Dalit Rights: दलितों की गहरी आस्था भीमराव अंबेडकर में है क्योंकि उन्हें एहसास है कि उन्होंने  दलितों के भले और अधिकारों के लिए जो किया वह आसान नहीं था. इस के लिए उन्हें शक्तिशाली ब्राह्मण लौबी से जूझना पड़ा था. अब ऐसा क्या और क्यों हो रहा है कि दलित उन के बताए रास्ते पर नहीं चल पा रहा, तो जवाब है कि अंबेडकर के हाथ में सुदर्शन चक्र और तीरकमान जैसे जानलेवा हथियार नहीं हैं और वे चमत्कार नहीं दिखाते.

‘एक दलित कुलपति की अनकही कहानी’ प्रोफैसर श्यामलाल की बायोपिक है जिस का शीर्षक ही मजमून भांपने के लिए काफी है. पटना यूनिवर्सिटी और जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर के कुलपति रह चुके श्यामलाल की 21 किताबें, 50 के लगभग रिसर्चपेपर और तमाम दीगर लेखन भीमराव अंबेडकर के इर्दगिर्द ही सिमटा और घूमता नजर आता है. जो यह एहसास कराता है कि अंबेडकर के पहले और अंबेडकर के बाद दलित राजनीति में अगर कुछ है तो वह एक वैक्यूम है जिसे एक हद तक बसपा के संस्थापक कांशीराम ने भरने में कामयाबी हासिल की थी. लेकिन उन के बाद दलित राजनीति जिस दुर्दशा का शिकार हुई तो फिर उस से वह नजात नहीं पा पाई.

अपनी एक और किताब ‘द क्राइसिस औफ दलित लीडरशिप’ की भूमिका में वे साफतौर पर लिखते भी हैं कि 1956 में डाक्टर अंबेडकर की मृत्यु के बाद से भारत में कोई सर्वमान्य दलित नेता नहीं हुआ. हालांकि 90 के दशक में दलितों को कांशीराम का नेतृत्व और मार्गदर्शन मिला और उन्होंने अंबेडकर के बाद दलित इतिहास में अपना स्थान भी बनाया लेकिन उन की मौत के बाद एक प्रतिबद्ध नेतृत्व का अभाव फिर से पैदा हो गया. यह अभाव अभी तक बना हुआ है और यह एक झंझट है.

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