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इस ऐप से पुरानी तस्वीरों में भरें नए रंग

गूगल ने एक ऐसा ऐप लॉन्च किया है जिससे आप सालों पुरानी तस्वीरों में नए रंग भर सकते हैं. फोटोस्कैन ऐप के जरिए आप अपनी पुरानी तस्‍वीरों को आसानी से डिजिटाइज कर सकते हैं. एंड्रॉयड और आईओएस यूजर इस ऐप का लाभ उठा सकते हैं. यह ऐप तस्वीरें लेने के लिए आपके फोन के कैमरा का इस्तेमाल करता है. तस्वीरें लेने के बाद यह ऐप पैनारोमा शॉट की तरह सारी तस्वीरों को एक साथ जोड़ देता है.

कलर भी रीस्‍टोर करेगा यह ऐप

गूगल का कहना है कि इस ऐप की मदद से एक प्रिंट तस्वीर को कैमरे से कैद कर डिजिटाइज किया जा सकता है. इसके अलावा यह ऐप खराब हो गई तस्वीरों में कलर रीस्टोर करने के लिए थोड़े बहुत बदलाव भी करेगा. अगर फोटो प्रिंट किनारों पर मुड़ा हुआ है तो ऐप तस्वीर को एक साथ कर देगा.

तस्वीरें सेव करें गूगल फोटोज में

डिजिटाइज तस्वीर को आप फोन या ऑनलाइन गूगल फोटोज में स्टोर कर सकते हैं. गूगल फोटोज पर 16 मेगापिक्सल तक की तस्वीरों को स्टोर करने के लिए अनलिमिटेड स्टोरेज मिलती है.

सोशल मीडिया की नई सनसनी ‘रामिणा अशफाक’

आपने अक्सर सुना होगा कि पाकिस्तान मॉडल बहुत खूबसूरत होती है. पाकिस्तानी मॉडल ग्लैमरस, सेक्सी और सेंसेशनल के साथ-साथ हॉट भी होती हैं. आपने कई हॉट मॉडलों को देखा होगा, लेकिन आज हम जिस पाकिस्तानी मॉडल से आपको मिलवाने जा रहे हैं उन्हे आपने शायद ही पहले कभी देखा होगा.

इस मॉडल की फोटो देखकर आप अपने दांत तले उंगली दबा लेंगे. ये हैं पाकिस्तानी मॉडल रामिणा अशफाक. रामिणा ने साल 2016 में 'मिस अर्थ' का टाइटल अपने नाम किया है. रामिणा की फोटो सोशल साइट्स पर आते ही लोगों के दिलों पर राज करने लगी हैं.

आप भी देखिए रामिणा की ये हॉट तस्वीरें

क्या आपके पास क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस कवर है?

हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने वालों में यह धारणा होती है कि एक बार पॉलिसी लेने के बाद वे अपनी सभी स्वास्थय से जुड़ी समस्याओं का सामना कर लेंगे. पर ऐसा नहीं होता. भविष्य में अगर परिवार के किसी सदस्य को गंभीर बिमारी(क्रिटिकल इलनेस) हो जाए, तो वहां आपकी हेल्थ पॉलिसी ज्यादा काम नहीं आएगी. आज के भागती-दौड़ती जिन्दगी और अजीबोगरीब जीवनशैली के फलस्वरूप कब, किसको क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. ऐसे में एक सामान्य मेडिक्लेम पॉलिसी और क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी के बीच का अंतर समझना जरूरी है.

क्या है क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी?

क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी गंभीर बीमारियों के लिए बीमा सुरक्षा मुहैया कराता है. यह बीमा कवर सिर्फ गंभीर और जानलेवा बीमारियों के लिए ही होता है. इन्हें आम हेल्थ बीमाकर्ताओं पर ध्यान दिए बिना अतिरिक्त/स्टैंडअलोन कवर के रूप में खरीदा जा सकता है. यह अस्पताल में भर्ती होने से पूर्व और पश्चात, बीमारी में स्वास्थ्य लाभ उपलब्ध कराते हैं और इसमें बीमा कंपनी के आधार पर अंग प्रत्यारोपण(ऑर्गन ट्रांसप्लैंट) के दौरान होने वाले खर्च भी शामिल होते हैं.

बीमा कंपनी का चयन

अलग-अलग बीमा कंपनियां अलग-अलग बीमा कवर करती हैं. इसलिए आप ऐसी बीमा कंपनी का चयन करें जो अधिक से अधिक बीमारियां कवर करती हो. डॉक्युमेंट ध्यान से पढ़ें और उसके बाद ही बीमा कंपनी का चयन करें.

फ्लोटर पॉलिसी है बेहतर विकल्प

यह पॉलिसी पूरे परिवार के लिए होती है. इसलिए ध्यान से इसी पॉलिसी का चयन करें. इसके तहत पॉलिसी लेने वाला व्यक्ति अपनी, अपने जीवनसाथी और दो बच्चों की क्रिटिकल बीमारियों का कवर ले सकते हैं.

