गांव में कहावत है कि खेती करने वाला कभी भूखा नहीं मरता. यह कहावत अत्यंत सीमित महत्त्वाकांक्षा का प्रतीक हो सकती है. इस से यह भी अर्थ लगाया जा सकता है कि आदमी सिर्फ खाने के लिए ही जीता है. पहले यह सब ठीक था क्योंकि उस समय हर आदमी की सीमित महत्त्वाकांक्षा थी और इस से बाहर निकलने के अवसर भी कम थे. आदमी सादगीपसंद था और समाज में छोटे व बड़े का स्पष्ट फर्क उस के रहनसहन से दिखाई पड़ता था. धीरेधीरे स्थिति बदली है और हर आदमी स्वयं को बड़े लोगों की कतार में देखने की महत्त्वाकांक्षा पालने लगा. यह अच्छी प्रवृत्ति है लेकिन इस के दुष्परिणाम भी इस तरह से सामने आए.

कई लोगों ने स्वयं का गलत आकलन शुरू कर दिया. वे स्वयं को बड़ा आदमी महसूस करने लगे और बड़े आदमी जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए उलटेसीधे रास्ते अपनाने लगे. कुछ ऐसे रास्ते से पैसा कमा कर बड़े बन गए लेकिन उन की मानसिकता तो वही रही. उन में कोई बदलाव नहीं आया. फूहड़ता जस की तस रही. इस के अलावा कुछ लोग योग्य थे लेकिन उन के समक्ष अवसर नहीं आए और इस वजह से उन की हताशा बढ़ने लगी. लिहाजा, उन्होंने गांव छोड़ कर बरतन मांजने या छोटामोटा कार्य करने के लिए शहर को चुना और गांव से मुंह मोड़ लिया. शहरों में उस ने संकट ही झेले लेकिन शहर में नौकरी करता रहा और इसी में वह स्वयं को सम्मानित महसूस करता रहा. उसे गांव जाना अच्छा नहीं लगा. लेकिन अब गांव जाने की मजबूरियां सामने आ ही गई हैं.

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