पुलिस द्वारा किसी भी निरपराध व्यक्ति को आतंकवादी करार दे कर जेल में ठूंस देना और उस पर थर्ड डिगरी अपनाना आम हो गया है. ‘शाहिद’ एक ऐसी ही सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है, जिसे निर्देशक ने बिना हेरफेर किए सचाई से बयां किया है.

‘शाहिद’ एक ह्यूमन राइट ऐक्टिविस्ट वकील शाहिद आजमी की जिंदगी पर बनी फिल्म है जिसे 2010 में मुंबई बम धमाकों के बाद गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था जबकि वह बेकुसूर था. जेल में ही रह कर शाहिद (राजकुमार यादव) ने वकालत की पढ़ाई पूरी की.

जेल में उस की मुलाकात वार साब (के के मेनन) से होती है. उस से मिलने के बाद शाहिद को महसूस होता है कि जेल में बंद वह अकेला नहीं है. उस जैसे कई और भी बेगुनाह कैद हैं.

जेल से छूट कर शाहिद वकालत शुरू करता है. वह गरीब बेगुनाहों को जेल से छुड़ाने का संकल्प करता है. कई बेगुनाह लोगों को वह जेल से बाहर निकलवाता है. इस दौरान अपनी जायदाद के केस में मरियम (प्रभलीन संधू) उस से मिलने आती है. शाहिद को उस से प्यार हो जाता है. दोनों निकाह कर के साथ रहने लगते हैं. इसी दौरान शाहिद को जान से मारने की धमकियां फोन पर मिलने लगती हैं. एक दिन कुछ गुंडे धोखे से उसे उस के दफ्तर में बुला कर गोलियों से छलनी कर देते हैं.

इस तरह की सच्ची घटनाओं पर बनने वाली फिल्मों को या तो वितरक नहीं मिल पाते या वे बरसों डब्बों में बंद पड़ी रहती हैं. ‘शाहिद’ जैसी मल्टीप्लैक्स थिएटर्स के लायक फिल्म कोई खास भीड़ नहीं जुटा सकी है.

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