Governor Movie Review: 122 मिनट की यह फिल्म आर्थिक सुधारों के इतिहास को इतनी सतही और बचकानी तिकड़मों से बयां करती है कि फिल्म किसी केंद्रीय बैंक की कहानी कम और अर्थ का अनर्थ ज्यादा लगती है. ऐसा लगता है जैसे गवर्नर हर रोज भारत की अर्थव्यवस्था को रिवाइव करने के लिए एक्सपैरिमैंटल मोड पर निकले हुए हैं और अलगअलग पैंतरे आजमा रहे हैं.

फिल्म का सब से बुनियादी और कमजोर पहलू इस का वह अजीबोगरीब प्लौट है जो भारत के आर्थिक इतिहास को बदलने का दावा करता है. जाहिर है 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के पीछे एक पूरी टीम, ग्लोबल सिचुएशन और भारत में तब की मुख्य पक्ष और विपक्ष की स्ट्रौंग पौलिटिकल विल थी. यह सुधार किन रास्तों से हो कर गुजरे, यह समय और उस समय मौजूद जिम्मेदार लोगों की कार्यप्रणाली के हिस्से आए लेकिन फिल्म के लेखक और निर्देशक ने इस का सेहरा अकेले आरबीआई के गवर्नर बने ‘रमन’ (मनोज बाजपेयी) को पहना दिया.

फिल्म के मुताबिक रमन ही भारत के आर्थिक सुधारों के असली और इकलौते वास्तुकार (आर्किटैक्ट) रहे हैं, जिन्हें दुनिया भूल चुकी थी और इस फिल्म ने उन्हें पुनर्जीवित किया है.

खैर, फिल्म की कहानी में रमन एक केंद्रीय बैंक के मुखिया के रूप में हैं. उन की बिल्ंिडग के सामने बीएसई की बढि़या ऊंची बिल्ंिडग है जिसे निहारते हुए रमन के कई कैमरा शौट लिए गए हैं. हैरानी यह कि देश के इतने जरूरी भवन का माहौल किसी ढीलेढाले सरकारी बैंक की शाखा जैसा लगता है, जहां कर्मचारी सिर्फ फाइलें खिसकाने और कैश गिनने में मसरूफ हैं. यहां तक कि कभीकभार वहां का चपरासी तक केंद्रीय बैंक की मुख्य टीम का हिस्सा लगने लग जाता है.

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