Download App

अपने स्लो स्मार्टफोन को बनाएं फास्ट

एंड्रॉयड स्‍मार्टफोन सबसे ज्‍यादा उपयोग किया जाने वाला ऑपरेटिंग सिस्‍टम है. हाइएंड से लेकर बजट और सस्‍ते फोन में भी आपको एंड्रॉयड स्मार्टफोन मिल जाता है. और अगर आपके पास एंड्रॉयड स्मार्टफोन है तो आप इसे अपने हिसाब से कस्टमाइज भी कर सकते हैं.

लेकिन एंड्रॉयड स्‍मार्टफोन का उपयोग करने वाले इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि एंड्रॉयड फोन्स में कई सारी परेशानियां भी देखने को मिलती हैं. एंड्रॉयड स्‍मार्टफोन हैंग होने की परेशानी सबसे बड़ी परेशानी है.

लेकिन फोन हैंग होने की समस्या से कुछ आसान से तरीकों से आप निजात पा सकते हैं.

1. कस्टम UIs (Custom UIs)

इंटरनल स्टोरेज फुल होने पर अक्सर फोन स्लो हो जाता है. ऐसे में जिन ऐप्‍स का प्रयोग नहीं करते उन्हें डिलीट कर देना चाहिए. इसके अलावा फोन में स्‍टोर डाटा (फोटोज, वीडियोज, म्यूजिक) को माइक्रोएसडी कार्ड में मूव कर देना चाहिए.

ऐप्‍स का कैश डाटा भी डिलीट कर फोन की हैंग होने की समस्या को ठीक कर सकते हैं. इसके लिए आपको फोन की सैटिंग्स > स्टोरेज में जाकर कैश डाटा को डिलीट करना होगा.

इससे ऐप्‍स का कैश डाटा साफ हो जाता है. इस काम को करने के लिए सी-क्लीनर जैसे ऐप्‍स भी प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं.

2. बैटरी की खपत

यूजर्स अपने डिवाइस में कम बैटरी लाइफ की समस्या का अक्सर जिक्र करते हैं. लोकेशन और ब्राइटनेस सेटिंग्स में बदलाव कर इस समस्या को दूर कर सकते हैं.

फोन की सेटिंग्स में जाकर लोकेशन और सिलेक्ट बैटरी सेविंग मोड को क्लिक करें. ब्राइटनेस को ऑटो से हटाकर इसे अपने हिसाब से एडजस्ट करें. इसके अलावा कुछ फोन्स में तो अतिरिक्त बैटरी सेविंग मोड्स भी उपलब्ध हैं.

3. कोई रिस्‍पांस न होना/हैंग होना

कई बार ऐसा होता है कि फोन की स्क्रीन कोई भी रिस्पांस नहीं देती. ऐसे में परेशान होने की जरूरत नहीं है. यह समस्या आसानी से खत्म हो जाएगी. इसके लिए आपको फोन को रिस्टार्ट करने की जरूरत है. पावर बटन को दबाकर फोन को ऑफ करें और कुछ मिनटों के बाद फोन को एक बार फिर ऑन कर दें. या फिर फोन में रीबूट का विकल्प भी होता है जिससे आप फोन को रिस्टार्ट कर सकते हैं.

4. ऐप क्रैश (App Crash)

एंड्रॉयड फोन्स में कई बार ऐप्‍स क्रैश हो जाती हैं. ऐसा कई बार नए अपडेट की वजह से भी होता है. इसलिए अगर ऐप अपडेट नहीं है तो उसे अपडेट कर लें. अगर ऐप अपडेट है तो इसका एक हल यह है कि ऐप को फोर्स क्लोज करें और मल्टीटास्किंग से रिमूव कर ऐप को दोबारा ओपन करें.

5. गूगल प्‍ले स्‍टोर

कई बार एंड्रॉयड यूजर्स को ऐसी समस्या का भी सामना करना पड़ता है जब गूगल प्ले स्टोर काम नहीं करता अथवा क्रैश होने लगता है.

इसके लिए इस प्रक्रिया को अपना कर देखिए- सेटिंग्स > ऐप्‍लीकेशन > ऑल ऐप्‍स > गूगल प्ले स्टोर > स्टोरेज में जाकर क्लियर कैश पर सिलेक्ट करें. फोन को रिस्टार्ट करें और समस्या दूर हो जाएगी.

क्रिकेट में भी महिलाएं पुरुषों से आगे

महिलाएं हर क्षेत्र में परुषों के कंधों से कंधा मिलाकर चलती हैं. कई क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरुषों से आगे भी निकल जाती हैं. गौरतलब है कि बहुत सी महिलाओं को उनकी काबिलियत के मुताबिक अवसर नहीं मिलते. पर कुछ कर गुजरने का हौसला हर महिला में होता ही है.

अब क्रिकेट को ही देख लीजिए, इसे एक जमाने में ‘जेन्टलमेन्स गेम’ के नाम से जाना जाता था. पर अगर रिकॉर्ड को देखें तो क्रिकेट में भी कई रिकॉर्ड पुरुषों से पहले महिलाओं ने अपने नाम किए हैं.

1. एक ही टेस्ट मैच में शतक और 10 विकेट

ऑस्ट्रेलिया की Betty Wilson ने यह रिकॉर्ड अपने नाम किया था. 1958 में मेलबॉर्न में इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच में उन्होंने 10 विकेट लेने के साथ-साथ 112 रन भी बनाए थे.

वहीं पुरुष खिलाड़ियों में Alan Davison ने 1960 में यह रिकॉर्ड अपने नाम किया था. इन दोनों के अलावा Ian Botham, Imran Khan और महिला क्रिकेटर Enid Bakewell ने ही यह रिकॉर्ड अपने नाम किया है.

2. वनडे में दोहरा शतक

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सन् 2010 में दोहरा शतक लगाया था तो पूरी दुनिया में उनकी तारीफों के पुल बंध गए थे. पर असल में वनडे क्रिकेट में पहला दोहरा शतक लगाने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया की Belinda Clark को जाता है. 1997 के वर्ल्ड कप में Belinda ने 155 बॉल में 200 रन बनाए थे.

3. वनडे क्रिकेट में 400 रनों का आंकड़ा

2006 में जब ऑस्ट्रेलिया ने दक्षिण अफ्रीका के सामने 435 रनों का लक्ष्य रखा था, तो सबकी घिग्गी बंध गई था. पर दक्षिण अफ्रीका ने ऑस्ट्रेलिया को इस मैच में शिक्सत दी थी. पर क्रिकेट मैच में 400 रनों से ज्यादा की पारी खेलने का रिकॉर्ड भी महिला क्रिकेटरों ने अपने नाम है. 1997 के वर्ल्ड कप के दौरान ऑस्ट्रेलिया की ही टीम ने डेनमार्क के सामने 413 रनों का लक्ष्य रखा था.

4. सबसे ज्यादा बार वनडे वर्ल्ड कप जीत

क्रिकेट वनडे का वर्ल्ड कप किसी महायुद्ध से कम नहीं है. इस महासंग्राम में भी महिलाओं ने जो रिकॉर्ड कायम किया है, उसे पुरुष खिलाड़ी अब तक तोड़ नहीं पाये हैं. ऑस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट टीम ने 6 बार वनडे वर्ल्ड कप अपने नाम किया है. 1973 में पहली बार महिला क्रिकेट का वर्ल्ड कप आयोजित किया गया था.

गौरतलब है कि पुरुष क्रिकेट में भी सबसे ज्यादा बार वर्ल्ड कप जीतने का रिकॉर्ड आस्ट्रेलिया के नाम ही है.

5. अन्तर्राष्ट्रीय टी-20 मैचों में लगातार जीत

टी-20 क्रिकेट अनिश्चतताओं से भरा है. इस क्रिकेट फॉर्मेट में बाजी कभी भी पलट सकती है. पर इंग्लैंड की महिला टीम ने 1-2 नहीं बल्कि 14 अन्तर्राष्ट्रीय टी-20 मैचों में लगातार जीत हासिल की है. उन्होंने ये कारनामा 30 अक्टूबर, 2011 से 15 सितंबर, 2012 के बीच किया.

वहीं पुरुष क्रिकेट में भी यह रिकॉर्ड इंग्लैंड की टीम के नाम ही है. इंग्लैंड की टीम ने लगातार 8 मैच जीते हैं.

जिस देश के खून में क्रिकेट घुला हुआ वहीं महिला क्रिकेट को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती. खैर कौन सी नई बात है. पूरी दुनिया में यही होता है और आने वाले समय में भी होता रहेगा.

जमीनी हकीकत से दूर हैं हवाई सेवाएं

सरकार को एहसास हो गया है कि देश की सड़कों और रेलों को सुधारना आसान काम नहीं है. आज सड़क बनाओ कल उस के किनारे मकान दुकानें बन जाएंगी और सड़क छोटी पड़ जाएगी. सड़कों को चाहे कैसे भी बना लें, उन में झील जितने बड़े गड्ढे बन ही जाएंगे. रेलों का हाल भी यही है. जितनी मरजी रेलें चला लो गरीब, फटेहाल पोटलियां लिए चले आएंगे. टिकट लें या न लें, पान की पीक जरूर डालेंगे. बदबू और गंदगी का आलम यह है कि अब शायद सूअरों और कुत्तों को भी यह जगह गंदी लगती है. इसलिए अब सरकार करीब 50 छोटे एअरपोर्टों को ठीक कर रही है ताकि पैसे वाले लोग बिना गरीबों के साथ कंधे से कंधा मिलाए चल सकें और छोटे कसबों और शहरों के बाहर बन रहे आलीशान फ्लैटों में जा कर आराम से रह सकें. विकास के नाम पर देश को कई हिस्सों में बांटा जा रहा है और हवाई यात्रा करने वाले तो खास हैं ही.

