Movie Review: दीवाली का मतलब सिर्फ दीये जलाना और मिठाइयां खाना नहीं है, बल्कि अपनों से मिल कर मन में दबी हुई उन बातों को बाहर निकालना भी है जिस से मन हलका हो. दीवाली दूरियां मिटाती है और एकजुट होने का एहसास दिलाती है. बल्कि स्मूद है जिसे पूरे परिवार के साथ बैठ कर देखा जा सकता है.

कहानी लखनऊ में रहने वाले परिवार की बुजुर्ग नानी (रोहिणी हट्टंगड़ी) के घर से शुरू होती है. नानी दीवाली के मौके पर अपने पूरे कुनबे को एक छत के नीचे इकट्ठा कर रही है. इस परिवार में 3 अलगअलग पीढ़ियां हैं. मजे की बात यह है कि तीनों पीढ़ियों के अपनेअपने विचार, तौरतरीके और उलझनें हैं.

फिल्म की स्टोरीलाइन सिंपल रखी गई है. कहानी की धुरी नानी के नाती जय (ऋत्विक भौमिक) के इर्दगिर्द है, जो अपनी पत्नी तारा की सड़क हादसे में हुई मौत के बाद से बुरी तरह टूट चुका है. वह अपनी पत्नी के जाने के गम से बाहर नहीं आ पा रहा है और उस ने अपने परिवार से भी दूरी बना ली है. वह जोर्जिया जाने का फैसला कर लेता है लेकिन उस की बहन सना (दलाई) एक बड़ा धमाका करने के लिए तैयार बैठी है तो उसे लखनऊ जाना पड़ जाता है. सना ने परिवार को बिना बताए चुपचाप करम (विक्रम बख्शी) से शादी कर ली है, पहले तो वह सिख है, दूसरे तलाकशुदा है और एक बच्ची का पिता भी है. जब सना अपनी इस शादी की खबर परिवार को देने के लिए लखनऊ पहुंचती है, तो त्योहार के माहौल में खलबली मच जाती है.

सना ने मरजी से शादी कर ली है तो पूरा परिवार इस बात को पचाने में लग जाता है. पूरा परिवार करम के साथ घुलनेमिलने की कोशिश करता है. इस बीच, जय भी अपने मन के भीतर लड़ रहा होता है. उसे इस में उस का का परिवार मदद करता है. फिल्म 3 पीढ़ियों के वैचारिक अंतर को ठीकठाक तरह से दिखाती है. एक तरफ पुरानी पीढ़ी के अपने तौरतरीके हैं, तो दूसरी तरफ बीच की पीढ़ी है जो बच्चों की हर हरकत पर चिंता करती है और घर को सहेज कर रखना चाहती है. वहीं, नई पीढ़ी अपनी शर्तों पर जिंदगी जीना चाहती है. इन तीनों पीढ़ियों की सोच के टकराव को निर्देशक ने बिना किसी भाषणबाजी के ठीकठाक तरह से परदे पर उतारा है.

फिल्म में जय का किरदार शांत और गंभीर है जो मैंटल स्ट्रैस और अकेलेपन से जूझ रहा है. इस के अलावा, घर में अचानक पहुंची 13 साल की पड़ोसी लड़की मीरा (शिविका ऋषि) के साथ जय का रिश्ता कहानी में एक अलग ही ठहराव पैदा करता है. निर्देशक ने मीरा को जय पर आया क्रश और फिर दोनों के बीच इस पर हुई बात को काफी सरलता से रैपअप किया है. अच्छी बात यह है कि यह भौंडा नहीं लगता. शुरुआत में मीरा का यों घर में रहना थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन धीरेधीरे इन दोनों के बीच की बौन्डिंग और बातचीत फिल्म के सब से प्यारे हिस्सों में से एक बन जाती है.

ऐक्टिंग में देखा जाए तो फिल्म की पूरी कास्ट ने अपना काम अच्छा किया है. रोहिणी हट्टंगड़ी नानी के किरदार में सहज लगती है, जो परिवार की मुखिया है और सब को एकजुट रखने की कड़ी है. ऋत्विक भौमिक ने एक चुपचाप और भीतर से टूटे हुए इंसान के दर्द को बहुत ही सधी हुई ऐक्टिंग से निभाया है.

अमृता के रोल में आयशा रजा मिश्रा की ऐक्टिंग एनर्जेटिक है. दलाई के साथ नोंकझोंक वाले कुछ सीन अच्छे बन पड़े हैं. एक परेशान और कंट्रोलिंग मां के रूप में वह पूरी तरह फिट बैठती है. ‘एनिमल’ फिल्म में रणबीर कपूर का भाई बनने के बाद एक बार फिर विक्रम बख्शी सिख बना है. 5.11 फुट का विक्रम अपनी भूमिका में जमा है.

तकनीकी तौर पर फिल्म बहुत मजबूत नहीं है. फिल्म लगभग एक घर में शूट हुई है तो सिनेमेटोग्राफर के पास करतब दिखाने के लिए ज्यादा कुछ था नहीं, मगर लखनऊ की हवेलियों और फैस्टिवल की रौनक को जितना संभव था, दिखाने की कोशिश की. अमित त्रिवेंद्र का म्यूजिक बहुत याद नहीं रहता और गाने भी चलताऊ हैं. फिल्म की लंबाई महज 119 मिनट है, जो इस तरह की कहानियों के लिए एकदम परफैक्ट है.

खैर, फिल्म ‘मीठे में क्या है’ यह एहसास जरूर कराती है कि चाहे परिवार में कितने भी मतभेद हों, अंत में साथ रहना और एकदूसरे को संभालना ही सब से बड़ी ताकत है. फिल्म कोई मास्टरपीस नहीं है. इस की पटकथा में कुछ खामियां हैं, लेकिन जिस तरह से यह परिवार की अहमियत को उकेरती है, वह सराही जा सकती है. Movie Review

 

 

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