Awarapan 2 Movie Review: साल 2007 में आई फिल्म 'आवारापन' सिनेमाघरों में रिलीज के समय एवरेज मानी गई थी, मगर तब इस के गाने खूब चले थे. ‘तेरा मेरा रिश्ता...’ गाना तो लोगों की जबान से उतरा ही नहीं. समय के साथ फिल्म के सीक्वल की मांग उठी. अब 19 साल बाद इस का दूसरा पार्ट आया है और शिवम पंडित बना इमरान हाशमी उसी भूमिका में दिखाई दिया है. मगर सिवा नोस्टेल्जिया और मिलेनियल्स की झूठी आत्मसंतुष्टि के, 'आवारापन 2' फीकी दिखाई देती है.
कहानी की शुरुआत ही उस मूल विचार को खत्म कर देती है जिस पर पहली फिल्म का क्लाइमैक्स टिका था. 'आवारापन' के अंत में गोलियों से छलनी शिवम की मौत एक स्प्रिचुअल डैथ थी, जो उसे जन्नत में अपनी प्रेमिका आलिया से मिलाती है, लेकिन अब सीक्वल बताता है कि शिवम मरा नहीं था. वह बच गया और अब भारत के किसी देहात में एक खामोश और उदास जिंदगी जी रहा है. वह अब भी आलिया की कब्र पर जाता है. उसी कब्र के पास उसे एक लावारिस बच्ची मिलती है, जिस का नाम वह आलिया ही रखता है.
सालों बाद, जब यह छोटी आलिया एक अंतर्राष्ट्रीय चाइल्ड ट्रैफिकिंग गिरोह का शिकार हो जाती है, तो अपने पुराने दर्द और हथियारों के साथ शिवम को वापस लौटना पड़ता है. यहां से फिल्म बैंकौक के अंडरवर्ल्ड में पहुंच जाती है. शिवम की टक्कर सनकी और खूंखार क्रिमिनल जोरावर (पूरन गब्बी) और एक अजीबोगरीब डौन नफीसा (शबाना आजमी) से होती है. इस बीच जोरावर की बहन जारा (दिशा पाटनी) भी कहानी में आती है, जो सेलो म्यूजिकल इंस्ट्रूमैंट बजाती है और अपने भाई की खूनी दुनिया से भागना चाहती है. शिवम का मकसद अब सिर्फ छोटी आलिया को ही नहीं, बल्कि अगवा किए गए 40 और बच्चों को बचाना है. जिस में वह अंत तक सफल हो जाता है.
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