पॉलिसी की अवधि

जीवन बीमा कंपनियां व साधारण बीमा कंपनिया, दोनों के क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी बाजार में मौजूद हैं. जीवन बीमा कंपनियों की योजनाओं की अवधि 10-20 साल होती है और सामान्य बीमा कंपनियां 1-5 साल की अवधि के लिए क्रिटिकल इलनेस हेल्थ प्लान उपलब्ध कराती है.

फरहान अख्तर किस किस पर ताला डालेंगे?

फरहान अख्तर के आर्थिक हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं. हमने ‘‘सरिता’’ पत्रिका में 17 नवंबर 2016 को ‘स्टूडियो को डुबाने में माहिर फरहान’’ शीर्षक के साथ बताया था कि फरहान अख्तर और रितेश सिद्धवानी ने मिलकर अपनी कंपनी ‘‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’’ के तहत 15 वर्ष में 16 फिल्में बनायी और नौ फिल्मों ने बाक्स आफिस पर करोड़ों का नुकसान किया. इसके बाद फरहान अख्तर की पिछली फिल्म ‘‘राक आन 2’’ ने जबरदस्त नुकसान किया. ‘‘राक आन 2’’ की असफलता ने फरहान अख्तर और रितेश सिद्धवानी की कमर तोड़ दी. इनके आर्थिक हालात दिन पर दिन बदतर होते जा रहे हैं. सूत्रों की माने तो फरहान अख्तर ने अपनी कंपनी की चार फिल्मों का निर्माण बंद कर दिया है. इतना ही नहीं बिगड़ते आर्थिक हालात के चलते अब उन्हे अपना मुंबई में सांताक्रुज इलाके में स्थित प्रिव्यू थिएटर ‘‘लाइट बाक्स’’ तक बंद करने का निर्णय लेना पड़ा.

‘‘लाइट बाक्स’’ में फिल्मकार अपनी फिल्मों के प्रिव्यू आयोजित करते रहे हैं. सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. यहां तक कि आमिर खान ने अपनी फिल्म ‘‘दंगल’’ के दो गाने इसी प्रिव्यू थिएटर में मीडिया को दिखाए थे. उसके बाद से पिछले डेढ़ माह से इस प्रिव्यू थिएटर में कोई गतिविधि नहीं हुई. एक माह से इसका दरवाजा नहीं खुला. ‘‘लाइट बाक्स’’ प्रिव्यू थिएटर से जुड़े सूत्र बता रहे हैं कि फरहान ने खुद इस प्रिव्यू थिएटर में काम करते रहे कर्मचारियों से कहीं और नौकरी ढूढ़ने के लिए कह दिया है.

यूं तो जब से फरहान अख्तर ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा था, तब से उनकी फिल्म निर्माण कंपनी हिचकोले लेकर ही चलती आयी है. मगर जब से फरहान अख्तर ने अपनी पत्नी अधूना से तलाक लिया है, तब से अचानक उनके करियर का ग्राफ बहुत तेजी से नीचे गिरा है, तो दूसरी तरफ अधूना अपने व्यापार में उतनी ही तेजी से प्रगति कर रही हैं.

बौलीवुड के कुछ लोग मानकर चल रहे हैं कि अब तक फरहान अख्तर अपनी पत्नी अधुना के लक का ही खा रहे थे, अन्यथा उनकी कार्यशैली व उनकी तकदीर इतनी गड़बड़ है कि उन्हे कोई नहीं बचा सकता. इतना ही नहीं अब तो फरहान अख्तर की निर्माण कंपनी से जुड़े लोग फरहान अख्तर के करियर के पतन के लिए फरहान अख्तर की पीआर कंपनी को भी दोषी ठहराने लगे हैं. उनका मानना है कि फरहान अख्तर की पीआर कंपनी सही काम नहीं कर रही है और उसने फरहान अख्तर को गलत सलाह दी.

जबकि बौलीवुड का एक तबका मानता है कि फरहान अख्तर ने जिस तरह से अपनी पत्नी अधूना से तलाक के साथ ही श्रद्धा कपूर के साथ नजदीकियां बढ़ायी हैं, उससे उन्हे अपनी महिला प्रशंसकों का कोप भाजन बनना पड़ा है. वहीं एक तबका इसके लिए भी पीआर कंपनी को दोष दे रहा है. क्योंकि उन्हे लगता है कि पीआर कंपनी के ही कहने पर फरहान अपनी फिल्म ‘‘राक आन 2’’ के निर्माण व उसके प्रदर्शन से पहले श्रद्धा कपूर के साथ अपने अफेयर की खबरों को हवा देते रहे, जिसका खामियाजा यह हुआ कि फिल्म ‘‘राक आन 2’’ लागत का दस प्रतिशत भी बाक्स आफिस से नहीं कमा सकी.

बहरहाल, वजह चाहे जो रही है, पर अपने वर्तमान हालात के लिए फरहान अख्तर स्वयं जिम्मेदार हैं. उनके पास विवेक या बुद्धि की कमी नहीं है. पर यह वही फरहान हैं जिन्होंने ‘राक आन 2’ को लेकर अपने पिता व मशहूर गीतकार जावेद अख्तर द्वारा दी गयी सलाह को भी अनसुना कर दिया था. बहरहाल, अब हमारी निगाह इस बात पर टिकी हुई है कि ‘लाइट बाक्स’ को बंद करने के बाद अब फरहान का अगला कदम क्या होता है.

