Dalit Rights: दलितों की गहरी आस्था भीमराव अंबेडकर में है क्योंकि उन्हें एहसास है कि उन्होंने दलितों के भले और अधिकारों के लिए जो किया वह आसान नहीं था. इस के लिए उन्हें शक्तिशाली ब्राह्मण लौबी से जूझना पड़ा था. अब ऐसा क्या और क्यों हो रहा है कि दलित उन के बताए रास्ते पर नहीं चल पा रहा, तो जवाब है कि अंबेडकर के हाथ में सुदर्शन चक्र और तीरकमान जैसे जानलेवा हथियार नहीं हैं और वे चमत्कार नहीं दिखाते.
‘एक दलित कुलपति की अनकही कहानी’ प्रोफैसर श्यामलाल की बायोपिक है जिस का शीर्षक ही मजमून भांपने के लिए काफी है. पटना यूनिवर्सिटी और जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर के कुलपति रह चुके श्यामलाल की 21 किताबें, 50 के लगभग रिसर्चपेपर और तमाम दीगर लेखन भीमराव अंबेडकर के इर्दगिर्द ही सिमटा और घूमता नजर आता है. जो यह एहसास कराता है कि अंबेडकर के पहले और अंबेडकर के बाद दलित राजनीति में अगर कुछ है तो वह एक वैक्यूम है जिसे एक हद तक बसपा के संस्थापक कांशीराम ने भरने में कामयाबी हासिल की थी. लेकिन उन के बाद दलित राजनीति जिस दुर्दशा का शिकार हुई तो फिर उस से वह नजात नहीं पा पाई.
अपनी एक और किताब ‘द क्राइसिस औफ दलित लीडरशिप’ की भूमिका में वे साफतौर पर लिखते भी हैं कि 1956 में डाक्टर अंबेडकर की मृत्यु के बाद से भारत में कोई सर्वमान्य दलित नेता नहीं हुआ. हालांकि 90 के दशक में दलितों को कांशीराम का नेतृत्व और मार्गदर्शन मिला और उन्होंने अंबेडकर के बाद दलित इतिहास में अपना स्थान भी बनाया लेकिन उन की मौत के बाद एक प्रतिबद्ध नेतृत्व का अभाव फिर से पैदा हो गया. यह अभाव अभी तक बना हुआ है और यह एक झंझट है.
उत्तर प्रदेश में गोलबंदी की होड़
किसी भी राज्य की तरह उत्तर प्रदेश में भी चुनावी तैयारियों का सब से अहम हिस्सा दलितों की गोलबंदी होता है. हरेक पार्टी को यह ज्ञान प्राप्त हो चुका है कि दलितों के वोटों के बगैर लखनऊ नहीं पहुंचा जा सकता. उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 21 फीसदी से भी ज्यादा है और उन के वोटों की तादाद 4 करोड़ पार कर चुकी है. 403 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में 140 सीटों पर दलित वोटों का रुख यह तय करता है कि सत्ता का सुख किस के हिस्से में जाएगा. 86 सीटें दलितों के लिए रिजर्व हैं. 2022 के चुनाव में भाजपा और उस के सहयोगियों को इन में से रिकौर्ड 65 सीटें मिली थीं. जबकि सपा और आरएलडी के खाते में 21 सीटें आई थीं. महज 2 सीट जीतने वाली कांग्रेस को एक भी सीट आरक्षित कोटे से नहीं मिली थी. बसपा गिरतेपड़ते एक सीट ले जा पाई थी.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव इन दिनों दलितों के प्रति कुछ ज्यादा गंभीर दिख रहे हैं. उन्होंने यह घोषणा की है कि वे 85 रिजर्व के अलावा 15 सामान्य सीटों पर से भी दलित उम्मीदवार उतारेंगे. इस तरह सपा के दलित उम्मीदवारों की संख्या 100 होगी. कांग्रेस ने तैयारी के नाम पर कुछ दिनों पहले ही वरिष्ठ दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया है. भाजपा ने अपने संगठन के फेरबदल में ओबीसी के साथसाथ, दिखावे और नाम के लिए ही सही, दलितों को भी जगह दी है.