औरतों को तो इन छोटे एअरपोर्टों से बहुत आराम रहेगा. मायका या ससुराल यदि ऐसे शहर में हो जहां एअरपोर्ट न हो, तो बड़ी कच्ची होती है. रिश्तेदार आने से कतराते हैं और कई बार बुलाने से भी कतराते हैं. ट्रेन, बस से आने वाली बेटीबहू को लेने गंदे स्टेशन या बस स्टैंड पर घंटों इंतजार करना पड़ता है और बदबू सहनी पड़ती है. हवाईअड्डा चाहे छोटा ही क्यों न हो, होगा तो खास लोगों के लिए ही न. गाड़ी पार्क करने की भी सुविधा है और स्नैक काउंटर भी अच्छा है.हवाईअड्डों पर चोरीचकारी कम होती है. बस या रेल में अकेले बीवी, बेटी, बहू को भेजना एक आफत रहती है. मोबाइल होते हुए भी हादसे का डर लगा रहता है. फिर समय तो ज्यादा लगता ही है.

यह हो सकता है कि ट्रैफिक न होने के कारण इन छोटे हवाईअड्डों का बहुत लाभ न हो पर यदि जेब में पैसे हों तो छोटा हवाईजहाज किराए पर ले कर जाया जा सकता है. खर्च चाहे सैकड़ों की जगह लाखों में हो, शान तो रहती है. आज शान बघारना काम करने से ज्यादा इंपौर्टैंट है न. हवाई सेवाएं विकास की निशानी हैं पर जमीनी हकीकत से दूर हैं. हमारे नेता, अफसर, बिजनैसमैन सब को बराबर का अवसर न मिले, इस की कोशिश में लगे रहते हैं और ऊंचनीच जो घरों में रसोई से चालू होती है, रगरग में बस गई है.

घर पर बनाएं केसरबाटी

आजकल मिठाई बनाने और उसे पेश करने का अंदाज अलग होने लगा है. यही वजह है कि मिठाई की दुकानों के मालिक और मिठाई बनाने के कारीगर कुछ न कुछ नया करने की कोशिश में रहते हैं. इस तरह के ज्यादातर प्रयोग खोए और मेवों के साथ किए जाते हैं. खोया जब मेवों के साथ मिल जात है, तो उस से तैयार मिठाई की लाइफ और कीमत दोनों बढ़ जाती हैं. ग्राहक भी नए तरीके से तैयार की गई मिठाई को खूब पसंद करते हैं. ऐसी ही एक मिठाई केसरबाटी है. मेवों, खोए और चीनी से तैयार होने वाली यह मिठाई अपने नाम से ही कुछ अलग लगती है.

लखनऊ की छप्पन भोग मिठाई के मालिक विनोद गुप्ता कहते हैं, ‘बाटी और चोखा उत्तर प्रदेश और बिहार का बहुत मशहूर पकवान है. उसी में से बाटी के आकार को ले कर हम ने केसरबाटी तैयार की है, जो आकार में बाटी की तरह दिखती है. इस के अंदर मेवे भरे होते हैं. बाटी को सेहत के लिए कारगर बनाने के लिए केसर का इस्तेमाल करते हैं. चीनी के छोटेछोटे दाने ले कर उन को केसर के रंग में रंग देते हैं. तैयार बाटी के ऊपर रंगे चीनी के दानों को चिपका दिया जाता है, जिस से बाटी देखने में पूरी तरह से केसरिया नजर आने लगती है. इस के जरीए हम ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की बाटी को अलग स्वाद में पेश करने की बेहद कामयाब कोशिश की है.’

केसरबाटी का स्वाद ले चुकी उमा आदिल कहती हैं, ‘केसरबाटी में केसर की भीनीभीनी खुशबू के साथसाथ खोए और मेवों का स्वाद मिलता है. सब से अच्छे बाटी के ऊपर लगे चीनी के दाने लगते हैं. वे इस मिठाई को पूरी तरह से अलग कर देते हैं. उसे खा कर लगता है जैसे हम मेवों से भरपूर कोई बहुत उम्दा मिठाई खा रहे हों. सब से अच्छी बात यह है कि यह दूसरी मिठाइयों के मुकाबले काफी किफायती है. मेवे मिले होने के कारण इसे खोऐ की दूसरी मिठाइयों के मुकाबले ज्यादा दिनों तक रख सकते हैं.’

कैसे बनती है केसरबाटी

केसरबाटी को बनाने के लिए सब से पहले कलाकंद बरफी बना लेते हैं.

इस के बाद छोटे दाने की सफेद रंग वाली साफ चीनी लेते हैं.

चीनी को केसर के रंग में रंग देते हैं. केसर के रंग के लिए केसर का ही इस्तेमाल करें. केसरिया खाने वाले रंग का इस्तेमाल न करें.

अब कलाकंद बरफी को बाटी का आकार देते हुए छोटेछोटे गोलगोल आकार में बना लेते हैं.

कुछ बारीक कटे मेवे अंदर रख कर बाटी को बंद कर देते हैं. ऊपर से चीनी के केसरिया दाने चिपका देते हैं.

हाथ से दबा कर बाटी के ऊपर गड्ढा सा बना देते हैं. गड्ढे में पिस्ते और बादाम के टुकड़े काट कर रख देते हैं.

विनोद गुप्ता कहते हैं, ‘आजकल लोगों को उन मिठाइयों का स्वाद ज्यादा पसंद आ रहा है, जो कम मीठी होती हैं. केसरबाटी में चीनी का इस्तेमाल बेहद कम किया जाता है. मेवों के मिलने से चीनी की मिठास कम हो जाती है. अपने नाम और आकार के अलावा केसरबाटी देखने में बहुत अच्छी लगती है, इसीलिए इस को लोग खूब पसंद कर रहे हैं. इस की कीमत करीब 500 रुपए प्रति किलोग्राम है. अपने खास नाम की वजह से यह लोगों को आसानी से याद रहती है.’

डर के आगे जीत है

बच्चों को जिस काम के लिए मना किया जाता है, वे उसी काम को करते हैं. कभीकभी तो ये नटखट शरारती बच्चे हिम्मत और सूझबूझ से कुछ ऐसा कर जाते हैं कि समाज में ही नहीं, दुनिया और देश में मांबाप की एक अलग पहचान बन जाती है. तब मांबाप को अपने बच्चे पर गर्व महसूस होता है.

पश्चिम बंगाल की 2 लड़कियों तेजस्विनी प्रधान और शिवानी गोंड ने भी हिम्मत और सूझबूझ से ऐसा कुछ कर दिखाया कि पश्चिम बंगाल में ही नहीं, पूरे देश में उन की चर्चा हो रही है. दरअसल, नेपाल के एक दंपति की एक जवान बेटी गायब हो गई थी. उन्होंने मार्ग नाम की स्वयंसेवी संस्था से बेटी को तलाशने में मदद मांगी.

संस्था के पदाधिकारियों ने अपने स्तर से पता लगा लिया कि गुम लड़की दिल्ली में है. इस के बाद संस्था ने इस की सूचना दिल्ली सीबीआई और स्टूडेंट्स अगेंस्ट ट्रैफिकिंग की 2 स्कूली सदस्यों तेजस्विनी प्रधान और शिवानी गोंड को दी. दोनों छात्राओं को पता चल चुका था कि उस लड़की को दिल्ली में देहव्यापार में धकेल दिया गया है और देह व्यापार चलाने वालों की जड़ें बड़ी गहरी हैं.

पश्चिम बंगाल की रहने वाली तेजस्विनी प्रधान और शिवानी गोंड ने समझदारी दिखाते हुए उस लड़की से फेसबुक द्वारा दोस्ती कर बात करनी शुरू कर दी. उन्होंने खुद को बेरोजगार बताया था. उस लापता लड़की ने एसएटीसी की दोनों सदस्यों को देहव्यापार का लालच दिया. दोनों लड़कियों को पूरे गैंग तक पहुंचना था, इसलिए उन्होंने उस के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.

इस बारे में पुलिस को सूचित कर दिया गया. इस के बाद पुलिस ने एसएटीसी सदस्यों की मदद से न सिर्फ उस लापता लड़की को मुक्त कराया, बल्कि देहव्यापार करने वाली एक महिला को भी गिरफ्तार कर लिया. तेजस्विनी प्रधान और शिवानी गोंड ने असीम साहस और निर्भीकता से पुलिस और एनजीओ की मदद से एक अंतरराष्ट्रीय सैक्स रैकेट का परदाफाश किया, बाद में पुलिस ने दिल्ली से मुख्य आरोपी को भी गिरफ्तार कर लिया था.

भारतीय बाल कल्याण परिषद ने इन दोनों बालिकाओं को वीरता के गीता चोपड़ा पुरस्कार से सम्मानित किया है.

भारतीय बाल कल्याण परिषद ने वीरता का सर्वश्रेष्ठ भरत अवार्ड अरुणाचल प्रदेश की 8 साल की बच्ची तार पीजू को मरणोपरांत दिया है. हिंदुस्तान में आज भी ऐसी तमाम जगह हैं, जहां नदी पार करने के लिए पुल नहीं हैं. लोगों को पानी में घुस कर नदी पार करनी पड़ती है. तार पीजू को 19 मई, 2016 को नदी पार कर के फार्महाउस जाना था. वह अपनी 2 सहेलियों के साथ नदी पार कर के जा रही थी.

पीजू आगेआगे चल रही थी, जबकि उस की दोनों सहेलियां उस के पीछे थीं. उसी बीच उस की दोनों सहेलियां पानी के तेज बहाव में बह गईं. नदी करीब 5 फुट गहरी थी.

