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मायके लौट आना समस्या का हल नहीं

आज विभा का मन बहुत उदास था. यों तो वह हमेशा खुश रहने का प्रयास करती पर न जाने क्यों कई बार उसे लगता कि आज से 30 साल पहले लिया गया निर्णय सही नहीं था. मां तो बचपन में ही गुजर गई थीं. पिता ने बड़ी धूमधाम से उस का विवाह मुंबई के एक कौंट्रैक्टर से किया था. पहली विदाई के बाद जब पति के साथ मुंबई गई तो मन ही नहीं लगा. मायके में आजादी और अपनी मनमरजी से रहने वाली विभा को पति के घर की जिम्मेदारी वाली जिंदगी रास नहीं आ रही थी. हर दूसरे दिन सामान उठा कर पिता और भाईर् के पास आ जाती. भाईभाभी दोनों सर्विस करते थे, इसलिए उन के बच्चे को संभालने से ले कर सारा काम करती और चैन से रहती.

मुंबई में जहां पति के टाइम के अनुसार काम करने, नातेरिश्तेदारी, घर की जिम्मेदारी निभाने जैसे कार्यों से उसे ऊब होती, वहीं यहां सुबह ही भाईभाभी बैंक चले जाते और पूरे घर पर उस का एकछत्र राज रहता. इसी तरह 2-3 साल निकल गए. फिर एक दिन वह हमेशा के लिए भाई के पास मायके आ कर ही रहने लगी. अब तक पिता भी गुजर चुके थे. पिता की ही तरह भाई ने भी उस से कभी कुछ नहीं कहा और उस दिन से ले कर आज 55 साल की हो गई है भाई का घर ही उस का सब कुछ है और उन के अनुसार चलना ही उस की जिंदगी. परंतु कभीकभी कोई बात अंदर तक कचोट जाती.

कहने को अपना

रीमा को भी आज ससुराल छोड़ कर मायके आए 25 साल हो गए हैं. जब आई थी तो मातापिता जीवित थे. ससुराल छोड़ कर आई बेटी को हाथोंहाथ लिया था, पर मातापिता कब तक जीवित रहते. एक दिन दुनिया छोड़ कर चले गए. तब से भाईभाभी के सहारे अपना और 2 बच्चों का जीवनयापन कर रही है. बैंक में नौकरी के कारण आर्थिक तंगी तो नहीं थी पर समाज, रिश्तेदारों और भाभी के ताने मन को अंदर तक तारतार कर देते थे. मगर अब उस ने इसे ही अपनी नियति मान लिया था.

रश्मि शादी के बाद जब ससुराल पहुंची, तो वहां का माहौल उस के मायके से एकदम अलग था. मायके में जहां सभी आजाद खयालों के थे वहीं यहां एकदम दकियानूसी माहौल था. सिर पर पल्ला, बड़ों के सामने बात नहीं करना जैसी कठोर पाबंदियां थीं. ऐसे माहौल में अकसर उस का दम घुटने लगता और पति से कहासुनी हो जाती. फिर एक दिन इसी सब के चलते उस ने अपना सूटकेस उठाया और आ गई मां के पास. मां ने बहुत समझाया परंतु जवानी का जोश और मायके के रोब ने कभी उसे अपने भविष्य के बारे में सोचने का मौका ही नहीं दिया. आज 45 वर्ष की हो गई है, परंतु उस का अपना कहने को कोई नहीं है. भाईभाभी, भतीजेभतीजियां सब अपनीअपनी दुनिया में व्यस्त रहते हैं.

नासमझी में कदम

शादी के बाद ससुराल में तालमेल न बैठा पाने के कारण पति से मनमुटाव हो जाने या मायके का मोह न छोड़ पाने के कारण आवेश में ससुराल छोड़ कर मायके आ जाना आजकल आम बात है. पहले जहां ऐसे केस कम देखने को मिलते थे, वहीं आजकल यह बड़ी आम बात हो गई है. पहले यदि लड़की नासमझी में ऐसा कदम उठा भी लेती थी, तो मातापिता और नातेरिश्तेदार दोनों में सहमति कराने का प्रयास कर के टूटते घर को बचा लेते थे, परंतु आजकल मातापिता भी यह कह कर कि वे लोग अपने को समझते क्या हैं लड़की का साथ देते हैं, जिस से समस्या और अधिक बढ़ जाती है. आम लोगों के अतिरिक्त फिल्मी दुनिया भी इस समस्या से अछूती नहीं है. मशहूर अभिनेत्री बबीता ने आपसी मतभेद के चलते पति रणधीर कपूर का घर अपनी दोनों बेटियों करिश्मा और करीना के साथ छोड़ दिया और स्वयं नौकरी कर के अपनी बेटियों को काबिल बनाया.

कदम कदम पर संघर्ष

करिश्मा कपूर का विवाह संजय कपूर के साथ बड़ी धूमधाम से हुआ था, परंतु कुछ वर्षों तक साथ रहने के बाद वे भी अपने 2 बच्चों के साथ अपने मातापिता के पास आ गईं.

अपने समय की जानीमानी अभिनेत्री पूनम ढिल्लो भी पारस्परिक मनमुटाव के चलते पति अशोक ठकेरिया का घर छोड़ कर अपनी बहन के घर आ गईं और बाद में हौंगकौंग के एक व्यवसायी से विवाह कर लिया.

विवाह के बाद एक महिला और पुरुष दोनों की ही नई जिंदगी शुरू होती है. जीवन की यह पारी नवीन जिम्मेदारियों, नए रिश्तों और नित नई चुनौतियों से भरी होती है. इस का कारण होता है कि 2 व्यक्ति अलगअलग परिवेश से आ कर एक प्लेटफौर्म पर मिलते हैं, तो विचारों, पसंदनापसंद, प्राथमिकताओं आदि में मतभेद होना स्वाभाविक है. अत: शुरू में सभी को तालमेल बैठाना ही होता है. पतिपत्नी को परस्पर एकदूसरे को समझना ही होता है, साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों के साथ भी तालमेल बैठाना होता है. महिला चूंकि परिवार की केंद्रबिंदु होती है, इसलिए उस पर जिम्मेदारियों का भार अधिक होता है. कई बार ससुराल के लोगों को समझने में काफी वक्त लग जाता है, परंतु यदि थोड़ी समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए, तो धीरेधीरे सभी परिस्थितियां मनोनुकूल हो जाती हैं.

पहाड़ सी जिंदगी

कई बार भावावेश में आ कर महिलाएं अपनी ससुराल या पति का घर छोड़ तो देती हैं और उस समय अकसर मायके वाले भी हाथोंहाथ लेते हैं, परंतु समय बीतने के साथसाथ मायके वालों का व्यवहार बदलने लगता है. यह स्थिति तब और खराब हो जाती है जब लड़की आत्मनिर्भर नहीं होती, क्योंकि ऐसी स्थिति में उसे अपने और बच्चों के दैनिक जीवन के खर्चों के लिए भी मातापिता या भाईबहन का मुंह देखना पड़ता है. कई बार तो भाईभाभी और बहनें बच्चों में ही फर्क करना शुरू कर देती हैं, जो किसी भी महिला के लिए असहनीय होता है. उस समय यह पहाड़ सी जिंदगी दुश्वार लगने लगती है.

बच्चों पर प्रभाव

जब एक महिला अपने बच्चों को ले कर मायके आ जाती है, तो उस की जिंदगी के साथसाथ उस के बच्चों की जिंदगी पर भी बहुत प्रभाव पड़ता है. कई बार तो बच्चे अपने चचेरेममेरे भाईबहनों के पिताओं को देख कर अवसाद तक में चले जाते हैं कि उन के पिता नहीं  हैं. उन्हें अपना परिवार अधूरा सा लगता है, क्योंकि एक बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए जितनी मां की आवश्यकता होती है उतनी ही पिता की भी होती है.

सामाजिक स्थिति

भारतीय समाज पुरुषप्रधान है. यह सही है कि आज महानगरों में अधिकांश महिलाएं अकेली रहती हैं, परंतु विवाह हो जाने के बाद मायके में रहने वाली महिला को सवालिया निगाहों से देखा जाता है. कई बार ऐसी महिला से दूसरी महिलाएं भी अपनेआप को दूर ही रखती हैं ताकि वह कहीं उन के पति पर डोरे न डालने लगे. इस के अतिरिक्त पुरुषों की कामुक निगाहों की भी वह अकसर शिकार हो जाती है, क्योंकि पुरुषों को वह बेचारी नजर आती है, जिस की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता.

स्वयं के जीवन पर प्रभाव

मायके वालों के सहारे कब तक जीवन व्यतीत किया जा सकता है. जब शादी होती है तो आप को ऐसा लाइफपार्टनर मिलता है, जो जीवन के हर मोड़ पर आप का साथ देने के लिए खड़ा रहता है, जिस से आप घरपरिवार, समाज, बच्चों और अपने बारे में खुल कर बात कर सकती हैं. जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब आप बच्चों से हर बात शेयर नहीं कर सकतीं, साथ ही जीवन में आने वाली समस्याओं को भी अकेले ही झेलना पड़ता है. इसीलिए अकसर अपने परिवार को छोड़ कर मायके में रहने वाली महिलाओं को मानसिक असंतोष के चलते डिप्रैशन और ब्लडप्रैशर जैसी बीमारियां हो जाती हैं.

