सुधीर मिश्रा निर्देशित फिल्म ‘‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’’ में अभिनय कर सेक्सी एक्ट्रेस के रूप में पहचान बनाने के बाद चित्रांगदा सिंह ‘‘यह साली जिंदगी’, ‘इंकार’, ‘साहेब बीबी और गैंगस्टर’ सहित कई फिल्मों में लीक से हटकर किरदार निभाती आयी हैं. चित्रांगदा सिंह महज एक एक्ट्रेस नहीं हैं, बल्कि वह फिल्म निर्माता होने के साथ साथ फिल्म की पटकथाएं भी लिख रही हैं. टीवी पर कुकरी शो कर रही हैं. इन दिनों जहां वह सैफ अली खान के साथ गौरव बजाज निर्देशित फिल्म ‘‘बाजार’’ को लेकर चर्चा में हैं. वहीं वह आर्मी की पृष्ठभूमि के अलावा एक अन्य स्पोर्ट्स बायोपिक फिल्म बनाने की भी सोच रही हैं.

आपने अपने 15 साल के करियर में बहुत कम फिल्में की. इसकी कोई खास वजह ?

पहली बात तो मेरे करियर को 15 वर्ष नहीं हुए. 2003 में मेरी पहली फिल्म ‘‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’’ आयी थी. पर 2004 में मैंने बौलीवुड को बाय बाय कर दिया था. पूरे छह साल तक मैंने कोई काम नहीं किया. 2010 से 2014 तक मैंने काम किया. फिर दो वर्ष मैंने काम नही किया. अब 2016 के बाद काम करना शुरू किया है. तो जब हम अपने करियर में इतना लंबा ब्रेक लेते हैं, तो फिल्मों की संख्या का कम होना भी लाजमी है. यहां इंडस्ट्री में अपने आपको निरंतर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है. पर मैं अपने आपको खुशकिस्मत मानती हूं कि जब भी ब्रेक लेकर मैंने काम करना चाहा, तो इंडस्ट्री ने मुझे हाथों हाथ लिया. 2014 में मैंने अपने निजी जीवन व वैवाहिक जीवन की समस्या के चलते ब्रेक लिया. अपनी जिंदगी की कुछ वजहों से भी मैंने कम काम किया. वैसे भी सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं हर जगह जरूरी होता है कि जहां आप काम कर रहे हैं, वहां हमेशा मौजूद रहें. लोगों के जेहन में मौजूद न रहने से फर्क पड़ता है.

पारिवारिक या निजी जीवन की समस्याओं का करियर पर किस तरह से असर होता है?

बहुत फर्क पड़ता है. हम अपना काम करके जो शोहरत, जो प्रशंसा इकट्ठा करते हैं, लोगों का जो विश्वास जीतते हैं, वह सब पारिवारीक व निजी समस्या के चलते हम गंवा देते हैं. मुझे लेकर लोगों के मन में हमेशा सवाल बना रहता है कि मैं मुंबई में रहती हूं या दिल्ली में रहती हूं. कई बार फिल्मकार मुझसे सवाल करते हैं कि अच्छा मुंबई में भी आपका घर है? इस वजह से भी लोगों के मन में शंका होती है कि यह गंभीरता से काम करेगी या बीच में छोड़कर चली जाएगी. तो फिल्मकारों के मन से इस शंका को दूर करने में मुझे बहुत समय लगा. यह सब मेरे निजी जीवन और पारिवारिक समस्या के चलते ही हुआ. जब हम लोगों की नजरों के सामने होते हैं, तो उन्हें अपनी फिल्म की कास्टिंग के समय हम याद आ जाते हैं. पर नजरों से ओझल होते ही सब कुछ गड़बड़ हो जाता है. फिर यह प्रतिस्पर्धा का जमाना है. और प्रतिस्पर्धा के दौर में फायदा उसी का होता है, जो सामने नजर आता है.