पीजू ने दोनों सहेलियों को बहते देखा तो वह उन्हें बचाने के लिए पानी में तैरते हुए उन के पास तक पहुंच गई. वह ज्यादा अच्छी तैराक तो नहीं थी, फिर भी अपनी कोशिश से उस ने दोनों की जान तो बचा दी, लेकिन नदी की तेज धारा में वह खुद बह गई.

बच्चों ने तार पीजू के मातापिता को यह बात बताई तो वे नदी के किनारे पहुंचे. पर उन्हें नदी में कहीं बेटी दिखाई नहीं दी. सूचना मिलने पर पुलिस पहुंची. पुलिस ने खोजबीन की तो काफी दूर आगे जा कर नदी के किनारे तार पीजू की लाश मिली.

8 साल की बालिका तार पीजू ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अदम्य साहस का परिचय देते हुए 2 सहेलियों की जान बचा कर गौरव का काम किया था. अपने प्राणों की आहुति देने वाली तार पीजू की इलाके के लोगों ने ही नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन ने भी सराहना की. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने भी तार पीजू को मरणोपरांत वीरता के भरत अवार्ड से सम्मानित किया है.

8 नवंबर, 2015 को उत्तराखंड का रहने वाला 15 वर्षीय सुमित ममगाई अपने चचेरे भाई रितेश के साथ पास ही स्थित अपने खेत से पशुओं का चारा लेने गया था. तभी अचानक झाडि़यों में छिपे एक गुलदार ने पीछे से उस पर हमला कर दिया. भाई पर गुलदार द्वारा हमला करने से सुमित डर गया. लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. साहस दिखाते हुए उस ने गुलदार पर पत्थरों से हमला करना शुरू कर दिया, साथ ही वह शोर भी मचा रहा था.

इस से गुलदार और खूंखार हो गया. रितेश को छोड़ कर उस ने सुमित पर हमला कर दिया. सुमित ने घबराने के बजाए गुलदार की पूंछ पकड़ कर उसे खींचने लगा. इस से गुलदार डर गया. सुमित ने जैसे ही उसे छोड़ा, वह दुम दबा कर भाग गया. सुमित ने गुलदार के चंगुल से अपने भाई रितेश को तो बचा लिया, लेकिन उस के हमले से उस के सिर और हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए थे, जिन से काफी मात्रा में खून बह गया था.

खबर पा कर मौके पर पहुंचे गांव वालों ने उसे अस्पताल पहुंचाया. काफी मशक्कत के बाद डाक्टरों ने उसे बचा लिया. सुमित के अतुल्य साहस की वजह से रितेश की जान बच गई थी. सुमित की बहादुरी को देखते हुए भारतीय बाल कल्याण परिषद ने उसे वीरता के संजय चोपड़ा अवार्ड से सम्मानित किया है.

भारतीय बाल कल्याण परिषद ने गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा अवार्ड सन 1978 में शुरू किया था. बाल बहादुरी के लिए ये दोनों अवार्ड दिल्ली के संजय चोपड़ा और गीता चोपड़ा नाम के भाईबहनों की याद में दिए जाते हैं. इन दोनों भाईबहनों की

दिल्ली के बुद्धा गार्डन में 2 बदमाशों रंगा और बिल्ला ने हत्या कर दी थी. बाद में रंगा और बिल्ला को फांसी की सजा भी हुई थी. इस पुरस्कार के तहत प्रत्येक बच्चे को 40-40 हजार रुपए नकद, स्वर्ण पदक और वीरता प्रमाणपत्र दिया जाता है.

वीरता का सर्वोपरि भरत पुरस्कार बहादुरी का जोखिम भरा काम करने वाले बच्चे को दिया जाता है. भरत पुरस्कार से नवाजे जाने वाले बालवीर को 50 हजार रुपए नकद, स्वर्ण पदक और वीरता प्रमाणपत्र दिया जाता है. यह पुरस्कार सन 1987-88 में शुरू किया गया था. तब से अब तक यह पुरस्कार केवल 8-9 बच्चोें को ही मिला है.

बहादुर बच्चों को दिया जाने वाला एक और पुरस्कार है बापू गयाधानी पुरस्कार. भारतीय बाल कल्याण परिषद द्वारा दिए जाने वाला यह पुरस्कार सन 1988 में शुरू हुआ था. यह पुरस्कार गुजरात के बड़ौदा शहर के रहने वाले बापू गयाधानी की स्मृति में दिया जाता है. इस पुरस्कार के तहत 24 हजार रुपए, वीरता पदक और प्रमाणपत्र दिया जाता है. इस वर्ष यह पुरस्कार मिजोरम की 13 साल की लड़कियों लालरियातपुई, रोलुआपुई और छत्तीसगढ़ के 15 साल के तुषार वर्मा को दिए गए.

रोलुआपुई 3 मार्च, 2016 को अपने स्कूल की ओर से पिकनिक के लिए तुईवाल नदी के किनारे गई थी. वह अपनी कुछ सहेलियों के साथ खेल रही थी तभी उसे नदी की ओर चीखपुकार सुनाई दी. उस ने जा कर देखा कि उस की कक्षा की एक लड़की भंवर में फंस गई है.

13 साल की रोलुआपुई तैरना जानती थी, इसलिए वह 18 फुट गहरी तईवाल नदी में कूद गई और अपनी सहपाठी को भंवर से बाहर निकाल लाई. तभी एक और सहपाठी सारहा भी डूबती दिखी. वह उसे भी गहरी नदी से निकाल लाई, पर खुद तेज धारा की चपेट में आ कर भंवर में फंस गई, जिस से उस की मौत हो गई.

इसी तरह मिजोरम की ही रहने वाली एच लालरियातपुई अपने 2 साल के चचेरे भाई को बचाने की कोशिश में अपनी जान गंवा बैठी. 18 मार्च, 2016 को लालरियातपुई अपने बड़े भाई के साथ एलपीजी सिलेंडर और चावल लेने बाजार गई थी. अपने साथ कार में वह 2 साल के चचेरे भाई को भी ले गई थी. सामान ला कर वह कार की डिक्की से सामान निकाल रही थी. कार ढलान पर खड़ी थी, इसलिए वह ढलान से नीचे उतरने लगी.

कार को नीचे जाते देख बहनभाई सामान निकालना भूल गए और कार को पूरी ताकत से रोकने की कोशिश करने लगे. कार में लालरियातपुई का 2 साल का चचेरा भाई अगली सीट पर बैठा था. कार नहीं रुकी तो दूर होते हुए उस के भाई ने कार को छोड़ कर लालरियातपुई को भी कार छोड़ने को कहा. लेकिन लालरियातपुई ने कार नहीं छोड़ी.

छोटे भाई को बाहर निकालने के लिए उस ने कार का दरवाजा खोला तो दरवाजे से चोट लगने से वह गिर गई और कार के नीचे आ गई. गंभीर रूप से घायल होने पर लालरियातपुई को अस्पताल ले जाया गया, जहां उस की मौत हो गई. अपनी कर्तव्यपरायणता का परिचय देते हुए लालरियातपुई ने अपने भाई की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की. इसलिए भारतीय बाल कल्याण परिषद ने इन दोनों लड़कियों को मरणोपरांत बापू गयाधानी पुरस्कार से सम्मानित किया है.

20 सितंबर, 2015 को 15 वर्षीय तुषार अपने घर में बैठा खाना खा रहा था. तभी उस ने शोर सुना तो खाना छोड़ कर भागा. उस ने एक घर से आग की लपटें उठती देखीं. वह घर भोलूराम वर्मा का था.

आग उन के घर में बनी पशुशाला के छप्पर में लगी थी. घर में वृद्ध दंपति थे और पशुशाला में 3 गाय और 2 बैल बंधे थे. कुछ पड़ोसी भी आ चुके थे, जो आग बुझाने में लग गए. तुषार वर्मा किसी तरह छत पर चढ़ गया और कई घंटे तक आग बुझाता रहा. आग बुझते ही उस ने फटाफट छत से नीचे उतर कर पशुओं को खोला. इस प्रयास में वह झुलस भी गया था.

तुषार वर्मा के नि:स्वार्थ भाव से किए गए साहसिक कार्य से कई जानवरों की जान तो बची, साथ ही उस ने औरों के लिए एक मिसाल भी पेश की.

राजस्थान का एक गांव है करौली. 21 सितंबर, 2015 को यहीं के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में परीक्षा चल रही थी. बरामदे में करीब 70 बच्चे परीक्षा देने के लिए फर्श पर बैठे थे. छात्रों के पीछे तह किया हुआ एक आसन पड़ा था. 2 बच्चों ने जैसे ही उस आसन को उठाया, उस में से एक कोबरा निकला. उस की लंबाई लगभग 4 फुट थी.

कोबरा को देखते ही सभी बच्चे डर कर इधरउधर भागने लगे. कोबरा भागने के बजाए खड़ा हो कर फन हिलाने लगा. बच्चे तो बच्चे हैं, कोबरा को देख कर बड़ों की भी घिग्घी बंध जाती है. उसे देख कर सभी दूर हो गए. कोबरा अचानक तेजी से एक छात्र धर्मेंद्र माली की ओर बढ़ा. तभी सोनू माली नाम के अन्य छात्र ने धर्मेंद्र को गोद में उठा कर दूर कर दिया.

9 साल के सोनू माली ने अपने साहसिक प्रयास से अपने सहपाठी को कोबरा के हमले से बचा कर एक सराहनीय कार्य किया था. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने बच्चे के इस साहसिक कार्य के लिए उसे वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है.

