पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ‘कसाब’ का विश्लेषण करते हुए उसकी संज्ञा कांग्रेस-समाजवादी पार्टी और बसपा से कहा था. अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और बसपा को ‘शराब’ कहा ऐसे ही मुददों से चुनाव प्रचार में जमीनी मुद्दे विकास, कालाधन, बेरोजगारी, चुनाव सुधार, जीएसटी, नोटबंदी, कालाधन  और अपराध जैसे मुददे चर्चा से बाहर हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में जब नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तब नरेन्द्र मोदी ने धर्म की राजनीति को दरकिनार करके विकास की राजनीति पर जोर दिया.

कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की सरकार के 10 साल के कुशासन से परेशान देश की जनता को लगा कि नरेन्द्र मोदी भाजपा की धर्म की राजनीति से दूर होकर देश में विकास की राजनीति करेंगे. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता अभियान, ग्रामीण आवास और महिलाओं को घरेलू गैस जैसी प्रमुख योजनाओं को आगे बढाने का काम भी किया. इसके बाद वह कांग्रेस वाली योजनाओं आधार कार्ड, जीएसटी और नोटबंदी जैसी योजनाओं को लागू करने लगे. इन योजनाओं के फेल होने का प्रभाव नरेन्द्र मोदी की सोंच पर पड़ा और वह 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रवाद, आतंकवाद, पाकिस्तान और राम मंदिर की राह पर वापस लौट आये.

विकास से शुरू हुआ नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक सफर धर्म और राष्ट्रवाद पर आकर टिक गया. 2014 में विकास, कालाधन, बेरोजगारी, चुनाव सुधार और अपराध के खिलाफ बात जंग लड़ने की बातें बेमानी हो गई. 2019 के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी पाकिस्तान और राष्ट्रवाद की बहस से जीत हासिल करना चाहते है. इसके लिये व्यापक रूप से प्रचार मध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है.  प्रचार की इस जदोजहद में जनता के अपने मुददे दूर हो गये है. लोकसभा चुनाव में मुददों को दरकिनार करके जुमलों को उछला जा रहा है.

लोकसभा चुनाव में जिन मुददों पर होना चाहिये चुनाव के प्रचार में वह मुद्दे कहीं नजर नहीं आ रहे है. चुनाव का प्रचार अभियान हर तरह की सीमायें तोड़ चुका है. चुनाव के प्रचार का बजट इतना बढ़ गया है कि छोटे छोटे क्षेत्रिय दलों प्रचार की दौड़ में पूरी तरह से पिछड गये है. बेराजगारी, मंहगाई, नोटबंदी, खेती किसानी और जीएसटी की मांग से जनता भले ही त्राहि-त्राहि कर रही हो पर राजनीतिक दल इस मंहगाई से पूरी तरह से बेअसर है. चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च घटाने के लिये भले ही तमाम प्रयास कर लिये हो पर चुनाव का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. चुनाव प्रचार ने जनता के मुद्दों को दरकिनार कर दिया है.

चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव लड़ने वालों को पैसा खर्च करने की एक सीमा तय कर रखी है. चुनाव आयोग खर्च का विवरण भी लेता है. इसके बाद भी चुनावों पर खूब सारा पैसा खर्च हो रहा है. जिसको देख कर साफ लग रहा है कि चुनावों के प्रचार में महंगाई का कोई असर नही दिख रहा है. मोटा अनुमान यह है कि इन चुनावों में राजनीतिक पार्टियां 20 हजार करोड़ से भी ज्यादा का पैसा खर्च कर रही है. सबसे ज्यादा पैसा शराब, प्रिटिंग, आटो, विज्ञापन और मैनेजमेण्ट लेवल पर खर्च हो रहा है. इसके अलावा निजी जरूरतों के सामान जैसे कपड़े, जूते, डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ, कास्मेटिक और कार्यकर्ताओं पर भी खूब खर्च हो रहा है.

चुनाव लड़ने वालों ने अपनी सुरक्षा पर भी खर्च को काफी बढ़ा दिया है. पहले सरकारी सुरक्षा कर्मचारियों के भरोसे ही नेता चल जाते थे. अब उनको अपनी ज्यादा सुरक्षा की जरूरत महसूस होती है. जिसके लिये वह प्राइवेट सुरक्षा एजेंसियों से बहुत सारे सुरक्षा कर्मचारियों को किराये पर लेकर चल रहे है. इन चुनावों में वोटरों को सीधे पैसा देने के बहुत सारे मामले सामने आ चुके है. इससे साफ लगता है कि चुनाव में पैसे भी खूब बांटे जा रहे हैं.

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