Women’s Freedom: तकनीक ने औरतों को भी अपनी बात कहने, दुनिया देखने, अपनी पहचान बनाने और आत्मनिर्भर होने के नए रास्ते दिए हैं. लेकिन इसी तकनीक को लेकर धर्म के ठेकेदारों की चिंता भी बढ़ गई है. दिलचस्प बात यह है कि जब औरतों के अपनी पसंद से जिंदगी जीने की बात आती है तो सबसे पहले सवाल औरतों के चरित्र और संस्कारों पर उठने लगते हैं. तकनीक को कटघरे में खड़ा करना आसान है लेकिन क्या समाज कभी उन नियमों पर भी सवाल उठाएगा जिनके तहत औरतों की आजादी को आज तक शक की नजरों से देखा जाता है?
मौलाना कारी इसहाक गोरा को औरतों के मोबाइल फोन पर लगे रहने की चिंता है. उन्होंने कहा कि औरतें मोबाइल फोन पर घंटों लगी रहती हैं. अपनी मां, बहनों और दोस्तों से बातें करती हैं इससे घर का माहौल और रिश्ते खराब होते हैं. प्रेमानंद महाराज ने कहा कि मोबाइल की वजह से युवाओं के रिश्तों और वफादारी पर असर पड़ रहा है. वहीं बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने लड़कियों के सोशल मीडिया पर रील बनाने को लेकर कहा था कि जब तक हमारे देश की बेटियां अपने अस्तित्व को नहीं समझेंगी और रील पर, मोबाइल पर मुजरा बंद नहीं करेंगी तब तक भारतीय संस्कृति का बचना बहुत मुश्किल है.
दरअसल, हमारे समाज में औरतों की आजादी को लेकर एक पुरानी बेचैनी रही है. पहले घर से बाहर निकलने पर सवाल उठते थे, फिर नौकरी करने पर, उसके बाद अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर और अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं. माध्यम बदलते रहे हैं लेकिन सवाल करने का तरीका वही है. औरत अगर घर में रहे तो उसे आदर्श माना जाता है, बाहर निकले तो उसकी सुरक्षा और चरित्र पर चर्चा होने लगती है, अपनी तस्वीर साझा करे तो उसे संस्कृति पर खतरा बताया जाता है और अपनी पसंद से जीवनसाथी चुने तो परिवार की इज्जत का सवाल खड़ा कर दिया जाता है. इस तरह औरतों की हर नई आजादी को किसी न किसी मोरल डिजास्टर से जोड़ देना एक पुरानी सामाजिक आदत है.
मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा की लड़कियों के मोबाइल पर लगे रहने से घर बिगड़ रहे हैं तो क्या लड़कों के मोबाइल पर लगे रहने से घर जुड़ रहे हैं? यह कैसी मानसिकता है जिसमें हर समस्या के लिए लड़कियों को ही निशाना बनाया जाता है? बागेश्वर बाबा ने लड़कियों के रील बनाने को मुजरा कहा. कोई लड़की नाचती है, गाती है, अपने विचार रखती है या अपने जीवन के एक्सपीरियंस शेयर करती है तो यह उसकी निजी पसंद का मामला है. उसके काम की आलोचना की जा सकती है लेकिन केवल इसलिए उसे संस्कृति का दुश्मन बताना कि वह अपनी मर्जी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती है घटिया मानसिकता का ही नतीजा है. संस्कृति की रक्षा का जिम्मा केवल लड़कियों के कंधों पर क्यों है? लड़कों के व्यवहार, उनकी भाषा, उनकी ऑनलाइन एक्टिविटी और लड़कियों के प्रति उनके रवैये पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल क्यों नहीं उठाए जाते?