अनिश्चित भविष्य

एक समय पर बच्चों की अपनी जिंदगी शुरू हो जाती है. वे उस में मस्त हो जाते हैं. आप की न ससुराल रहती है और न मायका, क्योंकि एक निश्चित समय के बाद मायके वाले भी कन्नी काटते हैं. ऐसे में भविष्य अनिश्चित हो जाता है. पति के साथ होने से आप अपनेआप को सुरक्षित महसूस करती हैं. आजकल के बच्चे अपने मातापिता का ध्यान नहीं रख पाते. ऐसे में आप के लिए उन के जीवन में कहां जगह होगी. पति का घर आप का अपना घर होता है जहां आप पति के न रहने पर भी आराम से जीवन व्यतीत कर सकती हैं.

आर्थिक संकट

घरेलू महिला जब पति का घर छोड़ कर मायके आ जाती है, तो उस के सामने सब से बड़ा संकट आर्थिक होता है. ऐसे में अपने दैनिक जीवन की जरूरतों तक के लिए उसे मायके वालों का मुंह देखना पड़ता है. उसे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन पर निर्भर रहना पड़ता है. इसी प्रकार हारीबीमारी में भी दूसरों का मुहताज होना पड़ता है. यदि वह आर्थिक रूप से सक्षम है, तो उसे मायके वालों की अर्थिक जरूरतों को भी पूरा करना पड़ता है. ऐसी स्थिति में उस के पैसों पर उन की पूरी नजर होती है.

फिल्मी दुनिया की बात अलग होती है. वहां तो दूसरी शादी भी सहजता से हो जाती है, दूसरे उन्हें आर्थिक संकट भी नहीं होता, परंतु भारतीय समाज में एक महिला के लिए दूसरी शादी करना भी उतना आसान नहीं होता. इस के अतिरिक्त यदि बच्चे हैं, तो नया पिता उन्हें स्वीकार करेगा या नहीं इस में भी संदेह होता है. आमतौर पर ऐसे मामलों में महिला को ही दोषी ठहराया जाता है कि पति के साथ ऐडजस्ट नहीं किया होगा, क्योंकि भारतीय समाज में पुरुषों के लिए कोई बंधन है ही नहीं. आश्चर्य की बात यह है कि महिला को ताने मारने में महिलाएं ही सब से आगे होती हैं. कई बार वे ताने इतने तीखे होते हैं कि सहने मुश्किल हो जाते हैं.

यह यही है कि कई बार ससुराल या पति के घर में स्थितियां इतनी विपरीत होती हैं कि पति का घर या ससुराल छोड़ कर मायके आने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता, परंतु छोटीमोटी वजहों को नजरअंदाज कर के परस्पर वैवाहिक जीवन का आनंद लेने में ही परिवार और आप की भलाई होती है. वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए छोटेमोटे समझौते और त्याग भी करने पड़ते हैं और उसी में आप के वैवाहिक जीवन की सार्थकता है.   

सरकार धर्म की दुकानदार

चीन आजकल छलांगें मार रहा है जैसे पहले जापान व उत्तर कोरिया ने मारी थीं. इस की एक बड़ी वजह यह है कि चीनी लोगों पर धर्म का बोझ सब से कम है. जापान और कोरिया भी किसी खास धर्म में विश्वास नहीं रखते. स्कैंडेनेवियन देश स्वीडन, नौर्वे आदि भी निधर्मियों से भरे हैं.

जिन देशों में धर्मों का बोलबाला है वहां आमतौर पर विवाद छाए रहते हैं. वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, पारिवारिक व मौलिक उलझनों के इतने शिकार रहते हैं कि उन्हें कुछ करनेधरने की फुरसत ही नहीं होती. चीन जब तक कम्यूनिज्म को एक धर्म की तरह मान रहा था वह पिछड़ रहा था पर जैसे ही माओत्से तुंग के बाद उस ने कम्यूनिस्ट धर्म का लबादा फेंक दिया वह तरक्की की राह पर चल पड़ा और चीन आज प्रति व्यक्ति आय में कुलांचें भर रहा है हालांकि जापान और दक्षिणी कोरिया से वह बहुत पीछे है.

धर्म की जकड़नों की शिकार सब से ज्यादा औरतें होती हैं. उन्हें समाज जानबूझ कर धार्मिक ढकोसलों में फंसाए रखता है ताकि वे पुरुषों की गुलामी करती रहें और चुपचाप रसोईर् और बच्चों में फंसी रहें. पुरुष सोचते हैं कि उन्हें इस तरह सुख मिलता है पर असल में वे ही नुकसान में रहते हैं, क्योंकि एक तो औरतों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है और दूसरे उन की बहुत सी शक्ति औरतों को कैदियों के रूप में रखने और खुद जेलर बने रहने में खर्च हो जाती है. कैदखानों में जेलरों और सिपाहियों को वेतन मिलता हो पर आय तो नहीं होती. इसी तरह धार्मिक जेल में औरतों को ठूंसने से पुरुष खुद अधकचरे रह जाते हैं.

जिन देशों में पिछले दशकों में निधर्मियों की गिनती बढ़ी है वे ज्यादा सुखी हैं, ज्यादा तरक्की कर रहे हैं. वियतनाम, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, साउथ अफ्रीका, आयरलैंड, कनाडा, आस्ट्रिया, जरमनी इस बात के सुबूत हैं. पिछले दशक में भारत ने खासी उन्नति की थी, क्योंकि 2004 के बाद धर्म का बोलबाला धीमा पड़ गया था और 1993 का राम मंदिर हल्ला कम हो गया था.

भारत में सरकार अब धर्म की सब से बड़ी दुकानदार बन गई है और इस का सीधा नुकसान औरतों को होता है. चाहे रामायण की सीता हो या महाभारत की द्रौपदी और राधा धार्मिक कारणों से ही उन्हें तरहतरह के कष्ट सहने पड़े और इन के  पति या प्रेमी औरतों के धर्मसम्मत स्थान को बचाने के लिए लड़ते फिरते रहे. उन्होंने विकास के कार्य किए हों, यह इन ग्रंथों में तो कहीं है नहीं.

धर्म से आजादी का अर्थ ही है मुंह खोलने और मनचाहा करने की आजादी. फिल्म ‘दंगल’ की गीता और बबीता जिन सामाजिक बंधनों के कारण बंधी थीं वे धर्म के दिए हुए हैं और अब कम से कम समाचारपत्र इन के असर की घटनाओं की रिपोर्ट तो कर देते हैं. कुछ समय पहले तक तो धार्मिक अत्याचार की शिकार औरतों की कहानियां खबरें तक नहीं बनती थीं, क्योंकि वह तो सामान् बात थी.

पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई ने मुंह खोल कर कट्टरता पर तमाचा मारा पर धर्म इतना अक्खड़ है कि वह छोटीमोटी दुर्घटनाओं से डरता नहीं.

भारत को उन्नति करनी है तो अंगरेजों, मुगलों, तुर्कों, अफगानों, शकों, हूणों के राज की जंजीरों से नहीं, बल्कि धर्म की जंजीरों से मुक्ति की कोशिश करनी होगी.

आज धर्म का बाजार गरम है और आर्थिक मटियामेट के आसार नजर आ रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी को योग के साथ धार्मिक अनुष्ठान के रूप में बेचा गया है और औरतों ने इस में जो खोया है या जो खोएंगी उस की गिनती करना असंभव है. इस का असर 4-5 साल बाद दिखेगा जब भारत एक पिछड़ा देश रह जाएगा और चीन (और उस का पिट्ठू पाकिस्तान भी) कहां के कहां होंगे.

बुआ के दिल ने जब भतीजे को छुआ

वेदराम बेहद सीधासादा और मेहनती युवक था. वह उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के एक चूड़ी कारखाने में काम करता था, जबकि उस के बीवीबच्चे कासगंज जिले के नगला लालजीतगंज में रहते थे. यह वेदराम का पैतृक गांव था. वहीं पर उस का भाई मिट्ठूलाल भी परिवार के साथ रहता था.

जिला कासगंज के ही थाना सहावर का एक गांव है बीनपुर कलां. यहीं के रहने वाले आलम सिंह का बेटा नेकसे अकसर नगला लालजीतगंज में अपनी बुआ के घर आताजाता रहता था. उस की बुआ की शादी वेदराम के भाई मिट्ठूलाल के साथ हुई थी.

वेदराम की पत्नी सुनीता पति की गैरमौजूदगी में भी घर की जिम्मेदारी  ठीकठाक निभा रही थी. वह अपनी बड़ी बेटी की शादी कर चुकी थी. जिंदगी ने कब करवट ले ली, वेदराम को पता ही नहीं चला. पिछले कुछ समय से वेदराम जब भी छुट्टी पर घर जाता था, उसे पत्नी सुनीता के मिजाज में बदलाव देखने को मिलता था. उसे अकसर अपने घर में नेकसे भी बैठा मिलता था.

नेकसे हालांकि उस के भाई मिट्ठूलाल की पत्नी का भतीजा था, फिर भी वह यही सोचता था कि आखिर यह उस के घर में क्यों डेरा डाले रहता है. उस ने एकदो बार नेकसे को टोका भी कि बुआ के घर पड़े रहने से अच्छा है वह कोई कामकाज देखे. सुनीता ने भी नेकसे पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन वह जब भी आता था, वह उस की खूब मेहमाननवाजी करती थी. नेकसे के मन में क्या था, यह सुनीता को पता नहीं था. एक दिन नेकसे दोपहर में उस के घर आया और चारपाई पर बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगा. अचानक वह उस के पास आ कर बोला, ‘‘बुआ, तुम जानती हो कि तुम कितनी सुंदर हो?’’

नेकसे की इस बात पर पहले तो सुनीता चौंकी, उस के बाद हंसती हुई बोली, ‘‘मजाक अच्छा कर लेते हो.’’

