रागिनी के पांव भारी होते ही वह जैसे पूरे घर की महारानी बन गयी. संजीव की मां जो हर वक्त उसको कोसती रहती थी, अब हर वक्त उसकी सेवा-टहल में लगी रहती थीं. उसको घर का एक काम नहीं करने देती. सुबह से शाम तक उसके खाने-पीने का ध्यान रखती. अपने हाथ से काजू-बादाम की खीर बना-बना कर खिलाती. तमाम तरह के जूस और सूप पिलाती. उसके लिए अपने हाथों से सूखे मेवे और सूजी के लड्डू बना-बना कर जार में रखतीं. रागिनी को बड़ा अटपटा लगता था कि इस बुढ़ापे में वह इतनी मेहनत कर रही हैं, मगर पोते का सुख पाने के लालच में मां की ममता उछाले मार रही थी, उसे रोक पाना न संजीव के बस में था और न रागिनी के. नौ महीने तो पंख लगाकर उड़ गये और वह घड़ी आ पहुंची जब मां की बरसों की साध पूरी हो गयी. संजीव का घर-आंगन नन्हें आशीष की किलकारियों से गूंज उठा. दादी को खेलने के लिए खिलौना मिल गया. रागिनी की जिम्मेदारियां बढ़ गयीं और संजीव को जीवन का लक्ष्य प्राप्त हो गया. आशीष ने सबका जीवन खुशियों से भर दिया था. पूरा घर बस उसके इर्द-गिर्द ही घूमता रहता था.

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