काफी विथ डी : कहानी विहीन फिल्म

एक अच्छे विषय को एक अनुभवहीन लेखक व निर्देशक किस तरह से घटिया फिल्म में परिवर्तित करता है, इसका ताजातरीन उदाहरण है फिल्म ‘‘काफी विथ डी’’.

फिल्म की कहानी के केंद्र में मुंबई का एक समाचार चैनल और उसमें कार्यरत न्यूज एंकर अर्नब घोष (सुनील ग्रोवर) के इर्द गिर्द घूमती है. अर्नब घोष अपने चैनल के प्राइम टाइम कार्यक्रम का संचालक है, जिसमें वह राजनीतिज्ञों के इंटरव्यू लेता है. चैनल की टीआरपी कम होती जा रही है. इस वजह से चैनल का संपादक (राजेष शर्मा) भी अर्नब से खुश नहीं है. क्योंकि चैनल के मालिकों ने दो माह के अंदर चैनल की टीआरपी को बढ़ाकर चैनल को फायदे में लाने की चेतावनी दे दी है, अन्यथा चैनल बंद कर दिया जाएगा.

संपादक ने अर्नब को शाम सात बजे के कूकरी शो को संचालित करने के लिए कह दिया है. जबकि उसके कार्यक्रम की जिम्मेदारी नेहा (दीपानिता शर्मा) को दे दी गयी. जब अर्नब यह बात अपने घर जाकर अपनी गर्भवती पत्नी पारूल (अंजना सुखानी) को बताता है, तो पारूल उससे कहती है कि उसे डी (जाकिर हुसेन) का इंटरव्यू करना चाहिए. यह बात अर्नब को जंच जाती है. फिर अर्नब, डी के बारे में कुछ अजीबो गरीब कहानियां बनाकर प्रसारित करता है. जिसकी वजह से डी का ध्यान उसकी तरफ जाता है. आखिरकार डी, अर्नब की चार सदस्यीय टीम को कराची अपने घर बुलाकर इंटरव्यू देता है.

एक समाचार चैनल का न्यूज एंकर मशहूर डान डी से इंटरव्यू करने जाता है, जिसका हौव्वा हमारे देश में है, जिसने आज तक किसी पत्रकार से बात नहीं की, यह सोच अपने आप में काफी अनूठी है. मगर इस सोच को कहानीकार व निर्देशक तथा पटकथा लेखक आभार दधीच सिनेमा के परदे पर लाने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. फिल्म देखते समय कहानी में अधूरापन नजर आता है. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता. संवाद लेखक के रूप मे भी आभार दधीच निराश करते हैं.

इंटरवल तक फिल्म किसी तरह से घिसटती रहती है. पर दर्शक को उम्मीद बंधती है कि डी से अर्नब के इंटरव्यू का हिस्सा लुभाएगा, मगर वहां भी फिल्म निराश करती है. डी और अर्नब के बीच बातचीत देखते समय लगता है कि यह फिल्म कब खत्म हो.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अंजना सुखानी और सुनील ग्रोवर दोनों ही बहुत निराश करते हैं. सुनील ग्रोवर को मान लेना चाहिए कि उनके अंदर अभिनय क्षमता का अभाव है, उसे निखारने के लिए उन्हे काफी मेहनत करने की जरुरत है. टीवी के कामेडी शो में औरतों के कपड़े पहनकर फूहड़ हरकतें कर दर्शकों को हंसाना अभिनय नहीं है. कलाकार की असली परीक्षा सिनेमा के परदे पर अभिनय कर लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में है. पर सुनील ग्रोवर बुरी तरह से असफल रहे हैं. ‘निल बटे सन्नाटा’ से बेहतर कलाकार  के रूप में उभरे पंकज त्रिपाठी भी इस फिल्म में डी के सहायक गिरधारी के किरदार में विफल रहे हैं. डी के किरदार में जाकिर हुसेन सही बैठे. पर महज एक कलाकार की प्रतिभा के बल पर अच्छी फिल्म नहीं बनती है.

फिल्म ‘‘काफी विथ डी’’ की कमजोर कड़ियों में कहानीकार व निर्देशक विशाल मिश्रा, पटकथा लेखक आभार दधीच व अभिनेता सुनील ग्रोवर आते हैं.

दो घंटे तीन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘काफी विथ डी’’ के निर्माता विनोद रमानी, निर्देशक विशाल मिश्रा, पटकथा व संवाद लेखक आभार दधीच, कलाकार हैं-सुनील ग्रोवर, अंजना सुखानी, दीपानिता शर्मा, राजेश शर्मा, पंकज त्रिपाठी, जाकिर हुसेन.

‘चिकन’ है इस खिलाड़ी की सफलता का राज

इन दिनों लोग भले ही मांसाहार छोड़कर शुद्ध शाकाहार अपना रहे हों, लेकिन टीम इंडिया के नए उभरते स्टार केदार जाधव ने अपनी शारीरिक क्षमता में एक्स्ट्रा पावर लाने के लिए शाकाहारी होने के बावजूद अपने आहार में नॉनवेज को शामिल करना पड़ा.

