रेटिंगः एक स्टार

निर्माता/ निर्देशकः मनोज के झा

लेखकः दिलीप शुक्ला

संगीतकारः साजिद वाजिद

कलाकारः जिम्मी शेरगिल, माही गिल,  सौरभ शुक्ला, सुधीर पांडे, सुप्रिया पिलगांवकर, पवन मल्होत्रा, मुकेश तिवारी, नंदिश सिंह, यशपाल शर्मा,  प्रणति राज प्रकाश, राज जुत्शी, सलिल आचार्य, मनोज पाहवा, विशाल सिंह व अन्य.

अवधिः दो घंटे सात मिनट

आधुनिकता किस तरह परिवारों की संस्कृति पर असर डाल रही जैसे मुद्दे पर बनी हास्य प्रधान फिल्म ‘‘फैमिली आफ ठाकुर गंज’’ की विषयवस्तु अच्छी है, फिल्म में सशक्त कलाकारों की भरमार है. मगर लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते फिल्म न हास्य रही, न गैंगस्टर फिल्म बन सकी. इतना ही नही फिल्म में कहानी के सतर पर कुछ भी नवीनता नही है, वहीं गैंगस्टर, वही भ्रष्ट पुलिस, वही राजनीति.

कहानीः

यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर ठाकुरगंज के दशरथ के परिवार की है. दशरथ के परिवार में दो बेटे नन्नू और मुन्नू हैं. जब यह बच्चे छोटे थे, तभी इनकी मौत हो गयी थी. और कम उम्र में ही नन्नू घर के लिए पैसा कमाने लगा था. वह बाबा भंडारी का चेला बन जाता है. धीरे धीरे शहर में आपराधिक गतिविधियों में बाबा भंडारी (सौरभ शुक्ला) का कोई सानी नहीं रहता. नन्नू (जिम्मी शेरगिल) उनका एकलव्य बनकर काम करते हुए एक बड़े मुकाम पर पहुंच जाते हैं. अब पूरा ठाकुरगंज नन्नू के नाम से कांपता है. जबकि मन्नू (नंदिश सिंह)अपने भाई व मां सुमित्रा देवी (सुप्रिश पिलगांवकर) से अलग रहते हुए इमानदारी से अपनी कोचिंग क्लास चला रहे हैं.नन्नू की शादी हो गयी है और उनकी आठ साल की बेटी है. नन्नू की पत्नी शरबती (माही गिल) भी रूआब गांठने में अपने पति नानू से कमतर नहीं है. मगर नन्नू और बाबा भंडारी के दूसरे चेले बद्री पाठक(मुकेश तिवारी) के बीच दुश्मनी है. बाबा भंडारी अक्सर नन्नू और बद्री के बीच सुलह कराते रहते हैं. ठाकुर गंज में भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर सज्जन सिंह (यशपाल शर्मा) अपनी अलग दुकान चला रहे हैं. सज्जन सिंह गाहे बगाहे नन्नू, बद्री और बाब भंडारी से धन लेकर उसका कुछ हिस्सा अपने वरिष्ठ तक पहुंचाते रहते हैं. भंडारी ने कंटैक्ट किलर बल्लू थापा (राज जुत्शी) की भी सेवाएं ले रखी हैं. नन्नू के साथ उनकी मां व पत्नी है, मगर उनके भाई मुन्नू को नन्नू की गतिविधियां पसंद नहीं है. नन्नू ने गगन (मनोज पाहवा) की पीली कोठी पर जबरन कब्जा जमा रखा है, जिसका अदालत में मुकदमा चल रहा है. इसी बीच मुन्नू की सगाई जगत चाचा (सुधीर पांडे) की बेटी सुमन (प्रणति राय प्रकाश) से हो जाती है.

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एक दिन नन्नू अपने गुर्गो के साथ परीक्षा सेंटर पर कब्जा जमाकर धड़ल्ले से नकल करवा रहे होते हैं, तभी वहां शिक्षाधिकारी जांच के लिए पहुंच जाते हैं, पर नन्नू उन्हें चुप करा देते हैं. वहीं पर नन्नू का भाई मुन्नू उस शिक्षाधिकारी को शिक्षा व संस्कारो को लेकर लंबा चौड़ा आदर्शवादी भाषण झाड़ते हैं, जिसका नन्नू पर काफी गहरा असर होता है. उसके बाद नन्नू सही राह पर चलते हुए पीली कोठी सहित हर गलत ढंग से हथियाई गयी वस्तु लोगों को वापस दे देते हैं. इससे बद्री व बाबा भंडारी परेशान हो जाते हैं. तब बल्लू थापा द्वारा मारे गए इंजीनियर दुबे की हत्या का आरोप नन्नू पर लगाते हुए पुलिस इंस्पेक्टर सज्जन सिंह, बद्री व बल्लू मिलकर नन्नू को मौत के घाट उतार देते हैं. यह सब बाबा भंडारी के ही इशारे पर होता है.

