसे कमाने की चाहत रखता था. उस ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर गे युवकों को फंसाने की योजना बनाई. इस के बाद गिरोह का सरगना सुमित फेसबुक पर हीरो की भूमिका में होता था. उस ने गलत नाम से अकाउंट बनाया हुआ था. जिस पर उस ने खुद को गे बताया हुआ था. फेसबुक पर वह बौडीबिल्डर की आकर्षक तसवीरें डालता था. लोग उस की तारीफ करते थे. गे युवक उसे देखते ही आकर्षित हो जाते थे. उन के साथ आसानी से फ्रैंडशिप भी हो जाती थी.

उस के सोशल साइट्स के गे क्लब में हर उम्रवर्ग के लोग शामिल थे. वह दावा करता था कि क्लब के लोगों की हकीकत कोई दूसरा नहीं जान पाएगा. उन की पहचान को गुप्त रखा जाएगा. समलैंगिक लोग अपने अनुभव भी उस से शेयर करते थे. कोई अपने दबे हुए अरमान बताता था, कोई जिस्मानी भूख की चाहत बयां करता था. ऐसे ही लोगों में से सुमित अपने शिकार का चुनाव करता था. पहले वह चैटिंग से, फिर मोबाइल से खुल कर बातचीत करता था. समलैंगिक से उस की दबी हुई जिस्मानी ख्वाहिशों को जान कर उन्हें पूरा करने का अपनेपन से भरोसा देता था.

जब सुमित उन के विश्वास को जीत लेता था तब शिकार को अपनी बताई जगह पर जिस्मानी खेल खेलने के लिए बुलाता था. इस के लिए वह सड़क किनारे सुनसान इलाके और खेतों को चुनता था. सुमित के साथी उस के इशारे पर वहां पहले से ही छिप जाते थे. सुमित परपुरुष की चाहत वालों की ख्वाहिश पूरी करता और उस के साथी चुपके से मोबाइल के जरिए एमएमएस बना लेते. काम खत्म होने पर उस के साथी बाहर निकल आते और शिकार होने वाला समलैंगिक पुलिस के पास जाना तो दूर, अपने साथ हुई घटना का किसी से जिक्र तक नहीं करता था.

जिन समलैंगिकों को शिकार बनाया जाता, सुमित और उस के साथी उन का पीछा नहीं छोड़ते थे. कुछ दिनों बाद वे उस के मोबाइल पर एमएमएस क्लिप भेजते और पैसे की मांग करने लगते. पैसे न देने पर वे उसे इंटरनैट पर अपलोड करने के साथ ही समाज में बदनाम करने की धमकी देते. किसी के रोनेगिड़गिड़ाने का उन लोगों पर कोई असर नहीं होता था. इच्छानुसार वसूली का यह खेल महीनों जारी रहता. ऐसे लोगों को मनचाही जगह बुला कर वे उन से कुकर्म भी करते. सुमित ऐंड कंपनी ने एकएक कर के करीब एक दर्जन लोगों को अपना शिकार बनाया. लेकिन कभी पकड़े नहीं गए. इस से उन के हौसलों में अतिरिक्त इजाफा हो गया और वे आएदिन शिकार करने लगे. उन का हर शिकार छटपटा कर रह जाता और अपने समलैगिक रिश्तों पर आंसू बहाता था. समाज में बदनामी के डर से किसी ने कभी उन के खिलाफ शिकायत ही नहीं की.

गिरोह का शिकार मेरठ का एक व्यापारी युवक अनमोल (परिवर्तित नाम) भी हुआ. सुमित का फेसबुक प्रोफाइल देख कर अनमोल ने उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. दोनों के बीच जल्द ही दोस्ती हो गई. बातोंबातों में शातिर सुमित ने उस की आर्थिक हैसियत का पता लगा लिया. सुमित ने वादा किया कि वह मौका मिलते ही उस के अरमानों को पूरा करेगा. दोनों के बीच विश्वास का रिश्ता कायम हुआ, तो अनमोल सुमित की बताई सुनसान जगह पर मिलने के लिए पहुंच गया. सुमित ने पहले उस के साथ कुकर्म किया, फिर दोस्तों के साथ उस की स्कूटी, मोबाइल व सोने की चेन लूट कर उसे भगा दिया. साथ ही, उस ने धमकी दी कि यदि किसी से इस बात का जिक्र किया, तो वह समाज में उसे बदनाम कर देगा.