छोटे कद के केदार जाधव को पुणे में उनके तूफानी शतक से भले ही 'पॉकेट डायनामाइट' कहा जाने लगा हो, लेकिन पूर्व राष्ट्रीय चयनकर्ता सुरेंद्र भावे ने खुलासा किया कि कभी शुद्ध शाकाहारी रहे इस बल्लेबाज ने जब चिकन खाना शुरू किया तो इससे उनको अतिरिक्त शक्ति मिली. महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड के पूर्व कर्मचारी महादेव जाधव के बेटे केदार का ताल्लुक ऐसे परिवार से है, जो शुद्ध शाकाहारी है.

भावे ने जाधव के बारे में बात करते हुए बताया, 'आप इसका श्रेय मुझे दे सकते हैं. वह मैं था, जिसने उसे चिकन खाना सिखाया.' महाराष्ट्र के पूर्व खिलाड़ी भावे ने कहा, 'मैं उसके स्टार बनने का श्रेय नहीं लेना चाहता हूं. मैं उसका कोच, बड़े भाई, मेंटर और गाइड की तरह हूं, जो कभी कभी मुझसे टिप्स लेता है. आखिरी बार (2010-11 में) मैंने उससे कहा कि उसकी बैकलिफ्ट सही नहीं लग रही है और उसने तुरंत उसमें सुधार किया और इससे काफी फायदा मिला.'

उन्हें याद है जब उन्होंने पहली बार केदार को कूच बिहार ट्रॉफी में केरल के खिलाफ 262 गेंदों पर 195 रन की पारी खेलते हुए देखा तब उन्हें तुरंत ही लगा कि वह (जाधव) खास हैं. जिस आसानी से वह केरल के गेंदबाजों पर शॉट लगा रहा थें वह वास्तव में भिन्न था. वह हर प्रारूप में खेल सकते हैं. वह गेंदबाजी कर सकते हैं, विकेट ले सकते हैं और उनकी विकेटकीपिंग किसी भी विशेषज्ञ से बेहतर है. हमने रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए उनकी विकेटकीपिंग देखी थी. वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं.

मुख्यमंत्री के इंतजार में अगडी जातियां

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ‘27 साल यूपी बेहाल’ का नारा देकर शीला दीक्षित को प्रदेश में मुख्यमंत्री का दावेदार बनाकर पेश किया था. समाजवादी पार्टी के साथ हो रहे गठबंधन ने कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के इस चेहरे को पैर वापस खींचने के लिये विवश कर दिया है. शीला दीक्षित कहती हैं ‘सपा-कांग्रेस गठबंधन होने की दशा में मै मुख्यमंत्री की दावेदारी से अपना नाम वापस ले लूंगी.’ यह सच है कि कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी बनने के बाद भी शीला दीक्षित का मुख्यमंत्री बनना सरल काम नहीं था. इसके बाद भी अगडी जातियों को उम्मीद थी कि शायद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई अगडी जाति का उम्मीदवार आया है. इससे अगडी जातियों को अपना वजूद वापस मिलता दिखा था. अगडी जातियों खासकर ब्राहमण मतदाताओं की रूचि वापस कांग्रेस में हो रही थी. सपा के गठबंधन के बाद इस उम्मीद पर पानी फिर गया है.

राजनीतिक चिंतक और लेखक हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं ‘नारायण दत्त तिवारी के बाद 1988 के बाद से केवल 2 मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. यह दोनों ही बहुत कम समय मुख्यमंत्री रहे. 1990 में मंडल कमीशन के बाद उत्तर प्रदेश में अगडी जातियां हाशिये पर आ गईं. केवल सत्ता पर से ही अगडी जातियों का प्रभाव नहीं घटा आर्थिक रूप से भी यह जातियां कमजोर होने लगी. अगडी जातियों को नौकरियों मिलनी बंद हुई. खेती की खराब दशा होने लगी और बिजनेस में भी दूसरी जातियों का दखल बढने लगा.समय के साथ मिली चुनौतियों के सामने अगडी जातियां अपने को दौड़ में शामिल नहीं रख पाई. राजनीतिक स्तर पर बनने वाली योजनाओं में अगडी जातियों को दरकिनार किया गया. अगडी जातियों के जो नेता और अफसर शासन सत्ता के केन्द्र में दिखते हैं, वह अपने वजूद को बचाने में लगे रहे.’

अगडी जातियों के विषय में हर स्तर पर यह प्रचारित होता है कि वह बहुत सम्पन्न और प्रभावशाली है. असल में यह एक तरह का मिथ्या प्रचार भर है. यह बात बहुजन समाज पार्टी के समझ आई थी तब उसने 2007 के चुनाव में ‘ब्राहमण-दलित‘ गठजोड तैयार कर सत्ता हासिल की. सत्ता हासिल करने के बाद बसपा इस गठजोड को बनाये रखने में सफल नहीं हुई. बिहार में भी वहां की सरकार ने सवर्ण आयोग का गठन किया पर उससे जो तथ्य सामने आये उनका खुलासा नहीं किया. सवर्ण आयोग के तथ्यों में बिहार में सवर्णो की खराब होती हालत को दिखाया था.