‘‘नहीं बुआ, ये मजाक नहीं है. तुम मुझे सचमुच बहुत अच्छी लगती हो. तुम्हें देखने को दिल चाहता है, तभी तो मैं तुम्हारे यहां आता हूं.’’ नेकसे ने हंसते हुए कहा.

नेकसे की बातें सुन कर सुनीता के माथे पर बल पड़ गए. उस ने कहा, ‘‘तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘कुछ नहीं बुआ, तुम बैठो और यह बताओ कि फूफाजी कब आएंगे?’’ उस ने पूछा.

‘‘उन्हें छुट्टी कहां मिलती है. तुम सब कुछ जानते तो हो, फिर भी पूछ रहे हो?’’ सुनीता ने थोड़ा रोष में कहा.

‘‘तुम्हारे ऊपर दया आती है बुआ, फूफाजी को तो तुम्हारी फिक्र ही नहीं है. अगर उन्हें फिक्र होती तो इतने दिनों बाद घर न आते. वह चाहते तो गांव में ही कोई काम कर सकते थे.’’ यह कह कर नेकसे ने जैसे सुनीता की दुखती रग पर हाथ रख दिया था.

इस के बाद सुनीता के करीब आ कर वह उस का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘बुआ, अब तुम चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा.’’

इतना कह कर नेकसे तो चला गया, लेकिन सुनीता के मन में कई सवाल छोड़ गया. वह सोचने लगी कि आखिर नेकसे का उस के यहां आनेजाने का मकसद क्या है? 28 साल का नेकसे देखने में ठीकठाक था. वह अविवाहित था. और अपने गांव के एक ईंट भट्ठे पर काम करता था. तनख्वाह तो ज्यादा नहीं थी, पर वहां उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. बुआ के यहां आतेआते उस का दिल बुआ की देवरानी सुनीता पर आ गया था.

सुनीता पति की दूरी से बहुत परेशान थी. इसी का बहाना बना कर उस ने उस के दिल में जगह बनानी शुरू कर दी थी. रिश्ते की नजदीकियां रास्ते में बाधक थीं. नेकसे को इस बात का भी डर लग रहा था कि अगर सुनीता को बुरा लग गया तो परिवार में तूफान आ जाएगा. उस दिन नेकसे के जाने के बाद सुनीता देर तक उसी के बारे में सोचती रही कि आखिर नेकसे चाहता क्या है. उस रात सुनीता को देर तक नींद नहीं आई. नेकसे की बातचीत का अंदाज मन मोहने वाला था, लेकिन सुनीता उम्र और रिश्ते में नेकसे से बड़ी थी. मन में पति के प्रति गुस्सा भी आया, क्योंकि पति से दूरी के कारण ही उस का मन डगमगा रहा था.

उस ने तय कर लिया कि इस बार जब पति घर आएगा तो वह उस से कहेगी कि या तो वह गांव में रह कर कोई काम करे या फिर उसे भी अपने साथ ले चले.

कुछ दिनों बाद वेदराम छुट्टी पर आया तो सुनीता ने कहा, ‘‘देखो, तुम्हारे बिना मेरा यहां बिलकुल भी मन नहीं लगता. या तो तुम यहीं कोई काम कर लो या फिर मैं भी बच्चों को ले कर फिरोजाबाद चल कर तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

पत्नी की बात सुन कर वेदराम बोला, ‘‘लगता है, तुम पगला गई हो. तुम अपनी उम्र तो देखो. बच्चे बड़े हो रहे हैं और तुम्हें रोमांस सूझ रहा है.’’

‘‘तो क्या अब मैं बूढ़ी हो गई हूं?’’ सुनीता ने कहा.

‘‘नहीं…नहीं, ऐसा नहीं है. पर सुनीता यह मेरी मजबूरी है. मेरी तनख्वाह इतनी नहीं कि वहां किराए पर कमरा ले कर तुम्हें साथ रख सकूं. और तुम क्या सोच रही हो कि वहां मैं खुश हूं. नहीं, तुम्हारे बिना मैं भी कम परेशान नहीं हूं.’’

पति के जवाब पर सुनीता कुछ नहीं बोली. वेदराम 3 दिनों तक घर पर रहा, तब तक सुनीता काफी खुश रही. पर पति के जाने के बाद उस के जिस्म की भूख फिर सिर उठाने लगी. वह उदास हो गई. तब उस के दिलोदिमाग में नेकसे घूमने लगा. वह उस से मिलने को उतावली हो उठी. इतना ही नहीं, वह अपनी जेठानी के घर जा कर बोली, ‘‘दीदी, नेकसे आया नहीं क्या?’’

जेठानी ने कहा, ‘‘आया तो था, पर जल्दी में था. क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘नहीं, मैं ने तो यूं ही पूछ लिया.’’ उदास मन से सुनीता वापस आने को हुई, तभी जेठानी ने कहा, ‘‘शायद वह कल आएगा.’’

जेठानी की बात सुन कर सुनीता का दिल बल्लियों उछलने लगा. उसे लग रहा था कि नेकसे उस से नाराज है, तभी तो वह उस के घर नहीं आया. अगले दिन अचानक उस के दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने दरवाजा खोला, सामने नेकसे खड़ा था.

‘‘तुम?’’ उसे देख कर सुनीता हैरानी से बोली.

‘‘हां, मैं ही हूं बुआ, लेकिन तुम मुझे देख कर इतना हैरान क्यों हो? बड़ी बुआ ने बताया कि तुम मुझे याद कर रही थीं, सो मैं आ गया. अब बताओ, क्या कहना है?’’ नेकसे ने घर में दाखिल होते हुए कहा.

सुनीता ने मुख्यद्वार बंद किया और अंदर आ कर नेकसे से बातें करने लगी. कुछ देर में सुनीता 2 गिलासों में चाय ले कर आई तो नेकसे ने पूछा, ‘‘फूफा आए थे क्या?’’

‘‘हां, आए तो थे, लेकिन 3 दिन रह कर चले गए.’’ सुनीता बेमन से बोली.

नेकसे को लगा कि वह फूफा से खुश नहीं है. उस ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा, ‘‘बुआ, मैं कुछ कहना चाहता हूं, पर डर लगता है कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम बताओ क्या बात है?’’

‘‘बुआ, सच तो यह है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’ नेकसे ने एक ही झटके में मन की बात कह दी.

नेकसे की बात पर सुनीता भड़क उठी, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? और हां, प्यार का मतलब जानते हो? अपनी और मेरी उम्र में फर्क देखा है. मैं रिश्ते में तुम्हारी बुआ लगती हूं.’’

‘‘हां, लेकिन इस दिल का क्या करूं, जो तुम पर आ गया है. अब तो दिलोदिमाग पर हमेशा तुम ही छाई रहती हो.’’ नेकसे ने कहा.

‘‘लगता है, तुम पागल हो गए हो. जरा सोचो, अगर घर वालों को यह सब पता चल गया तो मेरा क्या हाल होगा?’’ सुनीता ने कहा.

नेकसे चारपाई से उठा और सुनीता के पास जा कर उस के गले में बांहें डाल दीं. सुनीता ने इस का कोई विरोध नहीं किया. इस से नेकसे की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सुनीता भी खुद को नहीं रोक सकी तो मर्यादा भंग हो गई. जोश उतरने पर जब होश आया तो दोनों में से किसी के भी मन में पछतावा नहीं था.

सुनीता को अपना मोबाइल नंबर दे कर और फिर आने का वादा कर के नेकसे चला गया. उस दिन के बाद सुनीता की तो जैसे दुनिया ही बदल गई. पर कभीकभी उसे डर भी लगता था कि अगर भेद खुल गया तो क्या होगा. अब नेकसे का आनाजाना लगा रहने लगा. इसी बीच एक दिन वेदराम अचानक घर आ गया. उस की तबीयत खराब थी. पर उस समय घर पर नेकसे नहीं था. सुनीता डर गई कि कहीं पति की मौजूदगी में नेकसे न आ जाए, इसलिए उस ने नेकसे को फोन कर के सतर्क कर दिया. हफ्ते भर बाद वेदराम चला तो गया, पर सुनीता के मन में डर सा समा गया.

पड़ोसियों को सुनीता के घर नेकसे का आनाजाना अखरने लगा था. आखिर एक दिन पड़ोसन ने सुनीता को टोक ही दिया, ‘‘जवान लड़के का इस तरह घर आनाजाना ठीक नहीं है. अपनी जवान बेटी का कुछ तो खयाल करो.’’

सुनीता तमक कर बोली, ‘‘अपने घर का खयाल मैं खुद रख लूंगी. तुम हमारी फिक्र मत करो.’’

नेकसे उस के यहां बेखौफ और बिना रोकटोक आताजाता था. पड़ोसियों के मन में भी शक के बीज पड़ चुके थे. एक दिन जब वेदराम घर आया तो एक पड़ोसी ने कहा, ‘‘नेकसे तुम्हारी गैरमौजूदगी में तुम्हारे घर अकसर आता है. तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए.’’

इस बात से वेदराम को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उस ने सुनीता से पूछा, ‘‘यह नेकसे का क्या चक्कर है?’’

पति की बात सुन कर सुनीता की धड़कनें बढ़ गईं, ‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, तुम्हारा रिश्तेदार है. कभीकभी यहां आ जाता है. इस में गलत क्या है?’’

‘‘घर में जवान बच्ची है. तुम उसे यहां आने के लिए मना कर दो.’’ वेदराम ने कहा.

‘‘अपनी बेटी की देखरेख मैं खुद कर सकती हूं, पर कभी सोचा है कि तुम्हारे बिना मैं कैसे रहती हूं.’’

‘‘तुम लोगों के लिए ही तो मैं बाहर रहता हूं. जरा सोचो क्या तुम्हारे बिना मुझे वहां अच्छा लगता है क्या?’’

