हरेक संतान की स्वभाविक इच्छा होती है कि जिन पेरेंट्स ने दुनिया भर के त्याग और समझौते कर अपनी इच्छाओं और जरूरतों को दरकिनार कर हमारी बेहतर से बेहतर परवरिश की वे अपने जीवन की शाम यानी वृद्धावस्था हमारे साथ गुजारें जिससे हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकें. उनकी अशक्तता के दिनों में उन्हें तमाम सहूलियतें मुहैया करा सकें . इस ख़ूबसूरत जज्बे को बहुत छोटी लेकिन अहम एहतियात बरतते कैसे पूरा किया जा सकता है यहाँ पढ़िये -
वह दौर सिर्फ अधेड़ या उनसे भी पहले की पीढ़ी की यादों में ही बचा है जब परिवार संयुक्त होते थे. जिनमे बुजुर्ग पेरेंट्स की सेवा शुमार और देखभाल के लिए अलग से कुछ खास नहीं करना पड़ता था. हर काम की तरह यह जिम्मेदारी भी शेयर हो जाती थी. एक माँ बाप की तीन चार या उससे भी ज्यादा संताने होती थीं और अधिकतर घरों एक सदस्य जो आमतौर पर अविवाहित होता था और करने के नाम पर कुछ नहीं करता था लेकिन जो करता था उसकी कीमत और अहमियत घोषिततौर पर कुछ करने बालों से कमतर नहीं होती थी
दुनिया भर की नाते रिश्तेदारी निभाना, धरम करम के काम करना, शादी ब्याह रसोई जैसे फंक्शनो में हलवाई के पास भट्टी पर बैठकर पकवान बनबाना ,मवेशियों की देखभाल करना , खेती किसानी और व्यापार और कारोबार अगर कोई हो तो उसकी निगरानी करने के अलावा बूढ़े माँ बाप की सेवा की महती जिम्मेदारी भी इसी सदस्य के हिस्से में आती थी. इन कामों के लिए उसे इज्जत भी मिलती थी और कीमत भी मिलती थी. एक तरह से वह घर का सेकंड बॉस या सीईओ होता था.
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