लोकतंत्र में वोट का अधिकार सबसे बड़ा होता है. लोकतंत्र का गणित ‘जिसकी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ पर चलता है. प्रदेश में 40 फीसदी के करीब पिछड़े और 25 फीसदी दलित हैं. अगडी जातियां 15 फीसदी के करीब हैं. संख्या के आधार पर अगडी जातियां हाशिये पर होती हैं. इसके अलावा यह एकजुट नहीं है. वह वोट भी कम करता है. भारतीय जनता पार्टी से यह उम्मीद थी पर बिहार चुनाव के हश्र को देखते भाजपा भी पिछड़ा और दलित के सहारे आगे बढ़ने की योजना में है.

सपा की तरफ अखिलेश यादव तो बसपा की तरफ से मायावती मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी हैं. भाजपा ने अभी अपना चेहरा तय भले ही नहीं किया है. बिहार के नतीजो को देखते हुये भाजपा सवर्ण मुख्यमंत्री पर रिस्क नहीं लेगी. ऐसे में एक बार फिर से अगडी जातियां हाशिये पर हैं. देश के सबसे बड़े प्रदेश में वह अपने वजूद को तलाश रही हैं.  

नोटबंदी का नुकसान हर घर को सहना पड़ेगा

देश की आर्थिक प्रगति को जीडीपी यानी ग्रौस डोमैस्टिक प्रोडक्शन से आंका जाता है. इस का मतलब है कि देश भर में कुल कितना सामान बनाया गया. भारत सरकार खुश हो रही थी कि भारत की जीडीपी में बढ़ोतरी सब से तेज है और अरुण जेटली की तर्ज पर नरेंद्र मोदी भी बारबार कहते थे कि यह उन की वजह से हो रहा है, जबकि इस की वजह चीन व कुछ और देशों का धीमा हो जाना है और भारत का नए तरीके से आंकड़े देना है. पर यह बढ़ोतरी या कुल जीडीपी अपनेआप में दिल बहलाने का गालिब बहाना है. अपनी जनसंख्या के अनुसार हम अमेरिका, यूरोप तो छोडि़ए चीन, कंबोडिया, वियतनाम, सिंगापुर से भी कहीं पीछे हैं और इस नोटबंदी ने हमें और पीछे धकेल दिया है. प्रधानमंत्री अब कहने लगे हैं कि वे तो फकीर हैं, झोला ले कर निकल जाएंगे पर उन्हें देश भर को तो फकीर बना डालने की इजाजत नहीं थी.

भारत जो चीन से आबादी में लगभग बराबर होने के बावजूद धन संपत्ति के मामले में उस का 5वां है जीडीपी के हिसाब से और अमेरिका के मुकाबले 6 गुना बड़ा होने के बावजूद जीडीपी में 8वां है, तो क्या यह किसी तरह रोब मारने लायक है? भारत तो उस बाई की तरह का है जिसे नई कांजीवरम साड़ी पहनने को मिल गई हो और मालकिन पर इतराते हुए कहने लगे कि वह मालकिन की तरह खाना बनाएगी, झाड़ू नहीं लगाएगी, क्योंकि उस के पास भी कांजीवरम साड़ी है. नोटबंदी से सरकार ने करोड़ों लोगों को लाइनों में लगवा कर उन का उत्पादन छीन लिया. फैक्टरियां, खेत, बाजार सूने हो गए, क्योंकि लोगों को लाइनों में लगना पड़ा. बच्चों को भूखा रहना पड़ा, क्योंकि मांओं को लाइनों में लगना पड़ा. गोद के बच्चों को गरमीसर्दी सहनी पड़ी, क्योंकि वे मां की गोद में 8-8 घंटे लाइन में रहे. इन लाइनों ने भारत को जीडीपी की कतार में और पीछे धकेल दिया है. 7.4% की रफ्तार से आगे बढ़ने वाला देश अगर अब 4 या 5% पर आ कर चीन से बढ़ोतरी में भी पीछे चला जाए तो आश्चर्य नहीं.

इस का नुकसान हर घर को सहना पड़ेगा. जो डाका घर की संपत्ति पर पड़ा वह तो अलग है, जो काम के घंटे कम हुए वह भी अलग है. पूरे देश का जो नुकसान हुआ उस का जो हिस्सा हर घर को देना पड़ेगा यह आंका तो नहीं जा पाएगा पर यह कीमत एक मूर्खतापूर्ण फैसले के कारण देनी होगी. बेटी का फक्कड़ युवक के साथ भाग जाने की तरह इस का नुकसान देश को वर्षों भुगतना ही होगा.