वेदराम को सुनीता की इस बात से विश्वास होने लगा कि पड़ोसियों ने उसे उस की पत्नी और नेकसे के बारे में जो खबर दी है, वह सही है. वेदराम 2-4 दिन रुक कर अपने काम पर फिरोजाबाद चला गया. पर इस बार उस का काम में मन नहीं लगा. उसे लगता था, जैसे उस की गृहस्थी की नींव हिल रही है.

एक दिन अचानक वह छुट्टी ले कर बिना बताए घर से आ गया. उस ने घर में कदम रखा तो घर में कोई बच्चा दिखाई नहीं दिया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो सन्न रह गया. उस की पत्नी नेकसे की बांहों में थी. गुस्से में वेदराम ने डंडा उठाया और सुनीता की खूब पिटाई की. जबकि नेकसे भाग गया.

पिटने के बाद भी सुनीता के चेहरे पर डर नहीं था. वह गुर्रा कर बोली, ‘‘इस सब में मेरी नहीं, बल्कि तुम्हारी गलती है. मैं ने कहा था न कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती, पर तुम ने मेरी भावनाओं का खयाल कहां रखा.’’

वेदराम का गुस्सा बढ़ गया. वह हैरान था कि सुनीता ने रिश्तों का भी खयाल नहीं रखा. नेकसे तो उस के बेटे की तरह है. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, अब मैं आ गया हूं, सब संभाल लूंगा.’’

‘‘मैं आ गया हूं, से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘अब मैं नौकरी छोड़ कर हमेशा के लिए आ गया हूं. यहीं खेतीबाड़ी करूंगा. फिर देखूंगा तुझे.’’ वेदराम ने कहा.

पति के नौकरी छोड़ने की बात सुन कर सुनीता परेशान हो उठी. क्योंकि अब उसे नेकसे से मिलने का मौका नहीं मिल सकता था. उस ने नेकसे को सारी बात बता कर सतर्क रहने को कहा. अब वह किसी भी कीमत पर नेकसे को छोड़ने को तैयार नहीं थी. उस के मन में पति के प्रति नफरत पैदा हो गई.

वेदराम को अब इस बात का डर लगा रहता था कि सुनीता नेकसे के साथ भाग न जाए. अगर ऐसा हो गया तो समाज में उस की नाक ही कट जाएगी. लिहाजा उसे अपनी दुराचारी पत्नी से नफरत हो गई. बेटी भी जवान थी पर वह मां की ही तरफ से बोलती थी. उसे इस बात का भी डर था कि कहीं बेटी भी गुमराह न हो जाए.

वेदराम की चौकसी के बावजूद सुनीता और नेकसे मौका पा कर घर से बाहर मिलने लगे. यह बात भी वेदराम से ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. उस ने सुनीता को एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर वह कुछ भी मानने को तैयार नहीं थी. वेदराम समझ गया कि अब कोई बड़ा कदम उठाना ही पड़ेगा, वरना उस की गृहस्थी डूब जाएगी. घर का वातावरण काफी तनावपूर्ण रहने लगा था. नेकसे वेदराम की खुशियों के रास्ते में बाधा बन गया था. काफी सोचनेविचारने के बाद वेदराम को लगा कि इस समस्या का अब एक ही हल है कि रास्ते के कांटे को जड़ से निकाल दिया जाए.

दूसरी ओर रोजरोज पिटने से सुनीता को लगने लगा था कि अब वह पति के साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती. वह खुल कर नेकसे के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहती थी.

वेदराम धीरेधीरे अपने इरादे को मजबूत कर रहा था. बेशक यह काम उस के लिए कठिन था. पर एक ओर चरित्रहीन पत्नी थी तो दूसरी ओर बेलगाम भतीजा. दोनों उस केगुस्से को हवा दे रहे थे.

योजना के अनुसार, वेदराम उसी ईंट भट्ठे पर काम करने लगा, जहां नेकसे करता था. वेदराम जानता था कि नेकसे रात में भट्ठे पर ही सोता है. उसे लगा कि वह वहीं पर अपना काम आसानी से कर सकता है. वह भी भट्ठे पर ही सोने लगा और मौके की तलाश में लग गया.

नेकसे अपने फूफा वेदराम के इरादे से बेखबर था. जबकि वेदराम ने तय कर लिया था कि अपनी इज्जत पर हाथ डालने वाले को वह जिंदा नहीं छोड़ेगा. अपनी नौकरी के तीसरे दिन 5 दिसंबर, 2016 को वेदराम को मौका मिल गया. उस ने देखा, नेकसे अकेला सो रहा था. वह अपनी जगह से उठा और फावड़े से नेकसे पर प्रहार कर दिया. चोट नेकसे के कंधे पर लगी तो वह चीख कर उठा और भागने की कोशिश की. लेकिन वेदराम ने उस पर ताबड़तोड़ प्रहार कर दिए, जिस से वह वहीं पर मर गया.

नेकसे की हत्या करने के बाद वेदराम ने राहत की सांस ली, पर उस की दिमागी हालत ठीक नहीं थी. वह फावड़ा ले कर सीधे थाना सहावर पहुंचा और पुलिस को सारी बात बता दी. थानाप्रभारी रफत मजीद वेदराम से पूछताछ कर के उसे उस जगह ले गए, जहां उस ने नेकसे की हत्या की थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पुलिस ने वेदराम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. थानाप्रभारी रफत मजीद केस की तफ्तीश कर रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

दोस्ती के दम पर

महेश उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के कस्बा बिंदकी का एक दबंग किसान था. स्थानीय राजनीति में भी उस की अच्छी पकड़ थी. वह एक बार का प्रधान भी रह चुका था. उस की 4 बेटियां थीं, जिन में नीलम सब से छोटी थी. नीलम के अलावा वह तीनों बेटियों का विवाह कर चुका था. सब से छोटी होने की वजह से थोड़ा चंचल स्वभाव की नीलम घर में सब की लाडली थी. वह शादी लायक हुई तो महेश ने सन 2006 में जिला कानपुर के गांव रघुनाथपुर के रहने वाले जगदेव कुशवाहा के बेटे पिंटू से उस की शादी कर दी. पिंटू अपने पिता के साथ खेतीकिसानी करता था.

पिंटू खूबसूरत पत्नी पा कर खुद को बहुत खुशकिस्मत समझ रहा था. जबकि नीलम दुबलेपतले और सांवले रंग के पिंटू को पा कर अपने को बदकिस्मत समझ रही थी. नीलम सुंदर होने के साथ तेजतर्रार भी थी, इसलिए पिंटू उस से दबादबा सा रहता था और उस की हर बात मानता था. कुछ ही दिनों बाद नीलम पति को अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी थी.

पिंटू बहुत मेहनती था. वह सुबह 8-9 बजे खेतों पर चला जाता था तो शाम को ही घर लौटता था. वह नीलम को खुश रखने की हरसंभव कोशिश करता था, लेकिन तुनकमिजाज नीलम उस से खुश नहीं रहती थी. कभी वह कम कमाई का रोना रोती तो कभी अपने भाग्य को कोसती. दरअसल, नीलम ने हृष्टपुष्ट, सुंदरसजीले पति के सपने संजोए थे, लेकिन मिला उस के एकदम उलट था. वह उसे किसी भी तरह से संतुष्ट नहीं कर पाता था. इस तरह जैसेजैसे उस के साथ नीलम की जिंदगी कट रही थी.

पिंटू का एक दोस्त था इंद्रपाल. वह पड़ोसी गांव लालपुर का रहने वाला था और वह हैंडपंप लगवाने के ठेके लेता था. हृष्टपुष्ट शरीर का इंद्रपाल मजाकिया स्वभाव का था. पिंटू को जब भी फुरसत मिलती तो वह इंद्रपाल के गांव पहुंच जाता. वहां दोनों साथ खातेपीते और खूब बातें करते. पहले पिंटू शराब नहीं पीता था, लेकिन नीलम के बर्ताव से दुखी हो कर वह शराब पीने लगा था. धीरेधीरे वह शराब का लती बन गया था. एक दिन पिंटू के घर का हैंडपंप खराब हो गया तो मरम्मत के लिए उस ने इंद्रपाल को बुला लिया. पिंटू की शादी के बाद इंद्रपाल उस दिन पहली बार पिंटू के घर आया था. शादी के बाद नीलम के रूपरंग में और निखार आ गया था. इंद्रपाल ने नीलम को देखा तो वह उस की आंखों में रचबस गई.

हैंडपंप ठीक होने के बाद नीलम इंद्रपाल को पैसे देने लगी तो इंद्रपाल ने पैसे नहीं लिए. उस ने कहा, ‘‘भाभी, पिंटू मेरा दोस्त है, फिर पैसे किस बात के. आप बहुत सुंदर हैं. एक बार देख कर मुसकरा देंगी तो हम समझेंगे कि पैसा मिल गया.’’

अपने रूप की तारीफ सुन कर नीलम इंद्रपाल को गौर से निहारने लगी. फिर मुसकरा कर अपना सिर नीचे कर लिया. दिल में नीलम को बसा कर इंद्रपाल भी वहां से चला गया. इस के बाद इंद्रपाल और पिंटू जब कभी मिलते, पिंटू उसे घर ले आता. इंद्रपाल चाहता भी यही था.

नीलम को आकर्षित करने के लिए वह कभी उस के लिए साड़ी ले आता तो कभी साजशृंगार का सामान. थोड़ी नानुकुर के बाद नीलम यह स्वीकार कर लेती. पिंटू को खुश करने के लिए वह उस के साथ शराब पार्टी करता था. इंद्रपाल की आमदनी अच्छी थी इसलिए वह खूब खर्च करता था. कभीकभी वह नीलम को भी हजार-5 सौ रुपए दे देता था. इस तरह नीलम का झुकाव उस की तरफ होता गया. इंद्रपाल अब पिंटू की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आने लगा.

