दिल्ली के औल इंडिया इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज ने हाल में डाक्टरों का डाटाबेस बनाने के लिए एक फार्म बंटवाया ताकि डाक्टरों के सही नाम, पते, फोन नंबर आदि जमा करे जा सकें. इस में धर्म और जाति के भी कालम थे और इस पर जम कर हंगामा खड़ा हो गया. प्रशासकीय विभाग ने इन कालमों को डालने का खेद जताया पर जो नुकसान होना था, वह हो चुका था.

सारी शिक्षा, शैक्षणिक जानकारी, तकनीकी ज्ञान के बावजूद देश आज भी धर्म और जाति के इर्दगिर्द घूम रहा है. इस से इंकार नहीं किया जा सकता. धर्म और जाति हमारे सामाजिक के अभिन्न अंग हैं. सदियों पुरानी विभाजक रेखाएं आज भी उतनी ही गहरी हैं और स्कूलों में साथ पढ़ने, दफ्तरों में साथ काम करने वालों में साथ चलने के बावजूद लोग अपने धर्म और जाति को सिर पर कलगी की तरह पहने रहते हैं.

चुनावी मौसम में विश्लेषक सब से बड़ी बात यह नहीं कर रहे कि नरेंद्र मोदी को कौन क्यों वोट देगा बल्कि यह कर रहा है कि कौन सी जाति या धर्म के लोग किसे वोट देंगे. 2014 के चुनावों में अगर कुछ हिंदुओं ने जाति का सवाल भुला कर वोट दिया भी था तो अब यह सवाल फिर से उभर आया है. यह ऐसा फोड़ा है जो मंत्रों और पंडितजी की दवाओं के कारण बारबार उभर आता है.

इस देश में कहीं 20 जने इकट्ठे हो जाएं, वे अपनी जाति के लोगों को ढूंढ़ने लगते हैं और जैसे ही एक जाति के लोग मिलते हैं, अनजान भी रिश्तेदार बन जाते हैं. नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी ने सारे व्यापारियों को कालाबाजारी, करचोर, बेइमान, समाज का गुनाहगार घोषित कर दिया और लाखों का व्यापार ठप्प कर दिया पर वे जाति एक पार्टी को ही वोट देंगे, ऐसा लगता है. भारतीय जनता पार्टी यदि मायावती, अखिलेश, लालू यादव से ज्यादा राहुल और ममता बनर्जी से डरी हुई है तो इसीलिए उन्हें चुनने में जाति का सवाल नहीं खड़ा होता.

आरक्षण से उम्मीद थी कि निचले तबकों के कुछ लाख लोग ऊंचों के बराबर हो जाएंगे और उन में सामाजिक भेदभाव कम होने लगेगा पर जमीनी हालत वहीं के वहीं हैं. वैवाहिक विज्ञापन चाहे समाचारपत्रों में छपे हों या वैबसाइटों में हों, जाति, गोत्र पूछे बिना आगे नहीं बढ़ते. आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं पर 90% से ज्यादा विवाह निर्धारित गोत्रों, जाति भी छोडि़ए, के हिसाब से होते होंगे.

ऐसे में प्रशासनिक अफसर जिन्हें हर समय पता रखना होता है कि किस डाक्टर को कब, कहां, क्या देना है. जाति न पूछें, ऐसा कैसे हो सकता है. जाति से देश का समाज हमेशा टुकड़ेटुकड़े रहा है और बेचारा संविधान भी उस से हार माने हुआ है.

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