Hindi Film Review: निर्देशक इम्तियाज अली अकसर अपनी फिल्मोग्राफी से ऐसे किरदारों की कहानियां बयां करते हैं जो दुनिया के बनाए कायदेकानूनों में बंधे हैं और आजाद होने को छटपटा रहे हैं. मगर ‘मैं वापस आऊंगा’ उन के कैरियर की वह फिल्म है जिस में वे एक किरदार के माध्यम से मानव इतिहास की सब से बड़ी त्रासदियों में से एक की स्मृतियों में पहुंच गए हैं और एक सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इस की क्या जरूरत थी?
विभाजन की त्रासदी पर हिंदी सिनेमा में कई फिल्में बनी हैं, कुछ ने नफरत की आग को भुनाया तो कुछ ने नैशनलिज्म का लाउड नैरेटिव गढ़ा. मगर यहां इम्तियाज अली ने अपनी कोराइटर नयनिका महतानी के साथ मिल कर एक ऐसी कहानी बुनी है, जो जितनी राजनीतिक है, उतनी ही व्यक्तिगत भी.
फिल्म की शुरुआत चंडीगढ़ में रहने वाले 95 साल के बुजुर्ग ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह) से होती है. वे डिमैंशिया से जू?ा रहे हैं, उन्हें स्ट्रोक आया है और बिस्तर पर अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हैं. उन का शरीर भले ही भारत में है लेकिन उन का दिमाग 1947 के विभाजनपूर्व पंजाब के सरगोधा (अब पाकिस्तान का पंजाब प्रांत) में अटका हुआ है. वे उम्र की इस दहलीज में हैं जहां वे बोलते हुए कई बातों को कनैक्ट करते हुए बड़बड़ा रहे हैं.
उन के बेटे इस बड़बड़ाहट को उम्र का असर मान कर छोड़ देते हैं, लेकिन लंदन से आया उन का पोता निरवैर (दिलजीत दोसां?ा) इस उल?ा हुई दिमागी पहेली को सुल?ाने का जिम्मा लेता है. दरअसल निरवैर एनआरआई है और वह खुद अपनी उल?ानों में फंसा हुआ है. वह भारत आता है और ईशर सिंह से कम्युनिकेट करने में सफल होता है और उन के भाव को सम?ा लेता है. ईशर की बीमारी ही इस फिल्म का सब से बड़ा टूल है, जिस के जरिए बारबार अतीत में दाखिल हुआ जाता है.
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