Swara Bhasker Controversy: शोशल मीडिया पर इन दिनों स्वरा भास्कर जमकर ट्रोल हो रही हैं. उन्हें गन्दी गन्दी गालियां दी जा रही हैं. 31 अगस्त 2026 को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वुमन लाइफ फ्रीडम टॉक में स्वरा ने पद्मावत फ़िल्म के लास्ट सीन में दिखाए गये जौहर वाले सीन पर टिप्पणी की थी. तब से तूफान मचा हुआ है. क्या है पूरा मामला आइये जानते हैं.
25 जनवरी 2018 को पद्मावत फ़िल्म रिलीज हुई थी और स्वरा ने संजय लीला भंसाली को 27 जनवरी 2018 को एक ओपन लेटर लिखा था जो “द वायर” में छपा था. इस ओपन लेटर में उन्होंने फ़िल्म के जौहर वाले सीन पर सवाल उठाते हुए लेकर लिखा था कि “क्या औरत की इज्जत उसकी योनि में है जो रेप होने से खत्म हो जाती है? क्या रेप के डर से मर जाना ही बहादुरी है? यह मामला 2018 का है और तब स्वरा भास्कर के इस बयान पर काफ़ी विवाद हुआ था. करणी सेना और ऐसे तमाम हिन्दूवादी संगठनों ने जमकर हंगामा खड़ा किया था.
31 अगस्त 2026 को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वुमन लाइफ़ फ़्रीडम टॉक कार्यक्रम में स्वरा भास्कर से 2018 वाले विवाद के बारे में सवाल पूछा गया था तो उन्होंने 8 साल पुराने विवाद पर उसी बेबाकी से जवाब देते हुए कहा, “जब मैं फ़िल्म का सीन देख रही थी जिसमें सभी 800 महिलाएं जौहर करती हैं तो मैंने सोचा कि यार ईश्वर ना करे लेकिन अगर मैं रेप सर्वाइवर होती तो ये फ़िल्म आख़िर मुझे क्या संदेश देती? मैं कायर जैसा महसूस करती कि मैंने ख़ुद की इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी जान नहीं ली. क्या आप समाज में यही संदेश देना चाहते हैं? हमारे आज के समाज में मुझे लगता है कि बलात्कार एक महामारी की तरह फैल रहा है? क्या हम अपनी रेप सर्वाइवर्स को ये कहना चाह रहे हैं कि आपको जीने का अधिकार नहीं है? अगर सम्मानित और बहादुर औरत होती तो अपनी जान दे देतीं. क्या हम किसी औरत से ये कहना चाह रहे हैं कि रेप उसकी ज़िंदगी का अंत है? बहुत सारी चीज़ें हैं जो परेशान करने वाली हैं.”
स्वरा भास्कर के इस बयान के बाद वो शोशल मिडिया पर जमकर ट्रोल हुईं. इस क्लिप के वायरल होने के बाद ट्रोल आर्मी ने झूठ फैलाया कि स्वरा ने रानी पद्मावती को कायर कहा. इसके बाद स्वरा भास्कर के खिलाफ तमाम हिन्दुवादी संगठन एक बार फिर एक्टिव हो गये, गोदी मीडिया को मौका हाथ लग गया, प्राइम टाइम में डिबेट शुरू हो गई. इसके बाद स्वरा को सफाई में वीडियो जारी करना पड़ा.
स्वरा ने 1 सितंबर 2026 को वीडियो जारी कर कहा कि “मैंने बिल्कुल नहीं कहा कि रानी पद्मावती कायर थी या महल की बाकी औरतें कायर थीं. गाली देनी है तो सही चीज पर दो. मैंने कहा था कि जब मैं क्लाइमेक्स देख रही थी तो मुझे लगा भगवान ना करे अगर मैं रेप पीड़िता होती तो मैं खुद को कायर महसूस करती कि मैंने अपनी जान क्यों नहीं ली? यह देश रेप कल्चर में जी रहा है, कल ही दिल्ली में एक लड़की का 46 किलोमीटर तक कार में गैंगरेप हुआ है तो क्या हम फिल्मों के जरिए यह संदेश दें कि औरत की पवित्रता उसकी जान से ज्यादा कीमती है? निर्भया जो छह दरिंदों से लड़ती रही फिर भी आखिरी सांस तक वह जीना चाहती थी”
ट्रोल आर्मी कुछ भी कहती रहे लेकिन सच बात तो यह है कि स्वरा ने एकदम सही सवाल उठाया है और यही सवाल हर औरत को उठाना चाहिए. चौदहवी सदी में क्या हुआ यह इतिहास का विषय है लेकिन पद्मावत का जौहर वाला सीन इतिहास नहीं बल्कि सिनेमा है और सिनेमा आज के दर्शक के लिए बनता है, 1300 ईस्वी के दर्शक के लिए नहीं. जब आप 2026 के पर्दे पर 800 औरतों को आग में कूदते हुए स्लो मोशन में महिमामंडित करते हैं, औरतों के जलने के सीन पर बैकग्राउंड में मंत्र बजते हैं तो आप समाज को क्या बता रहे हैं? यही न कि बलात्कार के डर से मर जाना बहादुरी है और बलात्कार के बाद जी जाना कायरता है. यह वही मनुस्मृति वाला लॉजिक है कि औरत की इज्जत उसकी योनि में है. स्वरा ने इसी मनुवादी और नारिविरोधी मानसिकता पर उंगली उठाई है.
