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फिटनेस के लिए पेश हैं किफायती ऐप

आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में सेहत को लेकर लोग काफी परेशान हैं. सेहत पर ध्यान देने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप सेहत पर ध्यान ही ना दें. कुछ फिटनेस ऐप जो फिट रहने में आपकी मदद करेंगे.

Obino- यह एक रियल टाइम हेल्थ कोचिंग ऐप है. ओबिनो को अगर पर्सनल डॉक्टर कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा. इस ऐप के जरिए आप अपने खाने की आदतों, खाने की चीजों और अपने बदलते लाइफस्टाइल पर नजर रख सकते हैं. यह ऐप आपकी सेहत के हिसाब से खाने का सुझाव और योग की ट्रेनिंग भी देता है.

Pedometer- यह आपके पैरों को पूरे दिन ट्रैक करेगा और बताएगा कि आप दिन भर कितनी दूरी चले हैं और इसमें आपकी कितनी कैलोरी खत्म हुई है. साथ ही वजन कम करने में भी मदद करेगा.

Noisli- यह ऐप आपको बारिश, बहते पानी जैसी आवाज को आपको सुनाएगा. इन आवाजों से आपको काम में ध्यान लगाने और रिलैक्स होने में मदद मिलेगी. इस ऐप में आप ऑफलाइन भी आवाज सुन सकते हैं.

Poccare- यह ऐप बहुत ही काम का है. यह आपको ना सिर्फ बिना परेशानी के डॉक्टरों से अप्वाइंटमेंट दिलाएगा बल्कि आप डॉक्टरों से वीडियो कॉलिंग करके सलाह भी ले सकते हैं. इस ऐप के जरिए आप दवा खाने की रिमाइंडर भी लगा सकते हैं. इसमें टेस्ट के रिकॉर्ड भी सेव करके रखे जा सकते हैं.

Sleep Cycle- स्लिप साइकिल ऐप के जरिए आप अपने सोने की आदतों को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकते हैं. इस ऐप में आप सोने और उठने का समय फिक्स कर सकते हैं. यह ऐप आपको सोने और उठने का सही वक्त भी बताता है.

अगर आप भी हैं फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के शौकीन

वैसे देखा जाए तो आजकल फोटोग्राफी करने का शौक तो सभी को ही होता है और इस काम में एक अच्छा स्मार्टफोन आपकी मदद कर सकता है.

उपयोगकर्ता की जरुरत को ध्यान में रखते हुए स्मार्टफोन निर्माता कंपनियां भी अब ऐसे ही फोन्स लॉन्च कर रही हैं, जिसमें शानदार कैमरा पहले से ही लगा हो. इन दिनों स्मार्टफोन्स बेहतर कैमरा क्वालिटी के साथ आते हैं, जिनसे आप बेहतर फोटो और वीडियो शूट कर सकते हैं और साथ ही इनमें फोन्स में एडिटिंग टूल्स भी काफी अच्छे और एडवांस होते हैं.

कई बार ऐसा होता है कि आप बेहतर वीडियोज लेने के चक्कर में लंबे-लंबे शॉट्स ले लेते हैं. ऐसा इसलिए भी कि आप सोचते हैं कि कहीं आपसे कोई परफेक्ट शॉट मिस न हो जाए. ऐसे में लाजमी है कि कई बार आपके वीडियो का साइज भी बड़ा हो जाता है और वीडियो बेहद बोरिंग भी हो जाता है.

हम आपको बता दें कि अब आप अपने एंड्रायड स्मार्टफोन्स से लिए गए वीडियोज को, फोन में ही एडिट कर सकते हैं. ऐसा करने से आप परफेक्ट शॉट के अलावा बाकि पार्ट्स को डिलीट यानि कि ट्रिम कर सकते हैं..

एंड्रॉयड फोन में वीडियो एडिट करने के लिए ये हैं वो आसान से स्टेप्स…

1. इसके लिए सबसे पहले स्मार्टफोन में वीडियो (जिसे आप शॉर्ट या एडिट करना चाहते हैं) को ओपन करें. इसके बाद वीडियो के नीचे बने पेंसिल के आइकन पर क्लिक करें.

2. इसके बाद आपको, स्क्रीन पर एक टाइमलाइन दिखाई देगी. यह वीडियो टाइमलाइन है. यहां आपको वीडियो का हर फ्रेम दिखाई देगा.

3. अब इस वीडियो के एज को एक ओर से ड्रैग करें और जितना हिस्सा आपको ट्रिम करना या हटाना है, उस पर टैप करें. आप यहां, जहां से और जहां तक वीडियो आपको लेनी है, उसे सेलेक्ट कर सकते हैं.

4. ट्रिम करने के बाद, ऊपर दिए गए सेव के ऑप्शन पर टैप करें. अब आपकी वीडियो सेव हो जाएगी.

इसके अलावा भी यहां आपको फिल्टर करने के लिए कई इफेक्ट्स भी दिए होते हैं. आप इनका इस्तेमाल करके अपने वीडियो को और भी रोचक बना सकते हैं.

बलात्कारी बहादुर नहीं

हाल ही में दिल्ली पुलिस की वार्षिक रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा हुआ है, जिस के अनुसार हर घंटे एक महिला अपराध का शिकार हो रही है. चाहे वह दुष्कर्म की घटना हो या फिर छेड़छाड़ का मामला. साथ ही यह भी खुलासा किया गया है कि महिलाओं से दुष्कर्म की करीब 97त्न घटनाओं में उन के जानकारों का ही हाथ होता है. वहीं ऐसी वारदातों में 3त्न अपरिचित आरोपी निकले. हकीकत यह है कि दुष्कर्म या बलात्कार के ज्यादातर मामले लोकलाज के भय से या तो दबा दिए जाते हैं या उन की रिपोर्ट दर्ज नहीं होती, लेकिन दुष्कर्म के बाद जो मानसिक पीड़ा या त्रासदी महिला को झेलनी पड़ती है वह अकल्पनीय है.

सब से बड़ा सवाल यह है कि एक बलात्कारी किन मानसिक परिस्थितियों में इस तरह के कुकृत्य को अंजाम देता है? क्या वह उस के बाद होने वाले परिणामों को भूल जाता है या फिर उन के बारे में सोचता ही नहीं. दुष्कर्म या बलात्कार सब से घृणास्पद कुकृत्यों में शामिल है. ऐसे कुकृत्यों को अंजाम देने के बाद कोई बहादुर नहीं बन जाता या फिर समाज उसे कोई बड़ा तमगा नहीं दे देता. इस के उलट सचाईर् सामने आने पर वह घृणा या दुराव का ही शिकार होता है. उस की सोशल आईडैंटिटी खतरे में पड़ जाती है और उसे सजा के साथसाथ रिजैक्शन भी भोगना पड़ता है. हद तो तब होती है जब ये दुष्कर्मी सरेआम सीना ठोक कर ऐसे घूमते हैं मानो उन्होंने कोई बड़ा तीर मारा हो. देश के सुदूर ग्रामीण आदिवासी इलाकों में उच्चजाति के लोगों द्वारा दलित आदिवासी महिलाओं की अस्मत लूटने और उन्हें जिंदा जलाए जाने की खबरें सुर्खियां बनती रहती हैं पर पीड़ाजनक स्थिति तब होती है जब ऐसे लोग अपने कुकृत्यों का सरेआम ढिंढोरा पीटते हैं. पुलिस और कानून को धताबता कर ये अपनी जांबाजी में एक तमगा और जोड़ लेते हैं, पर यह विडंबना है कि हम आंख मूंदे इन बलात्कारियों का साथ देते हैं.