जोंबी वौक : डर का मजा

हौरर मूवीज में इंसान मरने के बाद भी डरावने रूप में बदला लेने के लिए लोगों के सामने आ जाता है. उस का पूरा शरीर घावों से भरा और खून से लथपथ होता है. चाल इतनी डरावनी होती है कि देखने वाले डर से कांप उठते हैं. वह जैसे ही उन के करीब आता है, वैसे ही बचाव में लोग भागने की कोशिश करते हैं. हालांकि फिल्मों में ये सब तकनीक पर आधारित होता है और एडिटिंग द्वारा खौफ पैदा किया जाता है, लेकिन हकीकत में कोई भूत नहीं होते बल्कि जोंबीज होते हैं जिन्हें मेकअप आर्टिस्ट की मदद से डरावना रूप दिया जाता है, जिसे देखने वाला भूत समझ कर खुद पर से काबू खो बैठता है.

क्या है जोंबी वौक

लोग लाइफ ऐंजौय करने के लिए क्याक्या नहीं करते. कभी ऐंडवैंचर के लिए खतरनाक स्टंट ट्राई करते हैं तो कभी अजीबोगरीब फैस्टिवल्स में भाग ले कर खुद को अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश करते हैं. इन्हीं अजीबोगरीब आयोजनों में दुनियाभर में जोंबी वौक भी एक है, जिस में जोंबीज बनने के इच्छुक लोग भाग लेते हैं. यह एक तरह से हैलोवीन थीम से मिलताजुलता है. इस में भाग लेने वाले व्यक्ति अपने फेवरिट हौरर करैक्टर के लुक व स्टाइल को कौपी कर लोगों को अपने डरावने चेहरों से डराने की कोशिश करते हैं. पता होने के बावजूद कि जोंबी वौक में शामिल होने वाला व्यक्ति भूत नहीं है फिर भी डर के मारे कोई भी उन के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. कुल मिला कर यह लोगों का एक नए अंदाज में ऐंटरटेनमैंट करता है.

मेकअप का खेल

इस में पूरा खेल मेकअप का होता है, जिसे मेकअप आर्टिस्ट अपने हाथ की सफाई से व्यक्ति के चेहरे, हाथपैरों व गरदन को वही रूप देने की कोशिश करता है जैसा करैक्टर बनने की ख्वाहिश वह व्यक्ति रखता है. चाहे कितना भी डरावना करैक्टर बनाना हो मेकअप आर्टिस्ट हार नहीं मानते और कर के दिखाते हैं, क्योंकि इस से जहां उन्हें अपनी कला को लोगों के सामने दिखाने का मौका मिलता है, वहीं इस के लिए उन्हें मुंहमांगी कीमत भी मिलती है.

किस मोटो से होता है आयोजन

जोंबी वौक का आयोजन जिस भी देश में किया जाता है उस के लिए लोगों तक सूचना पहुंचाने के लिए मीडिया व विभिन्न सोशल साइट्स की हैल्प ली जाती है ताकि बड़ी संख्या में लोग इस में भाग लेने के लिए पहुंच सकें. इस तरह के आयोजन का मुख्य उद्देश्य रूटीन लाइफ से एक दिन के लिए खुद को बाहर निकालना तो होता ही है, साथ ही वर्ल्ड रिकौर्ड बनाना या फिर किसी चैरिटी वर्क के लिए भी किया जाता है

फर्स्ट जोंबी वौक ने किया क्रेजी

पहली जोंबी वौक उत्तरी अमेरिका में 2000 में आयोजित हुई. भले ही इस में बहुत कम लोगों ने भाग लिया लेकिन इस के बाद इस की लोकप्रियता इतनी अधिक बढ़ गई कि इसे दुनियाभर में और भी कई जगहों पर आयोजित किया जाने लगा.

उत्तरी अमेरिका के बाद अगस्त, 2001 में ‘जोंबी परेड’ सैक्रामेंटो, कैलिफोर्निया में आयोजित हुई. वहां इस का श्रेय ब्रेना लविंग को जाता है, जिन्होंने ट्रैश फिल्म ओर्ग के सामने सुझाव रखा कि इस के माध्यम से वे अपने एनुअल मिडनाइट फिल्म फैस्टिवल  को प्रमोट कर सकते हैं.

इस के बाद दोबारा जुलाई, 2002 में यह इवैंट आयोजित हुआ और तब से यह उन का एनुअल इवैंट बन गया, जिस में भाग लेने वालों की संख्या हर बार बढ़ती ही है. इस के बाद अक्तूबर, 2003 में यह वौक टोरंटो में हौरर मूवी फैन द मंस्टर द्वारा आयोजित की गई. 

इस के बाद से यह वहां एक एनुअल इवैंट के रूप में मनाया जाने लगा. नएपन और देखादेखी के चलते बाकी देशों में भी इस का क्रेज बढ़ता चला गया.

यह कहना गलत नहीं होगा कि जोंबी फिल्म्स जैसे रैजिडैंट एविल मूवीज, 28 डेज लेटर, जैक स्नेडर्स डाउन औफ द डैड, शौन औफ द डैड , जौर्ज ए रोमैरोज, लैंड औफ द डैड आदि की सफलता से भी जोंबी इवैंटस का प्रचलन औैर ज्यादा बढ़ा है.