जून की तपती दोपहर में एक दिन इंद्रपाल नीलम के घर पहुंचा. नीलम उस समय कमरे में सो रही थी. गरमी अधिक होने की वजह से नीलम सिर्फ पेटीकोटब्लाउज पहने हुए थी. आसपास सन्नाटा पा कर इंद्रपाल नीलम के घर पहुंचा तो उस का कमरा बंद था, मगर खिड़की खुली हुई थी.

अविवाहित इंद्रपाल ने खिड़की से कमरे में झांका तो अस्तव्यस्त कपड़े में सो रही नीलम को देख कर वह बेकाबू हो उठा. पेटीकोट से बाहर झांकती नीलम की अधखुली टांगें तथा उफनते वक्षस्थल देख कर इंद्रपाल की धड़कनें बढ़ गई. उस ने दरवाजा खटखटाया तो नीलम की आंख खुल गईं.

नीलम ने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने मंदमंद मुसकराते इंद्रपाल को देख कर वह शर्म की वजह से चारपाई की तरफ बढ़ी. उस ने चारपाई पर रखी साड़ी लपेटनी चाही पर इंद्रपाल ने उस की साड़ी एक तरफ फेंक कर दरवाजा भीतर से बंद कर दिया. इस के बाद उस ने नीलम को अपनी बांहों में भर कर कहा, ‘‘कब तक तरसाओगी भाभी?’’

इस के बाद इंद्रपाल ने नीलम के बदन को चूमना शुरू कर दिया. नीलम ने उस का कोई विरोध नहीं किया तो इंद्रपाल ने उस के बचे हुए कपड़े भी उतार दिए. नीलम भी उस से लिपट गई और चंद मिनटों में उन्होंने सारी मर्यादाएं तोड़ दीं. इस के बाद अवैध संबंधों का यह खेल आए दिन खेला जाने लगा.

पिंटू अपनी पत्नी के प्रेमप्रसंग से बिलकुल अनजान था. लेकिन पासपड़ोस के लोगों में इंद्रपाल और नीलम के नाजायज संबंधों को ले कर चर्चा होने लगी थी. पर उन दोनों ने इस की परवाह नहीं की. इंद्रपाल नीलम का दीवाना था तो नीलम उस की मुरीद. धीरेधीरे इंद्रपाल उस पर अपना अधिकार समझने लगा.

एक दिन पिंटू ने नीलम से कहा कि वह बीजखाद के लिए कानपुर जा रहा है. वह रात में नहीं आ पाएगा. अगले दिन शाम तक ही लौट सकेगा. उसे किसी चीज की जरूरत हो तो बता दे, वह इंतजाम कर जाएगा.

नीलम बोली, ‘‘घर पर सब सामान है. तुम चिंता मत करो. अगर सिद्धनाथ मंदिर जाओ तो वहां से हमारे लिए प्रसाद जरूर ले आना.’’

पिंटू चला गया. उस के जाते ही उस ने इंद्रपाल को फोन कर के पति के कानपुर जाने की बात कह कर उसे रात में घर आने को कह दिया. पर पिंटू कानपुर गया ही नहीं था. दरअसल जब वह घाटमपुर स्टेशन पर पहुंचा तो उसे गांव का गिरिंदपाल मिल गया.

उस ने बताया कि वह खाद लेने कानपुर गया था, लेकिन गोदाम में स्टाक नहीं है. 2-4 दिनों बाद ही खादबीज आएगा. गिरिंद की बात सुन कर पिंटू ने कानपुर जाने का इरादा छोड़ दिया और घाटमपुर स्थित ऐतिहासिक शिवमंदिर चला गया. वहां दर्शन कर के वह प्रसाद ले आया.

पिंटू रात 9 बजे घर पहुंचा, उस समय नीलम इंद्रपाल की बांहों में समाई बेसुध पड़ी थी. पिंटू ने खिड़की से यह सब देखा तो आगबबूला हो उठा. उसे अपने दोस्त से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी. लेकिन सोचविचार के बाद उस ने खून का घूंट पी कर चुप रहना ही उचित समझा. उस ने सोचा कि इतनी रात को वह घर में कलह करेगा तो पूरा मोहल्ला जाग जाएगा, जिस से बदनामी उसी की होगी.

पिंटू पंचायत घर गया और वहां पड़े तख्त पर लेट गया. रात भर वह सो नहीं सका. सारी रात करवटें बदलता रहा. सवेरे वह उठा और इंद्रपाल के घर पहुंच गया. इंद्रपाल उस का तमतमाया चेहरा देख कर समझ तो गया कि शायद उसे उस पर शक हो गया है लेकिन खुद को सामान्य रखते हुए उस ने पूछा, ‘‘पिंटू भैया, आज सवेरेसवेरे?’’

‘‘हां इंद्रपाल, बात ही ऐसी है कि आना पड़ा.’’ पिंटू ने कहा.

‘‘मेरे लायक कोई काम?’’ इंद्रपाल ने पूछा.

‘‘आओ, मेरे साथ चलो, कहीं एकांत में बैठ कर बातें करते हैं.’’ पिंटू ने कहा.

इंद्रपाल उस के साथ चल पड़ा. गांव से बाहर निकल कर दोनों बंबा की पुलिया पर बैठ गए तो पिंटू ने पूछा, ‘‘आजकल मेरी पत्नी तुम पर काफी मेहरबान है?’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं.’’ इंद्रपाल ने अनजान बनते हुए कहा.

‘‘जानबूझ कर अनजान मत बनो.’’ पिंटू ने कहा.

‘‘इतना नाराज क्यों हो रहे हो भैया?’’

‘‘कल रात तुम कहां थे?’’

‘‘अपने घर पर.’’

‘‘सफेद झूठ.’’

इंद्रपाल ने सिर झुका कर मौन साध लिया. उसे इस तरह देख कर पिंटू होंठ चबाते हुए बोला, ‘‘तू मेरा दोस्त नहीं होता तो मैं तुझे कल रात तब ही कुल्हाड़ी से काट डालता, जब तू नीलम के साथ था. अब तू अगर अपनी खैर चाहता है तो ध्यान रखना कि फिर कभी मेरे घर की ओर भूल कर भी कदम मत रखना, वरना मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

इंद्रपाल को खरीखोटी सुना कर पिंटू अपने घर पहुंचा और पत्नी की जम कर पिटाई की. नीलम और इंद्रपाल को चेतावनी देने के बाद पिंटू शराब के ठेके पर पहुंचा और जम कर शराब पी. पत्नी की बेवफाई से वह बुरी तरह टूट गया. उस ने दाढ़ीमूंछ बढ़ा ली और नशे का लती बन गया.

दूसरी ओर नीलम और इंद्रपाल ने एकदूसरे से मिलनाजुलना तथा बोलना बंद कर दिया. पिंटू और इंद्रपाल की दोस्ती में दरार पड़ गई थी. लेकिन यह दरार ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. वजह यह कि पिंटू को पीनेखाने की दिक्कत होने लगी थी क्योंकि उस के पीनेखाने पर इंद्रपाल ही खर्च करता था.

अपनी इन्हीं मजबूरियों के चलते पिंटू ने इंद्रपाल से फिर से दोस्ती कर ली. दोनों साथ बैठ कर फिर खानेपीने लगे. इंद्रपाल ने वादा किया कि वह नीलम को अब कभी बुरी नीयत से नहीं देखेगा. लेकिन वह ज्यादा दिनों तक अपना वादा नहीं निभा सका और नीलम से लुकछिप कर मिलने लगा.

लेकिन सावधानी बरतने के बावजूद नीलम का कारनामा छिपा न रह सका. इस बार नीलम और इंद्रपाल को पड़ोसन सावित्री ने रंगेहाथों पकड़ लिया. सावित्री ने यह बात पिंटू को बताई तो उस का खून खौल उठा. उस ने नीलम की जम कर पिटाई कर दी.

पिंटू एक तरफ अपने गद्दार दोस्त से परेशान था तो दूसरी ओर पत्नी से, जो उस की आंखों में धूल झोंक कर रंगरलियां मना रही थी. आखिर जब बात पिंटू की बरदाश्त के बाहर हो गई तो उस ने गद्दार दोस्त इंद्रपाल को सबक सिखाने का फैसला कर लिया.

इंद्रपाल को सबक सिखाने के लिए पिंटू ने लालपुर गांव निवासी मोहनलाल गुप्ता से बात की. मोहनलाल ने पहले तो नानुकुर की, लेकिन बाद में पिंटू का साथ देने को तैयार हो गया. दरअसल, मोहनलाल का झगड़ा अपने भाई राजेंद्र से होता रहता था. वह झगड़ा पैतृक संपत्ति के बंटवारे को ले कर था.

इस झगड़े में इंद्रपाल राजेंद्र का साथ देता था, जिस से मोहनलाल इंद्रपाल से रंजिश रखता था. इसी कारण पिंटू ने जब इंद्रपाल को ठिकाने लगाने की बात मोहनलाल से की तो वह उस का साथ देने को राजी हो गया.

पहले से तैयार योजना के तहत पिंटू 12 फरवरी, 2017 की शाम इंद्रपाल से मिला. उस ने कहा, ‘‘इंद्रपाल, आज मेरा मूड ठीक नहीं है. सिर और बदन में दर्द हो रहा है. मन में अजीब सी बेचैनी है.’’