दुष्कर्मियों का कोई नैतिक बल नहीं होता. न ही कोई चारित्रिक संबल. असंतुलित भावनाओं के उन्माद में वे दुष्कर्म के दलदल में जा गिरते हैं पर एक सच यह भी है कि इस क्षणिक ज्वार के ठंडा पड़ते ही वे अपने पुराने स्वरूप में लौट आते हैं और ताउम्र पश्चात्ताप व ग्लानि की पीड़ा में अपनी बची जिंदगी गुजार देते हैं. इस की सब से बड़ी बानगी दिल्ली में घटा निर्भया कांड है. बलात्कारियों ने क्षणिक आवेश में वह कर डाला जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. इस के बदले उन आरोपियों को मिला क्या? केवल सामाजिक बहिष्कार, अलगाव, घृणा और सजा. सामाजिक बहिष्कार इन आरोपियों पर इस कदर हावी हुआ कि उन में से एक ने तो खुदखुशी कर ली. बाकी या तो सजा भुगत रहे हैं या अदालती ट्रायल के चक्कर काटते हुए भारी मानसिक तनाव व कुंठा से गुजर रहे हैं. अपराध छोटा हो या बड़ा उसे कभी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती. दुष्कर्मियों के लिए तो समाज में कोई स्थान है ही नहीं. अपराध हमेशा कुंठा, पीड़ा व सजा ही दिलवाता है, सम्मान नहीं.

हमें चाहिए कि इन दुराचारियों को किसी भी स्तर पर बिलकुल न सराहें और न सहें. इन्हें बढ़ावा तभी मिलता है जब हम मौन साध लेते हैं. हमारी दहाड़ इन के हौसले पस्त करेगी. सामाजिक और पारिवारिक बहिष्कार से ये अलगथलग पडे़ंगे और इन का वहशीपन कमजोर पड़ेगा.ऐसे प्रयास सिर्फ अपराधियों की तरफ से ही नहीं करने होंगे बल्कि हमें महिलाओं का पक्ष भी मजबूत करना होगा. दुष्कर्म की शिकार पीडि़ताओं के लिए स्वाभिमान कार्यक्रम चलाने होंगे. उन के भीतर के ग्लानि और कुंठा के भाव को स्नेह व प्रेम से निकाल ना होगा. उन्हें समाज व परिवार में दोबारा उचित स्थान दिलाने के लिए उन का मनोबल बढ़ाना होगा. तभी हम इन बलात्कारियों को मजबूत इरादों वाली महिलाओं से टक्कर दे सकेंगे. बलात्कारियों का बहिष्कार और पीडि़ताओं की सम्मानजनक वापसी उन के होश ठिकाने लगाने का सब से बड़ा मूलमंत्र है.

इसरो नासा से कम नहीं

रूस और अमेरिका जैसी महाशक्तियों ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उन्हें तकनीक के मामले में भारतचीन जैसे पूरब के देशों से तगड़ी चुनौती मिलेगी. चुनौती भी ऐसी कि वे इस संबंध में अपने भविष्य के बारे में सोचने को मजबूर हो जाएं. इधर, जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 15 फरवरी, 2017 को अपने प्रक्षेपणयान पीएसएलवी-सी37 से भारतीय कार्टोसैट-2 सीरीज के उपग्रह के अलावा स्वयं के 2 अन्य, अमेरिका के 96, इजरायल, कजाखस्तान, नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात का एकएक यानी कुल मिला कर 104 नैनोसैटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़े, तो यह खुद उस के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के संदर्भ में भी एक नया रिकौर्ड था. एक मुख्य, 2 छोटे और 101 नन्हे (नैनो) सैटेलाइटों की यह एक किस्म की बरात थी, जिस से जलने वालों की दुनिया में कमी नहीं है. निश्चय ही इसरो की सफलता देश का सिर गर्व से ऊंचा करती है पर यह मामला अब बाजार का ज्यादा है, जिस में सेंध नहीं लगने देने का इंतजाम अगर हम ने कर लिया, तो जमीन पर रोजगार से ले कर शोध के आसमान तक हमारा वर्चस्व कायम होने में देर नहीं लगेगी.

चीन, रूस व अमेरिका को  चुनौती

एक वक्त था, जब हमारे देश को अपने उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए सोबियत रौकेटों और निजी कंपनी ‘आर्यनस्पेस’ पर निर्भर रहना पड़ता था. इनसैट श्रेणी के उपग्रह भारत ने इसी तरह भारी खर्च कर के प्रक्षेपित किए हैं और इस में लाखों डौलर की रकम खर्च की है, पर आज यह नजारा पूरी तरह बदल गया है, आज इसरो खुद दुनिया भर (करीब 21 देशों) के उपग्रह अपने सब से भरोसेमंद रौकेटों से अंतरिक्ष में भेज रहा है और सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आर्यनस्पेस अब इसरो की व्यापारिक सहयोगी कंपनी बन गई है.

इसरो को मिली इस शानदार उपलब्धि के पीछे 2 अहम कारण हैं. पहला यह कि सैटेलाइट लौंचिंग के लिए इसरो अपने स्पेस मिशन दुनिया में सब से कम लागत में पूरे कर रहा है. इस का एक बड़ा उदाहरण वर्ष 2014 में तब मिला था, जब भारत का मार्स मिशन मंगल तक पहुंचा था. इस पर इसरो ने सिर्फ 73 अरब डौलर खर्च किए थे, जबकि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के मार्स मिशन में 671 अरब डौलर का खर्च आया था. दूसरी महत्त्वपूर्ण बात स्पेस अभियानों में इसरो की सफलता की दर है. अमेरिका, रूस और यहां तक कि चीन की स्पेस एजेंसियों द्वारा प्रक्षेपित अंतरिक्ष अभियानों की असफलताएं कहीं ज्यादा हैं. सफलता की दर और अभियान की कीमत आज के अंतरिक्ष बाजार में ये 2 महत्त्वपूर्ण कारण बन गए हैं जिस में इसरो कामयाबी के बल पर अपनी साख बनाता जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि पड़ोसी देश चीन भी भारत की तुलना में अपने स्पेस मिशनों पर ढाईगुना ज्यादा पैसा खर्च कर रहा है, हालांकि सैटेलाइट्स की लौंचिंग के मामले में उस की क्षमता भी भारत से चारगुना ज्यादा है. इस के बावजूद इसरो चीन के साथसाथ रूस और अमेरिका की स्पेस एजेंसियों के लिए चुनौती बन गया है. अमेरिका के लिए इसरो कैसे चुनौती बना है, इस की मिसाल इस से मिलती है कि पीएसएलवी-सी37 द्वारा इस बार जो 101 विदेशी नैनो सैटेलाइट सफलता से छोड़े गए, उन में से 96 अमेरिका के हैं. इन में भी 88 सैटेलाइट एक ही अमेरिकी कंपनी ‘प्लेनेट लैब’ के हैं. यह कंपनी धरती की छवियां लेने और उन्हें वर्गीकृत कर के बेचने का काम करती है. जाहिर है कि उस के पास अमेरिकी कंपनियों समेत कई विकल्प रहे होंगे, लेकिन मुनाफे के लिए व्यवसाय कर रही एक कंपनी ने इसरो पर भरोसा किया, यही इसरो की काबिलीयत दर्शाता है.

घबराई विदेशी एजेंसियां    

सचाई यह है कि इसरो की सफलता से अब अमेरिकी और ब्रिटिश स्पेस कंपनियां घबराने लगी हैं. अमेरिका के निजी अंतरिक्ष उद्योग के कारोबारियों और अधिकारियों ने पिछले साल इसरो के कम लागत वाले प्रक्षेपणयानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने की बात एक सार्वजनिक चिंता के रूप में सामने रखी थी और कहा था कि इस से अमेरिकी अंतरिक्ष कंपनियों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है. यह चिंता जताने वालों के मुखिया ‘स्पेस फाउंडेशन’ के सीईओ इलियट होलोकाउई पुलहम ने कहा था कि असली मुद्दा बाजार का है. उन का कहना था कि जिस तरह भारत सरकार इसरो के प्रक्षेपणयानों के लिए सब्सिडी देती है, वह इतनी नहीं होनी चाहिए कि उस से इस स्पेस बाजार में मौजूद अन्य कंपनियों के वजूद पर ही खतरा मंडराने लगे.