2016 का जोंबी वौक

मैक्सिको सिटी, लंदन, फ्रांस आदि कई जगहों पर जोंबी वौक का आयोजन हुआ, जिस में हजारों की संख्या में प्रतिभागियों ने भाग लिया. देखने वालों के होश तब उड़े जब नकली खून से सने, हाथों में मांस लटकाए और डरावना मेकअप किए एक प्रतिभागी ने उन की ओर दौड़ लगा कर उन्हें खाने का नाटक किया, जिस ने एक बार उन से आंखें मिला लीं, वे दोबारा उन से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कुछ ऐसा था 2016 का जोंबी वौक.

भारत में जोंबी वौक की जगह थीम पार्टीज का चलन

जोंबी वौक जहां अभी विदेशों में ही ज्यादा प्रचलित है, वहीं भारत में थीम पार्टीज का ज्यादा चलन है, क्योंकि यूथ अब नौर्मल पार्टीज की जगह थीम पार्टीज को ज्यादा पसंद करने लगे हैं. इन पार्टीज में युवा थीम्स के अनुसार खुद को रैडी कर जीभर कर ऐंजौय करते हैं. ऐसी पार्टीज के लिए उन की उत्सुकता कई दिन पहले से शुरू हो जाती है. आखिर हो भी क्यों न, जब लुक न्यू, डैकोरेशन और फूड भी थीम के अनुसार होगा तो दिल तो गार्डनगार्डन होगा ही.

आजकल सब से ज्यादा डिमांड में है, हैलोवीन थीम, जो भले ही दिखने में डरावना है लेकिन खूब मजा देने वाला होता है. इस के अतिरिक्त अवैंजर थीम, कैसीनो थीम, रैट्रो थीम, पाइरेसो थीम, जंगल थीम, डिस्को थीम, एंग्री बर्ड थीम भी चलन में हैं.

जिस तरह थीम पार्टीज ने भारत में जगह बनाई है ठीक उसी तरह जोंबीज इवैंट भी भारत में जल्द ही चलन में आएंगे क्योंकि ये मनोरंजन का नया माध्यम हैं

कालेज फैस्ट की तैयारी

कालेज सत्र आरंभ होने के साथ ही एक आजादी की भावना भी मन में हिलोरे लेने लगती है. स्कूल यूनीफौर्म से छुटकारा मिलता है और हम नितनई पोशाक पहनने को उत्सुक रहते हैं. कालेज में क्या पहनना है, यह तो आप ने सोच ही लिया होगा. लेकिन कालेज की जिंदगी में ‘कालेज फैस्ट’ और ‘रौक कौंसर्ट’ भी होते रहते हैं. वहां अगर हम सादे कपड़े पहन कर जाएं, तो अच्छा नहीं लगेगा, ऐसे मौकों के लिए चाहिए कुछ खास परिधान और खास तैयारी. तो जानिए कुछ टिप्स, जिन के द्वारा आप भीड़ में भी आकर्षक लगेंगे :

लुक पर दें ध्यान

मौसम के अनुसार ही कपड़ों का चुनाव करें. जैसे, सर्दी का मौसम हो तो लैदर की जैगिंग या स्किनी के ऊपर प्रिंट वाली जैकेट और साथ में रेशमी स्कार्फ या चेहरे पर फबती हैट पहनी जा सकती है. यदि गरमी का मौसम हो तो छोटा, बिना बाजू का जंपसूट या फूलों का प्रिंट वाला रोंपर जंचेगा. डैनिम ऐसा कपड़ा है जो हर मौसम में अच्छा लगता है. इस की सब से खास बात यह है कि यह कितना भी गंदा हो जाए, फिर भी फैशनेबल लगता है. जहां गरमियों में आप डैनिम के शौर्ट्स के साथ फूलों के प्रिंट वाली शर्ट या टैंक टौप या बिना कंधों वाला टौप पहन इतरा सकती हैं, वहीं सर्दियों में डैनिम की अच्छी फिटिंग वाली जींस के साथ एक ही रंग या प्रिंट का जिपर या रंगीन प्रिंट वाली जैकेट पहन सकती हैं.

रौक कौंसर्ट में आप ‘बैंड’ की प्रिंट वाली टीशर्ट पहन कर अलग दिख सकती हैं. टीशर्ट पर ऐसा प्रिंट भी होता है जो रात के अंधेरे में चमकता है. तो क्यों न ऐसी कोई टीशर्ट पहन कर महफिल में चमका जाए? लुक पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है. लुक का अर्थ है आप का पूरा व्यक्तित्व. यदि आप स्नीकर जूते पहनती हैं तो उन के साथ अच्छी फिटिंग की डैनिम जींस तथा आरामदेह टीशर्ट फबेगी. यदि आप घुटनों तक के ऊंचे बूट्स पहनती हैं तो उन के साथ स्किनी पैंट या जैगिंग और रंगीन टीशर्ट जंचेगी.