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भाई की मौत के लिए मुन्नू खुद को गुनाहगार मानने लगता है. पर मुन्नू अपनी भाभी व मां से कहता है कि सिस्टम के खिलाफ नहीं जाएंगी. सिस्टम ही उन्हें न्याय दिलाएगा. उसके बाद ठाकुरगंज का एसपी बनाकर राठौड़ (पवन मल्होत्रा) को भेजा जाता है. एसएसपी राठौड़ को सच पता चल जाता है. वह कानून के अनुसार कदम उठाते हैं, पर पहले सज्जन सिंह फिर बद्री की हत्या हो जाती है. राठौड़ को इसके पीछे बल्लू का हाथ लगता है, मगर बाबा भंडारी की हत्या के बाद एसएसपी राठौड़ सच जान जाते हैं कि यह हत्याएं मुन्नू ने की है, जिससे ठाकुरगंज से अपराध का सफाया हो जाए.एससपी राठौड़ स्वयं बल्लू की हत्या करते हैं और पुलिस कमिश्नर को सच बता देते हैं.

लेखन व निर्देशनः

फिल्म ‘‘फैमिली आफ ठाकुरगंज’’ क्या सोचकर बनायी गयी, यह समझ से परे है. दीवार,जंजीर,गाड फादर सहित कई क्लासिकल फिल्मों के कुछ हिस्सें लेकर एक ऐसी चूं चूं का मुरब्बा बनाया गया है, जिसकी कहानी व पटकथा का कोई सिर पैर ही नहीं है. यह न गैंगस्टर फिल्म बन पायी और न ही कौमेडी फिल्म. सब में कुछ हवा के झोके से दिशाहीन होकर उड़ रही पतंग की तरह है. किसी भी चरित्र का चरित्र चित्रण सही ढंग से नहीं किया गया.

हकीकत में एक असक्षम निर्देशक किस तरह फिल्म को बर्बाद कर सकता है, इसका उदाहरण है फिल्म ‘‘फैमिली आफ ठाकुरगंज’’. फिल्म में कब कौन सा दृश्य आ रहा है और क्यों यह समझ से परे रहा. इसमें पटकथा लेखक व निर्देशक के साथ साथ कुछ हद तक फिल्म के एडीटर की भी कमजोरी साफ तौर पर नजर आती है. कई बार ऐसा होता है कि अचानक दृश्य व चरित्र के संवाद बीच में कट गए और दूसरा दृश्य शुरू हो गया.

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इस फिल्म का सकारात्मक पक्ष यही है कि निर्माता और निर्देशक ने बौलीवुड में तमाम प्रतिभाशाली कलाकारों का जमावड़ा कर लिया. मगर जब चरित्र चित्रण व पटकथा कमजोर हो, तो बेचारे प्रतिभाशाली कलाकार भी क्या कर सकते हैं. इंटरवल से पहले सुमन के किरदार की रोचक शुरूआत हुई थी, पर इंटरवल के बाद फिल्मकार इस किरदार को लगभग भूल गए और फिल्म खत्म होने के बाद यह किरदार सिर्फ फिल्म में पैबंद बनकर रह गया.

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गीत संगीतः

गीत संगीत भी प्रभावित नही करता.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो स्थनीय डान नन्नू के किरदार में जिम्मी शेरगिल ने जरुर शानदार अभिनय किया है. माही गिल ने अपनी तरफ से ठीक परफार्मेंस दी है, मगर उनके किरदार को लेकर लेखक व निर्देशक दोनो बुरी तरह से दुविधा में रहे हैं, परिणामतः फिल्म भी बिगड़ गयी. सौरभ शुक्ला की परफार्मेंस अच्छी है. पवन मल्होत्रा, सुप्रिया पिलगांवकर, मनोज पाहवा व राज जुत्शी की प्रतिभा को जाया किया गया है.

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