अमेरिका की तरह भारत के महत्त्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रमों से कई ब्रिटिश सांसद भी नाराज बताए जाते हैं. इस संबंध में ब्रिटिश मीडिया में छपी खबरों में कहा गया है कि भारत को ब्रिटेन की ओर से अरबों रुपए की सहायता राशि मिलती है, जिस का उपयोग इसरो लंबी दूरी की मिसाइलों और स्पेस कार्यक्रमों में करता है. ये बातें स्पष्ट करती हैं कि इसरो की सफलता अमेरिकाब्रिटेन जैसे देशों के पेट में मरोड़ पैदा कर रही है.

बढ़ रही कमाई

इसरो के अंतरिक्ष अभियानों की भारत में ही यह कहते हुए पहले काफी आलोचना हुई है कि उसे चंद्रमा या मंगल जैसे मिशन चलाने से पहले देश की गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी का इलाज करना चाहिए. आलोचना का आधार यह होता था कि चूंकि इन अभियानों में देश के करदाताओं से ली गई भारी रकम खर्च होती है जो असल में देश के विकास कार्यक्रमों में लगनी चाहिए थी, पर इसरो ने अपने स्पेस मिशनों से साबित किया है कि वह अब खुद कमाई करने वाला संगठन बन गया है. हाल के आंकड़ों के अनुसार, इसरो की व्यापारिक इकाई ‘एंट्रिक्स कौरपोरेशन’ का विदेश व्यापार इस वित्त वर्ष (2015-2016) में 204.9त्न बड़ा है. एशियन साइंटिस्ट मैगजीन में पिछले साल प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार पिछले 3-4 वर्ष में ही विदेशी उपग्रहों को पीएसएलवी से प्रक्षेपित कर के इसरो ने 54 लाख डौलर की कमाई की है. हाल के 104 सैटेलाइट्स की लौंचिंग से मिले पैसों से इस कमाई में और इजाफा हुआ है, क्योंकि माना जा रहा है कि सिर्फ इसी अभियान से इसरो को 100 करोड़ रुपए विदेशी एजेंसियों से मिले हैं. हालांकि इस आंकड़े की पुष्टि इसरो ने नहीं की है.

इसरो या इस की सहयोगी संस्था एंट्रिक्स द्वारा विदेशी उपग्रहों की लौंचिंग की कीमत का सरकार ने भी कभी खुलासा नहीं किया, लेकिन माना जाता है कि यह शुल्क विदेशी स्पेस एजेंसियों के मुकाबले 60त्न तक कम होता है. अनुमान है कि नासा एक उपग्रह को लौंच करने के लिए अमूमन 25 हजार डौलर प्रति किलोग्राम के हिसाब से शुल्क लेता रहा है. कम शुल्क लेने के बावजूद पीएसएलवी से अब तक स्पेस में भेजे गए देशीविदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण के जरिए एंट्रिक्स कौरपोरेशन कंपनी लिमिटेड एक लाभदायक प्रतिष्ठान में बदल चुका है. अनुमान है कि विदेशी सैटेलाइट लौंच कर के एंट्रिक्स कौरपोरेशन 750 करोड़ रुपए से ज्यादा की विदेशी मुद्रा कमा चुका है. उल्लेखनीय है कि आज दुनिया में पीएसएलवी को टक्कर देने वाला दूसरा रौकेट (वेगा) सिर्फ यूरोपीय स्पेस एजेंसी के पास है, लेकिन उस से उपग्रहों की लौंचिंग की कीमत इसरो के मुकाबले कई गुना अधिक है. प्रतिस्पर्धी कीमत पर सैटेलाइट का सफल प्रक्षेपण ही वह कारण है कि पीएसएलवी दुनिया के पसंदीदा रौकेटों में बदल गया है और आज ज्यादा से ज्यादा देश अपने सैटेलाइट इसरो की मदद से स्पेस में भेजने के इच्छुक हैं.

यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि अब पूरी दुनिया में मौसम की भविष्यवाणी, दूरसंचार और टैलीविजन प्रसारण का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है और चूंकि ये सारी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं, लिहाजा ऐसे संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है.

दखल की शुरुआत

जहां तक भारतीय रौकेटों से विदेशी उपग्रहों की लौंचिंग का प्रश्न है, तो इस की शुरुआत डेढ़ दशक पहले 26 मई, 1999 को पीएसएलवी-सी2 से भारतीय उपग्रह ओशन सैट2 के साथ कोरियाई उपग्रह किट सैट3 और जरमनी के उपग्रह टब सैट को सफलतापूर्वक उन की कक्षा में स्थापित करने के साथ हुई थी, पर इस उड़ान में चूंकि एक भारतीय उपग्रह भी शामिल था, इसलिए इसे इसरो की पहली कामयाब व्यावसायिक उड़ान नहीं माना जाता. इस के बजाय पीएसएलवी-सी10 के 21 जनवरी, 2008 के प्रक्षेपण को इस मानक पर सफल करार दिया जाता है, क्योंकि उस से भेजा गया एकमात्र सैटेलाइट (इजरायल का पोलरिस) विदेशी था.

लव के लिए कुछ भी करेगा

न जाने क्यों लड़कियां हमेशा से मेरी बड़ी कमजोरी रही हैं. ऐसा नहीं है कि मैं ऐश्वर्या राय, माधुरी दीक्षित या करीना कपूर जैसी परियों की बात कर रहा हूं, मेरे दिल की धड़कनें तो बरतन मांजने वाली धन्नो भी तेज कर दिया करती थी. लेकिन मेरी बीवी ने फौरन उसे हटा दिया. बात तब की है, जब मैं जोरू का गुलाम नहीं बना था. मुझे मनचले लड़कों का गुरु ही समझ लीजिए. लड़कियों को अपनी ओर घुमाने में मुझे महारत हासिल थी. चाहे वे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए घूमें या फिर गाली देने के इरादे से, आखिर घूमती तो थीं.

हालात आज भी कुछ वैसे ही चल रहे हैं. लड़कियों को भी यह अच्छी तरह मालूम है कि वे मेरी कमजोरी हैं.

‘‘लड्डू, मेरे दीवाने…’’

‘‘ओह, मधु तुम…’’

मेरी तो बांछें खिल गईं. आज तक किसी लड़की ने मुझे इतने प्यार से नहीं पुकारा था. शादी जरूर हो गई थी, मगर आज तक लव करने की लालसा मन में ही मचल रही थी.

‘‘ओह लड्डू… क्या तुम मेरा एक काम करोगे?’’

‘‘हांहां, तुम्हारे लिए तो मैं सूली पर चढ़ सकता हूं, जान दे सकता हूं, आसमान से तारे तोड़ कर तेरे कदमों में डाल सकता हूं, सारी दुनिया से लड़…’’

‘‘बसबस, मैं समझ गई. तुम बस बातें ही बनाओगे, काम नहीं करोगे,’’ उस ने रूठने का नाटक किया.

‘‘तुम्हारे लिए तो मैं जमीनआसमान एक कर सकता हूं मधु…’’ मैं ने उसी अंदाज में बोला.

‘‘मुझे स्टेशन जाना है. वहां पहुंचाने के लिए कोई भी 20-30 रुपए मांग ही लेगा. करीब 30-40 किलो की पोटली जो है. क्या तुम मेरी मदद करोगे? यहां से स्टेशन केवल 3 किलोमीटर ही तो है.’’

मेरे तो होश ही उड़ गए. 30-40 किलो वजन और 3 किलोमीटर की दूरी.

मैं ने मधु से कहा, ‘‘मैं दुबलापतला आदमी, भला इतनी दूर कैसे इतना वजन ले जा सकता हूं?’’

‘‘तुम मर्द के नाम पर कलंक हो. देखा नहीं था कि ‘गदर…’ फिल्म में कैसे सनी देओल अपनी हीरोइन के लिए पूरे पाकिस्तान से लड़ गया था. जाओ, तुम मेरे प्यार के काबिल नहीं,’’ मधु ने ताना देते हुए कहा.

‘‘मधु, मेरे कहने का यह मतलब नहीं था. मैं तो वाकई तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं,’’ मैं ने दीवानगी जताते हुए कहा.

‘‘ऐ मिस्टर…’’ तभी मधु ने टोका, ‘‘ट्रेन छुड़वाने का विचार है क्या? मैं ने औरत होने के नाते कहा, वरना मैं खुद काफी थी.’’

