Common Man Rights: ‘सरिता’ ने अपनी शुरुआत से ही, 1945 से ही, यह नीति अपनाई थी कि हम भारतवासी संख्या, बुद्धि, बल, कौशल में तो किसी से कम नहीं लेकिन हम पर जो धार्मिक मान्यताएं थोपी गईं, उन का नतीजा आम जनता की त्रासदी रही और आम आदमी की इस त्रासदी के मूल में हमारी रामायण, महाभारत, पुराणों की कहानियां रहीं. सरिता ने इन ग्रंथों की बातों को हूबहू बताना शुरू किया तो वे लोग जिन के पुरखों ने सदियों से इन से समाज में प्रतिष्ठा पाई, तिलमिलाते रहे.

आज 21वीं सदी में जब युग विज्ञान का है, तर्क का है, तथ्य का है, जो दिख नहीं पा रहा उसे ढूंढ़ने का है, आगे देखने का है, पीछे की राह पर चलने का नहीं, हम पुरातन के केंद्रीयकरण की, एक ही आत्मा, एक ही ब्रह्म की सोच से बंधे हैं. जिस के कारण हम वास्तव में एक कमजोर और बंटा हुआ समाज ही बन पाए. इन ग्रंथों ने परीक्षण, परिश्रम, कौशल, दृढ़ता, सहयोग, समानता, समूह का लाभ उठाने का पाठ नहीं पढ़ा कर हमें बंटवाया और गलत आदर्श हमारे सामने रखे. वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत, स्मृतियों, रीतिरिवाजों में जो कहा गया उन से हम ने जो समाज बनाया वह हमेशा बेहद कमजोर साबित हुआ.

हमारी आम जनता सदा ही कुछ महानों की स्तुति तो करती रही पर उन के काम कभी ऐसे न थे जिन का अनुकरण किया जा सके. इसी वजह से बाहरी आक्रमणकारी जब भी हमारे यहां लूटने की नीयत से आए, हम बिखरे हुए, नेतृत्वहीन, पथभ्रष्ट व बिकाऊ साबित हुए.

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