पिछले 6-7 सालों में देश का मीडिया कुछ घोषित, कुछ अघोषित और कुछ घोषित सेंसरशिप में जिआ है. इस का नतीजा अब भारतीय जनता पार्टी देख रही है. पश्चिमी बंगाल और 2 दूसरे राज्यों में भाजपा की करारी हार की वजह यही है कि मीडिया जो नियंत्रित या गोदी मीडिया जो खुद ब खुद मोदी भक्त है सही.....नहीं दे रहा था. अब जब कोविड और चुनाव नतीजों की मार पड़ी है तो पता चला है कि शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छिपाने से सच छिप जाता है, झूठसच में नहीं बदलता.

मीडिया कंट्रोल अब सरकार पर भारी पड़ रहा है और उच्चन्यायालय व सर्वोत्तम न्यायालय जो आमतौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नकेल डाल रहे थे, अचानक मुखर हो उठे हैं. मद्रास उच्च न्यायालय ने तो यहां तक कह दिया कि खुले चुनाव करा कर चुनाव आयोग ने मर्डर किए हैं क्योंकि कोविड महामारी की दूसरी लहर सीधेसीधे चुनाव आयोग के कई फेजों में चुनाव कराने के फैसले को प्रधानमंत्री की रैलियों और अमित शाह की रोड शोओं से जोड़ा जा रहा है.

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चुनाव आयोग रोताझींकता सर्वोच्च न्यायालय भी गया पर काफी दिन बाद सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को कोई राहत देने से इंकार कर दिया. मद्रास उच्च न्यायालय ने ये शब्द एक सुनवाई के दौरान कहे थे, कोर्ई फैसला नहीं दिया था. चुनाव आयोग चाहता था कि मीडिया इस बात की चर्चा न करे पर सर्वोच्च न्यायालय ने जनता के जानने और आलोचना करने वे हक को बुनियादी माना है.

जो गोदी मीडिया सोच रहा है कि वह भक्ति कर के देश का भला कर रहा है खुद चुनावे में है. यह सही है कि प्रचार के बल पर और लगातार झूठ पर झूठ बोल कर ङ्क्षहदू मुसलिम खाई चौड़ी कर दी है और आम ङ्क्षहदू देश की समस्याओं के लिए मुसलमानों को कहीं दोषी मानता ही है.

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