मर्द वाली बात सुनते ही मेरी छाती गर्व से फूल गई और आननफानन पोटली मेरे सिर पर थी. मेरे बदन से पसीना टपकने लगा था. लग रहा था, जैसे मेरी जान बाहर ही निकलने वाली है और वह अपनी कमर को लचकाती हुई बेरहम की तरह आगेआगे चल रही थी.

‘लड्डू, दिक्कत हो रही हो, तो बोल दो. बाद में कुछ न कहना,’’ मधु ने हाथ मटका कर पूछा. मेरा तो सिर फटा जा रहा था. मन कर रहा था कि पोटली पटक दूं, मगर प्यार के लिए तो कुछ भी करना पड़ता है न. स्टेशन तक कैसे पहुंचा, यह तो मुझे ही पता है. स्टेशन पहुंचते ही मैं लड़खड़ा गया. एक पत्थर से टकरा जाने की वजह से मैं मुंह के बल जा गिरा. पोटली दूर छिटक गई और खनखन कर के कुछ टूटने की आवाज आई. मधु दहाड़ें मार कर रोने लगी.

‘‘मैं ने कहा था, दिक्कत है तो बोल दो… पर तुम ने कहा कि यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल है…’’ कहते हुए मधु का रोना जारी रहा.

तभी किसी ने मेरा कौलर पकड़ कर मुझे धरती से ऊपर उठा लिया. मेरे तो होश ही उड़ गए. वह बड़ीबड़ी मूंछों वाला सिपाही किसी शेर की तरह खा जाने वाली नजरों से मुझे घूरे जा रहा था.

‘‘क्यों बे, कितने का नुकसान किया है मैडम का?’’

‘‘साहब, मैं ने इस से पहले ही पूछ लिया था कि दम है तो चलो, मगर इस ने मेरा 4 सौ रुपए का सामान तोड़ दिया,’’ मधु ने रोतेरोते कहा.

सिपाही गरजा, ‘‘जल्दी से 4 सौ रुपए दो और मैडम से माफी मांगो.’’

भीड़ ने भी हां में हां मिलाई. मुझे काटो तो खून नहीं. बीवी ने जो पैसे सामान लाने के लिए दिए थे, वे मैं ने हालात को देखते हुए मधु को दे देने में ही भलाई समझी. मधु ने रोतेरोते रुपए अपने हवाले कर लिए और गाड़ी में चढ़ गई. फिर अचानक ही वह धीरे से मुसकराते हुए बोली, ‘‘तू अपना 30 रुपया भाड़ा तो लेता जा. जरा सौ रुपए के छुट्टे भी कर ला.’’ भीड़ खिलखिला कर हंस पड़ी और मैं शर्म से पानीपानी हो गया.

‘‘लाइसैंस है तुम्हारे पास?’’ तभी सिपाही गुर्राया.

मैं चौंका, ‘‘लाइसैंस… किस चीज का लाइसैंस?’’

‘‘स्टेशन पर कुली का काम करने का…’’

‘‘पर, मैं कुली नहीं हूं. मैं ने तो अपनेपन की खातिर मधु का सामान ला दिया था.’’

‘‘कुली न होने का कोई गवाह?’’

‘‘वह मधु से पूछ लीजिए.’’

‘‘मधु के बच्चे. वह अभी तुझे भाड़ा दे रही थी. चल, अभी मैं तेरे होश ठिकाने लगाता हूं,’’ सिपाही भड़क उठा.

गिड़गिड़ाने के अलावा मुझे कोई चारा नजर नहीं आया. ‘‘चल, 5 सौ रुपए दे दे, मैं तुझे छोड़ दूंगा,’’ सिपाही तरस खाते हुए बोला.

‘‘5 सौ रुपए, पर मेरे पास तो एक रुपया भी नहीं बचा.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ उस की नजर मेरी घड़ी पर थी, ‘‘समय नहीं है मेरे पास, पैसे नहीं हैं, तो अपनी घड़ी ला या फिर अंदर जाने की तैयारी कर.’’

‘‘नहीं, यह घड़ी तो ससुराल की है. मैं इसे नहीं दे सकता,’’ मुझे रोना आने लगा.

‘‘तो फिर चल, तुझे ससुराल की ही सैर करा देता हूं.’’

मैं भी अब अजीब मुसीबत में फंस गया था. ‘किस सौतन को अपनी घड़ी और रुपए दे आए?’ बीवी द्वारा पूछे जाने वाला यह सवाल मेरे दिमाग में घूमने लगा. ‘‘क्यों बे, तू ऐसे नहीं मानेगा,’’ सिपाही चिल्लाया. तभी उस सिपाही ने मुझे किसी चूहे की तरह दबोचा और दूसरे ही पल मेरी घड़ी उस की हो गई. मैं तड़प कर रह गया. घर पहुंचने पर मेरी बीवी ने क्या खातिरदारी की, यह मत पूछिए…  

पिता ही प्यार का दुश्मन

उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ की कोतवाली पट्टी का एक गांव है असुढ़ी. इसी गांव के रहने वाले भास्कर पांडेय का बेटा सौरभ प्रतापगढ़ शहर में रह कर बीकौम कर रहा था. वह जिस कालेज में पढ़ता था, उसी कालेज में गांव धनगढ़ सराय छिवलहां के रहने वाले राकेश कुमार सिंह की बेटी संजू सिंह भी बीएड कर रही थी.

सौरभ और संजू आसपास के गांवों के रहने वाले थे, इसलिए दोनों में जानपहचान हो गई. दोनों की यह जानपहचान जल्दी ही दोस्ती में बदली तो दोनों अकसर मिलनेजुलने लगे. लगातार मिलने से दोनों में प्यार हो गया. धीरेधीरे उन का प्यार बढ़ता गया. फिर तो यह हाल हो गया कि जब तक दोनों एकदूसरे को देख न लेते, बातचीत न कर लेते, उन्हें चैन न मिलता.

सौरभ और संजू का यह प्यार परवान चढ़ा तो उन्होंने साथसाथ जीनेमरने की कसमें ही नहीं खाईं, बल्कि निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो, लोग कितना भी विरोध करें, वे शादी जरूर करेंगे. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. इस की वजह यह थी कि दोनों की जाति अलगअलग थी.

सच है, प्यार न तो जाति देखता है और न ही धर्म. संजू और सौरभ के साथ भी यही हुआ था. उन के प्यार को जमाने की नजर न लगे, उन्हें किसी तरह जुदा न कर दिया जाए, यह सोच कर उन्होंने शादी करने का फैसला ही नहीं किया, बल्कि पड़ोसी जिला इलाहाबाद जा कर पानदरीबा स्थित आर्यसमाज मंदिर में वहां की रीतिरिवाज के अनुसार विवाह कर लिया. यह 1 जुलाई, 2016 की बात है.

विवाह करने के बाद संजू अपने घर आ गई थी. उस के विवाह की भनक घर के किसी भी आदमी को नहीं लग पाई थी. शादी के बाद सौरभ आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ चला गया. वहां वह पढ़ाई के साथसाथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहा था.

सौरभ के लखनऊ चले जाने के बाद संजू की उस से मोबाइल पर बातें जरूर हो रही थीं, लेकिन वह खुद को अकेली महसूस कर रही थी. उसे सौरभ की दूरी बहुत परेशान कर रही थी. संजू भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, इसलिए सौरभ ने आगे की पढ़ाई के लिए कानपुर में उस का एमएड में रजिस्ट्रेशन करा दिया.

कानपुर आने के बाद संजू सौरभ के साथ रहने की जिद करने लगी और 18 सितंबर, 2016 को वह लखनऊ आ गई. सौरभ लखनऊ के आशियाना में रहता था. संजू उसी के साथ उस के कमरे पर रहने लगी.