2014 के बाद दो साल तक बौलीवुड से दूर रहने के बाद जब आपने वापसी की, तो आपने ‘‘सूरमा’’ जैसी फिल्म से निर्माता बनने की बात क्यों सोची? क्या उस वक्त अभिनेत्री के तौर पर फिल्म नही मिल रही थी?

ईमानदारी की बात यह है कि मेरे पास बीच में समय बहुत था. क्योंकि मैं किसी फिल्म में अभिनय नहीं कर रही थी. खाली वक्त में मैंने लिखना भी शुरू किया था. उस वक्त मैं दो अलग अलग विषयों पर फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रही थी. क्योंकि मुझे लिखने में मजा आ रहा था. उसी दौरान एक दोस्त के मार्फत मेरी मुलाकात हौकी खिलाड़ी संदीप से हुई. जब मैंने संदीप सिंह के जीवन की कहानी सुनी, तो मुझे अविश्वसनीय लगी.

पर आप भी जानते हैं कि मैं शुरू से स्पोर्ट्स से जुड़ी रही हूं. तो मुझे पता है कि खेल जगत में एक बार चोटिल होने के बाद दुबारा वापसी करना मुश्किल होता है और वह भी हौकी जैसे खेल में, जहां शारीरिक रूप से स्वस्थ होना पहली जरूरत होती है. तो मैंने संदीप सिंह की कहानी को लिखना शुरू किया. लिखते लिखते मैंने उनके व खेल के बारे में बहुत कुछ महसूस किया. मैंने महसूस किया कि किसी भी खेल को खेलने में कितनी तकलीफें आती हैं. मैंने बहुत करीब से देखा हैं कि एक खिलाड़ी‘इंडियन जर्सी’पहनने के लिए कितनी मेहनत करता है. मुझे पता है कि क्रिकेट के खेल में बहुत पैसा है. मगर बाकी खेलों में पैसा नहीं है. क्रिकेट से इतर खेलों में खिलाड़ी महज ‘इंडियन जर्सी’पहनने के लिए जी जान लगा देता हैं. मुझे पता है कि क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में लोग भारत देश के लिए खेलते हैं. तो उनके अंदर खेल के साथ साथ अपने देश भारत के लिए जो जज्बा, जो जुनून होता है, वही सब कुछ मुझे संदीप सिंह की कहानी में नजर आया. जिसकी वजह से मेरे दिल ने आवाज दी की यह कहानी पूरे देश को सुनायी जानी चाहिए. और वह भी इसलिए क्योंकि यह क्रिकेट का खेल नहीं है. मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि सदीप सिंह की कहानी को व्यवसाय के रंग में न रंगते हुए यथार्थ के धरातल पर सही ढंग से परदे पर पेश कर लोगों तक पहुंचाउं. मुझे लगता है कि मैंने अपनी तरफ से ईमानदारी से काम किया.

पर क्या आपने सोचा कि क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों से खिलाड़ी को पैसा क्यों नहीं मिलता है? उनके सामने समस्या क्यों आती हैं?