वहीं, इन सब पर नगीना सांसद चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी खासतौर से पश्चमी उत्तर प्रदेश में भारी पड़ रही है क्योंकि दलित युवाओं को रुझान तेजी से उस की तरफ बढ़ रहा है. ये युवा खालिस अंबेडकरवादी हैं जिन्हें न तो मंदिर या मूर्तियों से कोई लेनादेना है और न ही कांवड़यात्राओं से कोई सरोकार उन्हें है. सब से ज्यादा घाटे में कोई है तो वह बसपा है क्योंकि उस का कोर वोट तो कभी का छिटक चुका है. अब परंपरागत रैदास, जाटव वोट भी आजाद समाज पार्टी की तरफ खिसक रहा है.
बसपा के मिटने में अहम रोल सतीश मिश्रा जैसे ब्राह्मणों का रहा है. लेकिन इस से कोई सबक न लेते हुए मायावती अभी भी दलितब्राह्मण गठजोड़ का पुराना राग आलाप रही हैं जिस पर कोई कान देने की जहमत नहीं उठा रहा, न दलित न ब्राह्मण. भाजपा का बसपा को खत्म करने का मकसद पूरा हो चुका है.
2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे भी हैं जिस में भाजपा को करारा झटका दलितों ने दिया था. सपा और कांग्रेस यह जताने में कामयाब रहे थे कि अगर भाजपा अपने नारे के मुताबिक लोकसभा में 400 पार पहुंच गई तो सब से ज्यादा मिटटी दलितों की कुटेगी क्योंकि भगवा गैंग की मंशा आरक्षण और लोकतंत्र खत्म कर देने की है. अखिलेश यादव और राहुल गांधी सहित तमाम छोटेबड़े कार्यकर्ता अपने अपने हाथ में संविधान की प्रति ले कर घूमे थे तो भाजपा को 33 सीटों पर समेटने में दलित वोटों का रोल अहम था. यानी, परोक्षअपरोक्ष दोनों तौर पर सहारा अंबेडकर का ही सपा और कांग्रेस ने लिया था.
ब्राह्मण बनाम दलित
आजादी के बाद से ही न केवल सामाजिक और धार्मिक बल्कि राजनीतिक लड़ाई भी सीधेसीधे ब्राह्मणों और दलितों के बीच ही होती रही है. इस को जाननेसमझने से पहले श्यामलाल की ‘द क्राइसिस औफ दलित लीडरशिप’ किताब में ही राजस्थान की दलित राजनीति का एक ही किस्सा यह बता देने को काफी है कि दरअसल लोचा क्या है और जो है वह तमाम राज्यों और देशभर में एक सा है.
श्यामलाल लिखते हैं कि राजस्थान में जनवरी 1980 के बाद राष्ट्रपति शासन खत्म हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर जून 1980 को उन के बेटे संजय गांधी की मौजूदगी में दिग्गज दलित नेता जगन्नाथ पहाड़िया को मुख्यमंत्री चुना गया.
उम्मीद के मुताबिक ऊंची जाति वाले नेता इस फैसले से खफा हो गए और पहाड़िया पर जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगने लगे. हरिदेव जोशी जैसे सीनियर ब्राह्मण कांग्रेसी लीडर उन के विरोध में खुल कर खड़े हो गए. राजस्थान की ब्राह्मण लौबी ने पहाड़िया मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार कर दिया. बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो और थी, ब्राह्मण लौबी ने एक मुहिम की शक्ल में पहाड़िया को सब से कमजोर और लचर मुख्यमंत्री प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसी लौबी के उकसाने पर जयपुर नगर निगम के सफाई कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी.
पहाड़िया ने सफाई कर्मचारियों से बात करने के लिए एक उपमंत्री मांगीलाल आर्य को नियुक्त किया लेकिन सफाई कर्मचारियों ने उन से बात करने से ही मना कर दिया. बात नहीं बनी तो इस लौबी ने इंदिरा गांधी को कई ज्ञापन भेजे जिन में पहाड़िया को हटाने की मांग की गई थी.
विरोध बढ़ता देख इंदिरा गांधी ने पहाड़िया को हटा कर कायस्थ समुदाय के शिवचरण माथुर को राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया. बात आई गई हो गई लेकिन वे यह मैसेज देने में कामयाब रही कि दलित नेतृत्व का संकट इस वजह से नहीं है कि दलित नेता नाकाबिल हैं बल्कि इसलिए है कि हिंदू नेता अपने पूर्वाग्रहों और कुंठाओं के चलते उन्हें नाकाबिल साबित करने की कामयाब साजिश रचते हैं. बकौल श्यामलाल, सभी राजनीतिक दल आरक्षण के चलते उन्हें टिकट तो देते हैं लेकिन जीतने के बाद उन्हें कमजोर कर के रखते हैं. यानी, दलित नेतृत्व का संकट दरअसल शासक जातियों का उपद्रव है.