वृंदावन के तथाकथित संत प्रेमानंद महाराज ने प्रेम संबंधों, लिव-इन रिलेशनशिप और औरतों के चरित्र को लेकर बड़ी वाहियात बातें की हैं. एक बयान में उन्होंने कहा था कि सौ में से मुश्किल से दो-चार लड़कियां ही पवित्र जीवन जीती हैं और एक से ज्यादा मर्दो से संबंध रखने वाली लड़की सच्ची बहू कैसे बन सकती है? यहां सवाल यह है कि किसी व्यक्ति के प्रेम संबंधों के आधार पर उसके चरित्र का फैसला करने का अधिकार आखिर किसे है? अगर किसी मर्द के कई प्रेम संबंध रहे हों तो क्या समाज इसी ढंग से उसके चरित्र और उसके पति बनने की काबलियत पर सवाल उठाता है? अगर नहीं, तो औरतों के लिए अलग मोरल पैरामीटर क्यों है?
रिश्ते केवल औरतों के व्यवहार से नहीं टूटते. किसी भी रिश्ते में भरोसा, सम्मान, बातचीत, जिम्मेदारी और बराबरी की अहम भूमिका होती है. घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता, बेवफाई, भावनात्मक उपेक्षा, परिवार का दबाव और आपसी असहमति भी रिश्तों को कमजोर करते हैं. मोबाइल फोन इन समस्याओं की जड़ नहीं है. अगर पति अपनी पत्नी से बात नहीं करता, उसकी इच्छाओं का सम्मान नहीं करता या उसे अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी नहीं देता तो इसका दोष मोबाइल पर डाल देने से समस्या हल नहीं होगी. इसी तरह अगर पत्नी अपने पति के व्यवहार से परेशान है तो उसे केवल संस्कारों की दुहाई देकर चुप कराने से रिश्ता बेहतर नहीं हो जाएगा. रिश्ते बचाने के लिए दोनों पक्षों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी.
तकनीक ने औरतों को अपनी आवाज दी है जो पहले घर की चारदीवारी के भीतर दबा दी जाती थी. आज कोई औरत इंटरनेट के जरिए पढ़ सकती है, नौकरी खोज सकती है, अपना कारोबार शुरू कर सकती है, दुनिया भर के लोगों से जुड़ सकती है और अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकती है. सोशल मीडिया ने औरतों को ऐसे मंच भी दिए हैं जहां वे उन सवालों पर बात कर सकती हैं, जिन पर परिवार और समाज पहले चुप्पी साध लेते हैं.
औरतों को ही बार-बार यह बताना कि उन्हें कैसे कपड़े पहनने चाहिए, किससे बात करनी चाहिए, सोशल मीडिया पर क्या शेयर करना चाहिए और किस तरह का जीवन जीना चाहिए, किसी स्वस्थ समाज की पहचान नहीं है. असली सवाल यह नहीं है कि मोबाइल इस्तेमाल करने से औरतें बिगड़ रही हैं या नहीं. असली सवाल यह है कि जब औरतें अपने फैसले खुद लेने लगी हैं तो धर्म के ठेकेदारों को उनकी आजादी से इतनी परेशानी क्यों होने लगी है? तकनीक अच्छी है या बुरी, इसका फैसला उसके इस्तेमाल से होना चाहिए, न कि उसे इस्तेमाल करने वाले के जेंडर से.
असली जहर तो धर्म ने घोला है
आज पति-पत्नी एक ही कमरे में बैठे होते हैं लेकिन दोनों की दुनिया अलग-अलग मोबाइल स्क्रीन में खोई रहती है. प्रेमी-प्रेमिका साथ होते हुए भी सोशल मीडिया पर बिजी रहते हैं. बच्चे माता-पिता के पास होते हुए भी ऑनलाइन दुनिया में व्यस्त रहते हैं. ऐसे में यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि तकनीक ने हमारे अपने रिश्तों में दूरी बढ़ा दी है? लेकिन सवाल यह है कि तकनीक को ही दोष क्यों? धर्म ने रिश्तों को कितना जोड़ा है?