आगे चल कर कोई परेशानी न हो, इस के लिए 20 सितंबर, 2016 को सौरभ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में संजू के साथ कोर्टमैरिज कर ली. इस के बाद संजू के घर वालों को सौरभ के साथ उस की शादी का पता चल गया. चूंकि सौरभ उन की जाति का नहीं था, इसलिए पूरा परिवार आगबबूला हो उठा. बेटी द्वारा लिया गया यह निर्णय किसी को स्वीकार नहीं था. खास कर संजू के पिता राकेश कुमार सिंह को.

बेटी की इस हरकत से वह काफी नाराज थे. जबकि सौरभ के घर वाले बेटे के इस प्यार के बारे में जानते तो थे ही, उन्हें संजू बहू के रूप में स्वीकार भी थी. संजू के पिता राकेश सिंह जनता इंटर कालेज उड़ैयाडीह के प्रधानाचार्य थे. ऐसे में अपनी इज्जत को ले कर वह काफी परेशान थे. किसी भी कीमत पर वह इस शादी के लिए तैयार नहीं थे.

बेटी की इस हरकत से वह काफी तनाव में रहने लगे थे. वैसे भी वह काफी उग्र स्वभाव के थे. यही कारण था कि उन के घर के अन्य लोग संजू का प्रेम विवाह चाह कर भी स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे.

संजू के लखनऊ आने के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह रहते हुए अपनी आगे की पढ़ाई कर रहे थे और भविष्य के सपनों में खोए रहते थे. उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि एक ऐसा तूफान आने वाला है, जो उन की जिंदगी को झकझोर कर रख देगा.

सौरभ और संजू के दिन अच्छी तरह से कट रहे थे. लेकिन 10 अक्तूबर, 2016 को संजू के पिता राकेश कुमार सिंह अचानक सौरभ के कमरे पर आ धमके तो उन्हें देख कर पहले तो दोनों डरे, लेकिन जब उन्होंने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, उन्होंने उन्हें माफ कर दिया है तो दोनों को थोड़ी राहत मिली.

राकेश कुमार सिंह ने कहा, ‘‘बच्चो, तुम्हारी शादी से हमें कोई परेशानी नहीं है. जो होना था, वह हो गया है. अब हम चाहते हैं कि समाज के जो रीतिरिवाज हैं, उन का पालन किया जाए.’’

इस के बाद संजू और सौरभ को विश्वास में ले कर गांव में धूमधाम से दोनों की शादी की बात कह कर राकेश कुमार सिंह संजू को अपने साथ ले कर गांव लौट आए.

सौरभ भी खुश था कि चलो देर ही सही, उस के ससुरजी ने नाराजगी त्याग कर बेटी को और उसे अपना लिया है. लेकिन संजू के गांव जाने के बाद जब उस ने उस से बात करने की कोशिश की तो बात नहीं हो सकी. क्योंकि संजू को उस से बात नहीं करने दी जा रही थी.

संजू पर तमाम पाबंदियां लगा दी गई थीं. एक तरह से उसे बंधक बना लिया गया था. 10 अक्तूबर, से 31 अक्तूबर, 2016 तक जब संजू से बात न हो पाई तो सौरभ अपनी ससुराल जा पहुंचा. लेकिन संजू से मिलने की कौन कहे, उसे घर पर रुकने तक नहीं दिया गया. उसे दुत्कार कर भगा दिया गया.

ऐसा कई बार हुआ तो सौरभ ने पत्नी को पाने के लिए हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से गुहार लगाई. इस का नतीजा यह निकला कि 3 नवंबर, 2016 को हाईकोर्ट ने संजू को उसे सौंपने का आदेश तो दे दिया, साथ ही हाईकोर्ट में भी पेश करने को कहा. लेकिन निर्धारित तारीख पर संजू को हाईकोर्ट में पेश नहीं किया गया.

इस के बाद पट्टी कोतवाली पुलिस ने राकेश कुमार सिंह को संजू के साथ थाने बुलाया, जहां हुई पंचायत में संजू अपने पिता के साथ जाने को तैयार नहीं थी. वह बारबार अपने पति सौरभ के साथ जाने की बात कर रही थी. उस का कहना था कि उस ने सौरभ को ही अपना सब कुछ मान लिया है, अब वह मरेगी तो उसी के साथ और जिएगी भी तो उसी के साथ.

थाने में हुई पंचायत में संजू के फैसले एवं हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद राकेश कुमार सिंह पुलिस पर दबाव डलवा कर संजू को अपने साथ घर ले आए. जबकि सौरभ ने पुलिस को हाईकोर्ट का आदेश दिखाने के साथ कोर्टमैरिज का प्रमाणपत्र भी दिखाया था. लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी थी.

30 अक्तूबर को दीपावली का त्यौहार था, जिस की वजह से कुछ नहीं हो सका. अगले दिन 31 अक्तूबर को पट्टी कोतवाली में सौरभ ने अपनी पत्नी संजू की जान का खतरा बताते हुए उस के पिता राकेश कुमार सिंह समेत 3 लोगों के खिलाफ नामजद तहरीर देते हुए न्याय की गुहार लगाई.

इस के अलावा सौरभ एसपी माधवप्रसाद वर्मा से मिला और उन्हें भी तहरीर दे कर पत्नी की जान बचाने की गुहार लगाई. एसपी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल संजू को सौरभ के सुपुर्द कराने के निर्देश दिए, बल्कि सौरभ की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर काररवाई करने का भी आदेश दिया.

उन के आदेश का यह असर हुआ कि पट्टी कोतवाली पुलिस ने 2 नवंबर, 2016 को सौरभ की तहरीर पर राकेश कुमार सिंह, उस के छोटे भाई धीरेंद्र सिंह और छोटे बेटे शुभम के खिलाफ अपराध संख्या 376/2016 पर भादंवि की धारा 368 के तहत मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन तुरंत कोई काररवाई नहीं की.

2 नवंबर को गांव धनगढ़ के लोगों से पट्टी पुलिस को पता चला कि संजू की मौत हो गई है तो पुलिस के हाथपांव फूल गए. पुलिस तुरंत गांव पहुंची और आननफानन संजू की लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही अपहरण के मुकदमे में हत्या की धारा 302 जोड़ कर नामजद लोगों की तलाश शुरू कर दी.

3 नवंबर, 2016 की सुबह संजू के पिता राकेश कुमार सिंह को उड़ैयाडीह मोड़ से गिरफ्तार कर लिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि संजू की मौत जहर से हुई थी. थाने ला कर राकेश कुमार सिंह से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि संजू ने उन की इज्जत से खिलवाड़ किया था, जिस की सजा जहर दे कर उस की हत्या कर के दी गई.

पूछताछ के बाद पटटी कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर राजकिशोर ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस के बाद वह संजू के चाचा धीरेंद्र सिंह तथा भाई शुभम की तलाश में लगे थे. कथा लिखे जाने तक दोनों पकड़े नहीं जा सके थे.  

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अधूरा रह गया एमी का सपना

सलमान खान फिल्म इंडस्ट्री के मोस्ट एलिजिबल बैचलर हैं. खास बात यह कि 51 साल के इस हीरो की अब भी तमाम हीरोइनें और लड़कियां दीवानी हैं. आधा दर्जन लड़कियों से सलमान का चक्कर भी चला, पर कोई भी उन्हें इस तरह मन नहीं भाई कि उस से शादी की सोच सकें. अलबत्ता इस में कोई दो राय नहीं कि उन्होंने कई कलाकारों का कैरियर बना कर उन की किस्मत संवारी है. इन में कई विदेशी लड़कियां भी हैं.

बौलीवुड में काम करने के चक्कर में कई विदेशी लड़कियां सलमान के पास आती रहती हैं, कई बार उन से सलमान की दोस्ती भी हो जाती है. ऐसे में लोग सलमान के साथ उन का नाम जोड़ने लगते हैं. इस क्रम में पिछले दिनों सलमान के साथ यूलिया और एमी जैक्सन के नाम भी जुड़े. लेकिन हकीकत में सलमान न तो उन की तरफ आकर्षित थे और न ही उन का उन से कोई रिश्ता था.