कर्नाटक की 10 साल की सिया वामनसा खोडे़ ने अपनी बुद्धि से जिस तरह अपने भाई की जान बचाई, देख कर बड़े भी हैरान रह गए. बात 14 अप्रैल, 2015 की है. सिया अपने 4 साल के भाई और चचेरे भाइयों के साथ खेल रही थी. उसी बीच बच्चों ने छत पर जाने का फैसला किया. जैसे ही सब छत पर पहुंचे, सिया को अपना भाई दिखाई नहीं दिया. वह उसे ढूंढने लगी.

उसे कमरे में उस का भाई दिख गया. पर वह एक जगह स्थिर था. वह न हिल रहा था और न ही कुछ बोल रहा था. तभी सिया की नजर बिजली के उस तार पर पड़ी, जो उस के भाई के हाथ में था. सिया समझ गई कि यह करंट की चपेट में है. स्कूल

में पढ़ाई के दौरान सिया को बताया गया था कि करंट की चपेट में आए व्यक्ति को किस तरह से बचाना चाहिए.

भाई का हाथ पकड़ कर खींचने पर वह खुद भी करंट की चपेट में आ सकती थी, इसलिए उस ने सावधानी बरतते हुए भाई की शर्ट पकड़ी और उसे जोर से खींचा. ऐसा करने से भाई बिजली के तार से छूट गया और वह खुद भी गिर गई. उस के चचेरे भाइयों के शोर मचाने पर सिया के मांबाप भी कमरे में पहुंच गए.

वे उसे अस्पताल ले गए, जिस से उस की जान बच गई. सिया वामनसा खोड़े के विवेकपूर्ण कार्य से उस के भाई की जान बच गई. उस के इस कार्य की गांव के सभी लोगों ने तारीफ तो की ही, साथ ही भारतीय बाल कल्याण परिषद ने भी उसे राष्ट्रीय वीरता के पुरस्कार से सम्मानित किया.

सिया की तरह मणिपुर के साढ़े 14 साल के मोइरंगथम सदानंदा सिंह ने भी सही समय पर सही समझ का उपयोग कर के अपनी मां की बिजली के करंट से जान बचाई थी. दरअसल उस के घर का आंगन इस तरह का था कि बारिश का पानी वहां जमा हो जाता था. इस के बाद मोटर के जरिए उस पानी को निकाला जाता था. 6 मई, 2016 को हुई बारिश का पानी भी उस के आंगन में भर गया था.

सदानंद की मां राधामनी देवी ने मोटर का तार किचन के बिजली बोर्ड से लगाया. उस समय वह किचन में खाना बना रही थीं. अचानक शार्टसर्किट से बोर्ड में आग लग गई. राधामनी ने मोटर के प्लग को बोर्ड से निकालने की कोशिश की तो वह बिजली के करंट की चपेट में आ गईं.

अपनी मां को करंट की चपेट में देख कर सदानंद भागाभागा कमरे में गया और लकड़ी का डंडा ले कर किचन में पहुंचा और मां के हाथ पर प्रहार कर के करंट से अलग किया. करंट से अलग होते ही राधामनी बेहोश हो कर गिर पड़ीं.

सदानंद फटाफट कमरे से कंबल लाया और मां को ओढ़ा दिया. फिर शोर मचाया. लोग राधामनी को अस्पताल ले गए, तब कहीं जा कर उन की जान बच सकी. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने बहादुर बालक सदानंद को वीरता के पुरस्कार से सम्मानित किया है.

13 दिसंबर, 2015 को हिमाचल प्रदेश के एक निजी स्कूल के बच्चे पिकनिक के लिए धर्मशाला गए थे. वहां से लौटते समय सभी शिवद्वाला में रुके. कुछ बच्चे और अध्यापक बस से उतर गए. बस का ड्राइवर भी उतर गया. उस ने बस का इंजन बंद नहीं किया था. उसी समय एक बच्चे ने ड्राइवर की सीट पर बैठ कर गियर बदल कर क्लच पर पैर रख दिया.

ऐसा करते ही बस चल पड़ी. बस के अंदर मौजूद बच्चे चीखनेचिल्लाने लगे. तभी 11 साल का प्रफुल्ल शर्मा दौड़ कर ड्राइवर की सीट पर पहुंचा और उस ने सूझबूझ का परिचय देते हुए ब्रेक पर पैर रख कर बस को रोक दिया. इस के बाद उस ने बस की चाबी निकाल कर उस के इंजन को बंद कर दिया.

प्रफुल्ल शर्मा ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए कई बच्चों की जान बचाई थी. स्कूल प्रशासन ने तो प्रफुल्ल शर्मा के कार्य की सराहना की ही, भारतीय बाल कल्याण परिषद ने इस बच्चे को वीरता के पुरस्कार से सम्मानित किया है.

गांवदेहात में रहने वाले बच्चों को तैराकी सीखने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं होती. वे आसपास नदी या तालाब में नहातेनहाते अपने दूसरे साथियों को देख कर तैराकी सीख जाते हैं. दिल्ली के साढ़े 16 साल के नमन, केरल की बदरुन्निसा, 14 वर्षीय आदित्यन, 16 वर्षीय बिनिल मंजली, 16 साल के अखिल के. शिबू, उड़ीसा के 11 वर्षीय मोहन सेठी, नागालैंड के 10 वर्षीय थंगिलमंग लंकिम, छत्तीसगढ़ की 8 वर्षीया कुमारी नीलम, असम के 16 वर्षीय टंकेश्वर पीगू एवं जम्मूकश्मीर की 12 वर्षीया बालिका पायल देवी ने डूबते हुए बच्चों की जान बचाने में अपनी जान की बाजी लगा दी थी.

इस प्रयास में पायल खुद अपनी जान गंवा बैठी. भारतीय बाल कल्याण  परिषद ने इन सभी बच्चों की बहादुरी को देखते हुए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है. नमन फिल्म ‘सुलतान’ में रेफरी की भूमिका निभाने वाले शमशेर सिंह का बेटा है.

उत्तर प्रदेश की साढ़े 14 साल की बालिका अंशिका पांडेय ने निहत्थे होते हुए हथियारबंद बदमाशों से जिस तरह खुद को मुक्त कराया, उस का यह साहस काबिलेतारीफ था. बात 14 सितंबर, 2015 की है. अंशिका साइकिल से अपने स्कूल जा रही थी. घर से करीब 500 मीटर ही निकली थी, तभी एक एसयूवी गाड़ी उस के पास आ कर रुकी. गाड़ी में पिछली सीट पर बैठे व्यक्ति ने गेट खोल कर अंशिका से कोई पता पूछा.

जैसे ही वह पता बताने लगी, उस आदमी ने बाल पकड़ कर अंशिका को गाड़ी में खींचने की कोशिश की. अंशिका ने चीखते हुए अपने पैर गेट पर फंसा दिए, जिस से गेट बंद न हो सका. जब उस आदमी को असफलता दिखाई दी तो उस ने चालक से एक बोतल मांगी, जिस में तेजाब था. जैसे ही उस व्यक्ति ने बोतल का ढक्कन खोलना चाहा, अंशिका ने उस के हाथ में दांतों से काट लिया, जिस से बोतल नीचे गिर गई.

उधर से गुजर रही अंशिका की सहेली ने यह मंजर देख कर शोर मचाना शुरू कर दिया. इस के बाद हमलावर डर गया. बौखलाहट में उस ने चाकू निकाल कर जैसे ही अंशिका के चेहरे पर हमला किया, अंशिका ने बचाव करते हुए अपना दायां हाथ

आगे कर दिया, जिस से उस का हाथ जख्मी हो गया.

बदमाश ने गाड़ी का दरवाजा बंद करना चाहा, पर अंशिका का पैर अड़ा होने की वजह से जब दरवाजा बंद नहीं कर सका तो अंशिका को धक्का दे कर गिरा दिया और गाड़ी ले कर भाग गया.

अंशिका यदि हिम्मत और सूझबूझ से काम न लेती तो उस के साथ कोई बड़ी वारदात हो सकती थी, पर उस ने निर्भीकतापूर्वक बदमाश से मुकाबला किया. उस की इस बहादुरी पर भारतीय बाल कल्याण परिषद ने उसे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है.

8 दिसंबर, 2015 की बात है. दिल्ली की अक्षिता और उस का छोटा भाई अक्षित स्कूल से घर पहुंचे तो उन्हें अपने घर के मेनगेट का लोहे का दरवाजा खुला मिला, जबकि उसी गेट का लकड़ी का दरवाजा अंदर से बंद था. बच्चों ने दरवाजा खटखटाया तो अंदर से कोई अनजानी आवाज आई. बच्चों को शक हुआ तो अक्षिता ने दरवाजे के ऊपर बने रौशनदान से अंदर झांका. उसे 2 अजनबी लोग ड्राइंगरूम में घूमते दिखे.

उस ने एक आदमी को सामान के साथ बालकनी से कूदते देखा. अक्षिता समझ गई कि ये चोर हैं. वह शोर मचाती हुई उसे पकड़ने दौड़ी. तभी बदमाश ने उस की गरदन पकड़ ली और उसे थप्पड़ मारने लगा. इस से अक्षिता का चश्मा गिर गया और चोर भाग गया.

दूसरा चोर बैग के साथ बालकनी की तरफ आया तो अक्षित ने स्कूल का बैग एक तरफ फेंका और उस की तरफ दौड़ा. दोनों बच्चों ने चोर को कस कर पकड़ा और शोर मचा दिया. शोरशराबा सुन कर पड़ोसी आ गए और उस चोर को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया.

अक्षिता शर्मा और अक्षित शर्मा ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए एक बदमाश को सलाखों के पीछे पहुंचाया था. दोनों बच्चों की निडरता को देखते हुए भारतीय बाल कल्याण परिषद ने उन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है.