आप के जूते

याद रहे, कालेज फैस्ट जैसे मौकों पर आप को घंटों खड़े रहना है, वहां बज रहे गानों पर थिरकना है, तो ऐसे में आप के जूते इतने आरामदेह होने चाहिए कि आप 5-6 घंटे बिना थके खड़े रह सकें. कालेज फैस्ट में जूतों का स्टाइलिश होना भी अतिआवश्यक है. ऊंची एढ़ी की सैंडिल न पहनें. आगे से खुली सैंडिल भी न पहनें ताकि भीड़ में आप के पैर कुचल न जाएं. फ्लैट सैंडिल पहनें. आप स्नीकर जूते भी पहन सकती हैं. आरामदेह होने के साथ ये फैशनपरस्ती में भी पीछे नहीं हैं.

आप का बैग

कालेज फैस्ट में आप के हाथ जितने खाली रहेंगे, आप उतना ही आनंद उठा सकेंगी. इसलिए ऐसा बैग लें जिसे आप कंधे से तिरछा डाल सकें, जिसे ‘क्रौस स्लिंग बैग’ कहा जाता है, ताकि जब आप नाच रही हों तो भी आप का बैग सहीसलामत रहे. इस के लिए थोड़ा बड़ा बैग अच्छा रहेगा.

आप के गहने

युवतियों को गहने बहुत पसंद होते हैं. कालेज कौंसर्ट जैसे अवसर पर गहने कैसे हों, यह जानना जरूरी है.

– ऐसे समय में कम से कम गहने पहनें. ऐसे गहने तो बिलकुल न पहनें, जिन के उलझने का खतरा हो.

– अपना लुक बढ़ाने के लिए केवल एक स्टाइल स्टेटमैंट रखें यानी एक बड़ी माला और कानों में आप के चेहरे को सूट करते झुमके. बालों में नकली फूल भी लगा सकती हैं.

– यदि आप ने पाश्चात्य कपड़े पहने हैं जैसे जींस तो संग में भारतीय लुक वाला कोई गहना कतई न पहनें. गहने आप के लुक से मेल खाने चाहिए.

– केवल एक हैट या ग्लैडिएटर सनग्लासेज भी आप का लुक सजा सकते हैं.

आप का मेकअप

मेकअप जितना कम करें उतना अच्छा, कालेज फैस्ट में नाचने में आप का पसीने में भीगना स्वाभाविक है. ऐसे में आप के चेहरे पर मेकअप की बहती लकीरें आप को हास्यास्पद बना देंगी, जो भी मेकअप करें वह वाटरप्रूफ हो. अच्छा रहेगा कि काजल और लिपस्टिक पर जोर दें, जो आसानी से ठीक की जा सकती है.

आप की केशसज्जा

आप चाहें तो बालों को खोल कर लहराएं. उन में आप रंगीन हेयर ऐक्सटैंशन लगा सकती हैं या फिर आजकल फैशन में विभिन्न आकार के हेयर स्टिकर भी चल रहे हैं. ऐसे में आप सुंदर तो अवश्य दिखेंगी किंतु भीड़ में बालों के खिंचने का खतरा हो सकता है. चाहें तो जूड़ा भी बना सकती हैं, जिसे आप कोई हेयर ऐक्सैसरीज जैसे नकली फूल या चमकदार जूड़ापिन से सजा सकती हैं. प्रसिद्ध अभिनेत्रियों जैकलीन फर्नांडीस और आलिया भट्ट द्वारा युवतियों हेतु कुछ टिप्स :

जैकलीन फर्नांडीस

– बहुत अधिक गहने पहनने से पूरा लुक अटपटा लगने लगता है. सिर्फ एक स्टेटमैंट ज्वैलरी पहनें, चाहे वह नैकलेस हो या कौकटेल अंगूठी.

– डैनिम की शर्ट के साथ लैदर की कमर तक ऊंची स्कर्ट. स्कर्ट के ऊपर एक पतली बैल्ट और गले में स्टेटमैंट नेकलेस.

– चमकदार टौप के साथ शौर्ट्स और यदि मौसम हो तो शनील का एक कोट भी.

– पूरी लंबाई वाली मैक्सी ड्रैस, घेरदार हो या स्ट्रेटकट.

आलिया भट्ट

आलिया भट्ट ने एक औनलाइन शौपिंग साइट जबौंग के साथ मिल कर कालेज के लिए फैशन कलैक्शन निकाला है जिस में कई लुक हैं :

– युवतियां भड़कीले रंग और प्रिंट पहनें ताकि जहां जाएं वह जगह चमक उठे.

– युवतियों पर औफ शोल्डर टौप या ड्रैस खूब फबेंगी.

– थोड़े थुलथुले बदन की युवतियों के लिए ‘लेयरिंग’ सब से अच्छा है. लेयरिंग का तात्पर्य है एक के ऊपर एक कपड़े पहनना, चाहे कैप हो या किमोनो, श्रग हो या वेस्टकोट, आप का ‘चिक लुक’ पक्का.

– खिलंदड़ लुक के लिए युवतियां फटी जींस और आरामदायक पोलो टीशर्ट पहनें.

सब से खास बात जो याद रखनी चाहिए वह यह है कि कालेज फैस्ट में चूंकि आप को काफी देर खड़ा रहना पड़ेगा इसलिए वही कपड़े और जूते पहनें जो आरामदायक हों.

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