तकनीक तो केवल आईना है, असली जहर तो धर्म ने घोला है. हम कहते हैं फोन ने बातचीत खत्म कर दी. लेकिन बातचीत थी कब? नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे NFHS-5 का डेटा कहता है कि भारत में 29 परसेंट शादीशुदा औरतें पति द्वारा शारीरिक हिंसा की शिकार हैं. क्या यह हिंसा मोबाइल ने सिखाई? पेव रिसर्च के अनुसार भारत में 77 फीसदी लोग ऐसा मानते हैं कि पत्नी को हमेशा पति का कहना मानना चाहिए, चाहे वो सही हो या गलत. ये सोच फोन से आई या धर्म-परंपरा से?
तकनीक ने तो केवल उस हिंसा को रिकॉर्ड करना शुरू किया है. पहले पति पीटता था तो औरत चुप रहती थी क्योंकि धर्म ने कहा था पति परमेश्वर है. अब वही औरत फोन पर वीडियो बनाती है, 100 नंबर डायल करती है या अपनी सहेली को व्हाट्सएप करती है. आज की औरतें तकनीक के सहारे अपनी जिंदगी की मुश्किलें ढूंढ रहीं हैं. शोशल मीडिया के जरिये कानून को समझ रही हैं और तकनीक से जुड़ कर अपने लिए नये राश्ते तलाश रही हैं. औरतों का इस तरह समझदार होना मर्दवादी समाज हजम नहीं कर पा रहा. इसी वजह से परिवार के टूटने का सारा दोष औरतों पर डाल दिया गया है. असल में तकनीक ने रिश्ते तोड़े नहीं बल्कि रिश्तों के अंदर की सड़न को दिखाया है.
धर्म ही रिश्तों में दूरी की पहली नींव है
धर्म ने कभी भी पति-पत्नी को बराबर नहीं माना. मनुस्मृति ने कहा- “पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने” यानी औरत को हमेशा किसी पुरुष की रक्षा चाहिए. इसी सोच से प्रेम भी एक सौदा बन गया और शादी दो लोगों का प्रेम नहीं, दो परिवारों का धर्म-जाति का समझौता बन गई. CMIE का डेटा कहता है कि आज भी भारत में 93 प्रतिशत शादियां जाति के अंदर होती हैं. क्या तकनीक ऐसा कहता है कि शादी सिर्फ जाति के भीतर होनी चाहिए? यह नियम तकनीक ने नहीं, धर्म ने बनाया.
तकनीक ने तो पहली बार रिश्तों में औरत को ऑप्शन दिया है. 20 साल पहले अगर एक महिला का पति उसे गाली देता था, मारता था तो उसके पास रास्ता क्या था? मायके जाती तो धर्म कहता कि शादी सात जन्मों का बंधन है. पुलिस के पास जाती तो समाज कहता कि घर की बात घर में रखो. आज वही औरत फेसबुक पर लिखती है, इंस्टा पेज पर लाखों औरतों से जुड़ती है और यूट्यूब पर कानून और अधिकार की बातें जानती है जिससे वह अब पहले से ज्यादा जागरूक हुई है. अब वह जुल्म सहती नहीं बल्कि विरोध दर्ज करवाती है और इस विरोध से ही मर्दों के परिवार टूटने लगे हैं इसलिए सारा दोष तकनीक पर मढ़ दिया जा रहा है कि तकनीक की वजह से रिश्ते टूट रहे हैं.
नेशनल कमीशन फॉर वीमेन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 साल में घरेलू हिंसा की ऑनलाइन शिकायतों में 300 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. इस रिपोर्ट को देखकर लगता है कि हिंसा बढ़ी है, लेकिन नहीं. असल में रिपोर्टिंग बढ़ी है. तकनीक ने औरत को आवाज दी है. धर्म ने उसे सिखाया था कि जुल्म सहो मगर चुप रहो लेकिन पहली बार तकनीक ने औरत को सिखाया कि जुल्म मत सहो बल्कि जुल्म के खिलाफ आवाज उठाओ.