महाराष्ट्र की साढ़े 16 साल की निशा दिलीप पाटिल 14 जनवरी, 2016 को अपने घर में थी. पड़ोस में रहने वाली कस्तूरबाबाई अपने बेटे को स्कूल छोड़ने गई थी. तभी अचानक उस के घर में आग लग गई. शोर मचाते हुए निशा उस के घर में घुस गई. उस का 6 माह का बच्चा पालने में पड़ा रो रहा था. उस कमरे में आग फैल चुकी थी.

निशा उस बच्चे को निकाल लाई. इस प्रयास में निशा मामूली रूप से झुलस भी गई थी. उधर निशा का शोर सुन कर जो पड़ोसी आए थे, वे आग बुझाने में लगे थे. तब तक कस्तूरबाबाई घर लौट आई थीं. घर में लगी आग से वह घबरा गई, लेकिन बेटे को सुरक्षित देख कर उस ने राहत की सांस ली. इस तरह निशा ने अपनी सूझबूझ से एक शिशु की जान बचाई. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने निशा के कार्य की प्रशंसा करते हुए उसे राष्ट्रीय वीरता का पुरस्कार प्रदान किया.

राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बहादुर बच्चों को मैडल, प्रशस्तिपत्र के अलावा 20 हजार रुपए दिए जाते हैं. भारतीय बाल कल्याण परिषद की अध्यक्षा गीता सिद्धार्थ ने बताया कि पुरस्कृत बच्चों को उन की स्कूली पढ़ाई पूरी करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में पढ़ने वाले बच्चों को छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है. इस के अलावा मैडिकल, इंजीनियरिंग, पौलिटेक्निक में प्रवेश के लिए इन्हें विशेष सुविधा दी जाती है. राज्य सरकारें भी ऐसे बच्चों को कई तरह की सुविधाएं देती हैं.

भारतीय बाल कल्याण परिषद ने इस बार 25 बच्चों को वीरता पुरस्कार के लिए चुना, जिन में 13 लड़के और 12 लड़कियां थीं. इन में से 4 बच्चे ऐसे भी थे, जिन्हें दूसरे की जान बचाने में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. उन चारों बच्चों के मांबाप ने यह पुरस्कार हासिल किया. सन 1957 से अब तक भारतीय बाल कल्याण परिषद 669 बालक और 276 बालिकाओं को इस पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है.

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इन बच्चों को राष्ट्रीयवीरता पुरस्कार से सम्मानित किया तो वहां मौजूद अभिभावकों की आंखों में आंसू छलक आए. इस के बाद सभी बहादुर बच्चों को खुली जीप में बैठा कर गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल किया गया.

इस से पहले एक सप्ताह तक उन्हें राष्ट्रपति एवं बड़े राजनेताओं और उद्योगपतियों से मिलवाया गया. उन्हें दिल्ली तथा आसपास के पर्यटकस्थलों की सैर भी कराई गई. जिन बच्चों को मरणोपरांत वीरता पुरस्कार दिया गया, उन के अभिभावकों ने आंखों में छलके आंसू पोंछते हुए कहा कि यदि उन के बच्चे भी जीवित होते तो और ज्यादा खुशी होती. फिर भी उन्हें अपने बच्चों पर फख्र है कि उन्होंने दूसरों की जान बचाई.

शादी के लिए 6 हत्याएं

पंजाब के जिला होशियारपुर का रहने वाला रघुवीर 18 साल का हो चुका था. उस की शादी की बात भी चलने लगी थी, लेकिन शादी के पहले उसे यह साबित करना था कि वह इस के काबिल हो गया है. इस के लिए उसे लूटपाट करने वाले गैंग में शामिल होना था. क्योंकि वह जिस बिरादरी से था, उस में शादी से पहले लूट की ट्रेनिंग लेनी पड़ती है.

दरअसल, रघुवीर बेडि़या जाति से था, जिस में रोजीरोजगार के साधन कम ही होते हैं, जिस की वजह से ज्यादातर पुरुष चोरी और लूट जैसी वारदातें करते हैं. इस के लिए वे गिरोह बना कर अपने इलाके से काफी दूर निकल जाते हैं और लूटपाट करते हैं. ये जिस इलाके में वारदात करने जाते हैं, लोकल लोगों को अपने गिरोह में शामिल कर के ही लूटपाट की वारदात को अंजाम देते हैं.

लूट के दौरान हत्या जैसे जघन्य अपराध करने से लोकल बदमाश घबराते हैं, जबकि ये जरूरत पड़ने पर ही नहीं, आसपास सनसनी फैलाने और लूट में कोई परेशानी न हो, इस के लिए भी घर के किसी न किसी सदस्य की हत्या जरूर करते हैं. इस का मकसद होता है गिरोह के नए सदस्यों में हिम्मत पैदा करना, जिस से वह लूट के दौरान किसी भी तरह से घबराएं न. गिरोह के वरिष्ठ सदस्य इसे शादी और घरगृहस्थी से भी जोड़ देते हैं.

कहते हैं कि बेडि़यों के गिरोह आज भी कबीला संस्कृति का पालन करते हैं, जिस में हत्या करना कोई कठिन काम नहीं माना जाता. गिरोह के वरिष्ठ लोग अपने नए साथी के मन से डर निकालने के लिए इस तरह का काम करने को उकसाते ही नहीं, बल्कि हर हालत में करवाते हैं. शादी के जोश में इस तरह के अपराध करने के लिए किशोर उम्र के लड़के तैयार भी हो जाते हैं.

गिरोह चलाने वाले यानी गिरोह के सरगनाओं का मानना है कि हत्या जैसी घटना को अंजाम देने के बाद किशोर अपराध के दलदल में इस तरह फंस जाते हैं कि चाह कर भी अपराध के इस दलदल से निकल नहीं पाते. वे दूसरों की पोल भी नहीं खोल सकते. किसी को भी जघन्य अपराधी बनाने के लिए उस के हाथ से हत्या कराना कबीला गिरोहों का मुख्य काम होता था. एक तरह से अपराध के साथ यह कुप्रथा भी थी. इन का यह कृत्य सभ्य समाज के लिए खतरा था.

गिरोह चलाने वाले सरगना को सब से ताकतवर माना जाता है. वह एक दो, नहीं कईकई हत्याएं यानी कम से कम 6 हत्याएं कर चुका होता है. इसी वजह से इन के गिरोह को छैमार गिरोह कहा जाता है.

दरअसल, ये लोग अपना खौफ पैदा करने के लिए भी इस तरह के नाम रख लेते हैं, जिस से कोई लूट का विरोध करने की हिम्मत न कर सके. हिम्मत करने वाले को पता होता है कि उस की हत्या हो सकती है. इस डर से जल्दी कोई लूट का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाता. अपने नाम का खौफ पैदा करने के बाद ये अपरध करने में सफल रहते हैं.

अपराध कर के ये लोग वह इलाका छोड़ देते हैं. इस के बाद पुलिस के हाथ गिरोह के वही सदस्य लगते हैं, जो नए होते हैं और आमतौर पर वे लोकल लोग होते हैं. चूंकि लोकल अपराधियों को मुख्य अपराधियों के बारे में जानकारी नहीं होती, इसलिए पुलिस कभी भी मुख्य अपराधियों तक पहुंच नहीं पाती.

कुप्रथाएं अपराधी भी बनाती हैं, लखनऊ पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार कर इस बात का परदाफाश कर सब को चौंका दिया है. इस से पता चलता है कि समाज अभी भी कितना पीछे है. लखनऊ पुलिस ने एक ऐसे लुटेरे गिरोह के कुछ लोगों को गिरफ्तार कर के परदाफाश किया है कि बेडि़या गिरोह के लोग शादी के लिए 6 हत्याएं करते हैं.

पंजाब के उस गिरोह को इसी वजह से ‘छैमार गैंग’ के नाम से जाना जाता है. इस गैंग में शामिल सदस्य अपनी शादी से पहले 6 हत्याएं जरूर करते हैं. पंजाब का यह गिरोह लूट के दौरान विरोध करने पर तुरंत हत्या कर देता है. यह गैंग उत्तर प्रदेश में ही नहीं, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में भी डकैती डालने का काम करता था.

लखनऊ पुलिस ने पंजाब से आए इस गिरोह के 4 सदस्यों को एसटीएफ के सहयोग से मडियांव थानाक्षेत्र में पकड़ा था. इन के पास से 2 तमंचे, चाकू, नकदी और गहने बरामद किए थे. 3 साल पहले इस गिरोह ने जौनपुर के शाहगंज इलाके में डकैती डाली थी. जौनपुर पुलिस ने इन के 2 सदस्यों पर 2-2 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया था.

लखनऊ के एएसपी (ट्रांसगोमती) दुर्गेश कुमार ने बताया कि रात को पुलिस को सूचना मिली थी कि पंजाब के छैमार गिरोह के कुछ डकैत घैला पुल के पास मौजूद हैं. एसटीएफ के एसआई विनय कुमार और इंसपेक्टर मडियांव नागेश मिश्रा ने फोर्स के साथ इन की घेराबंदी की.

पुलिस को देखते ही गिरोह के सदस्यों ने गोली चलाना शुरू कर दिया. जवाबी फायरिंग में वे भागने लगे, लेकिन पुलिस ने 4 लोगों को पकड़ लिया, जिन की पहचान कदीम उर्फ पहलवान, अली उर्फ हनीफ, मुन्ना उर्फ बग्गा और सलमान उर्फ अजीम के रूप में हुई. इन के पास से जौनपुर में हुई लूट का सामान भी बरामद हुआ.

