वैसे तो वे उस दिन से ही पार्टी में घुटन महसूस कर रहे थे जिस दिन चुनाव में लाखों गंवा चुकने के बाद सांसद बन कर दिल्ली को कूच किया था. सोचा था सूद समेत पाईपाई महीनेभर में वसूल कर लेंगे और उस के बाद...बेचारों ने दिल्ली जातेजाते पता नहीं क्याक्या सपने देखे होंगे, वे जानें या फिर उन की आंखें. छोटे बेटे का ये करूंगा तो दामाद को वो. बड़े बेटे को यहां फिट करवा दूंगा तो साले को वहां. भांजे को दिल्ली में कहीं सैटल करवा जीजा का कर्ज भी उतार दूंगा. पर सब सपने धरे के धरे रह गए. कम्बख्त कहीं दांव ही नहीं लग रहा.

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