इंद्रपाल खिलखिला कर हंसते हुए बोला, ‘‘दोस्त, तुम्हारे मर्ज की दवा मेरे पास है. उस से सिरदर्द भी गायब हो जाएगा और मूड भी ठीक हो जाएगा. 2 पैग लगाते ही हवा में उड़ने लगोगे.’’

इस के बाद इंद्रपाल ने पिंटू के साथ शराब पी. वहां से वापस लौटते समय दोनों बंबा की पुलिया पर बैठ गए. उसी समय मोहनलाल आ गया. मोहनलाल ने इंद्रपाल से तो बात नहीं की, लेकिन पिंटू से बातें करने लगा. इसी बीच मौका पा कर पिंटू ने इंद्रपाल को दबोच लिया.

इंद्रपाल ने छूटने की कोशिश की तो मोहनलाल उस पर टूट पड़ा और लातघूंसों से मारमार कर उसे पस्त कर दिया. हिम्मत कर के इंद्रपाल जान बचा कर भागा, लेकिन कदमों ने उस का साथ नहीं दिया और सरसों के खेत में गिर पड़ा. उसी समय मोहनलाल ने इंद्रपाल को दबोच लिया तो पिंटू ने तेज धार वाले चाकू से उस का गला रेत दिया. उन्होंने इंद्रपाल का धड़ तो वहीं खेत में छोड़ दिया, लेकिन उस के सिर को ले जा कर एक किलोमीटर दूर रायपुर गांव निवासी राकेश वाजपेयी के मटर के खेत में फेंक दिया. इस के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए.

सुबह लालपुर का रामू तेली अपने खेत पर पहुंचा तो उसे पड़ोसी के खेत में किसी का धड़ पड़ा दिखाई दिया. उस ने यह जानकारी गांव वालों को दी तो गांव के तमाम लोग इकट्ठा हो गए. इसी बीच किसी ने थाना घाटमपुर पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी अजय कुमार यादव पुलिस फोर्स के साथ लालपुर पहुंच गए.

अजय कुमार यादव ने वारदात की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और जांच में जुट गए. सरसों के खेत में एक युवक की सिरविहीन लाश पड़ी थी. उस के सिर का पता नहीं था. थानाप्रभारी सिर की तलाश में जुट गए. वहां मौजूद गांव के कुछ लड़के भी सिर खोजने लगे.

दोपहर 12 बजे के करीब अजय कुमार यादव को सूचना मिली कि पड़ोसी गांव रायपुर में राकेश वाजपेयी के मटर के खेत में किसी का कटा सिर पड़ा है. सूचना पाते ही वह रायपुर पहुंचे और राकेश वाजपेयी के मटर के खेत से कटा सिर बरामद कर लिया. सिर और धड़ को जोड़ा गया तो लालपुर गांव के लोग चौंके. वहां मौजूद रामपाल फूटफूट कर रोने लगा. उस ने बताया कि यह लाश उस के भाई इंद्रपाल की है.

उसी समय एसपी ग्रामीण राजेश कुमार सिंह भी आ गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतक के घर वालों से बात की. चूंकि लाश की शिनाख्त हो चुकी थी, इसलिए पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए लालालाजपत राय चिकित्सालय कानपुर भिजवा दिया. अजय कुमार यादव ने मृतक के भाई रामपाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गांव का मोहनलाल गुप्ता इंद्रपाल से रंजिश रखता था. शक है कि उसी ने इंद्रपाल की हत्या की है. शक के आधार पर पुलिस ने मोहनलाल गुप्ता को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई लेकिन उस ने हत्या से साफ इनकार कर दिया.

16 फरवरी, 2017 को पुलिस ने पुन: मोहनलाल से सख्ती से पूछताछ की. इस बार पुलिस की सख्ती से मोहनलाल टूट गया और इंद्रपाल की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि रघुनाथपुर निवासी पिंटू की पत्नी नीलम से इंद्रपाल के नाजायज संबंध थे. पिंटू के कहने पर उस ने उस की हत्या की थी.

मोहनलाल के बयानों के आधार पर पुलिस ने पिंटू को भी हिरासत में ले लिया. पिंटू ने जब थाने में मोहनलाल को देखा तो अपना अपराध स्वीकार कर लिया. चूंकि दोनों ने अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए पुलिस ने मृतक के भाई रामपाल की ओर से इंद्रपाल की हत्या का मुकदमा मोहनलाल और पिंटू के खिलाफ दर्ज कर लिया और पिंटू की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद करा लिया, जिसे उस ने अपने खेत में छिपा दिया था.

17 फरवरी, 2017 को थाना घाटमपुर पुलिस ने पिंटू और मोहनलाल को कानपुर की अदालत में रिमांड मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेरे पति ही मेरा सपोर्ट सिस्टम हैं : मंदिरा बेदी

बौयकट बालों और छरहरे बदन वाली मंदिरा बेदी अपने स्टाइल और बिंदास अंदाज के लिए जानी जाती हैं. मुंबई के पंजाबी परिवार में जन्मीं मंदिरा ने पढ़ाई के बाद ऐडवरटाइजिंग एजेंसी जौइन की थी. इसी दौरान उन्हें दूरदर्शन के धारावाहिक ‘शांति’ के लिए रोल औफर किया गया. यह उन के जीवन का टर्निंग पौइंट साबित हुआ.

धारावाहिक ‘शांति’ के बाद उन्होंने कई अन्य धारावाहिकों और फिल्मों में भी काम किया. यही नहीं, क्रिकेट में रुचि रखने वाली मंदिरा ने न सिर्फ क्रिकेट कमैंट्री की मेल डोमिनेटेड फील्ड में कदम रखा, बल्कि इस नीरस क्षेत्र में ग्लैमर गर्ल बन कर भी उभरीं. उन का नूडल्स स्ट्रैपी ब्लाउज और साड़ी का अंदाज लोगों को खूब भाया मंदिरा फैशन डिजाइनर भी हैं.

उन्होंने 1999 में वैलेंटाइन डे के दिन बौलीवुड फिल्म डाइरैक्टर राज कौशल से शादी की. शादी के 12 साल बाद 2011 में वे मां बनीं. आज 44 साल की उम्र में एक बच्चे को जन्म देने के बाद भी उन्होंने अपनी खूबसूरती और फिटनैस को पूरी तरह मैंटेन कर के रखा है. एक इवैंट में उन से बातचीत हुई:

मां बनने के बाद क्या काम पर वापस आना कठिन हुआ?

मैं जब प्रैगनैंट थी, तो सोचती थी कि पता नहीं मां बनने के बाद मुझे काम मिलेगा या नहीं. वैसे मैं ने 18 सालों से इस इंडस्ट्री में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हुई थी. शायद यही वजह रही कि मेरा बच्चा जब 5 माह का था तभी मुझे काम के औफर आने लगे.

1994 की लंबे बालों वाली शांति से आप अब बौयकट बालों में आ गई हैं. इस का राज क्या है?

इस में कोई राज नहीं है. सच तो यह है कि इतने सालों में मैं बहुत स्ट्रौंग हो गई हूं. पहले थोड़ी सहमीसहमी सी रहती थी. अब बिलकुल अपोजिट हूं. शायद इस का असर बालों पर भी नजर आ रहा है.

आप खुद को मोटिवेटेड कैसे रखती हैं?

छोटीछोटी सफलताएं ही आप को और ज्यादा पाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं. मान लीजिए मैं वेट लौस जर्नी पर हूं या किसी उद्देश्य की तरफ बढ़ रही हूं, ऐसे में यदि छोटेछोटे ही मगर सकारात्मक परिणाम आते हैं, तो बड़े परिणामों के लिए प्रेरणा मिलती है. छोटी सफलता ही बड़ी सफलता की चाह पैदा करती है.

काम के साथसाथ घरपरिवार कैसे संभालती हैं? पति का कितना सपोर्ट मिलता है?

घरपरिवार एकसाथ संभालने के लिए सपोर्ट सिस्टम की जरूरत होती है. इस मामले में मेरे पति मेरा बहुत साथ देते हैं. आज यदि मैं यहां दिल्ली में हूं और मेरा बेटा मुंबई में है, तो इसलिए क्योंकि वह पिता की देखरेख में है.

यदि एक पिता बच्चे के जन्म के बाद पुन: अपने कैरियर को एक नए मुकाम तक पहुंचा सकता है, तो एक पत्नी क्यों नहीं? मेरी सास अमेरिका में रहती हैं, मेरे मम्मीपापा दिल्ली में हैं, भाई सिंगापुर में, ननद अमेरिका में और हम मुंबई में. जाहिर है मेरे पास पति के सिवा कोई और सपोर्ट नहीं है. वही मेरे सपोर्ट सिस्टम हैं.

आज भी महिलाओं को जीवन में

कई तरह के कंप्रोमाइज करने पड़ते हैं. इतना ही नहीं बच्चे व परिवार की खातिर अपना कैरियर तक छोड़ना पड़ता है? क्या कहेंगी आप?

सामान्य रूप में यदि पति और पत्नी दोनों कामकाजी हैं और परिवार बढ़ा रहे हैं, तो महिला का कैरियर ही बैकसीट पर जाता है. मगर यदि मैं अपनी और अपनी सहेलियों की बात करूं तो स्थिति कुछ अलग है. हम सभी समान रिलेशनशिप में हैं. हमें कभी अपने कैरियर के साथ समझौता नहीं करना पड़ा. हां, मैं चाहती हूं कि मेरी तरह दूसरी महिलाओं को भी यह आजादी मिले.

फिटनैस के लिए आप क्या करती हैं?