शासक जाति के हर दौर में माने ये रहे हैं कि वह जाति जो ब्राह्मणों के इशारे पर नाचे, उन के चरणों में नतमस्तक रहे, पूजापाठ को बढ़ावा दे, वर्ण व्यवस्था को थोपने के जतन करे और मंदिरों में चढ़ावे के इंतजाम करे. यही आजकल नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.
पौराणिक काल में शासक भरभर कर ब्राह्मणों को जमीन, सोना, गाएं और औरतें तक दान में देते थे. मौजूदा दौर में यही सब दूसरे हिसाब से होता है. इस खेल में दलित और उन का नेतृत्व न पहले कभी था, न आज है. वे सदियों से निचली पायदान पर खड़े हैं.
भीमराव अंबेडकर ने इस साजिश को समझते संविधान और फिर बने कानूनों में ऐसे प्रावधान किए जो दलितों को वे तमाम हक और बराबरी देते हुए थे जो धर्म ने कब्ज़ा रखे थे. इस के नतीजे भले ही उम्मीद के मुताबिक न रहे हों लेकिन इतना तो होने लगा है कि हरेक राजनीतिक दल दलितों की बात करने लगा है.
दलितों में भी, आंशिक ही सही, जागरूकता आई क्योंकि कुछ संवैधानिक आरक्षण के चलते पढ़लिख कर सरकारी नौकरियों में आने लगे और सत्ता में भी भागीदार होने लगे. लेकिन इस से बाहर निकलने में वे नाकाम रहे. खासतौर से आज के अधिकतर दलित युवा, जो पढ़नालिखना छोड़ रील्स और धार्मिक दुनिया का अनुपजाऊ हिस्सा बन चुके हैं, को तो यह एहसास भी नहीं कि उन का हितेषी कौन है और कैसे उन्हें सपोर्ट कर गरीबी, भेदभाव, बदहाली और धार्मिक घुटन से बाहर निकालने के लिए मुद्दत से मुहिम चला रहा है और इस में उस के कोई आर्थिक या दूसरे स्वार्थ नहीं हैं.
यों बदले हालात
अब हालत यह है कि चुनाव हों न हों, सभी दलित हितों की बात करने को मजबूर हैं क्योंकि दलित समुदायों के वोट ही तय करते हैं कि सरकार किस की बनेगी. तकरीबन 20 फीसदी दलित वोट जिस तरफ झुक जाते हैं वह पार्टी सत्ता में आ जाती है. दलित वोटों की यह खासीयत है कि अब वे पार्टी बदलते रहते हैं वरना 70 के दशक तक उन का झुकाव कांग्रेस की तरफ ही रहता था क्योंकि कांग्रेस ने सब से पहले उन की अहमियत समझी और संविधान में उन के अधिकार तय किए.
भीमराव अंबेडकर पहले कांग्रेसी ही थे, बाद में उन्होंने अलग हो कर अपनी रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया बना ली थी जो वजूद में उन की मौत के बाद उन के समर्थकों द्वारा आई थी. अब इस के कर्ताधर्ता रामदास आठवले हैं जो भगवा गैंग के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं ठीक वैसे ही जैसे बिहार में चिराग पासवान औए जीतनराम माझी बने हुए हैं.
दलित वोट कांग्रेस से बड़ी तादाद में टूट कर आरपीआई की तरफ नहीं जा पाया क्योंकि अंबेडकर की मौत के बाद उन के वशंज दलित अभियान सफलतापूर्वक चला नहीं पाए और उन के किए का श्रेय कांग्रेस झटक ले गई. 50 के दशक से ही कांग्रेस ने संविधान और अंबेडकर के नाम पर वोट मांगना शुरू कर दिया था जो उसे मिलते भी रहे क्योंकि, खासतौर से उत्तर भारत में, उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था.
हिंदू महासभा, रामराज्य परिषद और जनसंघ ने कभी दलितों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे तब भी कट्टरवादी धार्मिक मानसिकता के थे और आज भी हैं. उन की नजर में दलितों की हैसियत वही थी जो मनु स्मृति सहित तमाम धर्मग्रंथों में बताई गई थी, मसलन अछूत, शूद्र, गुलाम, मजदूर और मवेशी वगैरहवगैरह.