काफी सोचविचार के बाद अनमोल ने 16 अक्तूबर को थाना कंकरखेड़ा में सुमित व उस के साथियों के खिलाफ लूट का मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस भी इस तरह के अपराध से सकते में आ गई. एसएसपी जे रविंद्र गौड़ के निर्देशन में सीओ बी एस वीर कुमार व क्राइम ब्रांच को गिरोह की धरपकड़ के लिए लगा दिया गया. पुलिस ने मुख्य आरोपी सुमित का नंबर सर्विंलास पर लगा दिया. उस पर होने वाली बातचीत से यह साफ हो गया कि सुमित गिरोह चला रहा था. इस के बाद ही सुमित व उस के साथियों को पुलिस ने गिरफ्त में ले लिया. पुलिस ने स्कूटी, मोबाइल व अन्य सामान आरोपियों की निशानदेही से बरामद कर लिया.

समलैंगिकता विवादित रही है. विवाद कानून की चौखट से ले कर सड़कों पर तक है. इस का एक पहलू यह है कि समलैंगिकता अपराधों को भी जन्म देती है. समाज के बीच दोहरी जिंदगी जीने वाले समलैंगिंक वास्तव में मानसिक दबाव में जी रहे होते हैं.    

2016 के मशहूर शब्द

2015 में औक्सफोर्ड डिक्शनरी का साल का मशहूर शब्द एक पिक्टोग्राफ रहा, एक ईमोजी, खुशी के आंसू वाला चेहरा. पर 2016 में कई नए शब्द हमारे शब्दज्ञान में जुड़ गए, सोशल मीडिया के हैशटैग और ट्रैंड्स ने इन्हें और मशहूर कर दिया. इस साल के कई शब्द हमें याद रहेंगे, जैसे-

नोटबंदी

यह शब्द तो भारतीयों को कभी भूलेगा ही नहीं, यह तो ‘वर्ड औफ द ईयर’ बन गया है, जिस ने देशभर के लोगों को खूब प्रभावित किया. औक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, ‘डीमोनेटाइजेशन’ का मतलब है किसी सिक्के या कीमती धातु का बंद हो जाना.

ब्रिक्सिट

जून में यूरोपियन यूनियन के इश्यू पर यह शब्द खूब सुनाई दिया. लोगों ने इस इश्यू पर बात करने के लिए ही जैसे यह शब्द अपना लिया.

जेनोफोबिया

जेनोफोबिया ‘डिक्शनरी कौम’ का ‘वर्ड औफ द ईयर’ है. इस शब्द के प्रचलन का श्रेय चुनावी रैलियों के समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिस्ट रिमार्क्स को जाता है. इस शब्द का मतलब है दूसरे देशों से आए हुए लोगों के प्रति नापसंदगी. इस का शाब्दिक अर्थ है इंसान को इंसान से डर.

सर्जिकल स्ट्राइक

जब एक रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान में आर्मी कैंपस पर हमला किया, यह शब्द लोकप्रिय हो गया. सर्जिकल स्ट्राइक का मतलब है सेना द्वारा किया गया आक्रमण. कई लोगों ने मोदी के नोटबंदी के फैसले को भी सर्जिकल स्ट्राइक कहा.

मूब्स

यह शब्द पुरुष के ब्रेस्ट्स के लिए प्रयोग होता है, मुख्यतया यह ब्रिटेन का बोलचाल का शब्द है. जो बूब्स से प्रभावित है.

पोस्ट ट्रुथ

औक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इसे ‘वर्ड औफ द ईयर’ कहा है. यह शब्द यू एस के राष्ट्रपति चुनावों के समय बहुत लोकप्रिय हुआ.

मास्टरडेटिंग

यह शब्द कुछ समय से प्रचलन में रहा है पर इस साल इस शब्द का प्रयोग खूब किया गया. मास्टरडेटिंग का मतलब है अकेले ही बाहर जाना या कुछ चीजें करना.

योलो

‘यू ओनली लिव वंस’ यानी योलो पूरे सोशल मीडिया पर सब से लोकप्रिय बजवर्ड था. 2016 में इस ने भी औक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘मूब्स’ के साथ जगह बनाई.

मित्रों

पीएम नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की, उस वक्त कई बार ‘मित्रों’ कहा, तभी से यह शब्द खूब पढ़ासुना गया. यह शब्द डिक्शनरी में भी जुड़ गया.

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