डियर दीपिका,

तुम मेरी जैसी ना जाने कितनी लड़कियों की हिम्म्त बन गई हो. आज से नहीं बल्कि उस दिन से जिस दिन से तुमने अपने डिप्रेशन की सच्चाई को अपनाते हुए उससे लड़ी और जीती भी.

80-90 के दशक में फिल्मों के नायक को हम लड़कियां अपना हीरो समझती थीं जो बस्ती के लिए लोगों के लिए लड़ता. जो महिलाओं की इज्जत बचाता. जो गरीबों का मसीहा होता. जो कभी मजदूरों का लीडर तो कभी कुली बन जाता. जब हम लड़कियां बड़ी हुईं तो समझ आया ये तो कल्पना के हीरो हैं असलियत के नहीं. हां असल जिंदगी में फिल्मों के उन विलेन से जरूर सामना हुआ. ये अलग बात थी कि उनके चेहरे अलग थे.

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