अपनी फिटनैस के लिए मैं किसी डाइटीशियन या न्यूट्रिशनिस्ट के पास नहीं जाती. मैं कोई खास डाइट भी नहीं लेती हूं. मुझे पता है कि क्या चीजें मेरे लिए अच्छी हैं और क्या बुरी. कभीकभी अगर खुद से चीट भी कर लेती हूं, तो अगले ही दिन से कवर भी कर लेती हूं. मैं नियमित रूप से व्यायाम करती हूं खासकर सुबह का व्यायाम कभी मिस नहीं करती.

आप की नजर में एक महिला की सब से बड़ी ताकत क्या है?

देखिए, एक महिला की सब से बड़ी ताकत है कि वह मल्टीटास्क कर सकती है. वह एक साथ कई भूमिकाएं निभा सकती है. एक समय में ही वह मां, पत्नी, बेटी, बहू की भूमिकाओं में रह कर अपनी श्रेष्ठता साबित करती है. पुरुष कभी भी मल्टीटास्क नहीं कर सकता.

आप को किस तरह की ड्रैसेज ज्यादा पसंद हैं, वैस्टर्न या इंडियन?

मैं दोनों ही तरह की ड्रैसेज पसंद करती हूं. कुछ खास मौकों पर या औफिशियल मीटिंग्स के दौरान साड़ी पहनती हूं, तो डेटुडे बिजनैस में जींस पहनना पसंद करती हूं.      

त्यागपत्र की राजनीति से नहीं होगा माया का भला

दलितों को नेतृत्व देने में असफल हो रही बसपा नेता मायावती ने राज्यसभा से अपना त्यागपत्र देकर अपने जनाधार को दोबारा हासिल करने का प्रयास किया है. मायावती को यह पता है कि भाजपा के द्वारा रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाये जाने से उसका कोई प्रभाव दलितों के बीच नहीं पड़ेगा. ऐसे में वह सहारनपुर कांड के ‘दलित-ठाकुर विवाद’ को अपना मुद्दा बनाकर राज्यसभा से अपना त्यागपत्र दे दिया है. मायावती का आरोप है कि उनको राज्यसभा में अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया. मायावती के त्यागपत्र के पीछे राज्यसभा में उनके दोबारा पहुंचने की चुनौती भी है. मायावती के राज्यसभा कार्यकाल का केवल 9 माह का समय ही बचा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा में बसपा के मेम्बर इतने नहीं है कि मायावती राज्यसभा की मेम्बर बन सके. ऐसे में उनको किसी दूसरे दल का सहारा लेना ही पड़ेगा.

उत्तर प्रदेश मायावती का गढ है. यहां की राजनीति के जरीय ही वह सफल हो सकती हैं. बसपा के लिये परेशानी का विषय यह है कि 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहने के बाद भी मायावती उत्तर प्रदेश में संघर्ष नहीं करना चाहती. मायावती उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उस समय ही सदस्य रहती है जब बसपा की सरकार रहती है और मायावती खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठती हैं. बसपा के सत्ता से हटते ही मायावती राज्यसभा के जरीये दिल्ली की राजनीति में अपने को सीमित कर लेती हैं. 9 माह के बाद उनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है और मायावती दोबारा बसपा के बल पर राज्यसभा सदस्य नहीं बन पायेंगी. ऐसे में राज्यसभा से त्यागपत्र देकर वह अपने वोट बैंक को संदेश देना चाहती हैं.

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से जातीय समीकरण बदले हैं उससे मायावती की चुनौतियां बढ़ गई हैं. अब दलितों में बड़ी संख्या में नव हिन्दुत्व वादी विचारधारा पनप रही है. जिससे दलित भी अब तेजी से पूजापाठ करने लगा है. दलितों में अब बौद्व धर्म अपनाने को लेकर कोई आकर्षण नहीं रह गया है. दलितों की नई पीढी के लिये मनुवाद कोई मुद्दा नहीं रह गया है. वह छुआछूत से परेशान जरूर है पर उसे यह नहीं बता कि इसका मुकाबला कैसे करे? उसे लगता है कि हिन्दु धर्म के अनुसार पूजापाठ करके ही अपना भला हो सकता है. दलितों को राह दिखाने का काम करने वाले दलित संगठन अब हाशिये पर हैं.

डीएसफोर जैसे संगठनों को मायावती ने अपने राज में ही दरकिनार कर दिया. बसपा से जुडे अलग अलग जातियों के नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया. राजनीति के जरीये समाज बदलने का फामूर्ला दलितों के भले का साबित नहीं हुआ. मायावती की अपनी कार्यशैली जिस तरह से बदली उससे वह दलितो की नेता कम तानाशाह ज्यादा बन गई. भ्रष्टाचार के आरोपों ने मायावती की छवि को नुकसान पहुंचाया. 2007 में जब बसपा को दलितों के भले के लिये कुछ काम करने का अवसर आया तो मायावती ने कोई कदम नहीं उठाया. केवल मूर्ति और पार्क के सहारे वह अपनी इमेज बनाती रहीं. ऐसे में धीरेधीरे दलित बसपा से दूर होता गया.

अखिलेश सरकार के समय जब दलित-पिछडा मतभेद चल रहा था, मायावती ने उत्तर प्रदेश में रह कर राजनीतिक संघर्ष से बचती रहीं. ऐसे में बसपा से अधिक भाजपा ने दलितों से अपनी नजदीकी बना ली. भाजपा ने 2007 के बाद से ही दलितों को नव हिन्दुत्व का पाठ पढ़ाना शुरू किया. जिसका असर 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. मायावती के लिये अपने वोटबैंक को वापस हासिल करना कड़ी चुनौती हो गया है. राज्यसभा से त्यागपत्र से यह संभव नहीं है. मायावती को अपना तानाशाही व्यवहार बदलना होगा. दलितों के बीच मनुवाद को बेनकाब करना होगा तभी बसपा से दलित वर्ग का जुड़ाव हो सकेगा. सहारनपुर जैसे मुद्दे अब पूरे प्रदेश में असर नहीं डालते. लोगों को अपना विकास चाहिये. केवल वोटबैंक बना देने से लोग पार्टी का साथ नहीं देने वाले.

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सुपरफास्ट और स्मार्ट हो चुकी तकनीक ने भले ही आपके फोन को डीएसएलआर में बदल दिया हो, लेकिन बेहतर कैमरे से बेहतर फोटो खींचना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती. ऐसे में आप फोटो एडिटिंग ऐप्स की मदद ले सकते हैं. ये ऐप्स आपके लो क्वालिटी के फोटो को भी बेहतरीन बना देते हैं. जानें उन ऐप्स के बारे में.

एडोब फोटोशॉप लाइटरूम

यह एप फोटोग्राफर के लिए सबसे बेस्ट एप है. फोटोग्राफर ज्यादातर इसका डेस्कटॉप एप्लिकेशन इस्तेमाल करते हैं. यह एप मोबाइल वर्जन आईफोन, आईपैड और एंड्रायड डिवाइस पर उपलब्ध है. इसमें क्लाउड के जरिए फोटोग्राफर फोटो को डायरेक्ट और फोटो लाइब्रेरी से फोटो का एक्सेस ले सकता है. इसमें कई तरह के एडिटिंग टूल्स उपलब्ध हैं. इस एप को इस्तेमाल करने के लिए आपके पास आईफोन 6s, आईपेड प्रो, सैमसंग गैलेक्सी S7 और गूगल पिक्सल स्मार्टफोन होगा जरूरी है. आप लाइटरूम मोबाइल HDR फक्शन को भी इस्तेमाल कर सकते हैं जिसमें अलग-अलग एक्सपोजर के साथ, एचडीआर इमेज में संयोजित कर सकते हैं, जिसमें सामान्य तस्वीर की तुलना में बहुत अधिक टोनल डिलेट होती है.

गूगल स्नेपसीड

स्मार्टफोन फोटो पर टचिंग देने के लिए स्नैपसीड काफी बेहतर एप साबित हुआ है. यह इमेज एडिटर आइओएस और एंड्रायड दोनों में उपलब्ध है. इस एप में वाइड रेंज के फिल्टर्स विंटेज, ग्लैमर ग्लो और ग्रन्ज जैसे ग्रुप्ड अंडर हैडिंग्स मौजूद हैं. यह सभी फुली कस्टमाइजेबल हैं एक बार इन्हें इस्तेमाल करके आप फोटो में बेहतर नतीजा पा सकते हैं.

एडोब फोटोशॉप एक्सप्रेस

अगर आप एक तस्वीर को जल्दी से पंच करना चाहते हैं तो फोटोशॉप एक्सप्रेस आपके लिए है. इसके जरिए फोटो में लुक्स को फिल्टर्स और इफेक्ट को कंट्रोल करके कर सकते हैं. वहीं ज्यादा तर लुक्स को विचित्र, सबसे सूक्ष्म, फ्लैटरिंग इफेक्ट्स, से अपनी तस्वीरों को नया रूप दे सकते हैं. इसमें करीब 11 मैनुअल एडिटिंग टूल्स हैं, जैसे एक्सपोजर, डिफोग और हाइलाइट्स शामिल हैं. इसके साथ ही इसमें ब्लेमिश रिमोवल, रेड आई रिडक्शन और फ्रैम के कई वेराइटी उपलब्ध हैं. यह एप एंड्रायड और आइओएस दोनों में उपलब्ध है.

एफिनिटी फोटो फॉर आईपैड

एफिनिटी फोटो आईपैड के लिए उपलब्ध है. इस एप्लिकेशन को इंस्टॉल होने में 2GB की स्टोरेज चाहिए. यह लगभग मैक पीसी और विंडो वाली डेस्कटॉप की तरह ही है. इसमें लेयर और ब्लेंड मोड्स के जरिए फोटो एडिट कर सकते हैं. इस एप के जरिए फोटो में हाइड पिक्सल और तरह-तरह के इफेक्ट्स एप्लाई कर सकते हैं.

