‘‘आईएएस की ट्रेनिंग के दौरान मु झे आदर्श मिले, जो सिर्फ नाम के ही नहीं विचारों के भी आदर्श हैं. आदर्श को जीवनसाथी में रूप की नहीं, गुणों की तलाश थी और हम परिणयसूत्र में बंध गए. ससुराल जाते हुए मैं बहुत आशंकित थी लेकिन मेरी सारी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं. ससुराल में सब ने मेरा खुलेमन से स्वागत किया. मेरा ससुराल सचमुच ‘घर’ था, जहां सब को एकदूसरे की भावनाओं का खयाल था. मेरी छोटीछोटी बातों की तारीफ होती. मैं किसी को रूमाल भी ला कर देती तो वे लोग एकदम खिल जाते. वे कहीं भी जाते तो मेरे लिए कुछ न कुछ जरूर लाते. तब मु झे अपने भाईबहन याद आते, जो सिर्फ अधिकार से लेना जानते हैं.’’

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