धर्म की सड़ान्ध में घुटते रिश्ते और हिन्दू औरत को तलाक का हक
सच यह है कि पहले जो रिश्ते टिके हुए दिखते थे वो टिके नहीं थे, टांके हुए थे. धर्म ने औरत के लिए तलाक को पाप बता दिया था. हिंदू समाज में शादी को एक ऐसा बंधन माना जाता था जिसे आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता था. पति चाहे तो औरत को छोड़ कर दूसरी, तीसरी शादी कर सकता था लेकिन औरत के लिए उसका पति ही परमेश्वर था. पति चाहे जुआरी, शराबी, नपुंसक या हिंसक हो वह रिश्ते को खत्म नहीं कर सकती थी. आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू की सरकार में हिंदू विवाह अधिनियम बनाया गया. जो 1955 में लागू हुआ. इसमें पहली बार हिन्दू औरतों को तलाक, अलगाव और विवाह से जुड़े दूसरे कानूनी अधिकार मिले.
हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के तहत कोई पत्नी क्रूरता, व्यभिचार, पति द्वारा छोड़ दिए जाने पर तलाक मांग सकती है. धारा 13(2) के अनुसार पत्नी को कुछ विशेष परिस्थितियों में तलाक मांगने के आधार दिए गए. इस कानून में 1976 में संशोधन हुआ. विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1976 के जरिए आपसी सहमति से तलाक का प्रावधान धारा 13B में जोड़ा गया.
इस कानून के बावजूद भारत में तलाक की दर दुनिया में सबसे कम है, सिर्फ 1 फीसदी. क्या इसका मतलब है कि हमारे रिश्ते सबसे अच्छे हैं? नहीं. इसका मतलब है कि यहाँ औरत के पास निकलने का दरवाजा आज भी बंद है. समाज, धर्म, परिवार सब कहते हैं, थोड़ा सह लो तो औरतें सहती हैं, घुटती हैं और एक ही कमरे में रहते हुए भी अकेली हो जाती हैं. अब उस अकेलेपन को देखकर कहा जाने लगा है कि फोन की वजह से दूरी है. सच ये है कि फोन से पहले भी दूरी थी, बस वो दिखाई नहीं देती थी. अब कम से कम वो दूरी दिखती तो है.
तकनीक दुश्मन नहीं है, तकनीक तो गवाह है. असली दूरी मोबाइल की स्क्रीन से नहीं, धर्म की उन दीवारों से पैदा होती है जो तय करता है कि पति ऊंचा है, पत्नी नीची है, प्रेम बराबरी नहीं समझौता है और शादी प्यार नहीं कर्तव्य है. जब तक रिश्तों को धर्म के तराजू पर तौला जाएगा तब तक दो लोग एक ही बिस्तर पर लेटकर भी अजनबी ही रहेंगे. अगर रिश्ते बचाने हैं तो फोन फेंकने से नहीं, धर्म के बनाए हुए पति-परमेश्वर और पतिव्रता वाले ढोंग को फेंकना होगा. रिश्ता तब जुड़ेगा जब दो लोग इंसान की तरह बराबर होकर जुड़ेंगे, भक्त और देवी बनकर नहीं.
तकनीक ने जाति-धर्म की दीवारें तोड़ीं
धर्म ने प्यार की परिभाषा ही बदल दी. प्यार को कर्तव्य बना दिया, अधिकार बना दिया, सेवा बना दी. मगर कभी बराबरी की बात नहीं की. धर्म ने माँ से कहा तुम ममता की मूर्ति हो तो उसे थकने का हक छीन लिया. पत्नी से कहा तुम लक्ष्मी हो तो उसे खर्च का हिसाब मांगने का हक छीन लिया. प्रेमिका से कहा तुम पवित्र हो तो उसे अपनी इच्छा कहने का हक छीन लिया. इन सुंदर शब्दों के पीछे एक ही साजिश थी कि औरत को इंसान से देवी बनाओ ताकि वो शिकायत न कर सके. देवी थकती नहीं, देवी गलती नहीं करती और देवी मना नहीं करती.