इस देश में हर रोज 90 रेप रिपोर्ट होते हैं. हर रेप की सर्वाइवर कोर्ट से, घर से और समाज से लड़ कर जीने की कोशिश करती है लेकिन ऐसी औरतों को पदमावत जैसी फ़िल्में क्या सीख दे सकती है? यही कि असली बहादुर तो वो औरत थी जो जल गई. यह संदेश खतरनाक है. रेप के बाद जिंदगी खत्म नहीं होती बल्कि जिंदगी शुरू होती है, रेप सर्वाइवर को भी जीने का हक है, पढ़ने का हक है, प्यार करने का हक है. जौहर जैसी मानसिकता को ग्लोरीफाई करना उसी हक को जलाने जैसा है. स्वरा ने इतिहास को गाली नहीं दी बल्कि आज के दौर में जौहर को ग्लोरिफाई करने वाली फ़िल्म को कटघरे में खड़ा किया है. अगर स्वरा भास्कर ने गाली ही दी है तो यह उस सोच को गाली है जो आज भी औरत को जिंदा जलते हुए देखना चाहती है.
जौहर, संगसार या सती धर्म का सबसे विभत्स पहलू है. धर्म कहता है कि औरत का शरीर ही उसकी इज्जत है इसलिए शरीर को आग में डाल दो, पत्थर से कुचल दो या तेजाब में भिगो दो तो इज्जत बच जाएगी? यह कैसा लॉजिक है? इज्जत शरीर में नहीं, सोच में होती है. अगर इज्जत चली भी गई तो इंसान क्यों जल कर मरे? अलाउद्दीन खिलजी जैसे हमलावर से लड़ना राजा का काम था. राजा की राजगद्दी की लड़ाई में औरतों को आग में झोंकना कौन सी बहादुरी का काम है? यह तो हार मान लेना है. अगर जौहर इतना ही पवित्र था तो राजा रतन सिंह ने खुद जौहर क्यों नहीं किया? उसके सिपाहियों ने जौहर क्यों नहीं किया? सिर्फ औरतें ही क्यों जलीं? पदमावत फ़िल्म के आखिरी सीन में गर्भवती औरत के पेट का क्लोजअप दिखा कर क्या यह नहीं बताया गया कि पैदा होने से पहले ही मर जाना बेहतर है क्योंकि मुसलमान आ जाएगा? यह इतिहास नहीं बल्कि यह इस्लामोफोबिया का पोर्न है.
स्वरा ने तो सिनेमा के ठेकेदारों से सवाल किया कि जब तुम इतिहास के नाम पर औरत को जलाने को महान बताते हो तो इससे आज की जिंदा औरत क्या समझे? भंसाली को फिल्म के जरिये अपनी अभिव्यक्ति प्रकट करने की पूरी आजादी है तो स्वरा भास्कर को भी उस फिल्म पर सवाल उठाने की आजादी है. जो लोग स्वरा को ट्रोल कर रहे हैं, यह वही लोग हैं जो चाहते हैं कि औरत सवाल ना पूछे. औरत सिर्फ जले और मर्द ताली बजाए.
NCRB की 2024 की रिपोर्ट जो मई 2026 में जारी हुई, बताती है कि इस देश में पिछले साल 29,536 रेप केस दर्ज हुए. यानी हर 18 मिनट में एक रेप हुआ. हर घंटे औरतों के खिलाफ 50 अपराध हुए. राजस्थान में सबसे ज्यादा 4,871 रेप के मामले दर्ज हुए, यूपी में 3,209, महाराष्ट्र में 3,091 और देश की राजधानी दिल्ली में 1,058 रेप केस दर्ज हुए. 19 मेट्रो शहरों में सबसे ज्यादा बलात्कार हुए. सबसे डरावनी बात कनविक्शन की है. 2024 में कोर्ट में 2,06,777 रेप केस ट्रायल के लिए थे, उनमें से 1,85,785 पेंडिंग रह गए. पेंडेंसी 89.8 प्रतिशत. ट्रायल पूरे हुए 20,587 केसों में, सजा हुई सिर्फ 5,032 में. कनविक्शन रेट 24.4 प्रतिशत. मतलब 100 में से 76 बलात्कारी बाइज्जत बरी हो गये. पीड़िता थाने से कोर्ट तक दौड़ती है, वकील पूछता है कि उस रात तुमने क्या पहना था? जज पूछता है कि तुम चिल्लाई क्यों नहीं? और आरोपी हंसता हुआ कोर्ट से बाहर निकल जाता है. यही रेप कल्चर है जिसकी बात स्वरा भास्कर ने की.
