Festivals of India: सितंबर (द्वुतीय) अंक पढ़ा. सरित प्रवाह के अंतर्गत संपादकीय टिप्पणी ‘15वीं सदी की ओर’ में आप ने सारी बातें सही कही हैं, फिर भी हमें परिस्थितियों को देखना होगा. 1977 के ‘जनता फार्स’ की तरह आज की विपक्षी एकता फार्स साबित हो सकती है.

लेखक – आशीष कुमार चौधरी  

त्योहारों को भी आजादी

अक्तूबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘त्योहार खुशी के, लूट के नहीं’ पढ़ा. मानव समाज में त्योहार अति जरूरी हैं. इन से सामाजिक मेलमिलाप बढ़ता है. छोटेबड़े सभी व्यापारियों व कारोबारियों की रोजीरोटी चलती हैं. बाजार पुनर्जीवित हो उठते हैं. त्योहारों को सिर्फ परस्पर खुशी, खरीदारी और सामाजिक मेलमिलाप के तौर पर ही मनाया जाना चाहिए. इन में धर्म को घुसेड़ना ठीक नहीं. धर्मों ने ज्यादातर त्योहारों को हड़प लिया है. धर्मों ने उन्हें मंदिरों, पंडों, चर्चों, पादरियों, मसजिदों, मौलवियों के हाथों में लूटने का हथियार बना दिया है. वैदिक साहित्य (प्राचीन साहित्य) में गृह्यसूत्रों में त्योहारों का विधिविधान उपलब्ध है.

इन ग्रंथों में दीवाली नाम के किसी त्योहार का उल्लेख नहीं मिलता. लेकिन जिस दिन दीवाली का त्योहार मनाया जाता है, उस दिन गृह्यसूत्र में ‘नवसस्येष्टि’ (नई फसल का यज्ञ) या ‘नवान्नेष्टि’ (नए अनाज का यज्ञ) अथवा ‘आग्रयण कर्म’ (नए चावल देवताओं को देने का यज्ञ) करने का उल्लेख है.

मानव गृह्य सूत्र के अनुसार, नवान्नेष्टि किए बिना नया अन्न न खाएं. चावलों की आहुतियों के बाद सोम देवता को सावां नमक अनाज की अथवा घी की आहुतियां दें. क्षत्रिय और वैश्य जब यह यज्ञ करें तो उन के यज्ञों से बचे सामान को ब्राह्मण ही लें. क्षत्रिय और वैश्य स्वयं किए गए यज्ञशेष को लेने के अधिकारी नहीं हैं. यज्ञ की दक्षिणा एक बछड़ा ब्राह्मणों को दें.

त्योहार में धर्म की घुसपैठ न हो तो वह सब का हो जाता है. सारे समुदायों के सभी त्योहारों को धर्मों से आजाद करना जरूरी है. त्योहार तभी जिंदा रहेंगे जब वे बाजार, मुल्ला और पंडित की लूट से बचेंगे.  Festivals of India

लेखक – सूरज कांत शर्मा

 

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