मैं हमेशा से सोचती रही हूं. मेरा भाई भी गोल्फ खेलता है. उसने अमैच्योर गोल्फ खेला है. एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. तो मुझे सारी तकलीफें पता है. जब मेरा भाई एशियन गेम्स में गोल्फ खेलने गया था, तो हमारे लिए बहुत बड़े गर्व की बात थी. वह भारतीय टीम का हिस्सा था. मेरे पिता खुद आर्मी में रहे हैं. तो हमारे लिए गौरव का वक्त था. लेकिन जब वह अपने ब्लेजर की फिटिंग के लिए गया था, तो बहुत तकलीफ हुई थी. क्योंकि ब्लेजर की गुणवत्ता बहुत घटिया थी. हर तरफ से बहुत टाइट/कसी हुई थी. वह पहन नहीं पा रहा था. रातों रात उसने उसे दूसरे दर्जी से ठीक करवाया. तो जो दर्जी खिलाड़ियों की ब्लेजर व पैंट सिलते हैं, उनके मन में भी इन खिलाड़ियों के प्रति कोई सम्मान नहीं होता कि कम से कम उनकी ब्लेजर और पैंट तो सही नाप से सिलें. जबकि मेरा भाई बीस दिन पहले नाप दे चुका था. यह बात एक खिलाड़ी के लिए बहुत मायने रखती है. खिलाडी ब्लेजर को अपने गौरव के लिए पहनता है. पर यदि दर्जी के रूप में उसने उसे सम्मान नही दिया, तो कितनी तकलीफ होती है. यह एक छोटा सा उदाहरण है. मैंने इसी तरह से खिलाड़ियों के साथ बहुत सी चीजों पर शुरू से सोचती रही हूं. मैं स्पष्ट कर दूं कि मुझे क्रिकेट बहुत पसंद है. पर खेल जगत में यदि आप क्रिकेटर नहीं हैं, तो आपके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है. मेरे कई राष्ट्रीय स्तर के शूटर खिलाड़ी जोरावर सिंह संधू, जुही आदि मित्र हैं. जिनसे मेरी बात होती रहती है. इन सभी को भी बहुत मुसीबतों का सामना करना पडता है. इन्हें शूटर के रूप में प्रैक्टिस करने के लिए कारतूस तक नहीं मिलते. तो यह बेचारे कहां से प्रैक्टिस करेंगें? कैसे अच्छे खिलाड़ी बनेंगें? क्रिकेट और दूसरे खेल के खिलाड़ी के बीच बहुत अंतर है. क्रिकेट के अलावा दूसरे खिलाड़ियों के साथ जो समस्या है, उसकी सबसे बड़ी समस्या प्रायवेट स्पांसरो का ना होना है. सरकार की तरफ से तो कमी बनी ही रहती है. क्रिकेट के साथ प्रायवेट स्पांसर बहुत होते हैं. सच कहूं तो मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं किसे दोष दूं. किस पर आरोप लगाउं? पर मैं देश के हर नागरिक से यह कहना चाहूंगी कि संदीप सिंह जैसे बहुत से खिलाड़ी ऐसे हैं, जो पैसे के लिए नहीं देश के लिए खेलते हैं. तो हम सबको दर्शक की हैसियत से सामने आकर ऐसे खिलाड़ियों की मदद करके उनका हौसला बढ़ाना चाहिए. छेत्री ने तो खुद लोगों से अपील की थी कि कम से कम आप खिलाड़ियों को सम्मान दें, उन्हें पहचान तो दें, भले पैसा ना दें.

पिछली बार जब आपसे मुलाकात हुई थी, तो आपने बताया था कि आप शूटर की ट्रेनिंग ले रही हैं. उस वक्त आप एशियन गेम्स में जाना चाहती थीं. उसका क्या हुआ?

हंसते हुए..कुछ नहीं हुआ. जैसा कि मैंने अभी थोड़ी देर पहले बताया कि हमें भी बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा. मैं ट्रैक शूटिंग कर रही थी. बहुत प्रैक्टिस कर रही थी. मैंने अपने लिए भाई से कह कर एक गन भी सेट करवायी. उसे मैंने अपनी साइज का बनवाया था, जिसमें 26 इंच का बैरेल था. लेकिन वही कारतूस का सबसे बड़ा मुद्दा था. क्योंकि उस वक्त भी और आज भी मैं रिनाउंड यानी कि लोकप्रिय शूटर नहीं हूं. इसलिए हमें शूटर के रूप में प्रैक्टिस के लिए कारतूस का उतना कोटा नहीं मिलता, जितनी जरूरत थी. जिसकी वजह से मैं आगे नहीं बढ़ पायी. मेरी ही तरह कई खिलाड़ियो के साथ ऐसा होता है. तो लोगों में प्रतिभा होने के बावजूद सुविधा के अभाव के चलते वह आगे नहीं बढ़ पाते हैं. मेरे साथ भी यही हुआ. इसलिए फिर से अभिनय में ध्यान देना शुरू कर दिया.