अब कानून और तकनीक ने मिलकर इस मूर्ति को जगाया है और उसे इंसान होने का एहसास कराया है. लड़कियाँ अब ममता की मूरत नहीं बनना चाहती, वह घर की लक्ष्मी नहीं बनना चाहिए और वह किसी परमेश्वर की दासी भी नहीं बनना चाहती. अब लड़कियों को भी बराबरी, न्याय, शिक्षा और सैलरी चाहिए. ये बगावत नहीं, ये इंसान बनने की प्रक्रिया है और जहाँ औरत इंसान बनती है, वहीं पितृसत्तात्मक धर्म की मौत तय हो जाती है.
तकनीक ने जाति-धर्म की दीवारें तोड़ीं, धर्म ने उन्हें सीमेंट किया. एक समय था जब आप जिससे प्यार करते थे, उससे शादी नहीं कर सकते थे क्योंकि पंडित, मौलवी और समाज के ठेकेदारों को आपके प्यार से पहले अपनी पोथी और पगड़ी की चिंता थी. आज भी जाती और धर्म की आड़ में ही 90 फीसदी ऑनर किलिंग को अंजाम दिया जाता है. प्रेम पर इस पहरे के पीछे धर्म खड़ा है, फोन नहीं. फोन ने तो जाति और धर्म की दीवारें तोड़ दी हैं. आज इंस्टाग्राम पर कोई लड़की अपनी पसंद के लड़के को ढूंढ लेती है जो पहले उसके गांव में कभी मुमकिन नहीं था. डेटिंग ऐप का डेटा बताता है कि भारत में 56 फीसदी Gen Z अपनी जाति से बाहर डेट करने को तैयार है. ये बदलाव धर्म से नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी की वजह से आया.
सबसे बड़ा झूठ ये है कि पहले परिवार जुड़े हुए थे. जुड़े नहीं थे, डरे हुए थे. दादा का हुक्म, चाचा का डर, बुआ के ताने और रिश्तेदारों की पंचायत. यही तो परिवार था. एक साथ बैठकर खाना खाते थे, पर बात कोई नहीं करता था. बाप बेटे से नहीं पूछता था तू खुश है या नहीं, बस कहता था नौकरी लगी या नहीं. तकनीक ने इस खामोश खाने को असहज बना दिया. अब बेटा खाने की टेबल पर भी हेडफोन लगाता है तो बाप को लगता है रिश्ता टूट गया. असल में रिश्ता तब भी नहीं था, तब सन्नाटा था. अब कम से कम बेटा हेडफोन में कोई पॉडकास्ट सुनकर दुनिया के बारे में जान तो रहा है. पहले तो इस सन्नाटे में सिर्फ आज्ञा चलती थी.
धर्म वाला रिश्ता तो वह था जहाँ सब साथ दिखते थे पर अंदर से सब अकेले थे. जहाँ औरत देवी थी पर इंसान नहीं, जहाँ शादी सफल दिखती थी क्योंकि तलाक लेना मना था. अब तकनीक वाला रिश्ता देखिए जहाँ दूर बैठे दो लोग भी वीडियो कॉल पर सच बोल लेते हैं, जहाँ लड़की कह सकती है, मुझे ये रिश्ता नहीं चाहिए. जहाँ प्यार कर्तव्य नहीं, चुनाव है. तकनीक ने हमें अकेला नहीं किया. तकनीक ने हमें पहली बार बताया है कि हम कितने अकेले थे?
रिश्तों की टूटन का बोझ औरतों पर क्यों?
रिश्तों के टूटने का सारा दोष औरतों पर डालना धर्म का सबसे पुराना आविष्कार है और ये कोई इत्तेफाक नहीं, ये पैटर्न है. जब भी घर टूटता है तो कहानी में एक औरत खलनायक बना दी जाती है. अयोध्या का राज्य टूटा तो नाम आया कैकेयी का और मंथरा का. सवाल किसी ने नहीं पूछा कि दशरथ ने बिना सोचे तीन वरदान क्यों दे दिए थे? पूरी राजसत्ता का संकट एक दासी और एक रानी की साजिश में समेट दिया गया.