एमी जैक्सन की बात करें तो ब्रिटेन के लिवरपूल शहर की रहने वाली एमी जैक्सन बौलीवुड में काम करने के लिए मुंबई आई थीं. सलमान खान के सहारे उन्हें उन के भाई सुहैल खान की फिल्म ‘फ्रीकी अली’ में काम मिल गया, जिस में वह नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अपोजिट थीं. इस साल एमी जैक्सन की अब तक की सब से महंगी भारतीय फिल्म ‘2.0’ होगी, जिस में रजनीकांत और अक्षय कुमार जैसे बड़े स्टार हैं. एमी को इस फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं.

एमी जब सुहैल की फिल्म ‘फ्रीकी अली’ में काम कर रही थीं, तब वह सलमान से मिलती रहती थीं. यह देख कर मीडिया ने एमी का नाम सलमान के साथ जोड़ना शुरू कर दिया था. जब इस बात को ले कर एमी और सलमान दोनों चुप रहे तो लोग तरहतरह के कयास लगाने लगे. लेकिन सलमान और एमी की लगातार चुप्पी ने आखिर इस पर विराम लगा दिया. पिछले दिनों जब एमी एक पार्टी में पहुंचीं तो कुछ मीडियाकर्मियों ने उन से सलमान के बारे में बात की. इस के जवाब में एमी ने कहा, ‘सलमान में ऐसा तो कोई जादू है जो हर कोई उन की तरफ खिंचा चला आता है. फिर भला मैं कैसे इस जादू से बच सकती थी. मैं बेशक सलमान के साथ ज्यादा वक्त नहीं बिता पाई, लेकिन जो भी वक्त गुजारा, खूब एंजौय किया. मुझे अगर एक बार फिर मौका मिले तो सलमान के साथ डेट पर जाना चाहूंगी.’

वैसे रियल लाइफ में एमी का नाम एक बार फिर उन के एक्स लवर बैक्सिंग चैंपियन जोसेफ सेल्किर्क के साथ जुड़ गया है. ज्ञातव्य हो, इन दोनों के रिश्ते में तब खटास आ गई थी, जब मीडिया में ऐसी खबरें आई थीं कि जोसेफ ने एक पार्टी में एमी के साथ मारपीट की है. इस के बाद दोनों के ब्रेकअप की खबरें आई थीं.

अब खबर है कि ब्रिटिश ब्यूटी एमी एक बार फिर जोसेफ के साथ नजर आ रही हैं. ऐसा लगता है कि सलमान के साथ डेट पर जाने का सपना पूरा न होने पर एमी पुरानी राह पर लौट गई हैं, अन्य कई भारतीय हीरोइनों की तरह.

लेक जेनेवा : बारबार देखो

जेनेवा झील का सम्मोहन मुझे बारबार वहां ले जाता रहा है. लंदन से स्विट्जरलैंड जाना वैसे भी अब पहले से बहुत आसान होता जा रहा है. इस बार जब मैं वहां पहुंची तो होटल की परिचारिका ने आर्द्र और धुंधले मौसम के लिए दुख प्रकट करते हुए मुझे कमरे की चाबी थमाई, तो मैं ने कहा कि मौसम की परवा नहीं. ऐसा कहना मेरी विनम्रता ही नहीं थी, बल्कि जेनेवा पहुंचने पर ऐसा मौसम मुझे सचमुच ही भाता था. दूसरे दिन आसमान साफ था. चमचमाते सूर्यप्रकाश में स्विट्जरलैंड की सब से बड़ी झील बेहद खूबसूरत और आकर्षक तो लगती ही है, लेकिन जब पर्वत शिखरों से उतरी धुंध झील पर कलाबाजी दिखाने लगती है और वायु, जल पर ‘कोड़ा’ चलाने लगती है, तब यह उच्छृंखल जगह ट्रैवल एजेंटों द्वारा पर्यटकों के लिए तैयार किए गए ब्रोशरों में दिखने वाले चित्रों से भी अधिक कुतूहलजनक हो उठती है.

अंगरेज कवि बायरन और शेली इस विशाल झील में अचानक आए तूफान में डूबतेडूबते बचे थे और तभी इस के बारे में कई कविताएं लिखी थीं. मुझे अब आभास हुआ कि ऐसे अवसर क्यों उन्हें काव्यरचना के लिए प्रेरित करते थे. मैं पहली बार लगभग 36 वर्षों पहले स्विट्जरलैंड घूमने गई थी और तभी यह विशाल झील देखी थी. तब से अब तक कई बार वहां गई हूं और मौसम चाहे जैसा भी हो, यह झील देख कर सम्मोहित हो उठती हूं, निष्पंद हो उठती हूं. लगभग 9 मील चौड़ी और 45 मील लंबी यह झील पश्चिमी यूरोप की सब से बड़ी झील है. पर मात्र इस की विशालता ही इसे इतना जीवंत नहीं बनाती, बल्कि चारों ओर हरीभरी पहाडि़यों से घिरी हिमाच्छादित चोटियां इसे ऐसी मोहकता प्रदान करती हैं.

यही कारण है कि स्विट्जरलैंड के प्राकृतिक दृश्यों के सब से बड़े चित्रकार हाडलर द्वारा इस झील का चित्रांकन स्तब्ध कर देता है. लेकिन वे भी इस के झंझावात तथा रहस्यमय सौंदर्य का सही चित्रण नहीं ही कर पाए. लेक जेनेवा सैलानियों, विशेषकर अंगरेजों की पसंदीदा सैरगाह रही है. 1816 में ब्रिटिश पत्रकारों से बचने के लिए लौर्ड बायरन वहां आए थे. उन दिनों कामातुर ख्यात लोगों की आलोचना करने से संबद्ध कोई कानून नहीं था. वहां उन के साथ परसी बिशी शेली अपनी पत्नी और बच्चों से छिप कर अपनी किशोरी प्रियतमा मेरी गाडविन के साथ आ पहुंचे थे. इन दोनों कवियों ने लेक जेनेवा के संबंध में ऐसी कविताएं लिखीं कि वह जगह अंगरेजों की प्रिय सैरगाह बन गई. उन की कविताओं की पुस्तकें लिए अंगरेज वहां आ पहुंचते थे. वहीं पर मेरी शेली ने 1816 में अपना विख्यात उपन्यास ‘फ्रेंकेस्टाइन’ लिखा था. यह उपन्यास पढ़ने में जितना रोचक है उतनी ही भयावह उस पर बनी फिल्में हैं.

जब मैं पहली बार वहां गई थी, तब वहां रुकना बहुत खर्चीला नहीं था. इसी कारण तब वहां अंगरेज भी भरे रहते थे. पर अब स्विस फ्रैंक महंगा हो जाने के कारण वहां अंगरेजों की चहलपहल कम हो गई है, पर नवधनाढ्य रूसी यहां गरमी की पूरी छुट्टियां बिताते हैं. फिर भी वहां आने पर इस बात की संतुष्टि हुई कि सप्ताहांत के 2 दिन भी थोड़े में गुजारना कठिन नहीं था. हम जब पहली बार पूरे सप्ताह के लिए स्विट्जरलैंड गए थे तब हम ने लंदन में ही स्विस टूरिस्ट औफिस से 180 पौंड में 4 दिनों का पास खरीद लिया था. इस पास से हम चाहे जितनी बार बस, ट्रेन, बोट तथा ट्राम द्वारा सभी जगह तो घूम ही सकते थे, वहां के अधिकांश संग्रहालयों में भी बिना टिकट जा सकते थे. सुननेपढ़ने में यह उतना सस्ता तो नहीं लगेगा, पर इस पास से हमें सचमुच काफी बचत हुई.

इस बार स्विट्जरलैंड पहुंचने पर हम सब से पहले मौंट्रेक्स में बहुत ऊंचाई पर बने होटल यूरोटेल में रुके. वहां चारसितारा होटल जैसी सारी सुविधाएं थीं और यह जेनेवा एयरपोर्ट से मात्र 1 घंटे की दूरी पर है. यहां से फेरी टर्मिनल पैदल ही कुछ मिनटों में पहुंचा जा सकता था. इस प्रकार झील के चारों ओर नौकाभ्रमण के लिए यह एक सही जगह थी. लेक जेनेवा का सब से शानदार आकर्षण है वहां का नावों का तंत्र. कुछ नावें तो पहले की पैडल मार कर चलाने वाली स्टीमर हैं जिन का अपना ही आनंद है, पर आधुनिक स्टीमर भी कम आनंददायी नहीं हैं. पर्यटकों में तो ये लोकप्रिय हैं ही, स्थानीय लोग भी इन्हें पसंद करते हैं.