चर्चा है कि आप किसी मशहूर तैराक पर बायोपिक फिल्म बनाना चाहती हैं?

जी हां! यह एक अपाहिज तैराक की कहानी है.

आपके पिता आर्मी में रहे हैं. आपको नही लगता कि आर्मी को लेकर आप फिल्म बनाएं?

आपने मेरे मन की बातें पढ़ रखी हैं. क्योंकि यह विचार मेरे मन में काफी दिनों से चल रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हाल ही में भारत में कुछ फिल्में बनी हैं, जिनमें आर्मी को गलत ढंग से पेश किया गया है. इन फिल्मों को बनाते समय इस बात पर ध्यान ही नही दिया गया कि बैच कैसे लगने चाहिए? कितनी सीटियां होनी चाहिए? कैसी बेल्ट होनी चाहिए? यह सब मुझे पता है. तो इन फिल्मों को देखकर एक सैनिक की बेटी होने के कारण बहुत तकलीफ हुई. इन फिल्मों में निर्देशन और कला निर्देशन बहुत गलत होता है. इन फिल्मों में आर्मी को बहुत अलग ढंग से दिखाया गया, जिसे देखकर मुझे तकलीफ होती है. फिल्म देखकर लगता है कि आर्मी का क्या मजाक बना रहे हैं? सिर्फ मैं ही क्यों जो भी इंसान आर्मी में हैं, उन सभी को तकलीफ होती है. आर्मी से जुड़े लोग उस ढंग से संवाद करते ही नहीं, जिस ढंग से फिल्मों में दिखाया जाता है. तो कुछ कहानियों पर हम काम कर रहे हैं, पर सही वक्त आने पर मैं उसे उजागर करना चाहती हूं.

आपने बताया कि आप बीच में कुछ लिख रही थीं. तो क्या लिख रही थीं?

देखिए, मैं कविता या कहानी नहीं लिख रही थी. बल्कि मैं तीन फिल्मों की पटकथा लिख रही थी. इसमें से एक बच्चों की फिल्म है, जो कि मेरे दिल के काफी करीब है. मेरी तमन्ना है कि मैं सबसे पहले इस फिल्म पर काम करूं. दूसरी फिल्म प्रेम कहानी और तीसरी एक रोमांचक फिल्म है.

आप निर्माण, लेखन, अभिनय सहित कई जगह हाथ पैर मार रही हैं. बीच में आप टीवी शो से भी जज के रूप में जुड़ी थीं. अब आप टीवी पर कुकरी शो कर रही हैं?

आपने बिलकुल सही कहा. मैं इन दिनों कई तरह के काम कर रही हूं. पर इसके पीछे कोई खास वजह नहीं है. देखिए, मुझे सिनेमा से प्यार है. सिनेमा मुझे बहुत उत्साहित करता है. मेरे लिए सिनेमा महत्वाकांक्षा नही, बल्कि एक पैशन है. पैशन में आप अंधे होकर दौड़ते हैं. जबकि महत्वाकांक्षा के लिए लौजिक जरूरी है. इसलिए मैंने लिखना शुरू किया. इसी पैशन की वजह से निर्माता भी बनी. क्योंकि में चाहती थी कि संदीप सिंह की कहानी बिना कोई मसाला डाले लोगों तक पहुंचे. फिल्म ‘सूरमा’ से मुझे इतना उत्साह मिला है कि जिन लोगों ने मुझ पर विश्वास बनाया है, उसके कारण मैं कुछ और फिल्मों का निर्माण करना चाहूंगी.