ठीक वैसे ही हस्तिनापुर टूटा तो ठीकरा द्रौपदी के एक वाक्य पर फोड़ दिया गया, “अंधे का पुत्र अंधा”. जबकि सच ये है कि द्रौपदी का चीरहरण एक भरी सभा में हुआ था, दांव पर उसे लगाने वाला उसका पति था, और युद्ध की नींव तो बहुत पहले शकुनि के पासों और धृतराष्ट्र के मोह ने रख दी थी. लेकिन धर्म-कथा ने आसान रास्ता चुना कि औरत ने ज़ुबान चलाई इसलिए महाभारत हुआ.
धर्म ने ही सिखाया है कि औरतें चालबाज होती हैं. मनुस्मृति, बाइबल या कुरान में औरतों के बारे ऐसी ही बातें लिखी हैं. आज अगर रिश्तों के टूटने की जिम्मेदारी तकनीक पर डाला जा रहा है तो सवाल यह है कि धर्म ने रिश्तों को जोड़ने के लिए क्या किया? धर्म का सारा जोर परलोक सुधारने पर है लेकिन परलोक का यह लालच भी सिर्फ इंडिविजुअल के लिए है वहां कोई भाई बाप बहन माँ का रिश्ता नहीं है. हाँ, गरुण पुराण जैसे ग्रंथों में औरतों के सती हो जाने के बाद पति के साथ स्वर्ग में रहने की बात जरूर है. इस्लाम में भी औरत अगर खूब नेकी करे तो वह जन्नत में अपने पति की रखैलों की सुपरवाइजर बन कर इनाम पा सकती है.
यही पैटर्न हर धर्मग्रंथ में कॉपी-पेस्ट है. मनुस्मृति में लिखा है. स्त्री कभी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं. बाइबल में ईव को पहले पाप की जड़ बताया गया. कुरान में औरत को खेत कहा गया. मकसद एक ही था. अगर रिश्ता टूटे, परिवार बिखरे तो दोष व्यवस्था पर न आए, पुरुष पर न आए बल्कि दोष औरत पर जाए क्योंकि औरत को दोषी बनाना सस्ता है और व्यवस्था को बदलना महंगा.
परलोक की व्यवस्था में भी औरतों के साथ धोखा
धर्म का पूरा बिजनेस मॉडल ही परलोक पर टिका है. इहलोक के रिश्ते औरत के लिए सिर्फ सीढ़ी हैं. गरुड़ पुराण खोलिए, आपको पन्ने के पन्ने मिलेंगे कि पति के मरने पर सती होने से पत्नी को पति के साथ स्वर्ग में कितने हजार साल रहने को मिलेगा? यानी औरत के जीते जी उसके सुख की कोई बात नहीं, मरने के बाद भी उसका इनाम यही है कि वो फिर उसी पति के साथ रहे जिसने उसे जीवन भर दबा कर रखा. किसी भी धर्म में नारी के अपने स्वर्ग की कोई कल्पना नहीं.
इसी तरह इस्लामिक कथाओं में नेक औरत के लिए जन्नत का जो सबसे बड़ा इनाम है वो ये कि वो वहाँ अपने शौहर की हूरों की सरदार बन जाएगी. सोचिए, दुनिया में उसने पूरी जिंदगी सौतन का दर्द सहा, पर्दा किया, खिदमत की और आखिरत में उसे इनाम क्या मिला? वही पति और उसकी रखैलों की निगरानी? ये कैसा जोड़ना हुआ? ये तो गुलामी का स्थायी कॉन्ट्रैक्ट है. इस कॉन्ट्रैक्ट में माँ, बहन, बेटी, पिता का कोई अपना स्वतंत्र रिश्ता नहीं बचता. सब रिश्ते एक पुरुष के इर्द-गिर्द घूमते हैं. बेटी बाप की इज्जत है, पत्नी पति की जायदाद है, माँ बेटे के स्वर्ग की चाबी है. औरत का अपना कोई रिश्ता नहीं, वो हमेशा किसी के रिश्ते से पहचानी जाती है.