एनलाइट

यह फोटो एडिटिंग की क्रिएटिविटी के लिए सबसे बेहतर है. यह सिर्फ आइओएस वर्जन में उपलब्ध है. इनलाइट इंटरफेस में फोटो के पैरामीटर्स को अपने हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं जैसे फोटो को लेफ्ट और राइट में खींच सकते हैं. वहीं इसमें मौजूद रेडियल फिल्टर्स की मदद से फ्रेम एरिया का एडजस्ट कर सकते हैं. इसके साथ ही इसमें तीन ग्रेडुएट फिल्टर रेडिअल, लीनियर और मिरर दिए गए हैं जिनकी मदद से मास्क फीचर को इस्तेमाल कर सकते हैं.

फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ का असर या..?

जब से संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ का निर्माण किया है, तब से उनके और इस फिल्म से जुड़े रहे सभी कलाकारों के सितारे गर्दिश में ही चल  रहे हैं. ‘बाजीराव मस्तानी’ के बाद संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘‘पद्मावती’’ की शुरुआत की. इस फिल्म के साथ कितनी मुसीबतें आयी और अभी भी आ रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. ‘बाजीराव मस्तानी’ के बाजीराव यानी कि अभिनेता रणवीर सिंह का करियर भी उसके बाद प्रगति नहीं कर पा रहा है. संजय लीला भंसाली की ही फिल्म ‘पद्मावती’ के अलावा उनके पास कोई फिल्म नहीं है.

उधर ‘बाजीराव मस्तानी’ की मस्तानी यानी कि दीपिका पादुकोण के पास भी फिलहाल ‘पद्मावती’ ही है. उनकी हौलीवुड फिल्म ने पूरे विश्व में बाक्स आफिस पर मुंह की खायी है. दीपिका पादुकोण की हालत यह है कि उन्हे हौलीवुड कलाकार के संग अपने रोमांस की खबर को हवा देनी पड़ रही है. इसी तरह ‘बाजीराव मस्तानी’ की काशीबाई यानी कि अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के साथ भी कुछ अच्छा नहीं हो रहा है. उनकी हौलीवुड फिल्म ‘बेवाच’ की जो दुर्दशा हुई, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. यूं तो उनके पास दो हौलीवुड फिल्में हैं, मगर ‘बेवाच’ देखने के बाद यह अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा कि हौलीवुड फिल्मों में उनके किरदार कितने अहम हो सकते हैं. मगर कटु सत्य यही है कि प्रियंका चोपड़ा के पास फिलहाल बौलीवुड में एक भी फिल्म नहीं है.

उधर प्रियंका चोपड़ा की मां डा. मधु चोपड़ा भी अब प्रियंका चोपड़ा के करियर को सहारा देने के लिए खुलकर मैदान में कूद पड़ी हैं. प्रियंका चोपड़ा द्वारा निर्मित की जा रही क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण में अहम भूमिका निभा रही हैं. मगर प्रियंका की क्षेत्रीय भाषा की फिल्में सफलता नहीं बटोर पा रही हैं. बौलीवुड से जुड़ने के लिए बेताब प्रियंका चोपड़ा बार बार अमेरिका से वापस भारत आकर लोगों से मिल रही हैं. हर बार वह पत्रकारों से भी मिलती है. इस बार तो उन्होने अपने जन्मदिन से कुछ दिन पहले एक बड़ी प्रेस कांफ्रेस भी की. पर परिणाम शून्य ही है.

क्या गुस्ताखियां बनेगी?

उधर संजय लीला भंसाली की मुसीबतें भी कम होती नजर नहीं आ रही हैं. संजय लीला भंसाली ने ‘बाजीराव मस्तानी’ से पहले ही अमृता प्रीतम व साहिर लुधियानवी की प्रेमकथा पर ‘गुस्ताखियां’ नामक फिल्म बनाने की घोषणा की थी. पर इस फिल्म के निर्माण का काम भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है. मजेदार बात यह है कि जब से इस फिल्म के निर्माण की घोषणा की गयी है, तब से इसके कलाकारों के नाम ही तय नहीं हो पा रहे हैं.

फिल्म ‘‘बेवाच’’ की असफलता के बाद खबर आयी थी कि अब प्रियंका चोपड़ा और इरफान खान के साथ ‘गुस्ताखियां’ बनेगी, मगर कुछ दिन बाद ही इरफान खान की तरफ से सफाई आयी कि वह इस फिल्म का हिस्सा नहीं हैं. इतना ही नहीं खबर यह भी आयी कि फिल्म ‘गुस्ताखियां’ में अमृता प्रीतम का किरदार निभाने के साथ साथ प्रियंका चोपड़ा इस फिल्म का सह निर्माण भी करेंगी. लेकिन सूत्रों ने इस खबर का खंडन करते हुए दावा किया है कि प्रियंका चोपड़ा इस फिल्म में सिर्फ अभिनय करेंगी, इसका सह निर्माण नहीं करेंगी.

मगर जिस तरह के हालात हैं, उन हालातों में इस फिल्म के शुरू होने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है. इरफान खान इस फिल्म से खुद को अलग कर चुके हैं. उनकी जगह कौन सा कलाकार होगा? यह तय नहीं है. उधर सूत्र दावा कर रहे हैं कि प्रियंका चोपड़ा दो हौलीवुड फिल्में कर रही हैं, पर कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि वह ‘गुस्ताखियां’ की शूटिंग कब करेंगी? कुछ सूत्रों का दावा है कि फिल्म ‘गुस्ताखियां’ के नाम पर प्रियंका चोपड़ा बौलीवुड में खुद को चर्चा में बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ का क्या होगा? जिसका सटीक जवाब किसी के पास नहीं है. मजेदार बात यह है कि इन सारी चर्चाओं के बीच फिल्म ‘गुस्ताखियां’ को लेकर खुद संजय लीला भंसाली ने चुप्पी साध रखी है.

आखिर वरुण धवन ने मांग ली कंगना से माफी

इन दिनों सोशल मीडिया काफी सशक्त हो गया है. सोशल मीडिया की ही वजह से अभिनेता वरुण धवन को अमेरिका की धरती पर ‘‘आइफा’’ में करण जोहर व सैफ अली खान के साथ मिलकर अभिनेत्री कंगना रानौट का मजाक उड़ाने के लिए माफी मांगनी पड़ी है.

वास्तव में करण जोहर व सैफ अली के साथ नेपोटिजम जिंदाबाद के नारे लगाते हुए वरुण धवन ने ‘आइफा’ के मंच से कंगना का मजाक उड़ाया था. उसके बाद ट्वीटर सहित हर सोशल मीडिया पर वरुण धवन की जबरदस्त खिंचाई हो रही थी. जिसके चलते अंततः वरुण धवन ने ट्वीटर पर माफी मांग ली है.

वरूण ने ट्वीटर पर लिखा है कि न्यूयार्क शहर में आइफा में परफार्म करने का अनुभव जबरदस्त रहा. मैं बहुत प्रेरित हुआ. मैं बड़ी विनम्रता से माफी मांगता हूं. यदि किसी को मेरी किसी बात से दुख पहुंचा हो तो. मैं माफी मांगने के साथ ही अपना दुःख प्रकट करता हूं. यदि उस परफार्मेंस से मैंने किसी को आहत किया हो या दुख पहुंचाया हो, तो मैं बड़ी संजीदगी के साथ माफी मांगता हूं.

तो अब राजामौली की फिल्म करेंगी श्रीदेवी

‘बाहुबली’ और ‘बाहुबली 2’ के निर्देशक एस एस राजामौली अपनी फिल्म ‘‘बाहुबली 2’’ में राजमाता शिवगामी के किरदार के लिए श्रीदेवी को जोड़ना चाहते थे. मगर श्रीदेवी ने मना कर दिया था. तब इस किरदार को राम्या कृष्णन ने निभाकर काफी चर्चा बटोरी. श्रीदेवी के अनुसार वह फिल्म ‘मौम’ की वजह से यह फिल्म नहीं कर पायी. मगर एस एस राजामौली ने कहा था कि श्रीदेवी ने उनके सामने स्टार जैसी कुछ मांगें रखी थी, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था. उसके बाद एस एस राजामौली और श्रीदेवी के बीच विवाद छिड़ गया था.

मगर कुछ दिन बाद एक इंटरव्यू में एस एस राजामौली ने स्वीकार किया कि उन्हे श्रीदेवी को लेकर इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए थी. उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा कि मुझे लोगों के सामने सब कुछ विस्तार से नहीं बताना चाहिए था. यह मेरी गलती थी. मुझे इस बात का दुःख है. श्रीदेवी को लेकर मेरे मन में सम्मान है.

एस एस राजामौली के इस इंटरव्यू के बाद हालात सामान्य हो गए. श्रीदेवी ने सारे गिले शिकवे मिटा दिए और अब खबर है कि एस एस राजामौली एक फिल्म का निर्माण करने जा रहे हैं, जो वर्तमान समय की कहानी होगी. यह फिल्म निजी जीवन के हालातों व संघर्ष की बात करेगी. इस फिल्म में मुख्य भूमिका श्रीदेवी निभाने वाली हैं.

इतना ही नहीं एस एस राजामौली की इस फिल्म में श्रीदेवी के साथ मोहन लाल की भी जोड़ी होगी. इन दोनों कलाकारों को एक साथ एक ही फिल्म में निर्देशित कर एस एस राजामौली एक नए अध्याय की शुरुआत करने वाले हैं. क्योंकि पचास साल के अपने अभिनय करियर में श्रीदेवी ने अब तक मोहन लाल के साथ एक भी फिल्म नहीं की है.

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