दरअसल, ये छैमार गिरोह के सदस्य थे. यह छैमार गिरोह पंजाब के बदमाशों द्वारा तैयार किया गया था. ये लोकल अपराधियों को अपने साथ रैकी के लिए रखते थे, जो उस घर की तलाश करते थे, जहां डकैती डालनी होती थी. इस के बाद का काम छैमार गिरोह का होता था.

लोकल अपराधी कत्ल करने में पीछे हट जाता था, जबकि छैमार गिरोह के क्रूर सदस्य लूट के दौरान कत्ल करने से जरा भी नहीं घबराते थे. ये अपना ठिकाना बदलते रहते थे, जिस से इन की शिनाख्त नहीं हो पाती थी.

6 कत्ल करने के बाद डकैत अपनी शादी कर के गृहस्थी बसा सकता था. लूट के पैसे से ये अपना खर्च चलाते थे. दरअसल आज भी बहुत सारे लोग हत्या जैसे अपराध को बाहुबल से जोड़ कर देखते हैं, जिस की वजह से ऐसी प्रथाएं चल पड़ी हैं. अपराधी खुद का दामन बचाने के लिए ऐसी प्रथाओं का हवाला देता है. ये अपने नाम और गैंग का नाम बदल कर आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं.

सावधान ! ऐसे ड्राइवर से

कोई भी अनहोनी या परेशानी बता कर नहीं आती. जिस तरह उजाले को शाम का अंधेरा अपने आगोश में समेटता है, वैसा ही कुछ हाल अनहोनी और परेशानी का भी होता है. नोएडा के वीआईपी इलाके सैक्टर ओमेगा वन स्थित ग्रीनवुड सोसायटी के रहने वाले कारोबारी अशोक गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

13 जनवरी, 2017 की दोपहर उन की आलीशान कोठी में अजीब सी हलचल थी. ऐसी हलचल, जिसे पहले कभी महसूस नहीं किया गया था. दरअसल उस दिन अशोक गुप्ता की पत्नी और बेटा विपुल काफी परेशान थे. मृदुभाषी अशोक का बैटरी बनाने का बड़ा कारोबार था, जिसे वह अपने 2 बेटों की मदद से चला रहे थे.

यूं तो अशोक गुप्ता खुशियों भरी जिंदगी जी रहे थे, लेकिन उस दिन जैसे उन के परिवार की खुशियों को किसी की नजर लग गई थी. दरअसल ढाई बजे के करीब उन के बेटे विपुल के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. नंबर चूंकि पिता का था, इसलिए उन्होंने तत्काल फोन रिसीव कर के कहा, ‘‘हैलो पापा.’’

विपुल को झटका तब लगा, जब दूसरी ओर से किसी अनजान आदमी की आवाज आई, ‘‘पापा, नहीं मैं बोल रहा हूं.’’

‘‘आप कौन ’’ विपुल ने पूछा.

‘‘यह भी बता देंगे, फिलहाल इतना जान लो कि तुम्हारे पापा हमारे कब्जे में हैं. अगर उन की जान की सलामती चाहते हो तो जल्दी से 3 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो, वरना अच्छा नहीं होगा.’’ फोन करने वाले ने सख्त लहजे में कहा.

उस की बात सुन कर विपुल के पैरों तले से जमीन खिसक गई. विपुल ने पूछना चाहा कि वह कौन बोल रहा है तो उस ने डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ज्यादा सवाल नहीं, जितना कहा है, सिर्फ उतना करो.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. इस के बाद गुप्ता परिवार सकते में आ गया. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि अशोक गुप्ता का अपहरण हो चुका है. वह बदमाशों के चंगुल में हैं. उन्हें छोड़ने के लिए बदमाश फिरौती मांग रहे हैं.

अशोक गुप्ता घर में बाजार जाने की बात कह कर अपनी कोरोला कार से ड्राइवर पवन के साथ निकले थे. उसी बीच उन का अपहरण हो गया था. उन का तो अपहरण हो गया, ड्राइवर पवन कहां गया, उस का कुछ पता नहीं था. घर वाले उसी के बारे में सोच रहे थे कि घबराया हुआ पवन घर में दाखिल हुआ. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. वह काफी डरा हुआ था.

उस के आते ही विपुल ने पूछा, ‘‘पवन, पापा को क्या हुआ ’’

‘‘वे मेरी आंखों के सामने से उन्हें ले गए और मैं कुछ नहीं कर पाया.’’ कह कर पवन जोरजोर से रोने लगा.

‘‘क्या हुआ, पूरी बात ठीक से बताओ.’’ विपुल ने पूछा.

‘‘भैयाजी, मैं साहब को ले कर सैक्टर पी-3 गोलचक्कर के पास जा रहा था, तभी एक मारुति वैन ने हमारी कार को ओवरटेक कर के रोक लिया. 3 बदमाशों ने हथियारों के बल पर साहब को निकाल कर अपनी कार में बैठाया और देखतेदेखते ले कर चले गए. मैं ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुझे धक्का दे कर गिरा दिया.’’ डरे हुए अंदाज में पवन ने कहा.

पवन अपनी बात कह ही रहा था कि अपहर्त्ता का फिर फोन आ गया. विपुल ने जल्दी से फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से पूछा गया, ‘‘पैसों का इंतजाम हो गया ’’

‘‘इतनी बड़ी रकम का इंतजाम इतनी जल्दी कैसे हो सकता है ’’

‘‘गुप्ताजी को जिंदा देखना चाहते हो तो फिरौती तो देनी ही होगी.’’

‘‘आप लोग मेरी बात समझने की कोशिश कीजिए, रकम बहुत ज्यादा है. हम कोशिश कर के भी इतनी बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर सकते. हमारे पास जो नकदी और गहने हैं, वह सब हम देने को तैयार हैं. लेकिन मेरे पापा को कुछ नहीं होना चाहिए.’’

‘‘उस की फिक्र तुम मत करो, हम अपने वादे के पक्के हैं. तुम पैसा तैयार करो, हम दोबारा फोन करते हैं. और हां, गलती से भी पुलिस को खबर की तो मजबूरन हमें अपने हाथ खून से रंगने पड़ेंगे.’’ अपहर्त्ता ने कहा और फोन काट दिया. इस तरह अपहर्त्ता लगातार विपुल के संपर्क में बने थे.

नातेरिश्तेदारों से सलाहमशविरा कर के विपुल ने पिता के अपहरण की सूचना पुलिस को दे दी. कारोबारी के अपहरण की सूचना मिलते ही सीओ डा. अरुण कुमार और स्थानीय थाना कासना के थानाप्रभारी सुधीर त्यागी अशोक गुप्ता की कोठी पर पहुंच गए.

मामला सीधे अपहरण का था. अब तक मिली जानकारी से पुलिस को पूरा विश्वास था कि अपहर्त्ता जरूर किसी न किसी रूप में अशोक गुप्ता के जानकार थे. उन्होंने उन की हैसियत देख कर ही फिरौती की मांग की थी.

उन के ड्राइवर पवन के सामने उन का अपहरण हुआ था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ की. उस ने वहीं बातें पुलिस को भी बताईं, जो विपुल को बताई थीं. पुलिस ने जब उस से पूछा कि उस ने वहां शोर क्यों नहीं मचाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं बहुत डर गया था.’’

एसएसपी धर्मेंद्र सिंह ने एसपी सुजाता सिंह से सलाह की. वह अपहृत कारोबारी अशोक गुप्ता की जल्द से जल्द बरामदगी चाहते थे, इसलिए उन के निर्देश पर एसपी सुजाता सिंह ने सर्विलांस टीम को सक्रिय कर दिया. पुलिस ने अपराध क्रमांक 33/2017 पर धारा 364ए/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी, साथ ही विपुल से अपहर्त्ताओं से संपर्क बनाए रखने को कहा.

अपहर्त्ता का फोन आया तो विपुल ने बात 15 लाख रुपए नकद और आभूषणों में तय कर ली. लेकिन अपहर्त्ताओं की एक बात ने विपुल को न सिर्फ चौंका दिया, बल्कि वह सोचने पर भी मजबूर हो गए. अपहर्त्ता ने कहा था, ‘‘हम यह फिरौती एक शर्त पर लेंगे.’’

‘‘क्या ’’

‘‘आप को रकम अपने ड्राइवर के हाथों भेजनी होगी, क्योंकि हम उसे पहचानते हैं. इस में कोई चालाकी नहीं होनी चाहिए. फिरौती ले कर कहां आना है, यह हम थोड़ी देर में बता देंगे.’’

अपहर्त्ता ने जैसे ही फोन रखा, विपुल ने पुलिस अधिकारियों से कहा, ‘‘सर, अपहर्त्ता कौन है, मुझे पता चल गया है.’’

‘‘क्या ’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी सर, मैं ने उस की आवाज पहचान ली है. वह कोई और नहीं, हमारा पुराना ड्राइवर सनेश है. मेरा शक उस पर इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि उस ने फिरौती की रकम पहुंचाने के लिए पवन को भेजने की शर्त रखी है. पवन को डेढ़ महीने पहले उसी ने हमारे यहां नौकरी पर रखवाया था.’’ विपुल ने बताया.

विपुल ने यह बात बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कही थी, इसलिए पुलिस के शक की सुई पवन पर ठहर गई. उस की भूमिका पुलिस की नजर में पहले से ही संदिग्ध थी, क्योंकि उस ने पुलिस को फोन न कर के और शोर न मचा कर घर आ कर अपहरण की बात बताई थी.

जबकि अपहरण के मामलों में ऐसा होता नहीं है कि अपहर्त्ता किसी ड्राइवर के जरिए फिरौती मंगवाएं. असलियत जानने के लिए पुलिस की सर्विलांस टीम ने पवन, अशोक गुप्ता और सनेश की काल डिटेल्स निकलवाई तो घटना के समय की तीनों की लोकेशन एक साथ की पाई गई. यही नहीं, पवन और सनेश की लगातार बातें भी हो रही थीं.

