आज के समय में सिंगल मदर समाज में अपना मुकाम बनाती जा रही हैं. सिंगल मदर के रूप में उन के पास जिम्मेदारी होती है. समाज सिंगल मदर को स्वीकार तो करने लगा है पर उन के पुरुष मित्रों को ले कर वह दकियानूसी सोच में ही जी रहा है.

सिंगल मदर की डबल जिम्मेदारी इसलिए होती है कि उन को अपने वजूद को बचाते हुए बच्चों का पालनपोषण करना होता है. सिंगल मदर के सामने कई तरह के हालात होते हैं. कुछ मामलों में उन के पेरैंट्स साथ होते हैं. कई बार पति साथ नहीं होता पर उस का दबाव बना रहता है.

देश में अभी भी तलाक या पतिपत्नी के बीच अलगाव आसान नहीं है. कईकई साल मुकदमों में गुजर जाते हैं. ऐसे में सिंगल मदर को बच्चों की देखभाल, उन की शिक्षा, स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होता है. इस के साथ पति के साथ मुकदमेबाजी का भी तनाव होता है. समाज का दबाव भी होता है. समाज सिंगल मदर के पुरुष साथियों को ले कर अपनी दकियानूसी राय से बाहर नहीं आ पाता है.

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सिंगल मदर को कचहरी, अस्पताल या स्कूल कहीं भी जाना हो, खुद ही जिम्मेदारी उठानी पड़ती है. कभीकभी अगर उन का साथ देने कोई पुरुष आ भी जाता है तो उन्हें शंकाभरी नजरों से देखा जाता है. ऐसे में सिंगल मदर के कैरेक्टर पर सवाल उठने लगते हैं. सो, सिंगल मदर के सामने चुनौतियां बढ़ जाती हैं कि वे अपने पुरुष साथियों से रिश्ता भी बनाएं और उन की चर्चा से बचें भी.

किसी के कैरेक्टर को ले कर चटपटी चर्चा करना बेहद सरल काम होता है. सोशल मीडिया के इस दौर में किसी के साथ संबंध को छिपाना मुश्किल हो गया है. ऐसे में संबंधों को निभाते समय सिंगल मदर खुद पर भरोसा और संबंधों में पारदर्शिता रखें, तभी समाज में रहते हुए वे अपने दायित्वों को पूरा कर सकेंगी.

सोच को पौजिटिव रखें

सिंगल मदर को ले कर तमाम तरह के गौसिप होते रहते हैं. ऐसे में जरूरी है कि वे अपनी सोच को पौजिटिव रखें. ‘फर्स्ट इंपैक्ट’ की इमेज कंल्सटैंट सौम्या चतुर्वेदी कहती हैं, ‘‘सिंगल मदर के सामने चुनौतियां अपार रहती हैं. चुनौतियों से निकल कर ही उन को सफल होना होता है. एक बार वे सफल हो जाएं तो आगे का रास्ता सरल हो जाता है. सफल होने के लिए जरूरी है कि वे अपने काम पर ध्यान दें.

‘‘पौजिटिव सोच ही इस में उन की सब से बड़ी मददगार होती है. इस के साथ उन को अपने को मजबूत बनाना चाहिए. अपने हर छोटेबड़े काम के लिए अगर वे किसी पर डिपैंड होंगी तो कभी खुद के पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएंगी. किसी की मदद लेना बुरा नहीं है, मदद लेते समय यह सावधानी जरूर रहे कि वे उस पर निर्भर न हो जाएं.

‘‘अगर किसी के साथ पर्सनल रिलेशन बनते भी हैं तो वहां भी वे प्राइवेसी का खयाल रखें. ऐसे संबंध बनाते समय यह जरूर देखें कि जिस से रिश्ता बना रही हैं उस का रिलेशनशिप को ले कर नजरिया क्या है. कई बार मदद के बहाने लोग करीब आ कर फायदा उठाने की कोशिश में रहते हैं. संबंधों की नजर से भी वे किसी पर निर्भर न हो जाएं. वे हमेशा अपनी सोच साफ रखें ताकि समय आने पर यह न सोचना पड़े कि कहीं गलती हो गई है. सिंगल मदर को बड़े हो रहे बच्चों की मानसिक हालत की चिंता होनी चाहिए. क्योंकि बच्चों के मन पर बुरी बातों का प्रभाव अधिक पड़ता है.’’

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संबंधों का भ्रम न बनाएं

सिंगल मदर आपसी संबंधों में भ्रम न रखें. कई बार आप के व्यवहार से कई तरह के खयाल लोगों में पैदा होने लगते हैं. सो, मौडर्न सोच के साथ अपने व्यवहार में शालीनता रखें. सिंगल मदर कमजोर कड़ी होती हैं जिन को ले कर कुछ भी कहना सरल होता है. सिंगल मदर का लाभ उठाने के लिए कई बार लोग दिखावटी रिश्ते भी बना लेते हैं. ऐसे रिश्तों से दूर रहें.

शालीन व्यवहार से ही आपसी संबंधों के भ्रम को साफ किया जा सकता है. यह सही है कि लोगों की बातों का जवाब दे सकती हैं. सब से जरूरी होता है कि पुरुष मित्र से सहयोग लेने में किसी तरह का भ्रम न रखें कि जिस से मदद करने वाले को लाभ लेने का मौका मिल सके.

कई बार सिंगल मदर अपने पुरुष मित्रों से बात करते समय अपने निजी जीवन की ऐसी बातें बता देती हैं जो उन को नहीं बतानी चाहिए. निजी जीवन की बातें बेहद गोपनीय होती हैं. कई बातों को सुन कर पुरुष मित्रों को लगता है कि वे सीमाओं को पार कर सकते हैं. वे सोचने लगते हैं कि ये बातें उन के लिए औफर सी हैं. ऐसे में बातचीत के दायरे को समझ कर आगे बढ़ें.

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यह सच है कि सिंगल मदर की जिम्मेदारी दोहरी होती है. अपने पर भरोसा कर के ही आगे बढ़ा जा सकता है. कहीं पर कभी कोई मतभेद हो तो उसे आपसी बातचीत से सुलझा लें. जब मतभेद नहीं सुलझते तो हालात खराब हो सकते हैं. एक बार आक्षेप लगने पर उस से बचाव मुश्किल हो जाता है.

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