लेकिन टीवी पर डांस इंडिया डांस या कुकरी शो मजे के लिए कर रही हूं. मैं इन कायक्रमों को करते हुए इंज्वाय कर रही हूं. मैंने बहुत यात्राएं की हैं. मैंने बहुत अलग अलग तरह के व्यंजन चखे व बनाना भी सीखा है. ताईवान से लेकर कोरिया, जापान, दक्षिण अमरीका सहित बहुत से देशों की कूकिंग को लेकर जानकारी रखती हूं. तो मुझे लगा कि कूकिंग शो से जुड़ना चाहिए. एक औरत और कुक होने के नाते अपने अनुभव इस शो में बांट रही हूं.

सिर्फ अपने अभिनय करियर से आप कितना संतुष्ट हैं?

संतुष्ट हूं ऐसा तो नहीं कह सकती. क्योंकि अभी तक मैंने बहुत ज्यादा काम नही किया है और ना ही बहुत अलग तरह के किरदार किए हैं. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मुझे लगता है कि अभी बहुत कुछ करना है. मैं चाहती हूं कि लोग कहें कि यह किरदार आपके लिए लिखा गया है. मुझे लगता है कि मेरे अंदर जो आग है, उसके चलते कुछ किरदार अपने आप मेरे पास आ जाएंगे. मैं इस उम्मीद से काम कर रही हूं कि मुझे भी कुछ बेहतर करने का मौका मिलेगा. मेरी इच्छा कुछ अलग तरह के किरदार निभाने की है. मसलन 26 अक्टूबर को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘बाजार’’ में काफी अगल तरह का किरदार निभाया है. इस तरह का किरदार इससे पहले नहीं निभाया था.

फिल्म ‘‘बाजार’’ के किरदार को लेकर क्या कहेंगी?

इस फिल्म में मंदिरा का किरदार निभाया है, जो कि एक उद्योगपति की बेटी है. मंदिरा के पिता की कंपनी में शकुन कोठारी (सैफ अली खान) नौकरी करते हैं. वह इस कंपनी को पांच करोड़ से पचास करोड़ की बनाने में योगदान देते हैं. उसके बाद मंदिरा व शकुन कोठारी की शादी हो जाती है. अति महत्वाकांक्षी शकुन अपनी मेहनत के बल पर एक दिन डायमंड मार्केट के अलावा शेअर बाजार में बहुत बड़ी हस्ती बन जाते हैं. मंदिरा अपने पति के साथ चट्टान की तरह खड़ी रहती है. मगर दौलत व महत्वाकांक्षा को लेकर मंदिरा व शकुन दोनों की सोच में अंतर है. मंदिरा एक अमीर परिवार से आयी है. इसलिए उसके लिए दौलत बहुत बड़ा मुद्दा कभी नहीं होता. उसके जीवन मूल्य व आदर्श अलग है. जबकि नए नए अमीर बने शकुन के लिए दौलत बड़ा मुद्दा है. मंदिरा जहां आवश्यक हो, वहीं बोलती है अन्यथा चुप रहना पसंद करती है. अब वह दो बेटियों की मां भी बन चुकी है. मगर महत्वाकांक्षाओं के टकराव के चलते मंदिरा का वैवाहिक जीवन गड़बड़ होता है.

सैफ अली खान के साथ फिल्म ‘‘बाजार’’ आपकी पहली फिल्म होगी?

जी हां! सैफ के साथ यह मेरी पहली फीचर फिल्म है. पर कई वर्ष पहले मैंने उनके साथ एक विज्ञापन फिल्म ‘‘ताज चाय’’ की थी. जब हम दोनों इस फिल्म के सेट पर मिले, तो इस विज्ञापन फिल्म को याद कर रहे थे. इस विज्ञापन फिल्म की शूटिंग के कुछ फोटोग्राफ सैफ के पास थे, जो एक दिन वह सेट पर लेकर आए थे. उस फोटो में वह और मैं दोनों अलग नजर आ रहे थे. उनके साथ काम करने का अपना अलग आनंद रहा

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