सामाजिक कार्यकर्ताओं के आंदोलनों को हलके में लेने की भूल यूपीए सरकार ने की थी जिस का खमियाजा उसे सत्ता गंवा कर भुगतना भी पड़ा. यही गलती अब नरेंद्र मोदी वाली एनडीए सरकार कर रही है. अन्ना हजारे तो कभीकभार मौका ताड़ते हैं पर मेधा पाटकर तो हमेशा आंदोलन करती रहती हैं. अब मेधा नरेंद्र मोदी से भी खफा हो चली हैं तो तय है इस के दीर्घकालिक नतीजे मौजूदा सरकार के हक में अच्छे नहीं निकलने वाले.

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