family Drama Movie: डेविड धवन ने अपनी ही पुरानी तिजोरी से एक नया खिलौना निकाला है, जिस का अटपटा सा नाम रखा है, ‘है जवानी तो इश्क होना है.’ वही आउटडेटेड कौमेडी जिस पर कभी गोविंदा व सलमान हंसाया करते थे. डेविड धवन ने अपना निर्देशन कैरियर ‘एक मर्द और दो औरतें’ वाले फौर्मूले पर रखा है. ‘साजन चले ससुराल’, ‘घरवाली बाहरवाली’ और ‘बीवी नंबर 1’ इसी इंजन से चली थीं. यहां भी वे यही पेश कर रहे हैं मगर थोड़ा मौडर्न तरीके से.
कहानी घूमती है एक वैडिंग फोटोग्राफर जस्स (वरुण धवन) के इर्दगिर्द, जिस की अपनी पत्नी बानी (मृणाल ठाकुर) से इसलिए अनबन हो जाती है क्योंकि जस्स को तुरंत बच्चा चाहिए और बानी को अपना कैरियर. दोनों अलग होने का फैसला करते हैं. इस के बाद जस्स लंदन पहुंचता है और वहां उस की मुलाकात प्रीत (पूजा हेगड़े) से होती है. प्रीत का एक खूंखार पंजाबी भाई है रंधावा (जिमी शेरगिल). कहानी में मोड़ तब आता है जब जस्स को पता चलता है कि उस की अलग रह रही पत्नी और नई प्रेमिका, दोनों एक ही समय पर प्रैग्नैंट हो गई हैं.
फिर शुरू होता है, जस्स की छिपनछिपाई. पहली को दूसरी के सामने आने से रोकना और दूसरी को पहली का पता न चलने देना. फिल्म का क्लाइमैक्स अजीब सा है. डायरैक्टर के पास 90 के दशक वाली छूट नहीं थी कि जहां दोनों बीवियां एक पति को अपनाता हुआ दिखा दें, इसलिए यह बताया गया है कि चूंकि हर इंसान अंदर से व्यभिचारी होता है इसलिए यह सब चलता है. जस्स को दोनों लड़कियां छोड़ देती हैं, वह वापस इंडिया आ जाता है जहां उसे अपनी पुरानी क्लासमेट दिशा (कृति सेनन) मिल जाती है.
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