पुलिस को अपहर्त्ताओं तक पहुंचने की राह मिल गई थी. पवन से पूछताछ की गई तो पहले वह अपना हाथ होने से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि अपहरण की साजिश में वह खुद भी शामिल है.

एसपी सुजाता सिंह जानती थीं कि अपहर्त्ताओं को जरा भी शक हुआ तो अशोक गुप्ता की जान को खतरा हो सकता है, इसलिए उन्होंने पवन के जरिए अपहर्त्ताओं तक पहुंचने और अशोक गुप्ता को सकुशल बरामद करने की योजना बनाई. इस मामले में खास बात यह थी कि पवन को पता था कि अशोक गुप्ता को कहां रखा गया है.

विपुल ने अपहर्त्ताओं को फोन कर के बता दिया था कि उन्होंने पवन को रकम दे कर भेज दिया है. जबकि पुलिस टीम ने पवन को कार में अपने साथ बैठा रखा था. 10 मिनट बाद ही पवन के साथी का फोन उस के मोबाइल पर आ गया. पवन ने पुलिस के इशारे पर उसे विश्वास दिला दिया कि किसी तरह का कोई खतरा नहीं है और वह फिरौती का माल ले कर उन के पास पहुंच रहा है.

अब तक रात हो चुकी थी. हथियारों से लैस पुलिस टीम पवन को साथ ले कर रात करीब 12 बजे बुलंदशहर जनपद के थाना सिकंदराबाद के गांव सनौटा के जंगल में पहुंची. थोड़ी कोशिश कर के पुलिस ने ईंख के एक खेत में बंधक बनाए गए अशोक गुप्ता को सकुशल अपहर्त्ताओं के चंगुल से मुक्त करा लिया.

पुलिस ने घेराबंदी कर के सनेश और उस के साथी राबिन को गिरफ्तार कर लिया, जबकि इन के 2 साथी पुलिस को चकमा दे कर भाग निकले. पुलिस को इन के कब्जे से 315 बोर के 2 तमंचे मिले. अशोक गुप्ता काफी डरेसहमे थे. पुलिस सभी को ले कर नोएडा आ गई. पुलिस के लिए यह बड़ी सफलता थी.

एसपी सुजाता सिंह ने आरोपियों से पूछताछ की. इस पूछताछ में राह से भटके एक शातिर महत्त्वाकांक्षी नौजवान की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

एक साल पहले अशोक गुप्ता ने सनेश को अपने यहां ड्राइवर रखा था. वह नोएडा से ही लगे जिला बुलंदशहर के गांव खगावली का रहने वाला था. निम्नवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बीए पास सनेश काफी महत्त्वाकांक्षी था और बचपन से ही अमीर बनने के सपने देखता आया था.

यह बात अलग थी कि उस के सपने पूरे नहीं हो सके थे और वह ड्राइवर बन कर रह गया था. अपने काम से सनेश जरा भी खुश नहीं था. अपने सपने के बारे में वह अकसर अशोक गुप्ता से भी जिक्र करता रहता था कि एक दिन उसे भी बड़ा आदमी बनना है. अशोक गुप्ता उस की बातें सुन कर मुसकरा देते थे.

अमीर बनने के सपने ने सनेश को कुंठित कर दिया था. अक्तूबर, 2016 के अंत में नौकरी छोड़ कर उस ने कोई दूसरा काम करने का विचार किया. जबकि अशोक गुप्ता नहीं चाहते थे कि वह नौकरी छोड़ कर जाए. उन्हें परेशानी हुई तो उन्होंने उस से कोई दूसरा ड्राइवर दिलाने को कहा.

अशोक गुप्ता के कहने पर उस ने अपने रिश्तेदार पवन को उन के यहां नौकरी पर रखवा दिया. पवन का बड़ा भाई सनेश का जीजा था. पवन उसी के पड़ोस के गांव शरीकपुर का रहने वाला था. यहां अशोक गुप्ता की लापरवाही ही कही जाएगी कि उन्होंने दोनों ड्राइवरों का पुलिस वैरिफिकेशन कराना जरूरी  नहीं समझा.

सनेश ने नौकरी तो छोड़ दी, लेकिन काफी भटकने के बाद भी उसे न कोई दूसरी नौकरी मिली और न ही वह कोई दूसरा काम कर सका. हर समय वह किसी भी तरह रुपए कमाने के बारे में सोचा करता था. दिमाग में जब एक ही बात बैठ जाए तो आदमी अच्छाबुरा भी नहीं देखता.

ऐसे में ही सनेश के दिमाग में गलत तरीके से पैसे कमाने की बात आई तो उस ने अपने पुराने मालिक का अपहरण कर मोटी फिरौती वसूलने का मन बना लिया. क्योंकि वह अशोक गुप्ता की आर्थिक स्थिति और स्वभाव को जानता था.

उस ने सोचा कि अगर अशोक गुप्ता का अपहरण कर लिया जाए तो उन से आसानी से मोटी रकम फिरौती में मिल सकती है. चूंकि उस का रिश्तेदार पवन उन के यहां ड्राइवर था, इसलिए उस के जरिए बिना किसी खतरे के अशोक गुप्ता का अपहरण किया जा सकता था. पूरी योजना बना कर सनेश ने इस मुद्दे पर पवन से कहा, ‘‘पवन मेरा बचपन से करोड़पति बनने का सपना है. अगर तू मदद कर दे तो मैं एक ही झटके में करोड़पति बन सकता हूं, साथ ही तुझे भी करोड़पति बना सकता हूं.’’

‘‘इस के लिए मुझे क्या करना होगा ’’ पवन ने पूछा.

‘‘अपने लालाजी का अपहरण कराना होगा.’’

‘‘क…क…क्या ’’ पवन चौंका.

‘‘देख, सीधे रास्ते से तो करोड़पति बनने से रहे. भाई इस के लिए कुछ ऐसा ही करना होगा. लेकिन इस में तुझे घबराने की जरूरत नहीं है. मैं सब संभाल लूंगा. किसी को हम पर शक भी नहीं होगा.’’ सनेश ने पवन को समझाया तो अमीर बनने का उस का भी सपना जाग गया.

सनेश का ही एक दोस्त था राबिन, जो मेरठ जिले के थाना भावनपुर के गांव किनानगर का रहने वाला था. अपना इरादा उस ने राबिन और अन्य 2 साथियों विपिन और ललित को बताया तो पैसों के लालच में वे भी साथ देने को राजी हो गए. इस के बाद एक दिन सभी ने बैठ कर पूरी योजना तैयार की.

सनेश शातिर दिमाग था. वह पूरी सफाई के साथ अशोक गुप्ता का अपहरण कर फिरौती वसूलना चाहता था. उन की योजना थी कि फिरौती वसूल कर को वे अशोक गुप्ता की हत्या कर देंगे, क्योंकि वह उन्हें पहचानते थे. अगर उन्हें जिंदा छोड़ दिया जाता तो बाद में सभी पकड़े जाते. इसलिए वे फिरौती मिलने तक ही उन्हें जिंदा रखना चाहते थे. इस तरह अपहरण की फूलप्रूफ योजना तैयार कर ली गई.

योजना के मुताबिक, 13 जनवरी को पवन अशोक गुप्ता को ले कर निकला. उन्हें रामपुर बाजार जाना था. वापसी में पवन ने कार सेक्टर पी 3 गोलचक्कर के पास अचानक सर्विस रोड की ओर घुमा दी. अशोक गुप्ता को उधर नहीं जाना था, इसलिए

उन्होंने पूछा, ‘‘पवन, इधर कार कहां ले जा रहे हो ’’

‘‘अभी पता चल जाएगा.’’ पवन ने जवाब में कहा.

अशोक गुप्ता कुछ समझ पाते, उस के पहले ही पवन ने कार को किनारे कर के रोक दी. कार के रुकते ही पहले से ही मोटरसाइकिल से पीछा कर रहे सनेश और उस के साथियों ने कार को घेर लिया. इस के बाद सनेश और उस के अन्य साथी कार में दाखिल हो कर अशोक गुप्ता पर तमंचे तान दिए. अचानक घटी इस घटना से अशोक गुप्ता घबरा गए.

सनेश और उस के साथी राबिन ने अशोक को कब्जे में कर लिया. पवन ने कार बढ़ा दी तो बाकी 2 साथी मोटरसाइकिल से उन के पीछेपीछे चल पड़े. अशोक गुप्ता ने चीखने की कोशिश की तो उन्होंने उन के साथ मारपीट कर के और उन्हें जान से मारने की धमकी दे कर चुप करा दिया. इस में उन की स्वेटर भी फट गई.

कार पवन ही चला रहा था. योजना के मुताबिक वे उन्हें जंगल में ले गए और ईंख के खेत में बंधक बना लिया. इस के बाद पवन ने घर जा कर अपहरण की मनगढ़ंत कहानी सुना दी, जबकि सनेश आवाज बदल कर विपुल को फोन करता रहा. वे अपनी योजना में सफल भी हो जाते, लेकिन बुरे कामों का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता. विपुल ने आवाज पहचान ली, जिस से अपहर्त्ताओं की पोल खुल गई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने सनेश, पवन और राबिन को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी बचे उन के साथियों ललित और विपिन की पुलिस तलाश कर रही थी. सनेश ने अपने बेलगाम सपनों को काबू में रखा होता तो ऐसी नौबत कभी न आती.    