जब भाजपा वजूद में आई तो उसे यह समझ आ गया कि बगैर दलितों के सत्ता हासिल करना नामुमकिन है. सो, उस ने दलितों को बहलानाफुसलाना शुरू कर दिया. उन्हें उन के हिंदू होने का एहसास कराया जाने लगा. लेकिन दलितों ने सहज और एकाएक ही उस का भरोसा नहीं किया, वजह, वह सदियों से ऊंची जाति वालों की मनुवादी व्यवस्था से वाकिफ था और अतीत में किए गए अत्याचारों को भूला नहीं था. इस पर भी नीम चढ़े करेले सरीखी बात यह थी कि दलित अत्यचार और प्रताड़ना खत्म नहीं हुए. जब भी ऊंची जाति वालों को मौका मिलता था, वे इन्हें लतियाने की अपनी लत दिखा ही देते थे. यह लत आज भी कायम है.
इमरजैंसी खत्म हो जाने के बाद जब भाजपा बनी तब भी उस ने अंबेडकर पर गौर नहीं किया था, न ही कभी उन की बात की थी. सो, उसे उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली. जब हकीकत उसे समझ आई कि बिना अंबेडकर के उसे दलित वोट और समर्थन नहीं मिलना और 8-10 फीसदी सवर्णों के दम पर हिंदू राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता तो 1989 में पहली दफा उस ने अंबेडकर का नाम लिया. लेकिन यह नाकाफी साबित हुआ तो उस ने आहिस्ताआहिस्ता अंबेडकर को पूछना और पूजना शुरू कर दिया जो उस का प्रिय काम और पेशा भी है.
धीरेधीरे ही, आरएसएस ने भी अंबेडकर की बात शुरू कर दी कि वे समानता की बात करते थे. इस समानता को उस ने सामाजिक समरसता का नाम दिया और अंबेडकर जयंती बड़े व भव्य पैमाने पर मनाना शुरू कर दिया. उस के स्वयंसेवक दलित बस्तियों में जा कर काली और हनुमान की तसवीरें बांटने लगे. इस के बाद शुरू हुआ दलित जातियों को उन के देवीदेवता थमाने का दिलचस्प लेकिन चिंतनीय सिलसिला और उन के पूजापाठ कराने का, मंदिर बनवाने का, भंडारों और झाकियों का जो आज तक चल रहा है. इसे संक्रामक सामाजिक रोग कहना ज्यादा सटीक है.
यह मुहिम, जो दरअसल एक साजिश थी, बड़े पैमाने पर चली. नतीजतन, दलित अंबेडकर और संविधान से परे पापपुण्य, स्वर्गनरक और व्रतउपवास के फेर में भी पड़ने लगा. यही भगवा गैंग चाहता था कि एक बार वे धार्मिक चक्रव्यूह में फंस भर जाएं, फिर दुनिया की कोई ताकत उन्हें इस से बाहर नहीं निकाल सकती.
हुआ भी यही. दलितों को अपनी बदहाली की बाबत लगने लगा कि यह दरअसल पूर्वजन्म के पापों का ही फल है कि वे दलित पैदा हुए और दलित ही मरेंगे. लेकिन इस जन्म में पूजापाठ, दानदक्षिणा कर लें तो अगले जन्म में जाति अपग्रेड हो जाएगी. इतना होना भर था कि भाजपा का काम आसान होता गया और दलित कांग्रेस का पल्लू छोड़छाड़ कर गले में भगवा गमछा डालने लगा. भाजपा को दलित वोट मिलने लगे तो वह 2014 में भारी बहुमत से केंद्र में भी काबिज हुई और हिंदीभाषी राज्यों में भी उस की सरकारें न केवल बनने लगीं बल्कि दलितों की धार्मिक मानसिकता के चलते टिकने भी लगीं.
अभी हिमाचल प्रदेश छोड़ सभी हिंदीभाषी राज्यों में वह काबिज है. लेकिन धीरेधीरे फिर दलित को समझ आने लगा है कि वह समरसता और भगवान सहित हिंदू होने की आड़ में भी ठगा गया है. पहले उसे उपेक्षित कर पिछड़ा रखा जाता था, अब गले लगाने का ड्रामा कर हाशिए पर फेंका जा रहा है. लेकिन अब तक हालात काफी बदल चुके हैं. कई दलित जातियों ने खुद को छोटे और दोयम दर्जे का हिंदू स्वीकार लिया है. लेकिन कई जातियां इस से बाहर निकलने की कोशिश में लगी हैं जिन्हें धार्मिक घुटन और सामाजिक तिरस्कार से छुटकारा चाहिए. यही लोग असल और सच्चे अंबेडकरवादी हैं.