रेप कल्चर सिर्फ रेप करना नहीं है, रेप कल्चर यह साबित करना है कि रेप के बाद औरत की जिंदगी खत्म. पीड़िता के असली दर्द को कोई फिल्म बयान नहीं कर सकती. बलात्कार की शिकार एक लड़की जब अस्पताल के बिस्तर पर लेटी होती है तो उसके शरीर पर 30 टांके होते हैं, उसकी बच्चेदानी फटी होती है, उसकी रीढ़ टूटी होती है लेकिन समाज को चिंता उस लड़की से ज्यादा उसकी इज्जत की होती है. असल में तो इज्जत उस लड़की की नहीं गई, इज्जत तो उस समाज की गई जिसके लिए लड़की से ज्यादा उसकी योनि मायने रखती है. वह लड़की जब हॉस्पिटल से घर आती है तो मोहल्ले वालों कि चिंता यह होती है कि अब इससे शादी कौन करेगा? अब यह कॉलेज कैसे जाएगी? पुलिस वाले कहते हैं कि समझौता कर लो और जब वह नौकरी के लिए जाती है तो इंटरव्यू में उसकी कहानी को सिम्पैथी पॉर्न बना दिया जाता है. फिल्म में 800 औरतों को आग में कूदते दिखाना आसान है लेकिन एक रेप के सर्वाइवर को जिंदगी की असली जंग को दिखाना मुश्किल है.
सवाल यह भी है कि यह मानसिकता कहां से आती है? यह सोच आसमान से नहीं आती. जिस समाज को सदियों से पुराणों की लोरियां सुनाई गई हों जहाँ बलात्कार देवताओं की लीला का हिस्सा और किस्सा रहीं हैं उस समाज में रेप की विक्टिम की पीड़ा को कोई समझ भी कैसे सकता है? इंद्र की कहानी सुनो. इंद्र देवताओं का राजा है, वह गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को देख कर उसका रूप धर कर उसके साथ छल से संबंध बनाता है. बृहस्पति की पत्नी तारा को चंद्रमा उठा ले गया, देवताओं ने युद्ध किया लेकिन तारा से किसी ने नहीं पूछा कि तू क्या चाहती है? द्रौपदी को जूए में दांव पर लगाया गया, भरी सभा में चीरहरण हुआ, धर्मराज युधिष्ठिर चुप रहे, भीष्म चुप रहे. समाज मान गया कि यह तो मर्दों का अधिकार है और जब यह कहानियां बच्चों को बचपन से सुनाई जाती हैं कि देवता भी ऐसा करते थे तो यह तो बिलकुल सामान्य बात हो जाती है. यही तो रेप कल्चर है. शास्त्र में इसे बलात्कार नहीं, लीला कहा गया. सजा किसे मिली? इंद्र तो इंद्र ही रहा लेकिन अहिल्या को पत्थर बना दिया गया. रेप करने वाला देवता बना रहा, रेप झेलने वाली पत्थर बन गई. आज भी यही होता है, रेपिस्ट मर्द शर्म से नहीं मरते लेकिन लड़की पत्थर जैसी जरूर हो जाती है.
जौहर भी इसी मानसिकता का परिणाम है. आग में कूदकर मरने वाली औरतों को समझाया गया कि मुसलमान आएगा तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट कर देगा इसलिए मर जाओ तो धर्म बच जायेगा. क्या धर्म योनि में रहता है जो भ्रष्ट हो जाएगा? अगर धर्म इतना कमजोर है कि एक हमले से भ्रष्ट हो जाता है तो वह धर्म नहीं, कांच है और अगर औरत के मरने से धर्म बचता है तो वह धर्म औरत का नहीं बल्कि मर्दों की जागीर है. स्वरा ने इसी जागीर पर सवाल उठाया है.
स्वरा भास्कर ने बिलकुल सही कहा कि एक गर्भवती औरत के पेट का क्लोजअप दिखा कर आप कह रहे हो कि पैदा होने से पहले ही लड़की को मर जाना चाहिए क्योंकि भविष्य में उसका रेप हो सकता है? आज तेरहवीं सदी नहीं है बल्कि यह इक्कीसवीं सदी है. आज देश को आग में कूदने वाली देवियों की कोई जरूरत ही नहीं है. तेरहवीं सदी में हमलावरों के कारण आग में कूद कर जल मरने वाली औरतों से ज्यादा महान इक्कीसवीं सदी की वो औरतें हैं जो आग से निकल कर कोर्ट और समाज से लड़ते हुए भी जिंदा रहती है. Swara Bhasker Controversy





