शासकीय सेवा में मैं ने 35 वर्ष गुजारे हैं और इतने लंबे कार्यकाल के अनुभव के बाद यही समझ में आया कि सफलता की कुंजी हमेशा परिश्रम, लगन और निष्ठा नहीं है, बल्कि खुराफाती दिमाग, स्कीमिंग में माहिर, चाटुकारिता में पीएचडी हासिल हो तो वही आज रेस का अपराजित घोड़ा बन सकता है. वैसे भी हमारा समाज नेताओं और नौकरशाहों के आसरे चलता है, पर अभी मैं उच्चतर सेवा की बात कर रहा हूं. आईसीएस का नाम बहुत था और गोरी सरकार के योजनाकार यह बखूबी जानते थे कि हिंदुस्तान में राज करने के लिए सेवा में ऐसे भारतीय चुने जाएं जो पश्चिमी सभ्यता से खासे प्रभावित रहते हों, फिर वे चाहे मध्यवर्गीय परिवार के ही क्यों न हों. घर में ‘बाबूजी’, ‘अम्माजी’ में कम आत्मीयता बल्कि ‘मम्मी’, ‘डैडी’ संबोधन में अधिक निकटता पाते हों.

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