धर्म कभी भी दो लोगों के बीच बराबरी का पुल नहीं बना पाया. उसने हमेशा रिश्तों को वर्टिकल बनाया. ऊपर पुरुष, नीचे स्त्री. ऊपर सास, नीचे बहू. ऊपर बड़ा भाई, नीचे छोटी बहन. और जब भी वर्टिकल रिश्ता होता है तो उसमें प्यार नहीं, डर चलता है. सम्मान नहीं, आज्ञा चलती है इसीलिए हमारे घरों में लोग एक-दूसरे से बात नहीं करते, फरमान सुनते हैं.
तकनीक पर दोष डालना इसलिए आसान है क्योंकि तकनीक नया है और धर्म पुराना. फोन हाथ में दिखता है, धर्म दिमाग में नहीं दिखता. लेकिन डेटा कहता है कि जिन घरों में धर्म का दखल सबसे ज्यादा है, वहीं औरतों की हालत सबसे खराब है. थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सर्वे में भारत को औरतों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया था, वजह धर्म नहीं तो क्या था? क्या मोबाइल ने दहेज हत्या सिखाई? NCRB कहता है हर दिन 19 दहेज हत्याएं होती हैं. ये कौन सा ऐप सिखा रहा है?
औरत की आजादी से हिली धर्म की ईमारत
जब-जब औरत ने अपना मुंह खोला है, तब-तब रिश्ता टूटा नहीं, रिश्ते में पहली बार बराबरी आई है. सावित्रीबाई फुले ने जब स्कूल खोला तो कहा गया वो परिवार तोड़ रही हैं. रुकैया सखावत हुसैन ने जब मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो कहा गया वो समाज तोड़ रही हैं. आज जब कोई लड़की कहती है मैं लिव-इन में रहूंगी तो कहा जाता है वो संस्कृति तोड़ रही है. असल में वो संस्कृति नहीं बल्कि अपनी युगों पुरानी जंजीरे तोड़ रही है.
कोई भी रिश्ता पवित्र नहीं होता, सारे रिश्ते मानवीय होते हैं. मानवीय रिश्तों का सीधा मतलब यह होता है कि यह रिश्ते टूट सकते हैं, बन सकते हैं और बातचीत से ठीक भी हो सकते हैं. धर्म ने रिश्तों को पवित्र बनाकर उन्हें अटूट होने का श्राप दे दिया. अटूट का मतलब हो गया कि चाहे मारो, पीटो, गाली दो, रिश्ता तोड़ना पाप है. तकनीक ने पहली बार कहा कि नहीं, कोई भी रिश्ता पवित्र नहीं होता बल्कि सहमति से बनता है. सहमति खत्म तो रिश्ता खत्म. यही बात पितृसत्ता को सबसे ज्यादा चुभती है इसलिए अगर कोई कहे कि रिश्ते मोबाइल ने तोड़े हैं तो उससे पूछिए कि धर्म ने कौन सा रिश्ता बनाया था जहाँ औरत इंसान थी?
ध्यान दीजिए, हर कथा में आदर्श औरत वही है जो सहती है. सीता ने अग्निपरीक्षा दी फिर भी वनवास दिया गया, मगर वह चुप रहीं. गांधारी ने अपने अंधे पति की खातिर जीवन भर आंखों पर पट्टी बांधी. सावित्री ने यमराज से पति के प्राण वापस लिए. इन कहानियों को औरत के त्याग की मिसाल साबित करने के लिए पढ़ाया गया लेकिन सच बात यह है कि इन कथाओं के भीतर एक खतरनाक संदेश छिपा था कि रिश्ता बचाने की पूरी जिम्मेदारी औरत की है. पुरुष गलती करेगा और औरत उस गलती को अपने त्याग से सुधारेगी. पुरुष छोड़ देगा फिर भी औरत उस पति का जिंदगी भर इंतजार करेगी.