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

आइये मिलें भोजपुरी फिल्मों की सनी लियोनी से

सनी लियोनी की तरह दिखने वाली भोजपुरी एक्ट्रेस पल्लवी सिंह ने उनके ऑनर में न सिर्फ अपना नाम बदलकर सनी रख लिया, बल्कि उनकी हर एक अदा को भी कॉपी करती हैं. भोजपुरी फिल्मों में पल्लवी उर्फ सनी की पॉपुलैरिटी का आलम ये है कि अब लोग उन्हें उनके रियल नाम नहीं बल्कि सनी सिंह कहकर ही बुलाते हैं. बता दें कि पल्लवी ने हाल ही में फ्रेंड्स के साथ अपना बर्थडे सेलिब्रेट किया था.

भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली एक्ट्रेस पल्लवी सिंह को उनके फ्रेंड हमेशा ही कहते थे कि उनका फेस काफी हद तक सनी लियोनी से मिलता-जुलता है. इतना ही नहीं पल्लवी का फिगर भी सनी लियोनी जैसा ही है. सनी के मुताबिक, जब मैंने फिल्मों में काम करने का फैसला किया तो मेरे पेरेंट्स बोले- फिल्म में काम करने की जगह कोई नौकरी कर लो. हालांकि मेरी जिद के बाद दोनों झुक गए और बोले ठीक है काम करो, लेकिन जरा संभलकर रहना.

पल्लवी के मुताबिक, 2012 में उन्होंने पहली बार सनी लियोनी को टीवी पर देखा तो हैरान रह गईं कि सनी का चेहरा तो हू-ब-हू उनसे मिलता है. इसके बाद पल्लवी सनी लियोनी को रोल मॉडल मानने लगीं.

पल्लवी उर्फ सनी सिंह ने भोजपुरी फिल्म 'लेके आजा बैंड बाजा ए पवन राजा' में एक्टर पवन सिंह की साली का रोल प्ले किया था. फिल्म में उन्होंने अपने भाई यानी हीरो और हीरोइन को करीब लाने का काम किया था. फिल्म 'भोजपुरिया राजा' में पल्ल्वी को सेकेंड लीड रोल मिला.

पल्लवी का मानना है कि, स्टोरी के मुताबिक फिल्मों में आइटम डांस भी करना पड़ता है. इसके लिए कहानी की डिमांड के मुताबिक वो काम करती हैं. बता दें कि पल्लवी फिल्म 'विधायक जी' और उड़िया फिल्म 'टाइगर' में भी आइटम डांस कर चुकी हैं.

सनी उर्फ पल्लवी के मुताबिक, वो फिल्मों में काम करने के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रही हैं. फिलहाल वो बीकॉम फाइनल ईयर में हैं. पढ़ाई के दौरान ही फ्रेंड्स कहते थे कि लुक अच्छा है तुम्हें फिल्मों में कोशिश करनी चाहिए. इसके बाद मैंने ट्राय किया तो काम मिल गया और इस तरह मैं फिल्मों में आ गई.

पल्लवी सिंह कुछ पर्सनल कारणों के चलते करीब 1 साल तक फिल्मों से दूर रहीं. हालांकि बाद में उन्होंने वापसी की. पल्लवी सिंह जल्द ही 'बाली उमरिया में हो गई प्यार' और 'तीन बुड़बक' जैसी फिल्मों में नजर आएंगी.

बॉलीवुड सितारों की सेक्स लाइफ की कहानी, उन्हीं की जुबानी

बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ की लाइफ में जानने के लिए उनके फैंस हमेशा बेसब्र रहते हैं, लेकिन हमारी तरह उनकी भी पर्सनल लाइफ है जिसे वो सबके सामने जाहिर नहीं करना चाहते. खास तौर पर अपनी सेक्स लाइफ को लेकर सेलिब्रिटीज़ कभी बात नहीं करते. लेकिन हाल ही अक्षय कुमार की वाइफ ट्विंकल खन्ना ने अपनी सेक्स लाइफ के बारे में खुलकर बात की. ट्विंकल की तरह और भी ऐसे सेलिब्रिटीज़ हैं जिन्होंने जाने-अनजाने अपनी सेक्स लाइफ के बारे में कई खुलासे किए हैं.

हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में ट्विंकल खन्ना ने उनके और अक्षय कुमार के सेक्शुअल रिलेशनशिप से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे किए. पिछले 16 सालों से अक्की के साथ मैरिड लाइफ एन्जॉय कर रहीं ट्विंकल ने बताया, "सेक्स हर उम्र में जरूरी होता है. अक्षय की जो चीजें मुझे अट्रैक्ट करती थीं, वह समय के साथ बदल गई हैं."

हाल ही में एक बच्ची के पिता बने शाहिद कपूर ने अपनी सेक्स लाइफ के बारे में कहा था कि वो एक्टिंग छोड़ सकते हैं लेकिन सेक्स करना नहीं.

इन दिनों सुर्खियों से दूर नरगिस फखरी ने कहा, रिलेशनशिप में सेक्स बहुत जरूरी है, अगर आपको इसकी कमी महसूस हो रही है तो ऐसे रिलेशनशिप को खत्म कर देना चाहिए.

बॉलीवुड के 'बाजीराव' यानि रणवीर सिंह का कहना है कि वो अपने पर्स में हमेशा कंडोम रखकर चलते हैं, क्या पता कब जरूरत पड़ जाए.

बॉलीवुड की' बेगम जान' यानि विद्या बालन का कहना है कि महिलाओं को भी सेक्स की उतनी ही जरूरत होती है जितनी आदमियों को होती है.

बॉलीवुड से ज्यादा हॉलीवुड में नज़र आने वाली प्रियंका चोपड़ा का कहना है कि उन्हें मर्दों में और सेक्स में कोई इंटरेस्ट नहीं है. अगर अपनी जिंदगी में कभी उन्हें किसी मर्द की जरूरत पड़ेगी तो वो सिर्फ एक बच्चा पैदा करने के लिए होगी.

बॉलीवुड की 'मस्तानी' दीपिका पादुकोण का कहना है कि उनके लिए सिर्फ फीजिकल होना सेक्स नहीं है, बल्कि इसमें इमोशन्स जुड़े होने चाहिए.

अर्जुन कपूर का कहना है कि जिंदगी में प्यार भले न हो लेकिन सेक्स होना जरूरी है.

बॉलीवुड के 'दबंग' सलमान खान का तो सेक्स से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है. सलमान का कहना है कि वो वर्जिन हैं और उन्होंने अपनी वर्जिनिटी अपनी होने वाली वाइफ के लिए बचा रखी है.

स्वरा भास्कर का कहना है कि सेक्स बहुत नॉर्मल चीज़ हैं बशर्ते इसे हम उसके साथ करें जिससे हम प्यार करते हों.

आलिया भट्ट ने तो अपनी फेवरेट सेक्स पोजिशन के बारे में भी हता दिया. The Classic Missionary उनकी फेवरेट सेक्स पोजिशन है.

सोनम कपूर का कहना है कि वो कैजुअसल सेक्स में भरोसा नहीं करतीं.

पड़ने वाली है महंगाई की मार

बजट 2017-18 में किए गए वादों के मुताबिक 1 अप्रैल से आप पर महंगाई की मार पड़ने वाली है. महंगी होने वाली चीजों में आपकी जरूरत की चीजों से लेकर आपके शौक की चीजें भी शामिल है. 1 अप्रैल से पान-मसाला, सिगरेट, चांदी के सामान, हार्डवेयर, सिल्वर फोएल, चांदी के आभूषण, स्टील का सामान और स्मार्ट फोन शामिल है.

बढेंगे दाम तो पूरे कैसे होंगे शौक?

– तंबाकू युक्त पान-मसाला और गुटखा पर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया गया है. इस पर पहले 10 प्रतिशत उत्पाद शुल्क लगता था, जो अब बढ़कर 12 प्रतिशत हो गया है. पान मसाला और तंबाकू का शौक रखने वाले लोगों पर इसकी मार पड़ेगी.

– स्वास्थय के लिए हानिकारक सिगरेट अब आपकी जेब के लिए हानिकारक होने वाला है. सिगरेट पर अब तक 215 रुपए प्रति 1000 का उत्पाद शुल्क लगता है. 1 अप्रैल से यह बढ़कर 311 रुपए होने वाला है.  

– इंश्यरेंस भी होगा महंगा : पान मसाला, सिगरेट के अलावा 1 अप्रैल से हेल्थ बीमा और गाड़ी का बीमा भी महंगा होने वाला है.

– स्मार्टफोन भी होगा महंगा : डिजिटल इंडिया पर जोर देने वाली सरकार स्मार्टफोन भी महंगे करने वाली है. स्मार्टफोन बनाने के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले प्रिंटिड सर्किट बोर्ड पर सीमा शुल्क लगा दिया गया है. इससे स्मार्टफोन महंगे हो जाएंगे.

– एलईडी ब्लब : एलईडी बल्ब बनाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली चीजों पर भी मूल सीमा शुल्क के अलावा 6 प्रतिशत प्रतिपूर्ति शुल्क लगेगा. इससे एलईडी बल्ब महंगे भी हो जाएंगे.

– एल्यूमीनियम :  एल्युमीनियम पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया गया है. तो एल्यूमीनियम से बनने वाली हर चीज महंगी हो जाएगी.

सरकार ने दी है राहत

अगर महंगाई की मार मिलने वाली है तो सस्ती चीजों का मलहम भी दिया जाएगा. 1 अप्रैल से कुछ चीजें सस्ती भी होने वाली है. लैदर के सामान, नैचुरल गैस, निकल, बायोगैस, नायलॉन, रेल टिकट पर लगने वाला अतिरिक्त शुल्क, आरओ, प्वाइंट ऑफ सेल मशीन, पार्सल आदि चीजें सस्ती भी हो जाएंगी. 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें