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जब मैं किसी खूबसूरत जवान लड़की को देखता हूं, तो मेरा मन उस के साथ हमबिस्तरी को करता है. मैं क्या करूं.

सवाल

मेरी बीवी खूबसूरत है, फिर भी जब मैं किसी खूबसूरत जवान लड़की को देखता हूं, तो मेरा मन उस के लिए मचलने लगता है. मैं क्या करूं?

जवाब

किसी पराई खूबसूरत लड़की को जीभर कर देखने में तो हर्ज नहीं है, मगर उसे हासिल करने की बात सोचना बेवकूफी है, क्योंकि ऐसा होना कोई हंसीखेल नहीं है. आप अपनी खूबसूरत बीवी में मन लगाएं और दूसरी औरतों के बारे में सोचना छोड़ दें.

 

सराहनीय प्रयोग

‘मूव ओवर लेडीज फौर पौट लक, नाऊ कम चीफ मिनिस्टर ऐंड हिज मिनिस्टर्स फौर पौट लक किट्टी.’ अब भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पौट लक मंत्रिमंडल बैठक बुलाई जिस में सभी मंत्री घर से खाना लाए और सब ने आपस में शेयर किया. बजाय जनता को सिखाने का काम करते रहने के मंत्रियों का जनता से सीखने का यह एक अच्छा मामला रहा है.

मंत्रियों को एकदूसरे का खाना कैसा लगा, यह तो नहीं बता सकते पर अगर महिलाओं से पूछें तो उन्हें रेस्तराओं और कैटररों के खाने से घरों के खाने में कहीं ज्यादा स्वाद आता है. एक घरवाली के हाथ का स्वाद ही कुछ और होता है पर हमारे यहां किचन को नीचा देखा जाने लगा है.

इस की एक वजह यह भी है कि किचन की बनावट ही कुछ गलत होती है और रखरखाव खराब रहता है. आजकल कई बिल्डर किचन को विशेष ढंग से सजाने लगे हैं कि वह अलग लगे ही नहीं और बड़े मकानों में भी आम घर की सी लगे ताकि खाना पकाने में बोरियत न हो.

भोपाल का मंत्रिमंडल प्रयोग बहुत अच्छा है और उसे बोर्डरूमों में भी ले जाना चाहिए ताकि गंभीर चर्चा के साथ खाने के स्वाद की भी  चर्चा हो सके. हां, यह संभव है कि वैसे बहुत ही सुलझे जने की बीवी या कुक अनगढ़ हो और कह डाले कि या तो अधपका ले जाओ या फिर किसी रेस्तरां से खरीद कर ले जाओ. उस में मजा ही खत्म हो जाएगा.

सम्मिलित भोज सदियों से समाज को जोड़ने का काम करते रहे हैं. हां, विशिष्ट लोगों का अपना ग्रुप बन जाए जिस में वे औरों को न आने दें तो बात दूसरी. तब मुश्किल हो जाती है. सामूहिक भोज विभाजन की लकीर बन जाता है. रोटीबेटी का संबंध बनाने या न बनाने की गलत परंपरा वहीं से विकसित हुई है. यह समाज के हर हिस्से में फैली है.

सामूहिक भोज जिस में हरकोई अपने घर का खाना ला कर डाले वाकई आपसी प्रेम की निशानी होगा. हो सकता है पता न चले कि कौन क्या लाया पर यह एहसास कि सब उस के घर का खाना चख रहे हैं, अपनापन बढ़ाने में बड़ा कारगर होगा और हलवाई या कैटरर के खाने से कहीं ज्यादा पेट और दिल के लिए सुखद होगा.                     

 

जब पति को लगे पत्नी खटकने

प्राचीनकाल से ही भारत पुरुषप्रधान देश है. लेकिन अब समय करवट ले चुका है. महिला हो या पुरुष दोनों को ही समानता से देखा जाता है. ऐसे में यदि बात पति और पत्नी के बीच की हो तो दोनों ही आधुनिक काल में सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते दिखते हैं. पर कई बार ऐसा होता है कि पति अपनी पत्नी से यदि किसी चीज में कम है तो वह हीनभावना का शिकार होने लगता है और उसे पत्नी कांटे के समान लगने लगती है.

ऐसे में जरूरी है पतिपत्नी में आपसी तालमेल, क्योंकि कईर् बार ऐसा होता है कि पतिपत्नी में खटास नहीं होती है, लेकिन दूसरे लोग ताने कसकस कर आग में घी का काम करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि इस कठिन स्थिति से निकलने की कोशिश पतिपत्नी दोनों करें.

गलत मानसिकता में रचाबसा समाज

समाज में यह मानसिकता हमेशा बनी रहती है कि पत्नी के बजाय पति का ओहदा हमेशा उच्च होता है. पत्नी के उच्च शिक्षित, सुंदर, मशहूर और सफल होने से पति को ईगो प्रौब्लम होने लगती है. समाज की दृष्टि से पति को पत्नी की तुलना में प्रतिभाशाली, गुणी, उच्च पदस्थ आदि होना चाहिए. लेकिन पतिपत्नी को समझना चाहिए कि यह आप की अपनी जिंदगी है. इस में छोटाबड़ा कोई माने नहीं रखता है.

यदि पत्नी ऊंचे ओहदे पर है

अकसर देखने में आता है कि पत्नी का ऊंचे ओहदे पर होना समाज में लोगों को गवारा नहीं होता. ऐसा ही कुछ शालिनी के साथ हुआ. उस की लव मैरिज थी. वह उच्च शिक्षा प्राप्त और एक बड़ी कंपनी में उच्च पद पर कार्य करती थी जबकि पति अरुण उस से कम पढ़ालिखा और अपनी पत्नी के मुकाबले निम्न पद पर था. अकसर उस से लोग कहते रहते थे कि तुझे इतनी शिक्षित और कमाऊ बीवी कहां से मिल गई. साथ ही, शालिनी भी उसे ताने देती रहती थी. इन सभी बातों से अरुण इतना अधिक डिप्रेशन में रहने लगा कि उस के मन में अपनी पत्नी के खिलाफ जहर घुलने लगा और फिर तलाक की नौबत आ गई.

पत्नी दे ध्यान: पत्नी के सामने यदि ऐसी स्थिति आए तो वह इस से घबराए नहीं, बल्कि डट कर सामना करे. कई बार हम सामने वालों की गलतियां गिना देते हैं, लेकिन कहीं न कहीं हम में भी खोट होता है. अकसर एक बड़े ओहदे पर होने के कारण पत्नी अपने पति को खरीखोटी सुनाती रहती है जैसे वह अपनी पढ़ाई व कमाई के नशे में चूर अपने पति की कमियों का उपहास उड़ाती रहती है कि घर का सारा खर्च तो उस की कमाई पर ही चलता है.

कई कमाऊ पत्नियां सब के सामने यह कहती पाई जाती हैं कि अरे यह कलर टीवी तो मैं लाई हूं, वरना इन के वेतन से तो ब्लैक ऐंड व्हाइट ही आता. इन सब बातों से रिश्तों में खटास बढ़ती है. ऐसी स्थिति में पत्नियों को चाहिए कि वे अपने पति को प्रोत्साहित करें कि वे भी जीवन में तरक्की करें न कि हीनभावना से ग्रस्त हो कर कौंप्लैक्स पर्सनैलिटी बन जाएं.

पति ध्यान दें: पति को चाहिए कि वह अपनी पत्नी से हीनभावना रखने के बजाय उसे आगे बढ़ने का प्रोत्साहन दे. यदि कोई बाहरी व्यक्ति कमज्यादा तनख्वाह का मुद्दा उठाए तो कहे कि हमारे घर में सब कुछ साझा है और हम दोनों पतिपत्नी मिलजुल कर घर की जिम्मेदारियां निभाते हैं.

पत्नी का खूबसूरत होना

वैसे तो हर आदमी की चाह होती है कि उस की पत्नी खूबसूरत हो, लेकिन यदि पत्नी बेहद खूबसूरत हो और पति कम स्मार्ट और सिंपल हो तो लोग यह बोलते नहीं रुकते कि अरे देखो तो लंगूर के मुंह में अंगूर या बंदर के गले में मोतियों की माला. ऐसे में पति को पत्नी बेहद खटकने लगती है. वह न चाह कर भी उसे ताने देता रहता है.

वैसे तो पत्नी की तारीफें पति को गर्व से भर देती हैं, लेकिन जब पत्नी की आकर्षक पर्सनैलिटी पति के साधारण व्यक्तित्व को और दबा देती है, तब संतुलित विचारों वाला पति और भी बौखला जाता है. नतीजतन, पति अपनी सुंदर पत्नी के साथ पार्टीसमारोह में जाने से बचने लगता है. अगर साथ ले जाना जरूरी हो तो पार्टी में पहुंच कर पत्नी से अलगथलग खड़ा रहता है. सजनेधजने तक पर भी ताने देता है.

पत्नी ध्यान दे: ऐसे में पत्नी को समझदारी से काम लेना चाहिए. यदि पत्नी को लगता है कि उस का पति उस की खूबसूरती को ले कर हीनभावना महसूस कर रहा है तो वह पति को समझाए कि पति से बढ़ कर उस के लिए दुनिया में कोई माने नहीं रखता है. साथ ही अपने पति के सामने किसी आकर्षक दिखने वाले आदमी की बात भी न करे. किसी महफिल या समारोह में पति के हाथों में हाथ डाल कर यह दिखाने की कोशिश करे कि वह पति को दिल से प्रेम करती है.

पति ध्यान दे: जिंदगी में उतारचढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन पत्नी पति का हर परिस्थितियों में साथ निभाती है. ऐसे में जरूरी है कि पति लोगों की बातों को नजरअंदाज करे, क्योंकि कुछ लोगों का काम ही होता है कि दूसरे के खुशहाल परिवार में आग लगाना. यदि पतिपत्नी दोनों एकदूसरे का साथ सही से निभाएं तो दूसरा कोई उंगली नहीं उठा सकता.

मायके के पैसे का घमंड

कई बार ऐसा होता है कि पत्नी के मायके में ससुराल के मुकाबले ज्यादा पैसा होता है. पत्नी की सहज मगर रईस जीवनशैली उस के मायके वालों का लैवल, गाडि़यां, कोठियां आदि पति को हीनता का एहसास दिलाने लगते हैं. साथ ही पत्नी भी पति के समक्ष मायके में ज्यादा पैसे होने का राग अलापती रहती है. बातबात पर अपने मायके के सुख बखान कर पति को ताने देती रहती है, जिस से पति हीनभावना से ग्रस्त हो जाता है और उसे पत्नी खटकने लगती है.

पत्नी ध्यान दे: पतिपत्नी के रिश्ते में एकदूसरे का सम्मान सब से ज्यादा अहम होता है. पत्नी को चाहिए कि वह अपने मातापिता के पैसे पर इतना अभिमान न करे कि उस से दूसरे को ठेस पहुंचे. हमेशा मायके के ऐश्वर्य को अपने पति के सामने न जताए. इस से पति के अहम को ठेस पहुंचती है, साथ ही वह पत्नी को मायके जैसा सुख न देने के कारण हीनभावना से ग्रस्त हो जाता है.

पति ध्यान दें: कई बार पत्नी के कुछ खरीदने पर या किसी डिमांड पर पति क्रोधित हो कर उस के मायके के ऐश्वर्य को ले कर उलटासीधा बोलने लगता है. ऐसे में जरूरी यह होता है कि आप प्रेमपूर्वक आपस में बैठ कर बात करें न कि लड़ाई ही इस विषय का समाधान है. जैसे पत्नी का बारबार अपने मायके के सुख के ताने देना पति को खराब लगता है ऐसे ही पति का पत्नी के मायके के लिए बोलना भी उसे खराब लगता है. 

मंदिरों में चप्पल चोरी, सुख के दरवाजे पर ही दुख

नेहा पहली बार लखनऊ के भूतनाथ मंदिर गई थी. उस की एक रिश्तेदार भी साथ थी. जब वह मंदिर से वापस आई, तो देखा कि उस की नई चप्पलें गायब थीं. नेहा भी जैसे को तैसा के जवाब में वहां रखी किसी और की चप्पलें पहन कर घर चली आई.

घर आ कर नेहा ने यह घटना अपने परिवार वालों को बताई, तो उन्होंने उस से कहा कि जब तुम भी वही गलती कर आई, तो तुम में और दूसरे में क्या फर्क रह गया?यह सुन कर नेहा को बहुत बुरा लगा. वह वापस मंदिर गई और वहां से लाई चप्पलें वापस रख दीं, पर उसे अपनी चप्पलें नहीं मिलीं.  दीपाली वाराणसी के मशहूर काशी विश्वनाथ मंदिर गई थी. उस के साथ 4 साल की बेटी और कुछ रिश्तेदार भी थे. उस नेएक दुकान से प्रसाद लिया और वहीं दुकान के पास ही अपनी चप्पलें उतार दीं. दीपाली का एक रिश्तेदार वहीं रुक गया.

जब दीपाली अपने परिवार के साथ वापस आई, तो उस की बेटी की नई चप्पलें गायब थीं. न तो दीपाली के रिश्तेदार को और न ही दुकानदार को चप्पलें चोरी होने की भनक लग सकी.

दीपाली की बेटी का रोरो कर बुरा हाल था. जब तक उसे नई चप्पलें नहीं दिलाई गईं, तब तक वह चुप नहीं हुई. सुनीता लखनऊ के मनकामेश्वर मंदिर गई. मंदिर में जाने के पहले उस ने एक जगह पर चप्पलें उतार कर रख दीं. चप्पलें चोरी न हों, इस के लिए सुनीता ने पूरी सावधानी बरती थी. उस ने सब से किनारे अपनी चप्पलें रखी थीं. जब सुनीता लौट कर आई, तो देखा  कि एक औरत उस के जैसी चप्पलें पहन कर जा रही थी. उस ने सोचा कि एकजैसी कई चप्पलें होती हैं.

जब सुनीता अपनी चप्पलों के पास गई और वहां उस को गायब पाया, तो वह समझ गई कि उस की आंख के नीचे से ही चप्पलें गायब हो गई हैं. सुनीता के मन में यह खयाल आया कि भगवान के दर्शन करने आए थे, पर चप्पलें गुम हो गईं. माया दिल्ली के एक दुर्गा मंदिर में दर्शन करने गई. नवरात्र का समय था. मंदिर में काफी भीड़ थी. दर्शन के लिए अंदर जाने से पहले उस ने अपनी चप्पलें  एक जगह पर रख दीं. मंदिर वालों ने चप्पल रखने के लिए एक जगह बना रखी थी. जब माया दर्शन कर के वापस आई, तो उस की चप्पलें गायब थीं. माया को बहुत बुरा लगा. वह नंगे पैर ही घर वापस आई. जिया और उस की एक सहेली गीता शादी के पहले मंदिर दर्शन करने के लिए जाती थीं. एक दिन गीता की चप्पलें चोरी हो गईं. वह रोने लगी. रोतेरोते वह घर आई, तो उस के परिवार वालों ने कहा कि कोई बात नहीं. जिस की चप्पलें मंदिर में चोरी हो जाती हैं, भगवान उस के हर दुख को दूर करते हैं. पर यह बात गीता के पल्ले नहीं पड़ी.

योगिता कहती है कि वह कई बार मातारानी के मंदिर जाती थी. एक बार 5 मिनट के अंदर ही उस की चप्पलें गायब हो गईं. वे उस की मनपसंद चप्पलें थीं. चेतना बताती है कि वह शिरड़ी के मंदिर गई थी. वहां उस की चप्पलें चोरी हो गई थीं. रेनू कहती है कि वह एक बार गुरुद्वारे में लंगर खाने गई थी. बच्चे भी साथ में थे. बच्चों की नई चप्पलें निकाल कर बाहर रख दी थीं. लंगर खा कर जब वे बाहर निकले, तो चप्पलें गायब थीं. तब से अब किसी मंदिर में जाओ,तो चप्पलों की हिफाजत में ही ध्यान लगा रहता है. ये घटनाएं मनगढ़ंत नहीं हैं. इन में एक सामान्य सी बात यह देखने में आई कि मंदिर छोटा हो या बड़ा, चप्पल चोरी की घटनाएं हर मंदिर में होती हैं.

यही वजह है कि लोग जब मंदिर जाते हैं, तो पुरानी चप्पलें पहन कर जाते हैं. अगर चप्पलजूते नए होते हैं, तो सब से ज्यादा उन की हिफाजत की चिंता रहती है. कई बार तो लोग उन्हें कार या किसी सुरक्षित जगह रख कर जाते हैं. यह बात केवल मंदिरों की ही नहीं है, बल्कि शोकसभाओं, गुरुद्वारों में भी चप्पलें चोरी होती हैं. जहां लोग सुख के लालच में जाते हैं, वहां दरवाजे पर ही दुख मिलता है. धर्म के समर्थक इस बात को ऐसे देखते हैं कि चप्पलजूते चोरी होने से उन के दुखदर्द दूर हो जाते हैं. वैसे, इस तरह की चोरी से एक बात साफ हो गई कि नैतिकता पूजापाठ से नहीं आती है.

मंदिरों में केवल जूतेचप्पल ही चोरी होते हों, ऐसी बात नहीं है. वहां पर पौकेटमारी और चेन स्नैचिंग जैसी घटनाएं भी खूब होती हैं. तमाम मंदिरों में यह लिखा होता है कि यहां चोरउचक्कों से सावधान रहें. पौकेटमारी से बचने के लिए लोग मंदिरों में पर्स ले कर नहीं आते. वे चढ़ावे के लिए पैसा अलग जेब में रख कर आते हैं.

कई मंदिरों में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए यह नियम बना दिया गया कि चमडे़ से बना सामान जैसे पर्स, बैल्ट वगैरह को ले कर मंदिर न आएं. मंदिर वालों को लगता है कि पर्स चोरी की घटनाओं को रोकने का यह सब से अच्छा तरीका है.

समझने वाली बात यह है कि मंदिरों में लोग शांति और अपनी मुरादें पाने के लिए जाते हैं. जब मंदिर में ही ऐसी घटनाएं घटने लगेंगी, तो वहां जाने का क्या फायदा? केवल वे लोग ही मंदिर नहीं जाते, जिन के जूतेचप्पल चोरी होते हैं. वे लोग भी मंदिर जाते हैं, जो चोरी करते हैं. मंदिरों में केवल बडे़ लोगों के जूतेचप्पल ही चोरी नहीं होते, बल्कि बच्चों के भी जूतेचप्पल चोरी होते हैं. कुछ गिरोह इसी काम के लिए सक्रिय रहते हैं. ऐसे में मंदिरों में अपराध की घटनाएं बताती हैं कि लोग जिस सुखशांति की तलाश में मंदिरों में जाते हैं, वह उन को वहां भी नहीं मिलती. पूजा से ज्यादा उन का ध्यान बाहर रखे जूतेचप्पलों में लगा रहता है. दूसरी तरफ चोरों का भी ध्यान इस में लगा रहता है कि वे कब अपने हाथ का कमाल दिखाएं.                   

 

गृहिणियों की अनदेखी क्यों

क्यागृहिणी होना एक सजा है? सब जानते हैं कि बदलते वक्त के साथ गृहिणी की भूमिका भी बदल गई है. लेकिन उस की जिम्मेदारियां कम न हो कर और बढ़ गई हैं. वैसे तो इस आधुनिक समय में घर के हर काम के लिए मशीनें मौजूद हैं, पर क्या मशीनें स्वयं कार्य कर लेती हैं? क्या गृहिणी की भागमभाग अब भी जारी नहीं है?

जिम्मेदारियां तो पहले भी थीं, लेकिन दायरा सीमित था. मगर आज दायरा असीमित है. आज महिला घर से ले कर बाहर तक की जिम्मेदारी के साथसाथ बच्चों की पढ़ाई से ले कर सब का भविष्य बनाने और भविष्य की बचत योजना तैयार करने में जुटी रहती है और वह भी पूरी एकाग्रता से.

गृहिणी की भागदौड़ सुबह से शुरू हो जाती है. फिर चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण. रात को सब के बाद अपने आराम की सोचती है. रोज पति, बच्चों और घर के अन्य सदस्यों की देखरेख में इतनी व्यस्त रहती है कि खुद को हमेशा दोयम दर्जे पर ही रखती है. वह दूसरों की शर्तों, इच्छाओं और खुशियों के लिए जीने की इतनी आदी हो जाती है कि अगर किसी काम में जरा सी भी कमी रह जाए तो अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती है. लेकिन उस के बाद भी उसे ताने ही सुनने को मिलते हैं. उस के काम का श्रेय और सम्मान उस के हिस्से नहीं आता.

सम्मान की अपेक्षा

गृहिणी एक ऐसा सपोर्ट सिस्टम है, जो हर किसी को जीने का हौसला देता है. यह नहीं कि कामकाजी महिला कुछ नहीं. महिला चाहे घर में काम करे या बाहर, काम तो करती ही है. पर यहां बात उस महिला, उस गृहिणी की हो रही है, जिसे हमारा समाज बेकार समझता है. उस की न कोई छुट्टी, न कोई वेतन. सच कहें तो कोई गृहिणी वेतन चाहती भी नहीं. पर वह अपनों की जो सेवासहायता करती है उस के बदले सम्मान की अपेक्षा तो करती ही है और वह उस का मानवीय हक भी है.

एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक 40% ग्रामीण और 65% शहरी महिलाएं, जिन की उम्र 15 साल या उस से ज्यादा है, पूरी तरह से घरेलू कार्यों में लगी रहती हैं. और भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आंकड़ों के हिसाब से 60 साल से ज्यादा की उम्र वाली एकचौथाई महिलाएं ऐसी हैं, जिन का सब से ज्यादा समय इस आयु में भी घरेलू कार्य करने में ही बीतता है.

वर्ल्ड इकौनोमिक फोरम की ग्लोबल जैंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ भारत में ही महिलाएं दिन भर में 350 मिनट अवैतनिक कार्य करने में बिताती हैं यानी इस काम के लिए उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता, जबकि पश्चिमी देशों में घर की जिम्मेदारियां केवल महिलाओं के हिस्से नहीं हैं.

अवसाद की शिकार

इसी वजह से वहां की महिलाओं के गृहिणी के रूप को भी श्रम और आर्थिक भागीदारी के पक्ष की वजह से महत्त्व दिया जाता है. हमारे यहां का रहनसहन और सामाजिक ढांचा कुछ इस तरह का है कि घर पर रहने वाली महिलाओं के हिस्से सुविधाएं कम हैं. सब से बड़ी बात तो यह है कि हमारे यहां घरेलू कार्य का जिम्मा पूरी तरह से महिलाओं पर ही होता है. पुरुषों का सहयोग नाममात्र का ही मिलता है. हमारे यहां घरेलू कामकाज में पुरुषों की भागीदारी रोजाना केवल कुछ मिनट की है जैसे एक कलाकार किसी भी कलाकृति को उकेरने के लिए कैनवास का सहारा लेता है, उसी तरह घर के सदस्यों के जीवन में रंग भरने की भूमिका गृहिणी ही निभाती है. भले ही कैनवास की तरह वह दिखे नहीं. शायद इसी कारण उस के इस रूप को हर जगह और हर हाल में अनदेखा करने की ही कोशिश की जाती है. कितनी आसानी से उस से कह दिया जाता है कि तुम दिन भर घर में करती ही क्या हो.

यह सब सुनतेसुनते वह सब के साथ हो कर भी अकेली हो जाती है और अवसाद व तनाव की शिकार हो जाती है. अपराधबोध से जुड़ा उस का यह भाव अधिकतर मामलों में बच्चों की परवरिश या परिवार की संभाल से ही जुड़ा होता है. इस के बावजूद उस के कार्यों का आकलन ठीक से नहीं किया जाता है.

सवाल वही है

वह चौबीस घंटे की और जिंदगी भर की मुफ्त की नौकर है, जिस की नकेल पति के हाथों में होती है. पति जैसा चाहे वैसा उस का इस्तेमाल करता है. चाहे वह शारीरिक रूप से हो, मानसिक रूप से हो या और किसी रूप में. हर तरह से उस की भावनाओं के साथ खेला जाता है. वह एक ही समय में घरेलू दासी और बंधुआ मजदूर दोनों तरह से यूज होती है. वह अपने पति और बच्चों की हर जरूरत पूरी करने के लिए मजबूरीवश सब कार्य करती है. यहां तक कि वह प्यार की खातिर काम करती है और प्यार करना भी एक काम बन गया है.

अब सवाल वही कि गृहिणी की आवाज कैसे नीतिनिर्धारकों तक पहुंचे? एक गृहिणी किस दिशा में कदम उठाए? कैसे आंदोलन करे? ऐसे किसी भी आंदोलन को राजनीतिक दिशा की जरूरत है. बहुत से एनजीओ व स्वयंसेवी संस्थाएं पूरे देश में मिलेंगी, जो गृहिणियों को अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सलाह देने के लिए दफ्तर खोले बैठी हैं. लेकिन जब तक परिवार में स्त्रीपुरुष का बराबरी का समीकरण नहीं बदलेगा, पितृसत्ता व वर्गीय शोषण को हम उठा कर नहीं फेकेंगे, तब तक हम पेन किलर जैसी तत्कालीन राहत ही गृहिणी को देते रहेंगे.

अब दूसरा सवाल यह है कि गृहिणी का दुश्मन कौन है? क्या उस का पति ही पितृसत्ता का प्रतीक है? पितृसत्ता को कायम रखने के लिए राज्य व्यवस्था, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद की क्या भूमिका रही है? क्या इस राज्य व्यवस्था के साथ समझौता कर के इसी का हिस्सा बन कर व इसी सूत्र की आर्थिक सहायता ले कर गृहिणी का जीवन बेहतर बन सकेगा? क्या पुलिस, जज, मंत्री इत्यादि इस शोषणकारी व्यवस्था के अंग नहीं हैं?

सोचने वाली बात यह है कि जो महिलाएं घर में सारा दिन बच्चों के लिए और पति के लिए पिसती रहती हैं और भी बहुत से काम करती हैं उन्हें गैरकमाऊ की श्रेणी में रखना क्या सही है? जबकि आज की गृहिणी पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर अपना सहयोग दे रही है.

21वीं सदी को न केवल यूनेस्को ने, बल्कि भारत सरकार, सभी बुद्धिजीवियों ने भी महिलाओं की शताब्दी बताया है.

श्रम का मोल नहीं

गृहिणी जो भी कार्य करती है उस का उसे फायदा मिलना चाहिए. उसे सांस लेने की आजादी, विचारों की आजादी यानी पूर्ण आजादी मिलनी चाहिए. वह सिर्फ बच्चा पैदा करने या पालने वाली मशीन नहीं है और न ही कोई रोबोट. सब से पहले वह एक इनसान है.

सहयोगियों को भावनात्मक सहयोग व देखभाल देना, दोस्ती, झुक जाना, दूसरों के आदेश पर रहना, उस के घावों पर मरहम लगाना, यौन रूप से इस्तेमाल होना, हर बिखरी चीज को संवारना, जिम्मेदारी का एहसास तथा त्याग, किफायती होना, महत्त्वाकांक्षी न होना, दूसरों की खातिर आत्मत्याग करना, सभी बातों को सहन कर लेना और मददगार होना, अपनेआप को पीछे हटा लेना, सक्रिय रूप से हर संकट का हल निकालना, एक सैनिक की तरह सहनशक्ति और अनुशासन रखना ये सब मिल कर गृहिणी की कार्यक्षमता बनाते हैं. इस तरह गृहिणी के श्रम का मोल नहीं है.

नैतिकता की आवश्यकता

ऐसा नहीं कि आज की गृहिणी जागरूक नहीं, बल्कि स्त्रीमुक्ति आंदोलन से गृहिणियों में जागरूकता आई, कानून बदले. भारतीय महिला चाहे वह गृहिणी हो या कामकाजी, अपने विकास के दौरान जहां वह बहुत ही सामाजिक, धार्मिक रूढियों, जड़ताओं, कुप्रथाओं और पाखंडों से मुक्त हुई है, वहीं दूसरी ओर उस के सामने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नई चुनौतियां भी उत्पन्न हुई हैं, जो परंपरागत कुरीतियों से अधिक घातक सिद्ध हो रही हैं. जैसे नए रूप में स्त्री देह व्यापार, कन्या भ्रूणहत्या, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, घरेलू हिंसा, कुपोषण, हिंसाअपराध, हत्या, विस्थापन, महिलाओं का वस्तुकरण, परिवार का बिखरना जैसी अनेक भयावह स्थितियां सामने खड़ी हैं. साथ ही, बहुत सी पुरानी परंपराएं, कुप्रथाएं भी आज तक कायम हैं, जो गृहिणी सशक्तीकरण में अवरोधक हैं. उन कुप्रथाओं का कारण भी स्वयं गृहिणी ही है. बहुत सी गृहिणियां बदलते परिवेश में खुद को नहीं बदलना चाहतीं और टकराव की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं. गृहिणी अधिकार तो जानती है पर स्त्रीपुरुष आचार संहिता को घरघर में कैसे लाना, कैसे लागू करना है, यह सुचारु तरीके से नहीं हुआ. बीमारी का उपचार किया गया, लेकिन थेरैपी का तरीका सही दिशा में नहीं था ताकि बीमारी से छुटकारा मिल जाता.

यह तो वही बात हुई न कि जनगणमन अधिनायक जय हो यानी जन की बातें हुईं, गण में गृहिणी को सभाओं में लाया गया पर ‘मन’ रह गया. जबकि हम सब जानते हैं कि महिला (गृहिणी) ‘मन’ से जुड़ी है. गृहिणी आज भी अपने प्रति अत्याचार से डरती है. वह बलात्कार (चाहे शरीर का हो या मन का) से घबराती है. वह पहले के मुकाबले निर्भीक बनी है, परंतु अभी भी भीड़ से न डर के उस भीड़ में से कब कौन एकांत पा कर उस का शारीरिक शोषण कर दे, इस का डर रहता है उसे. आज नैतिकता की आवश्यकता है न कि उन स्प्रे और जैल की जो बलात्कारियों से लड़ने/बचने के लिए दिए जा रहे हैं. मानसिक उत्थान की कमी है.

बदलाव बेहद जरूरी

गृहिणियों की रुचि पितृसत्ता को सिर्फ सहयोग देने में नहीं है, उन का विश्वास समानता में है. समाज में कोई भी हाशिए पर नहीं होना चाहिए. प्रत्येक को केंद्र में होना चाहिए, प्रत्येक को समान नागरिक होना चाहिए. अभी बदलाव की लंबी लड़ाई बाकी है. बस कोशिश है इसे नई मंजिल की ओर ले जाने की.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के साथ ही अमेरिका भर में महिलाओं ने जुलूस निकाल कर अपनी राजनीतिक हैसियत की ओर ध्यान दिलाया था, जिस की वजह से ट्रंप कोई भी ऐसा कदम नहीं उठा पा रहे, जो महिलाओं के खिलाफ हो.

हौसले हों बुलंद तो हर मुश्किल को आसां बना देंगे, छोटी टहनियों की क्या बिसात, हम बरगद को हिला देंगे. वे और हैं जो बैठ जाते हैं थक कर मंजिल से पहले, हम बुलंद हौसलों के दम पर आसमां को झुका लेंगे.                

अपमानित आंकड़े

 

आप को यह जान कर बड़ा दुख होगा कि कुछ साल पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महिला के सड़क हादसे में मारे जाने पर उस के परिवार को पर्याप्त मुआवजा देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि गृहिणियों की हैसियत महज क्व1,250 प्रतिमाह आंकी गई थी.

 

उस आकलन के अनुसार, घर की नारी और भिखारी एक बराबर हैं. जनगणना में कुछ लोगों को गैरकमाऊ लोगों की श्रेणी में रखा गया था. इन में गृहिणियां, भिखारी, कैदी और वेश्याएं थीं. कितने अपमानित आंकड़े थे ये. इस से ज्यादा एक महिला, एक गृहिणी के लिए अपमानित बात भला और क्या हो सकती है?

 

तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि महिलाओं का नए सिरे से सम्मानजनक मूल्यांकन करें. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उस परिवार को मुआवजे की रकम क्व6 लाख दिलवाई और कहा कि गृहिणियों को भिखारी, कैदी और वेश्याओं की श्रेणी में रखना अपमानजनक है.

 

 

इंटरनेशन तैराक की कातिल माशूका

23 जनवरी, 2017 की सुबह की बात है. बिहार के भागलपुर के लोदीपुर थानांतर्गत कवाली नदी के किनारे कुछ बच्चे बेर तोड़ रहे थे तभी किसी की नजर पास की झाड़ी में पड़ी एक लाश पर गई. लाश देखते ही डर कर बच्चे वहां से भाग गए. उन्होंने यह बात अपने जानने वालों को बताई तो गांव के कुछ लोग उस जगह पहुंच गए, जहां लाश पड़ी थी.

वहीं से किसी ने फोन कर के यह जानकारी लोदीपुर थाने में दे दी. सुबह 10 बजे के करीब पुलिस को जैसे ही लाश मिलने की सूचना मिली तो थानाप्रभारी भारतभूषण पुलिस टीम के साथ नदी के किनारे पहुंच गए.

वहां झाडि़यों में करीब 35 साल के एक युवक की लाश पड़ी थी. वह युवक विकलांग था. उस के दोनों हाथ नहीं थे. उस का चेहरा तेजाब से झुलसा हुआ सा लग रहा था. लाश से दुर्गंध आ रही थी. इस से लग रहा था कि उस की हत्या कई दिन पहले की गई थी.

जांच में उस लाश की पुष्टि इंटरनैशनल तैराक और बिहार सरकार के सचिवालय में क्लर्क की नौकरी करने वाले विनोद कुमार सिंह के रूप में हुई. विनोद मूलरूप से सीवान जिले के बड़ा सिकवा इलाके के नौतन बाजार में रहने वाले रामजी सिंह का बेटा था. वह पश्चिम बंगाल के 24 परगना के स्कूल में अध्यापक थे. पुलिस ने खबर भेज कर रामजी सिंह को बुलवा लिया. बेटे की लाश देख कर वह फूटफूट कर रोने लगे. मौके की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस ने रामजी सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि विनोद का लोदीपुर की रहने वाली वौलीबौल खिलाड़ी रंजना कुमारी से प्रेम चल रहा था. 6 जनवरी, 2017 से ही वह पटना से लापता था. तब 13 जनवरी को उन्होंने उस के गायब होने की सूचना सचिवालय थाने में दी. इस के 8 दिन बाद भी जब विनोद के बारे में जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने विनोद के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. एफआईआर दर्ज कराते हुए उन्होंने रंजना कुमारी, उस के पिता, मां, बहनोई और फुफेरे भाई पर अपहरण की आशंका जताई थी.

इंटरनैशनल तैराकी में मुकाम बना चुके विनोद को इसी उपलब्धि पर सचिवालय भवन में जल संसाधन विभाग में सन 2012 में क्लर्क की नौकरी मिली थी. विनोद के करीबी लोगों ने पुलिस को बताया कि वह रंजना को तैराकी सिखाता था. उसी दौरान दोनों करीब आए. दोनों चोरीछिपे मिलते रहते थे और धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ गया. विनोद शादीशुदा ही नहीं, बल्कि 2 बच्चों का पिता था. बेटा मिलन सिंह 7 साल का और बेटी गुनगुन 4 साल की है. विनोद की बीवी वीणा अपने ससुर के साथ ही 24 परगना में ही रहती है.

इस के बावजूद भी उस का रंजना से चक्कर चल रहा था. विनोद अपने परिवार के साथ पटना के राजवंशी नगर मोहल्ले में रहता था. उस के साथ उस का भांजा अंकित भी रहता था. विनोद के पिता ने पुलिस को बताया कि रंजना का मकसद विनोद के पैसों पर कब्जा जमाना था. रंजना सीतामढ़ी के डीएवी स्कूल में टीचर थी. विनोद जहां इंटरनैशनल डिसएबल स्विमर था तो वहीं रंजना स्टेट लेवल की वौलीबाल खिलाड़ी रह चुकी थी. विनोद के साथ पटना में रहने वाले उस के भांजे अंकित ने बताया कि जब विनोद गायब हुआ था तो उस दौरान वह पटना में नहीं था. वह कोलकाता जाने की बात कह कर पटना से निकले थे. पर बाद में पता चला कि वह कोलकाता पहुंचे ही नहीं.

जांच की इसी कड़ी में पुलिस को पता चला कि पहली जनवरी, 2017 को विनोद पर मोबाइल छीनने का आरोप लगा था. 2 लोग उसे पीटने पर उतारू थे. उन से जान बचा कर विनोद किसी तरह तिलकामांझी थाने के पास पहुंच गया. तब पुलिस ने उसे बचाया था. जो लोग उस की पिटाई करने पर उतारू थे उन्होंने पुलिस को बताया कि एक बैंक के एटीएम बूथ के पास विनोद ने किसी लड़की का मोबाइल फोन छीना है.

उन की यह बात सुन कर पुलिस भी चौंकी क्योंकि जिस आदमी के दोनों हाथ ही कंधों से न हों, वह किसी का मोबाइल कैसे छीन सकता है. तब उन दोनों युवकों ने पुलिस की उस लड़की से भी बात कराई. जिस का मोबाइल छीनने का वह आरोप लगा रहे थे. वह लड़की रंजना ही निकली और जो 2 आदमी विनोद को पीट रहे थे उन में एक रंजना का बहनोई और दूसरा मौसेरा भाई था.

रंजना ने पुलिस को बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल छीना नहीं था बल्कि कई दिन पहले ले लिया था जो अब लौटा नहीं रहा है. पुलिस ने विनोद से मोबाइल फोन ले कर रंजना के बहनोई को दे दिया.

रंजना और उस के घर वाले चाहते थे कि विनोद रंजना का पीछा छोड़ दे. लेकिन विनोद नहीं मान रहा था. उस से पीछा छुड़ाने के लिए उन्होंने उस पर लूटपाट का झूठा आरोप लगाया था.

विनोद ने पुलिस को बताया कि रंजना उस की बीवी है, जो लोदीपुर इलाके में रहती है. वह नए साल पर उसे गिफ्ट देने आया था. इतना ही नहीं उस ने अपने मोबाइल में रंजना की और अपनी विवाह की तसवीरें भी दिखाईं.

विनोद तैराकी के बटरफ्लाई स्ट्रोक में माहिर था. उस ने सन 2005 और 2008 के बीजिंग पैरा ओलांपिक के अलावा 2011 में कई नैशनल और इंटरनैशनल तैराकी प्रतियोगिताओं में भाग लिया था. कई प्रतियोगिताओं में वह भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुका था. सन 2006 में मलेशिया में आयोजित ऐशियाई खेलों में भी उस ने भाग लिया था.

इस के बाद सन 2007 में ताइवान में आयोजित वर्ल्ड ऐम्प्यूटी स्पोर्ट और जरमन ओपन में हिस्सा ले चुका था. 2008 में वह तैराकी का इंटरनैशनल चैंपियन बना था. जर्मनी में तैराकी प्रतियोगिता में उसे गोल्ड मैडल मिला था. उस की इस उपलब्धि पर बिहार और बंगाल सरकार ने उसे कई पुरस्कारों से सम्मानित भी किया था.

साल 2012 में विनोद को खेल कोटा से बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग में क्लर्क की नौकरी मिली थी. शनिवार और रविवार को वह कोलकाता जा कर तैराकी का अभ्यास करता था.

अपनी विकलांगता को अपना हथियार बनाने वाले विनोद ने कभी हिम्मत नहीं हारी. उस के दोनों हाथ नहीं थे इस के बावजूद भी वह पैरों से ही सारा काम कर लेता था. घरेलू काम हो चाहे औफिस का काम हो, वह सारा काम पैरों से ही करता था. मोबाइल फोन से ले कर कंप्यूटर तक वह बिना किसी अवरोध के पैरों से ही चला लेता था.

रंजना के पिता राधाकृष्ण मंडल स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करते थे. वह रिटायर हो चुके हैं. चूंकि विनोद के पिता ने रंजना के घर वालों पर ही आरोप लगाया था इसलिए पटना के एसएसपी मनु महाराज के निर्देश पर पुलिस ने रंजना, उस के पिता राधाकृष्ण मंडल, मां सबरी देवी, बहनोई शंभू मंडल को हिरसत में ले कर पूछताछ की तो उन्होंने विनोद की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. पूछताछ में पता चला कि खेल कोटे के तहत नौकरी का फार्म भरने के लिए रंजना बिहार सचिवालय में गई तो वहीं पर उस की मुलाकात विनोद से हुई थी. बाद में दोनों के बीच संबंध और गहरे हो गए.

रंजना ने कई चौंकाने वाली बातें पुलिस को बताईं. उस ने बताया कि वह विनोद से प्यार करती थी. पर उस ने खुद के शादीशुदा होने की बात उस से छिपाई. जब उसे पता चला कि विनोद 2 बच्चों का बाप है तो उस ने विनोद से दूरी बनानी शुरू कर दी.

रंजना के फोन में विनोद के साथ खींचे गए कुछ फोटो खास पलों के थे. विनोद ने उस का फोन अपने पास रख लिया. वह उन फोटो को सार्वजनिक करने की धमकी दे कर रंजना पर शादी का दबाव बना रहा था. पर रंजना उस से शादी तो दूर बल्कि उस से मिलना तक नहीं चाहती थी. बाद में रंजना की नौकरी सीतामढ़ी के डीएवी स्कूल में लग गई. लेकिन विनोद उस से मिलने उस के स्कूल में भी पहुंच जाता था.

रंजना ने बताया कि विनोद पैरों से ही मोबाइल फोन को पकड़ कर सेल्फी भी खींच लेता था. इतना ही नहीं वह पैरों से ही सिगरेट जला कर पी लेता था. कई बार जब वह उस से मिलने भागलपुर पहुंचता था और उस के घर वाले घर का दरवाजा नहीं खोलते थे तो वह बरामदे में ही घंटों बैठा रहता था. उस दौरान वह पैरों से ही माचिस जला कर सिगरेट जला लेता था और कश पर कश लेता रहता था.

रंजना की मां सबरी देवी ने रोतेरोते पुलिस से कहा कि परिवार की इज्जत बचाने के लिए गलत काम करना पड़ा. विनोद रंजना को ही नहीं बल्कि पूरे परिवार को ब्लैकमेल कर रहा था. रंजना और विनोद के रिश्तों की वजह से समाज में उस के परिवार की काफी बदनामी हो रही थी. छोटी बेटी का विवाह पक्का हो चुका था. विनोद की धमकी के बाद परिवार के लोगों को इस बात का अंदेशा था कि कहीं विनोद की वजह से बेटी का रिश्ता न टूट जाए. इसलिए परिजनों ने विनोद को यह समझाने की कोशिश की बेटी की शादी तक चुप रहे पर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था.

रंजना की बहन की शादी की तारीख जैसेजैसे नजदीक आती जा रही थी वैसेवैसे रंजना के घर वाले परेशान हो रहे थे. क्योंकि विनोद रंजना पर साथ रहने का दबाव  बढ़ा रहा था. 6 मार्च, 2017 को रंजना की बहन की शादी की तारीख निश्चित हो गई. रंजना को डर लगने लगा था कि विनोद और उस के अवैध संबंधों की बात बहन के ससुराल वालों को पता चल गई तो शादी टूट सकती है.

रंजना ने मिलने के लिए उसे भागलपुर बुलाया ताकि उसे बैठा कर समझाया जाए. विनोद 6 जनवरी को ही भागलपुर रेलवे स्टेशन पहुंच गया. उस समय रात हो गई थी इसलिए वह रेलवे स्टेशन पर ही रुक गया था. 7 जनवरी को वह रंजना से मिलने पहुंच गया. काफी समझाने के बाद भी विनोद अपनी जिद पर अड़ा रहा.

7 जनवरी की सुबह विनोद ने अपने पिता से बात की. पिता को जब पता चला कि वह भागलपुर में रंजना के पास गया है तो उन्होंने उस से कहा कि वह तुरंत लौट आए. पर विनोद ने कहा कि रंजना के भाई बिट्टू ने मिलने के लिए बुलाया है उस से बातचीत कर के लौट आऊंगा.

इस के बाद विनोद ने रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू को फोन कर के कहा कि रंजना के मांबाप से बोल दो कि रंजना से उस की शादी हो चुकी है और अब जल्द से जल्द वह उस की विदाई कर दें. रंजना के बहनोई शंभू मंडल ने पुलिस के सामने कबूल कर लिया कि उस ने रंजना के मौसेरे भाई कमल किशोर उर्फ बिट्टू और उस के एक दोस्त संजीव के साथ मिल कर विनोद का कत्ल किया था. कत्ल के दौरान रंजना वहां मौजूद नहीं थी.

सभी ने पकड़ कर विनोद को जमीन पर पटक दिया. रंजना की मां और संजीव ने उस के पैर पकड़ लिए और बिट्टू उस का गला घोंटने लगा. शंभू ने विनोद के मुंह में गमछा ठूंस कर नाक दबा ली. कुछ ही देर में दम घुटने से विनोद की मौत हो गई. चूंकि रंजना ने ही मिलने के लिए विनोद को भागलपुर बुलाया था इस से वह साबित हो गया कि वह भी विनोद की हत्या की साजिश में शामिल थी.

 पुलिस ने सभी अभियुक्तों से पूछताछ कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. 

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जिद पत्नी बनने की

11 दिसंबर, 2016 की बात है. उत्तर प्रदेश के जिला शिकोहाबाद के थाना मक्खनपुर के 2 कांस्टेबल क्षेत्र में रात्रि गश्त पर निकले थे, तभी उन्होंने मक्खनपुर गांव के ही एक अधबने मकान से जबरदस्त धुआं उठते देखा. वे दोनों उस मकान में घुसे तो प्लास्टिक की बोरियों में आग लगी देखी. उन्होंने इस की सूचना थानाप्रभारी देवेंद्र सिंह और अग्निशमन दल को फोन कर के दे दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी वहां पहुंच गए. उन्होंने जब गौर किया तो उन्हें इंसान के पैर दिखे जिन में बिछुए थे. वह समझ गए कि यह किसी महिला की लाश है. तब तक अग्निशमन दल की टीम भी वहां आ चुकी थी. टीम ने जब आग बुझाई तो वहां वास्तव में एक महिला की लाश निकली. वह लाश झुलस चुकी थी. फिर भी चेहरा इतना तो बचा था कि उस की शिनाख्त हो सकती थी.

गांव के जो लोग वहां इकट्ठे थे, उन से लाश की शिनाख्त कराई तो इकबाल ने उस की पुष्टि अपनी भाभी नरगिस के रूप में की. उस ने बताया कि भाई महबूब की मौत के बाद यह रशीद के साथ रहती थी. रशीद शिकोहाबाद के रुकुनपुरा का रहने वाला था और शिकोहाबाद शहर में संदूक बनाने का काम करता था. प्रारंभिक पूछताछ में पुलिस को काफी जानकारी मिल चुकी थी, इसलिए पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

अज्ञात हत्यारे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने रशीद की तलाश में उस के रुकुनपुरा स्थित घर पर दबिश दी पर वह घर पर नहीं मिला. शिकोहाबाद में जो उस की संदूक की दुकान थी, वह भी बंद मिली. इस से पुलिस को उस पर पूरा शक होने लगा.

रशीद के जो भी ठिकाने थे, पुलिस ने उन सभी जगहों पर उसे तलाशा पर उस का पता नहीं चला. उस ने अपना मोबाइल फोन भी बंद कर रखा था. ऐसे में थानाप्रभारी ने सादे कपड़ों में एक कांस्टेबल को उस के घर पर नजर रखने के लिए लगा दिया.

करीब 15 दिन बाद आखिर एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने रशीद को शिकोहाबाद के बसस्टैंड से हिरासत में ले लिया. वह वहां दिल्ली जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था. थाने ला कर जब उस से नरगिस की हत्या के सिलसिले में पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उस के सामने हालात ऐसे बन गए थे, जिस से उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस के बाद उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

नरगिस पश्चिम बंगाल के रहने वाले सलीम की बेटी थी. सलीम मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार का पालनपोषण कर रहे थे. आज भी ऐसे युवक, जिन की किसी वजह से शादी नहीं हो पाती है, वे पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों का रुख करते हैं. इन राज्यों के कुछ करीब अभिभावक अपनी बेटी के भविष्य को देखते हुए बेटियों का हाथ उन युवकों के हाथ में दे देते हैं. वे बाकायदा सामाजिक रीतिरिवाज से शादी करते हैं. इसी तरह नरगिस की शादी भी उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के रामगढ़ के रहने वाले महबूब से हुई थी.

महबूब का अपना निजी घर था, जहां वह अपने 5 भाइयों के साथ रहता था. कालांतर में उस के 3 बड़े भाई मुंबई चले गए. घर में वह और उस का छोटा भाई इकबाल ही रह गया था. दोनों भाई मजदूरी कर के अपना घर चला रहे थे. नरगिस के आ जाने से उन्हें समय पर पकीपकाई रोटी मिल जाती थी. समय बीतता गया और नरगिस 4 बच्चों की मां बन गई.

नरगिस पति के साथ खुश थी. मांबाप के घर गरीबी के अलावा कुछ नहीं था पर यहां पति और देवर अपनी कमाई ला कर उस के हाथ पर रखते तो वह खुश हो जाती. उस ने भी अपनी जिम्मेदारी से घरगृहस्थी को अच्छे से संभाल लिया था.

महबूब मजदूरी कर के जब घर लौटता तो वह थकामांदा होता था. लेकिन पिछले कुछ दिनों से उस की तबीयत खराब रहने लगी थी. वह शारीरिक रूप से भी कमजोर हो गया था. उसे सांस फूलने की शिकायत हो गई थी. इस की वजह से उस का काम पर जाना भी मुश्किल हो गया था. फिर एक दिन ऐसा आया कि उस ने खाट पकड़ ली. इस के बाद वह फिर उठ नहीं सका.

पति के बीमार होने के बाद नरगिस परेशान रहने लगी. देवर जो कमा कर लाता, उस से घर का खर्च ही चल पाता था. पैसे के अभाव में वह पति का इलाज तक नहीं करा पा रही थी. फिर मजबूरी में उस ने चूड़ी के कारखाने में काम करना शुरू कर दिया. धीरेधीरे गृहस्थी की गाड़ी फिर पटरी पर आ गई पर महबूब को बीमारी ने बुरी तरह जकड़ लिया और इलाज के अभाव में एक दिन उस की मौत हो गई.

पति का साया सिर से उठने के बाद नरगिस बुरी तरह टूट गई और बुरे दिनों में देवर इकबाल ने भी उस का साथ छोड़ दिया. नरगिस को बच्चों की चिंता खाए जा रही थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इसी बीच एक दिन उस की मुलाकात रशीद नाम के एक आदमी से हुई. रशीद रुकुनपुरा थाना शिकोहाबाद का रहने वाला था और मक्खनपुर में संदूक बनाने का काम करता था.

रशीद के साथ नरगिस की मुलाकात तब हुई जब वह अपनी एक पड़ोसन के लिए संदूक खरीदने उस की दुकान पर गई थी. रशीद को अचानक नरगिस अच्छी लगने लगी थी. वह उस से बात करना चाहता था पर उस दिन साथ में दूसरी औरत होने की वजह से बात नहीं कर सका. लेकिन बातचीत कर के उसे पता लग गया था कि वह फिरोजाबाद के रामगढ़ थाने के पास की गली में रहती है.  नरगिस को देखने के बाद रशीद के दिल में खलबली मच गई थी. वह उस से मिलना चाहता था, इसलिए एक दिन वह दुकान बंद कर के थाना रामगढ़ के नजदीक पहुंच कर आसपास के लोगों से नरगिस के बारे में पूछने लगा. लेकिन कोई उसे कुछ नहीं बता पाया. फिर अचानक उसे गली की नुक्कड़ पर नरगिस मिल गई.

नरगिस ने उसे देखा तो कहा, ‘‘अरे, तुम यहां कैसे?’’

‘‘अपने किसी दोस्त से मिलने आया था.’’ रशीद ने बहाना बनाया.

नरगिस ने उसे अपने घर चलने को कहा तो वह उस के साथ चल दिया.

नरगिस के घर पहुंच कर रशीद ने उस के हालात का जायजा लिया. उस के प्रति सहानुभूति दिखाई तो नरगिस के दिल में रुका हुआ लावा भी फूट पड़ा. उस ने बताया कि शौहर की मौत के बाद जिंदगी बहुत मुश्किल हो गई है. रशीद ने महसूस किया कि नरगिस को भी किसी मर्द के सान्निध्य की जरूरत है. इसी का उस ने फायदा उठाने का फैसला लिया. पर नरगिस का दिल टटोलना भी जरूरी था, लिहाजा उस दिन वह कुछ ही देर में फिर से मिलने का वादा कर के चला आया. उस ने नरगिस को अपना मोबाइल नंबर दे दिया और कहा जब भी किसी चीज की जरूरत हो, वह उस से बेझिझक कह सकती है.

नरगिस को भी एक दोस्त की जरूरत थी, अत: धीरेधीरे वे दोनों मोबाइल पर दिल की बातें करने लगे. रशीद जब नरगिस के घर जाता तो बच्चों के लिए कुछ खानेपीने की चीजें भी ले जाता. इस से नरगिस के बच्चे भी उस के साथ घुलमिल गए थे. बातचीत के दौरान नरगिस को यह जानकारी हो गई थी कि रशीद शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों का बाप भी है. लेकिन उसे तो एक सहारे की जरूरत थी इसलिए उस का रशीद के प्रति झुकाव बढ़ता गया. एक दिन नरगिस देर शाम को उस की दुकान पर आई. कुछ देर बाद जब वह जाने लगी तो रशीद ने उस का हाथ पकड़ लिया और आई लव यू कहते हुए अपने मन की बात कह डाली. नरगिस ने उसे घूर कर देखा और तमक कर बोली, ‘‘कुछ देर बाद तुम घर आ जाना. मैं खाना बना कर रखूंगी. तभी बात करेंगे.’’ इस के बाद वह चली गई.

रशीद का दिल बल्लियों उछल रहा था. नरगिस जैसी हसीन औरत का सामीप्य जो उसे मिलने वाला था. उस समय वह भूल गया कि शिकोहाबाद में उस की पत्नी और बच्चे भी हैं. रशीद ने उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा पहले ही दुकान बंद कर दी. फिर कुछ देर इधरउधर टहलता रहा. हलका अंधेरा होने पर उस ने नरगिस के घर का रुख कर दिया. जब वह उस के घर पहुंचा तो देखा कि उस के बच्चे सो चुके थे और वह उस का इंतजार कर रही थी.

औपचारिक बातचीत के बाद नरगिस ने खाना लगा दिया. रशीद ने नरगिस को भी साथ बैठा कर खाना खिलाया. खाना खाने के बाद वह उसे कमरे में ले आई. अब कमरे में रशीद और नरगिस के अलावा तनहाई थी जो उन्हें कोई गुनाह करने को उकसा रही थी. उस रात उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कीं. रात काली और लंबी जरूर थी लेकिन उन के लिए खुशनुमा थी. सुबह रशीद ने चलते समय कुछ रुपए नरगिस के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘ये खर्चे के लिए हैं.’’ फिर बोला, ‘‘तुम खाना बहुत अच्छा बनाती हो.’’ नरगिस भी हंसते हुए बोली, ‘‘आज से तुम्हें ये खाना रोज मिलेगा.’’

रशीद चला गया पर नरगिस का अधूरापन पूरा कर गया था. वह खुश थी. उसे एक सहारा मिल गया था. शाम को उस ने खाना बनाया और टिफिन ले कर रशीद की दुकान पर पहुंच गई. उसे देखते ही रशीद बोला, ‘‘अरे तुम यहां, मैं तो अपने घर शिकोहाबाद जाने वाला था.’’

‘‘हां, चौंक क्यों रहे हो. जब रोज शाम का खाना तुम्हें यहीं मिल जाया करेगा. तब शिकोहाबाद जा कर क्या करोगे.’’ वह बोली.

इस के बाद नरगिस का रशीद की दुकान पर आनाजाना होने लगा. रशीद को जब रोजाना ही शाम का खाना मिलने लगा तो उस ने शिकोहाबाद में अपने घर जाना बंद कर दिया. कई दिनों तक वह घर नहीं गया तो उस की पत्नी सलमा को चिंता होने लगी. उस ने पति को फोन किया तो रशीद ने दुकान पर काम ज्यादा होने का बहाना कर दिया. फिर एक दिन रशीद नरगिस को बताए बिना अपने घर चला गया. नरगिस जब खाना ले कर उस की दुकान पर पहुंची तो दुकान का ताला बंद देख कर उस ने रशीद को फोन मिलाया. तब उसे उस के घर जाने की जानकारी मिली. अगले दिन रशीद आया तो नरगिस ने उस से शिकायत की.

उस ने रशीद से कहा कि उस का रोजरोज दुकान पर आना ठीक नहीं है. उस ने उसे मक्खनपुर में ही किराए का कमरा लेने की सलाह दी. रशीद को उस की सलाह उचित लगी. इसलिए उस ने मक्खनपुर में किराए का कमरा ले लिया. अब नरगिस वहीं शाम का खाना ले कर पहुंच जाती और फिर सारी रात प्रेमी के आगोश में होती थी. करीब 6 महीने तक उन दोनों के बीच गुपचुप तरीके से संबंध बने रहे. कभीकभी नरगिस यह सोच कर डरती थी कि कहीं रशीद उसे छोड़ न दे. उस का रशीद पर कोई कानूनी हक तो था नहीं, जो वह उस पर अधिकार जताती. वह रशीद के मन की बात टटोलना चाहती थी. एक दिन बातों ही बातों में नरगिस ने उस की पत्नी सलमा के बारे में कुछ कह दिया तो रशीद भड़क उठा. नरगिस को लगा कि अभी सही वक्त नहीं आया है. रशीद को अपना बनाने में कुछ वक्त देना होगा और कुछ ऐसा करना होगा जिस से वह पत्नी को छोड़ उसी का हो जाए.

वक्त आगे बढ़ रहा था पर नरगिस के गलीमोहल्ले वालों में नरगिस और रशीद के संबंधों की बात फैल गई थी. इकबाल चूंकि रिक्शा चला कर देर रात को लौटता था इसलिए उसे भाभी के बारे में कुछ भी पता नहीं था. एक दिन एक पड़ोसी ने उस से कहा, ‘‘इकबाल, तुम अपनी भाभी पर नजर रखो. कहीं किसी दिन वह बच्चों को छोड़ कर भाग गई तो बच्चे तुम्हारे गले पड़ जाएंगे.’’ यह सुन कर इकबाल चिंतित हो उठा. उस ने उस पड़ोसी से पूछताछ की तो उसे भाभी की सच्चाई पता चली. यह बात इकबाल को पसंद नहीं आई. उस ने नरगिस को समझाने की कोशिश की तो नरगिस ने घूर कर उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘भाई की मौत के बाद तुम ने कभी जानने की कोशिश की कि मैं किस हाल में रहती हूं, बल्कि घर की जिम्मेदारी उठाने के बजाय तुम ने मुझे अकेला छोड़ दिया. बेहतर यही है कि तुम मेरी जिंदगी में टांग मत अड़ाओ.’’

इकबाल के पास इस का कोई जवाब नहीं था. अब नरगिस के मन में एक ही ख्वाहिश थी और वह यह थी कि रशीद की रखैल से अब बीवी कैसे बने. वह रशीद को बताती कि उस के मोहल्ले वाले और देवर उस के खिलाफ हो रहे हैं. तब रशीद उसे समझाता कि जमाना तो कुछ न कुछ कहता ही है. हमें जमाने से लड़ना थोड़े ही है. रशीद की बातों से नरगिस को समझ में आने लगा था कि वह उसे सिर्फ इस्तेमाल कर रहा है. वह रिश्ते के प्रति गंभीर नहीं है और न ही उस का उस से निकाह करने का ही कोई इरादा है. इधर रशीद सोच रहा था कि वह नरगिस से मोहब्बत करता है और बदले में उस का खर्चा उठाता है. इतना ही बहुत है. दोनों के बीच की कशमकश रिश्ते में खटास ला रही थी. अब तो नरगिस उसे शिकोहाबाद जाने से भी रोकती थी.

इसी बीच रशीद की बीवी को भनक लग गई कि उस के शौहर ने फिरोजाबाद में भी कोई औरत रखी हुई है. यह जानकारी मिलते ही सलमा परेशान हो गई और एक दिन जब रशीद घर आया तो उस ने साफ कह दिया कि वह अपने मायके चली जाएगी और मांबाप को सब कुछ बता देगी. सलमा की इस धमकी से रशीद परेशान हो गया. वह दो नावों पर सवार था. अब उसे डूबने से डर लगने लगा. नरगिस इतनी करीब आ चुकी थी कि उसे छोड़ना भी मुश्किल था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इधर नरगिस ने भी तय कर लिया कि वह सलमा को रशीद की जिंदगी से निकाल देगी. एक दिन उस ने रशीद से साफसाफ कह दिया, ‘‘बहुत हो गया. अब तुम्हें फैसला करना ही होगा.’’

‘‘कैसा फैसला?’’ रशीद चौंकते हुए बोला.

‘‘आखिर मैं कब तक तुम्हारी रखैल बन कर रहूंगी. सलमा को तलाक दो और मुझ से निकाह करो.’’ नरगिस अपनी बातों पर जोर देते हुए बोली. रशीद को नरगिस की यह बात इतनी बुरी लगी कि उस ने उस के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया और कहा, ‘‘आगे से कभी सलमा को तलाक देने की बात मुंह से मत निकालना.’’

नरगिस को भी गुस्सा आ गया. वह बोली, ‘‘तुम ने मुझे मारने की हिम्मत की. अब मैं भी बताती हूं कि या तो मुझ से निकाह करो वरना मैं कुछ भी कर सकती हूं.’’

रशीद नरगिस की धमकी से डर गया कि कहीं यह उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज न करा दे. वह किसी चक्कर में नहीं पड़ना चाहता था. इसलिए उस ने अपना व्यवहार सामान्य कर के उसे समझाया. पर मन ही मन उस ने उस से छुटकारा पाने का फैसला कर लिया. वह इस का उपाय ढूंढने लगा. रशीद ने अब नरगिस से मिलनाजुलना कम कर दिया. वह दुकान बंद कर के किराए के कमरे पर आने के बजाए शिकोहाबाद स्थित अपने घर चला जाता था. नरगिस के पूछने पर कोई न कोई बहाना बना देता था. नरगिस रशीद को खोना नहीं चाहता थी क्योंकि वह घर चलाने के पैसे जो देता रहता था.

नरगिस से अवैध संबंधों की बात रशीद की ससुराल तक पहुंच गई थी. अब रशीद को बदनामी से भी डर लगने लगा. वह समझ गया कि इस की वजह से समाज और रिश्तेदारी में उस की बेइज्जती हो सकती है इसलिए नरगिस नाम के कांटे को जीवन से जल्द निकालने का उस ने फैसला ले लिया. इस के बाद किसी न किसी बात को ले कर उस का नरगिस से झगड़ा होने लगा. तनाव की वजह से उस का धंधा भी चौपट हो चुका था. जिस मकान को उस ने नरगिस को किराए पर दिलाया था, वहां के आसपड़ोस वालों को भी दोनों के झगड़े की जानकारी हो चुकी थी, पर कोई भी उन के मामले में दखल नहीं देता था. जिस मकान में नरगिस रहती थी, वह अधबना था. मकान मालिक वहां नहीं रहता था.

12 दिसंबर, 2016 को दुकान बंद कर के रशीद नरगिस के पास कमरे पर पहुंचा. खाना खाने के बाद नरगिस ने पूछा, ‘‘तुम ने फैसला कर लिया?’’ ‘‘कैसा फैसला? देखो नरगिस, मैं तुम जैसी औरत के लिए अपने बीवीबच्चों को हरगिज नहीं छोड़ सकता.’’ वह दृढ़ता से बोला. ‘‘मुझ जैसी औरत….आखिर तुम कहना क्या चाहते हो? पहले तो बड़ीबड़ी बातें करते थे. इस का मतलब यह हुआ कि अब तक तुम केवल मेरा इस्तेमाल कर रहे थे. ठीक है, अब देखना मैं क्या करती हूं.’’ कह कर जैसे ही वह उठने लगी, रशीद ने उसे धक्का दे कर गिरा दिया और झट से उस के सीने पर बैठ गया. वह उस का गला तब तक दबाए रहा जब तक वह मर नहीं गई. कुछ ही देर में नरगिस की लाश सामने थी और जुनून उतर चुका था. पुलिस का डर उसे सताने लगा था. लाश ठिकाने लगाने के लिए वह उसे अधबने कमरे में ले गया और उस पर वहां मौजूद प्लास्टिक की बोरियां डाल कर आग लगा दी. इस के बाद वह वहां से फरार हो गया.

कुछ देर बाद गश्ती सिपाही वहां से गुजर रहे थे तो मकान से धुआं निकलता देख वे मकान के अंदर चले गए. तब मामला दूसरा ही सामने आया.

रशीद से पूछताछ कर पुलिस ने उसे 28 दिसंबर, 2016 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.?

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सारा अली खान की डेब्यू फिल्म की कुछ अलग है थीम

कई महीनों से चर्चे थे कि सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान करण जौहर की निर्माण संस्था से डेब्यू करेगी. बीते दिनों निर्देशक अभिषेक कपूर ने सारा के साथ फिल्म "केदारनाथ” की घोषणा करके सभी के मन को शांत कर दिया है. फिल्म अनाउंसमेंट का छोटा सा वीडियो केदारनाथ में धूनी रमाने वाले बाबाओं को भी दिखा रहा है.

सारा के अपोजिट फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत हैं. इन्हें देखकर लगता है फिल्म सिर्फ एक अन्य लोकेशन पर बेस्ड लव स्टोरी है. फिल्म केदारनाथ अंचल की प्रेम कहानी जरूर है, लेकिन दिल दहलाने वाले उस हादसे को भी पर्दे पर लाएगी. फिल्म के क्लाइमेक्स का बड़ा हिस्सा इसी के बीच दिखाया जाएगा.

2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ और लैंडस्लाइड ने काफी तबाही मचाई थी. करीब पांच हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गयी थी. चारधाम का प्रसिद्ध शिव मंदिर "केदारनाथ' भी क्षतिग्रस्त हो गया था. खूबसूरत और शांत प्रदेश लगभग बर्बाद हो गया था. दस हजार से ज्यादा सैनिक यहां रेस्क्यू के लिए कई दिनों तक काम करते रहे थे.

निर्देशक अभिषेक कपूर ने अब तक अलग सब्जेक्ट पर ही फिल्मे बनाई हैं. “रॉक ऑन”, “काय पो छे” उनकी बनाई हिट फिल्म्स रही हैं. पिछली फिल्म "फितूर” गलत स्टारकास्ट और ओवर बजट होने के कारण बड़ी फ्लॉप रही. इस फिल्म में अभिषेक बजट का पूरा ख्याल रख रहे हैं. हर हाल में फिल्म का बजट बेहद सीमित रखे जाने की पूरी प्लानिंग की गई है. फिल्म के हीरो सुशांत सिंह राजपूत ने फितूर के लिए हामी भरने के कई महीनों बाद फिल्म से बैकआउट कर लिया था. अब वे फिर अभिषेक के साथ हैं.

राज कपूर कनेक्शन

राज कपूर की फिल्म "राम तेरी गंगा मैली' ऐसी कहानी थी जिसके बड़े हिस्से की शूटिंग उत्तराखंड में हुई थी. इस बीच किसी भी फिल्म की पूरी शूटिंग उस क्षेत्र में नहीं हुई. 1985 की इस फिल्म के 37 साल बाद अभिषेक की फिल्म की लगभग पूरी शूटिंग वहीं होगी. इसके अलावा मुंबई में कुछ सेट लगाए जाएंगे. फिल्म में वीएफएक्स का भी बड़ा काम होगा.

परिवार कनेक्शन

2005 में मुंबई शहर भी बरसात की बाढ़ से डूब गया था. इसे 2009 में आई सोहा अली खान और इमरान हाश्मी की फिल्म "तुम मिले” में प्रमुखता से दिखाया गया था. मानवीय कहानी और त्रासदी से जुडी लव स्टोरी वाली फिल्म में सोहा को बहुत सराहना मिली थी. अब उनकी भतीजी सारा भी प्राकृतिक आपदा के बीच प्रेम कहानी को पर्दे पर ला रही हैं.

चैंपियंस ट्रॉफी : किस खिलाड़ी के नाम रहा कौन सा अवॉर्ड

आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पाकिस्तान ने गत विजेता भारत को 180 रनों के बड़े अंतर से हराकर पहली बार खिताब पर कब्जा किया. पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 338/4 का विशाल स्कोर बनाया था, जिसके जवाब में भारतीय टीम सिर्फ 158 रन ही बना सकी.

पाकिस्तान की तरफ से 114 रनों की शानदार पारी खेली साथ ही मोहम्मद आमिर ने भी शानदार गेंदबाजी की, वहीं भारत की दिग्गज बल्लेबाजी बुरी तरह फ्लॉप रही.

पाकिस्तान के लिए यह खिताब बेहद खास रहा. खिताब जीतने के बाद खिलाड़ियों पर इनामों की बौछार भी हुई. आइए आपको बताते हैं कि किस खिलाड़ी को किस इनाम से नवाजा गया.

चैंपियंस ट्रॉफी 2017 (पाकिस्तान)

साल 2017 के आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब पाकिस्तान ने अपने नाम किया. पाकिस्तान ने भारत को 180 रनों से हराकर इस खिताब पर कब्जा जमाया. पाकिस्तान की टीम ने पहली बार चैंपियंस ट्रॉफी पर कब्जा किया है. इस खिताब को जीतने के साथ ही पाकिस्तान आईसीसी के तीनों खिताब (विश्व कप, टी20 विश्व कप, चैंपियंस ट्रॉफी) जीतने वाली कुल चौथी टीम बन गई है.

मैन ऑफ द मैच अवॉर्ड (फखर जमान)

पाकिस्तान के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज फखर जमान को आतिशी पारी के लिए मैन ऑफ द मैच का खिताब दिया गया. जमान ने भारत के खिलाफ बेहतरीन बल्लेबाजी करते हुए (114) रनों की पारी खेली. भारत के खिलाफ अपने पहले शतक के दौरान जमान ने 12 चौके और 3 गगनचुंबी छक्के ठोके.

गोल्डन बैट अवॉर्ड (शिखर धवन)

चैंपियंस ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन करने वाले शिखर धवन को पूरे टूर्नामेंट में शानदार बल्लेबाजी के लिए ‘गोल्डन बैट’ के खिताब से नवाजा गया. धवन ने पूरे टूर्नामेंट में 2 अर्धशतक और 1 शतक लगाया. धवन ने (68, 125, 78, 46, 21) रनों की पारी खेली और उन्होंने 5 मैचों में 338 रन बनाए. धवन का सर्वोच्च स्कोर श्रीलंका के खिलाफ 125 रन

गोल्डन बॉल और प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट अवॉर्ड (हसन अली)

पाकिस्तान के तेज गेंदबाज हसन अली को गोल्डन बॉल और प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट के अवॉर्ड से नवाजा गया. हसन अली ने टूर्नामेंट में कुल 13 विकेट झटके. अली ने पूरे टूर्नामेंट में (1, 3, 3, 3, 3) विकेट लिए. हसन अली का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्श फाइनल मुकाबले में 19 रन देकर 3 विकेट रहा. प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब जीतने वाले अली पाकिस्तान के पहले और दुनिया के छठे खिलाड़ी बने.

आइए नजर डालते हैं इस चैंपियंस ट्रॉफी में बने कुछ आंकड़ों पर.

सर्वाधिक छक्के

हार्दिक पांड्या ने इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा छक्के जड़े. उन्होंने कुल 5 मैचों में 10 छक्के लगाए.

पारी में सबसे बेहतरीन गेंदबाजी

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी जोश हेजलवुड ने किसी भी एक पारी में सबसे अच्छी गेंदजबाजी करने वाले गेंदबाज बनें. न्यूजीलैंड के खिलाफ उनका 9-0-52-6 का स्कोर था.

सबसे बड़ी साझेदारी

चैंपियंस ट्रॉफी में बांग्लादेशी खिलाड़ी शाकिब अल हसन और महमुदुल्लाह ने न्यीजूलैंड के खिलाफ सबसे बड़ी साझेदारी (224 रन) की.

सबसे ज्यादा कैच लेने वाला खिलाड़ी

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ग्लेन मैक्सवेल ने टूर्नामेंट में 3 मैच में 4 कैच लपके.

अगर हम चैंपियंस ट्रॉफी विजेताओं की बात करें तो वो इस प्रकार हैं.

1998: दक्षिण अफ्रीका (फाइनल में वेस्टइंडीज को हराया)

2000: न्यूजीलैंड (फाइनल में भारत को हराया)

2002: भारत एवं श्रीलंका संयुक्त विजेता

2004: वेस्टइंडीज (फाइनल में इंग्लैंड को हराया)

2006: ऑस्ट्रेलिया (फाइनल में वेस्टइंडीज को हराया)

2009: ऑस्ट्रेलिया (फाइनल में न्यूजीलैंड को हराया)

2013: भारत (फाइनल में इंग्लैंड को हराया)

2017: पाकिस्तान (फाइनल में भारत को हराया)

बैंक में निवेश से बेहतर क्यों है म्यूचुअल फंड?

एक निवेशक अपनी कमाई को कितनी बड़ी पूंजी में बदल पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह उसे कैसे और कहां निवेश करता है. शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले कई लोगों ने खूब कमाई की है, लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो अपना सबकुछ खो बैठे हैं. अगर आप शेयर बाजार के जानकार नहीं है तो सीधे उसमें घुसना काफी जोखिम भरा हो सकता है.

यदि आप अपने बेहतर भविष्‍य के लिए पूंजी का निर्माण करना चाहते हैं तो विशेषज्ञों के सुझाए गए रास्‍ते को अपनाएं. यह रास्‍ता है म्यूचुअल फंड का. यहां हम आपको म्‍यूचुअल फंड के बारे में बता रहे हैं. हम आपको बता रहे हैं कि क्यों बैंक निवेश से बेहतर है म्यूचुअल फंड.

क्या है म्यूचुअल फंड

– म्‍यूचुअल फंड शेयर बाजार में निवेश करने का एक बढ़िया और कम जोखिम वाला विकल्प है

– इसमें फंड को अलग-अलग तरह के शेयरों में लगाया जाता है

– म्यूचुअल फंड के पैसे को अनुभवी और बाजार के जानकार लोगों द्वारा शेयर बाजार में निवेश किया जाता है.

बैंक में निवेश से बेहतर क्यों है म्यूचुअल फंड?

1. बैंक में पैसा सुरक्षित तो रहता है लेकिन लेकिन ब्याज दर 7 से 8 फीसदी ही मिलती है.

2. महंगाई दर भी 7 से 8 फीसदी सालाना के आसपास रहती है.

3. बैंक से मिलने वाला रिटर्न महंगाई के असर से बचाने में नाकाम.

4. बैंक में रखने से पैसे की खरीद की ताकत ज्‍यादा नहीं बढ़ पाती.

5. कम समय में ही पैसा वापस चाहिए तो बैंक में रखें.

6. लंबा निवेश करना है तो म्यूचुअल फंड अच्छा विकल्प, म्यूचुअल फंड के लिए धैर्य जरूरी.

7. उतना ही पैसा लगाएं, जिसे आप लंबे समय तक नियमित लगा पाएं.

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