Pandit Nain Singh Rawat : 13वीं सदी के इब्ने बतुता ने अरब से चीन तक की लम्बी यात्राएं की थीं. 13वीं सदी के ही यूरोपियन यात्री मारको पोलो भी सिल्क रूट के सहारे चीन तक पहुंचे थे. इन दोनों यात्रियों को दुनिया जानती है लेकिन भारत के पंडित नैन सिंह रावत के बारे में ज्यादा कुछ लिखापढ़ा नहीं जाता. पंडित नैन सिंह रावत वो शख्शियत हैँ जिन्होंने 19वीं शताब्दी में बिना किसी आधुनिक उपकरण की मदद के पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार कर लिया था.

नयन सिंह रावत के इस काम के लिए अंग्रेजी हुकुमत से उन्हें सर्वेक्षण के क्षेत्र में दिया जाने वाले सब से ऊंचा सम्मान 'पेट्रोन गोल्ड मैडल' मिला था. यह पुरस्कार पाने वाले नैन सिंह इकलौते भारतीय हैं.

अंगरेजों के लिए पहाड़ों के बीच बसे तिब्बत का नक्शा बनाना कठिन था. उन्हें एक ऐसे पहाड़ी आदमी की तलाश थी जो पहाड़ों पर मीलों लम्बी दूरी तय कर तिब्बत की सीमा को माप सके. उत्तराखंड के एक गांव के रहने वाले नयन सिंह रावत को पहाड़ों पर लम्बी दूरी तय करने का अच्छा खासा अनुभव था. अंग्रेजों ने नयन सिंह को इस महत्वपूर्ण काम के लिए चुना. आज से डेढ़ सौ साल पहले वह भारत की सुदूर सीमा से लगे एक गांव से, तिब्बत की ओर निकले. नयन सिंह का काम था तिब्बत का नक्शा बनाना, लेकिन कोई उपकरण तो था नहीं इसलिए उन्होंने एक कमाल का रास्ता निकाला.

पंडित नैन सिंह के हाथों में एक माला रहती थी. यूं तो माला में 108 मनके होते हैं, लेकिन इस माला में 100 मनके थे और 100वां मनका बाकी मनकों से कुछ बड़ा था. हर 100 कदम चलने पर एक मनका वह खिसका देते थे और इस तरह 100 मनकों पर 10 हजार क़दमों की दूरी तय हो जाती थी. 10 हजार कदम यानी ठीक 5 मील. अब हर कदम बराबर हो ये जरूरी तो नहीं, इसलिए पंडित नैन सिंह अपने पैरों के बीच एक रस्सी बांधते थे और कुछ इस तरह चलते थे कि एक कदम ठीक 31.5 इंच का हो और ऐसा करते हुए उन्हें सिर्फ सपाट रास्तों पर ही नहीं बल्कि तिब्बत के पठारों और उबड़ खाबड़ दर्रों पर भी चलना था. ऐसा करते हुए पंडित नैन सिंह 31 लाख 60 हजार कदम चले और एकएक कदम का हिसाब रखा.

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