इसका नतीजा क्या हुआ? रिश्ते में दो बराबर के लोग रहे ही नहीं. एक कर्ता रहा और एक भोक्ता हो गया. एक फैसले लेता रहा और दूसरा भुगतता रहा और जब किसी भुगतने वाली ने थक कर कहा कि अब नहीं सहना तो धर्म ने तुरंत उसे कुल्टा और चरित्रहीन घोषित कर दिया. सोचिए, तलाक के लिए हिन्दू ग्रंथों में एक ही शब्द है. परित्यक्ता. ये शब्द सिर्फ औरतों के लिए क्यों है? परित्यक्त पुरुष क्यों नहीं होता? क्योंकि धर्म ने मान ही लिया है कि छोड़ने का अधिकार सिर्फ पुरुष के पास है और परित्यक्त होने का ठेका औरत के पास.
अब इसी धार्मिक ठेके को तकनीक ने तोड़ा है. लड़की के हाथ में जब अपना पैसा आया, अपना फोन आया, अपनी पढ़ाई आई तो उसने पहली बार पूछा कि मैं क्यों सहूं? और यहीं से धर्म को तकनीक से दिक्कत शुरू हुई. असली दिक्कत फोन की लत से नहीं, फोन की आजादी से है. क्योंकि वही लड़की जो पहले सास के ताने सुनकर रोती थी, अब यूट्यूब पर सर्च करती है कि क्या सास द्वारा ताना मारना घरेलू हिंसा है? वही लड़की जो करवा चौथ को भूखे रहना किस्मत समझती थी, अब गूगल करती है कि व्रत का वैज्ञानिक आधार क्या है?
औरतों की घुटन में पनपता धर्म
धर्म चाहता है कि रिश्ते अंधेरे में चलें, सवाल न पूछे जाएं मगर तकनीक रोशनी ले आती है और रोशनी में बहुत सारे रिश्तों की असलियत दिख जाती है कि वे प्रेम से नहीं, परजीविता से चल रहे थे. एक और चालाकी देखिए. धर्म ने कभी भी रिश्तों को सुधारने के लिए औरत को ज्ञान नहीं दिया बल्कि उसे ढेर सारी पूजा, उपासना और व्रत दिया. पति शराबी है तो पत्नी व्रत रखे. पति बेरोजगार है तो पत्नी पूजा करे. पति हिंसक है तो पत्नी कथा सुने. यानी बीमारी कहीं और मगर इलाज औरत के शरीर पर. गरुड़ पुराण से लेकर तमाम व्रत कथाओं तक में यही ढकोसला है. पति को स्वर्ग भेजने के लिए पत्नी भूखी रहे, प्यासी रहे, सती हो जाए. कभी किसी ग्रंथ में ये नहीं लिखा कि पत्नी के सुख के लिए पति व्रत रखे.
जब आज कोई कहता है कि पहले रिश्ते ज्यादा मजबूत थे तो उससे पूछिए कि किसके लिए मजबूत थे? उस औरत के लिए जो 13 से 16 साल की उम्र में ब्याह दी गई और 60 साल तक कभी अपनी पसंद का खाना भी नहीं मांग पाई? उस मजबूत रिश्ते की कीमत किसने चुकाई? तकनीक ने कोई आदर्श रिश्ता नहीं बनाया लेकिन उसने पहली बार रिश्ते की कीमत चुकाने वाले को बोलने का माइक थमा दिया और माइक हाथ में आते ही पता चला कि धर्म की कहानी में कैकेयी, मंथरा, द्रौपदी और शूर्पणखा जैसी जो विलेन औरतें थीं असल में वो विलेन नहीं थीं बल्कि वे पहली औरतें थीं जिन्होंने अपनी मर्जी से कुछ मांगने की हिम्मत की थी. धर्म ने उन्हें खलनायिका बना दिया क्योंकि अगर वे नायिका बन जातीं तो पितृसत्ता की पूरी कहानी ही पलट जाती. Women’s Freedom