कौन दिलाएगा नजात
अब सभी सियासी दल दलितों की बात तो कर रहे हैं लेकिन वह महज चुनावी है. कोई भी उन्हें मुख्यधारा में लाने की पहल तो दूर की बात है उस की बात भी नहीं कर रहा है. सपा के साथ दिक्कत यह है कि उस पर यादवों और मुसलमानों की पार्टी होने का ठप्पा लग चुका है. बसपा अंबेडकर के उसूलों से कटने के बाद दौड़ से बाहर है. भाजपा बदस्तूर अपने धार्मिक एजेंडे पर सवार है. असपा जरूर संघर्ष कर रही है. इस माहौल में कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा है कि वह कैसे दलितों का खोया हुआ भरोसा और समर्थन हासिल करे.
कांग्रेस अभी भी सब से बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन उस में भी दलित नेताओं का टोटा है. राहुल गांधी दलितों, संविधान और अंबेडकर की बात जरूर करते हैं जिस का फायदा भी कांग्रेस और उस से भी ज्यादा सपा को पिछले लोकसभा चुनाव में मिला था. लेकिन राहुल गांधी पिछड़ों और मुट्ठीभर समर्थकों के लिहाज में खुल कर दलितों की बात उस दमदारी से नहीं कर पा रहे हैं जिस की कि उन्हें और दलितों को जरूरत है.
यानी, सब की अपनी मजबूरियां, स्वार्थ और सीमाएं हैं. ऐसे दलितों को ही समझना होगा कि उन का वह भला, जिस की कल्पना और कोशिश अंबेडकर ने की थी, धर्म या राजनीति से नहीं बल्कि दलित विचारकों और गैरदलित हितैषियों की सक्रियता से पूरी होगी जो दलितों के भटकाव को ले कर हताश हो चले हैं क्योंकि दलित समुदाय उन की बातों पर ध्यान ही नहीं दे रहा है.
कांशीराम ने राजनीति में नया प्रयोग किया था. वे पिछड़ों को यह एहसास कराने में कामयाब रहे थे कि धर्मग्रंथों के लिहाज से हैं तो वे भी शूद्र ही लेकिन भाजपा ने 90 के दशक के बाद ऐसा माहौल बनाया कि पिछड़े खुद को दलितों से श्रेष्ठ समझने की खुशफहमी का शिकार हो कर इधरउधर भटकने लगे. जबकि, मुख्यधारा में वे भी उपेक्षित हैं. मुख्यधारा यानी 8 – 10 फीसदी सवर्ण जिन का दबदबा राजनीति और ब्यूरोक्रेसी में कायम है.
हैरानी और चिंता की बात यह है कि 20 फीसदी दलित और 45 फीसदी के लगभग पिछड़े 4 फीसदी ब्राह्मणों की गुलामी अब दूसरे तरीके से ढो रहे हैं. पिछड़ों की ऊंची और संपन्न जातियां, जो 20 फीसदी भी नहीं, खुद को सवर्ण समझने की भूल कर रही हैं तो इस का खमियाजा भी वे भुगत रही हैं. बिहार में राजद का हश्र इस का जीताजागता सुबूत है.
लेकिन दलितों के पास अभी मौका है कि वे इस से सबक लें नहीं तो उसे हालात सुधरने की उम्मीद नहीं करना चाहिए. हालात अभी न सुधरने लायक बिगड़े नहीं है बशर्ते दलित अपने सच्चे शुभचिंतक और विचारकों को पढ़ेंसुनें और अमल भी करें. दलित तबके में प्रतिभाशाली, मेहनती और बुद्धिजीवी लोगों की कमी नहीं लेकिन उन की दिक्कत यह है कि उन के विचार काम और सुझाव बहुत छोटे दायरे में सिमट कर रह जाते हैं या समेट कर रख दिए जाते हैं वरना कांचा इलैया शेफर्ड, आनंद तेलतुन्बंडे, सूरजपाल चौहान, मीना कंडासामी, गोपाल गुरु, पेरूमल मुरगन, प्रोफैसर विवेक कुमार और मोहनदास नैमिशराय सहित सूरज येंगडे और राजरत्न अंबेडकर जैसे सैकड़ों चिंतकविचारक हैं जो देश को हिलाने की कूवत रखते हैं. जरूरत वही इन्हें पढ़ने, समझने और प्रोत्साहन देने की है.