झील दर्शन के लिए ये बेहद अच्छा और सस्ता साधन है, साथ ही झील के आरपार जाने के लिए सुविधाजनक भी क्योंकि ये छोटेछोटे घनी झाडि़यों वाले 30 से भी अधिक बंदरगाहों पर रुकती हैं. झील में और उस के आसपास घूमने के बाद हम ने जेनेवा जाना तय किया. लोगों की धारणा है कि जेनेवा एक बहुत ही बोरिंग व्यापारिक शहर है, पर ऐसा केवल उन लोगों के लिए हो सकता है जो केवल व्यापार के सिलसिले में किसी मीटिंग में यहां आते हैं, होटल में ठहरते हैं और मीटिंग के बाद लौट जाते हैं. जेनेवा दरअसल एक विश्व स्तर का शहर है जिस का इतिहास बहुत समृद्घ और विविधतायुक्त रहा है. वहां अच्छेअच्छे संग्रहालय हैं जिन में एक कला संग्रहालय भी है जिस में हाडलर के बनाए स्विट्जरलैंड संबंधी चित्रों का अच्छा संग्रह है. इन चित्रों को देखना हमें अंतरतम तक भिगो गया. उस के बाद हम पुराने शहर में कलादीर्घाओं और एंटिक वस्तुओं का आनंद लेते रहे.

अगले दिन हम न्योन के लिए चल पड़े जो रोमनकाल में महानगर था. आजकल यह बाजारों वाला मध्यवर्गीय शहर है, क्योंकि पास ही में स्थित बड़े शहर जेनेवा की वजह से इसे छोटा माना जाना स्वाभाविक है. वहां हर तरफ रोमन खंडहर हैं जिन्हें देखना भी एक अलग तरह का अनुभव था. वहां एक भव्य पुरातात्विक संग्रहालय भी है जहां एक से बढ़ कर एक अजूबी चीजें देखने को मिलीं. वहां टूरिस्ट औफिस से मिले एक ब्रोशर से हमें शहर घूमने और वहां के दर्शनीय स्थलों तक पहुंचने में बड़ी आसानी हुई. न्योन के बाद हम लुसाने पहुंचे. वहां तक तो झील बड़ी नहीं लगी थी पर लुसाने के रास्ते में जेनेवा झील का वृहत्तर रूप दिखने लगा. झील के किनारे बसा लुसाने शहर स्विट्जरलैंड का सब से जीवंत शहर कहा जा सकता है. वहां बाहरी विद्यार्थियों की संख्या अधिक है जिस से वहां खूब चहलपहल बनी रहती है. गरमी के दिन थे, इसलिए वहां की संकरी सड़कें लोगों से भरी पड़ी थीं. सारा वातावरण भूमध्यसागरीय लग रहा था.

ऊपर पहाड़ी पर अलंकृत गिरजाघर से स्तब्ध करते आल्पस पर्वत और लहराती हुई झील को देख कर जो अनुभव हुआ, उसे लेखनी द्वारा बता पाना मुश्किल है. कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, न तो लेखनी उन का सही वर्णन कर पाती है और न ही तूलिका द्वारा उन्हें चित्रों में उतारा जा सकता है. शायद, इसे देख कर ही विक्टर ह्यूगो ने लिखा था- ‘मैं ने झील को छतों पर देखा, पहाड़ को झील के ऊपर, बादलों को पहाड़ के ऊपर और तारों को बादलों के ऊपर’. काश, मैं इस से अच्छा लिख पाता. वेवे पहुंच कर पहले तो लगा कि वह बड़ा ही नीरस शहर है, जहां बहुत ही कम दर्शनीय स्थल हैं, पर कुछ समय बिताने के बाद वह मेरा पसंदीदा शहर बन गया. उपन्यासकार ग्राहम ग्रीन ने अपना घर यहीं बसाया था और चार्ली चैपलिन ने भी शहर के किनारे स्थित महल जैसे घरों में से एक में अपना अंतिम समय बिताया था जिसे अब एक सुंदर संग्रहालय का रूप दे दिया गया है. हम उस ‘होटल डू लेक’ में केवल कौफी पीने गए जहां अनीता बु्रकनर ने अपना इसी नाम का बुकरपुरस्कृत उपन्यास लिखा था.

आश्चर्यजनक रूप से धीरगंभीर मगर लावण्य से भरपूर वेवे के बाद हमें मौंट्रेक्स बड़ा ही बेतुका, गड्डमड्ड, फीका और आधुनिकता का मुलम्मा चढ़ा शहर लगा. पर इन खामियों के बावजूद मौंट्रेक्स में उस के स्वर्णकाल के कुछ अवशेष बचे हुए हैं. रूसी उपन्यासकार नोबोकोव यहीं मौंट्रेक्स पैलेस होटल में रहते थे. होटल के बाहर कुरसी पर बैठी उन की एक भव्य प्रतिमा है जिसे इस प्रकार बनाया गया है जैसे वे तुरंत कुरसी से लुढ़क जाएंगे. तटक्षेत्र से लगभग आधा घंटा पैदल चल कर हम शैटे द चिलौन से रूबरू हुए. कहा जाता है कि यही वह किला है जिस ने बायरन को उस की चर्चित कविता ‘द प्रिजनर औफ चिलौन’ लिखने को प्रेरित किया था. सोचती हूं कि काश, बायरन की थोड़ी सी भी साहित्यिक प्रतिभा मुझ में भी समा जाती. कई बार लेक जेनेवा जाने पर भी अभी तक तो यह इच्छा पूरी नहीं हुई है, पर अभी भी प्रतीक्षा है.

भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार

रिश्वत लेते हुए सरकारी अफसर पकड़ा जाए तो इस देश में उस का क्या इलाज है? बड़ा आसान है, रिश्वत दे कर छूट जाओ. हजारों रिश्वतखोर अफसर यही करते हैं और रिश्वतों का बाजार ऐसा ही गरम है जैसा ‘जौली एलएलबी’ फिल्म में थानों में नियुक्ति की बोली के रूप में दर्शाया गया है. हमारे यहां रिश्वतखोर अफसर तब पकड़ा जाता है जब वह अपने ऊपर के अफसरों को उन का सही हिस्सा नहीं देता. अगर पकड़ा जाए तो रिश्वत दे कर छूटने का उदाहरण अफसर बी एल अग्रवाल का सामने आया है जो छत्तीसगढ़ सरकार में प्रमुख सचिव हैं. 2010 में अग्रवाल के खिलाफ 2 मुकदमे केंद्रीय जांच ब्यूरो ने दर्ज किए थे जब वे स्वास्थ्य सचिव थे. आयकर विभाग वालों ने जांच कर पता किया था कि अग्रवाल के पास 93 करोड़ रुपए की संपत्ति है.

मामले को रफादफा करने के लिए बी एल अग्रवाल ने सोर्स ढूंढ़ने की कोशिश की और एक सय्यद बुड़हानुद्दीन ने उन्हें झांसा दिया कि वह प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करता है और उस की फाइल नष्ट करा देगा. यह शख्स कभी ओ पी शर्मा, कभी ओ पी सिंह तो कभी इकबाल अहमद के नाम से कार्य करता है. एक प्रमुख सचिव की हैसियत पर काम करने वाले भारतीय जनता पार्टी की सरकार वाले राज्य में इस तरह की चोरी व सीनाजोरी दर्शाती है कि नरेंद्र मोदी का भ्रष्टाचारमुक्त भारत सिर्फ हवा में है. सरकारी लोग आज भी पैसा बना रहे हैं और जम कर बना रहे हैं. मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण गई पर इसलिए कि उस समय औडीटर जनरल ने भ्रष्टाचार के मामलों को बढ़ाचढ़ा कर प्रसारित करा दिए थे. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इन पर प्रतिवाद नहीं कर पाए. हालांकि, मौजूदा सरकार के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी एक भी नेता या अफसर कोयला या 2 जी घोटाले में सजा नहीं पा पाया है. नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जा रहा है कि उन का कार्यालय भ्रष्टाचारमुक्त है पर यह भी तो संभव है कि वहां कार्यरत कर्मचारी गद्दारमुक्त न हों. यानी हर बात गुप्त है, भ्रष्टाचारमुक्त नहीं.