कांग्रेस को अंबेडकर का रास्ता लेना ही पड़ेगा – फूलसिंह बरैया, वरिष्ठ दलित नेता व कांग्रेस विधायक
मध्यप्रदेश के इकलौते वरिष्ठ और दिग्गज दलित नेता फूलसिंह बरैया बसपा संस्थापक कांशीराम के मानस पुत्र कहे जाते हैं. मध्यप्रदेश में बसपा का प्रभाव जब बढ़ रहा था और वे सर्वमान्य दलित नेता के तौर पर स्थापित होते जा रहे थे तो मायावती को उन से खतरा महसूस हुआ. नतीजतन, उन्होंने बसपा को इस राज्य में एक हद से आगे बढ़ने ही नहीं दिया तो वे कांग्रेस में आ गए. यहां पेश हैं उन से की गई बातचीत के प्रमुख अंश.
सवाल – कांग्रेस दलितों के वोट व समर्थन हासिल करने में पिछड़ क्यों रही है?
जबाब – महज इसलिए कि वह भीमराव अंबेडकर का नाम खुल कर नहीं ले पा रही.
सवाल – क्या आप अपनी ही पार्टी पर आरोप लगा रहे हैं?
जबाब – बिलकुल नहीं. मैं तो पार्टी को सुझाव देते यह कह रहा हूं कि कांग्रेस इकलौती पार्टी है जिस के साथ देशभर के दलित हैं. यह और बात है कि कुछ इधर गए, कुछ उधर गए जिस के चलते दलित वोटों में बिखराव आया जिस का खमियजा दलित भुगत भी रहे हैं
सवाल – दलित इधरउधर गए ही क्यों?
जबाब – यह बहुत उम्दा सवाल है. अधिकतर दलित भाजपा के बरगलाने में आ गए और धार्मिक कुंठा के चलते खुद को सवर्ण समझने लगे. वे भूल गए कि बाबासाहेब ने कहा यह था कि धर्म, मंदिर और देवीदेवताओं से बच कर रहना. ये तुम्हारे लिए नहीं हैं. ये ऊंची जाति वालों के औजार हैं जिन की नोक तुम्हारी तरफ है. भूल तो वे यह भी गए कि उन्हें शिक्षित होने की हिदायत दी गई थी लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि यही शिक्षित हो कर मंदिरों में जा कर घंटेघड़ियाल बजा रहे हैं, पूजापाठ कर रहे हैं, मंदिरों में अपनी मेहनत की कमाई दान कर रहे हैं. हालांकि, मानते वे उन अंबेडकर को हैं जिन्होंने मनु स्मृति ही जला दी थी. आप ने या किसी ने कभी यह नहीं सुना या देखा होगा कि किसी विष्णु भक्त ने अंबेडकर की शिक्षा की बात की हो लेकिन दलित भगवानभगवान का खतरनाक और आत्मघाती खेल खेलने लगा है.
सवाल – तो फिर कांग्रेस दलितों को यह सब समझा क्यों नहीं पा रही?
जवाब – दो टूक कहूं तो सवर्णों की वजह से जो अब उस के रहे ही नहीं. पार्टी को आज नहीं तो कल उन का मोह और परवा छोड़ना ही पड़ेंगे.
सवाल – सवर्ण तो भाजपा में कांग्रेस से कहीं ज्यादा हैं, फिर दलित क्यों उस की तरफ भागता है?
जवाब – यह आरएसएस का कुचक्र है, भाजपा उस का टूल है. दलितों को वे धर्म का डर और लालच दिखा कर टैंपरेरी तौर पर ही बहका सकते हैं. आखिर में तंग आ कर उन्हें आना तो वापस कांग्रेस में ही पड़ेगा. इस में देर न हो, इस के लिए पहल कांग्रेस को करनी पड़ेगी.
सवाल – दलित राजनीति का भविष्य कैसे आंकते हैं?
जवाब – बगैर दलितों के अब कोई दल राजनीति नहीं कर सकता. दलित भोला, सीधा और मोदीराज में भयभीत है. जिस दिन उसे अक्ल आ जाएगी वह दिन उस की गैरत और इज्जत के जश्न का दिन होगा. Dalit Rights