छत्तीसगढ़ सरकार में ही नहीं, सभी राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों का यही हाल है. देश में पनप रहे धन्ना सेठों में अधिकांश के पीछे भ्रष्टाचार का ही प्रमुख हाथ है क्योंकि यहां के धन्ना सेठ न अच्छी सेवा दे रहे हैं, न अच्छा उत्पादन कर रहे हैं. वे केवल सरकारी ठेकों, सरकारी दान, सरकारी काम पर निर्भर हैं. बी एल अग्रवाल ने अगर करोड़ों रुपए नाजायज कमाए हैं तो उन के सहारे दूसरों ने अरबों रुपए कमाए होंगे. ये लोग आज भी सरकार में वैसे ही बने हुए हैं जैसे सोनिया, मनमोहन की पिछली सरकार में थे.

नरेंद्र मोदी ने हजारों की संख्या में सरकारी अफसरों पर कांग्रेसी राज में भ्रष्टाचार करने का आरोप नहीं लगाया है और न ही उन्हें निकाला. फिर देश भ्रष्टाचार मुक्त कैसे बन सकता है?

कसौली : पलपल बदलता है जहां मौसम

हिमाचल प्रदेश को खूबसूरत वादियों के लिए जाना  जाता है. यहां हर मौसम में प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठाया जा सकता है. लेकिन अगर आप भागदौड़भरी जिंदगी से ऊब कर थोड़े समय के लिए सस्ते में आबोहवा बदलना चाहते हैं तो हिमाचल प्रदेश का खूबसूरत पर्यटन स्थल कसौली एक बेहतरीन विकल्प है. समुद्रसतह से लगभग 1,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कसौली हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित एक लोकप्रिय हिल स्टेशन है जो अपनी खुशनुमा आबोहवा के लिए दुनियाभर में लोकप्रिय है.

ब्रिटिशों द्वारा विकसित एक छोटा शहर, कसौली अभी भी अपना प्राचीन आकर्षण समेटे हुए है. 1857 में जब भारत की आजादी की पहली लड़ाई प्रारंभ हुई तब कसौली ने भी भारत के सैनिकों के बीच एक विद्रोह देखा. कसौली का प्रशासन सेना के हाथ में है और  यह मूलतया सैनिक छावनी है.

खूबसूरत हिलस्टेशन कसौली चंडीगढ़ से शिमला जाने वाली सड़क की आधी दूरी पर स्थित है. धरमपुर कसौली का सब से नजदीकी रेलवेस्टेशन है जहां टौय ट्रेन द्वारा पहुंचा जा सकता है. फिर यहां से किसी भी बस द्वारा कसौली पहुंचा जा सकता है. सड़क मार्ग से करीब 3 घंटे में कालका से कसौली पहुंच सकते हैं. पूरा रास्ता चीड़ यानी देवदार के वृक्षों से आच्छादित है. इस क्षेत्र में वाहनों के आने का समय निश्चित है जिस के कारण पर्यटक स्वच्छंद रूप से वादियों का लुत्फ उठाते हैं.

यहां सर्वाधिक चहलपहल वाले स्थान अपर और लोअर माल हैं, जहां की दुकानों पर रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं और पर्यटकों के लिए सोविनियर बिकते हैं. लोअर मौल में अनेक रेस्तरां है, जहां स्थानीय फास्टफूड मिलता है.

पलपल बदलता मौसम

मानसून के दिनों में वर्षा की बौछार पड़ते ही कसौली की हरियाली देखते ही बनती है. बारिश थमी नहीं कि चारों तरफ कुहासे का साम्राज्य हो जाता है और पर्यटक उस में घूमने निकल पड़ते हैं. यहां का मौसम पलपल अपना रंग बदलता है, कभी बादलों का समूह पलभर में ही धूप के नीचे छाकर बरस पड़ता है तो दूसरे ही पल मौसम साफ हो जाता है और तनमन को रोमांचित करने वाली खुशनुमा हवा बहने लगती है. कसौली का मौसम इतना सुहावना होता है कि कसौली पहुंचने से 2-3 किलोमीटर पहले से आप को कसौली में प्रवेश करने का एहसास हो जाएगा.

अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर महीने में यहां आने का बेहतरीन समय होता है. यहां के पेड़पौधों पर इस मौसम का जो रंग चढ़ता है, उसे फूलपत्तों पर महसूस किया जा सकता है. बर्फ का आनंद उठाने की चाह रखने वाले पर्यटकों को यहां दिसंबर से फरवरी के बीच होने वाली ओस जैसी बर्फ की बारिश  भी खूब गुदगुदाती है.

मंकी पौइंट

मंकी पौइंट कसौली की सब से लोकप्रिय जगह  और सर्वाधिक ऊंची चोटी है और यह कसौली से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस स्थान से सतलुज नदी, चंडीगढ़ और बर्फ से ढकी चूर चांदनी चोटी, जो हिमालय श्रेणी की सब से ऊंची चोटी है, का स्पष्ट दृश्य देखा जा सकता है. कसौली के सब से ऊंचे इस पौइंट पर पर्यटकों की खासी भीड़ रहती है. मंकी पौइंट का संपूर्ण क्षेत्र भारतीय वायुसेना के नियंत्रण में है. इस स्थान की सैर के लिए पर्यटकों को अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती है. इस परिसर में कैमरा ले जाने की अनुमति  भी नही है. इस स्थान तक कार द्वारा या पैदल पहुंचा जा सकता है. मंकी पौइंट से प्रकृति की दूरदूर की अनुपम छटा दिखती है. पर्यटक सुबहशाम मंकी पौइंट तथा दूसरी ओर गिलबर्ट पहाड़ी पर टहलने निकलते हैं. इन दोनों जगहों पर पिकनिक मनाने वालों की हमेशा भीड़ लगी रहती है. 

मंकी पौइंट की ओर जाने वाला मुख्य रास्ता एयरफोर्स गार्ड स्टेशन से हो कर लोअर मौल तक जाता है, जिस के लिए व्यक्ति को पहले पंजीकरण कराना आवश्यक है. यहां सायं 5 बजे प्रवेश बंद हो जाता है.

कसौली में अंगरेजों द्वारा 1880 में स्थापित कसौली क्लब भी अपनेआप में एक देखने की जगह है. देश के नामचीन क्लबों में शामिल इस क्लब की सदस्यता के लिए 20 सालों की वेटिंग चलती है.

रचनात्मकता और स्वास्थ्य लाभ का ठिकाना

मनमोहक और स्वास्थयवर्धक वादियां कसौली को रचनात्मक लोगों के लिए बेहतरीन पर्यटन स्थल बनाती हैं. इस जगह ने खुशवंत सिंह, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा  और गुलशन नंदा जैसे नामचीन साहित्यकारों को भी साहित्य सृजन के लिए आकर्षित किया और इस जगह ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि खुशवंत सिंह के अलावा अनेक नामचीन हस्तियां यहां अपना आशियाना बनाने के लिए मजबूर हो गई. रचनात्मकता के अतिरिक्त लोग यहां स्वास्थ्य लाभ के लिए भी आते हैं. कसौली की अच्छी आबोहवा के कारण यहां पर क्षय रोगियों के लिए एक सैनेटोरियम  भी बनाया गया है. शायद यही वजह थी कि अंगरेजों ने इसे हिलस्टेशन के रूप में व्यवस्थित रूप से विकसित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

कहां ठहरें : यहां ठहरने की बेहतर व्यवस्था है. यहां दर्जनों अच्छे होटल, रिजौर्ट्स, गैस्टहाउस आदि हैं.

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