Internet and Poverty: 14 जून के आसपास स्टारलिंक और टेस्ला के मालिक दुनिया के पहले ट्रिलियनर बन गए थे. भारत के 145 करोड़ लोग दिनरात मेहनत कर के पूरे साल में जितना कमाते हैं उस का एकतिहाई एलन मस्क के पास अकेले कमाते है. यह अमीरी की जहालत की इंतहा है. बाद में टेस्ला और स्टारङ्क्षलक के शेयरों के दाम गिरने के बाद एलन मस्र्क की पूंजी एक चौथाई कम हो गई पर अभी भी वे बहुत अमीरों में से हैं जुलाई माह में उन्हें 750 अरब डौलर का नुकसान हुआ.
अमीर और गरीब के बीच की खाई तो हमेशा से थी. जब से इंसान के अंदर इकट्ठा करने की मानसिकता ने जन्म लिया तभी से संसाधनों को इकट्ठा करने की होड़ शुरू हुई और इस होड़ में सभी दौडऩे लगे. जो इस दौड़ में फिसड्डी रहा वह गरीब हुआ और जो इस रेस में आगे रहा वह अमीर कहलाया. आज भी यह दौड़ जारी है लेकिन हालात बदल गए हैं. आज अमीर जिस रफ्तार से अमीर होता जा रहा है, गरीब उसी रफ्तार से और गरीब होता जा रहा है. खाई लगातार बढ़ रही है.
आज स्थिति यह है कि दुनिया की एक प्रतिशत आबादी ने दुनियाभर की आमदनी का करीब 20 फीसदी हिस्सा हथिया रखा है. ऐसा क्यों हो रहा है? क्या अमीर और गरीब की इस खाई को बढ़ाने के पीछे गरीबों की कामचोरी है या अमीरों की साजिश? आइए जानते हैं. इसी खाई में एक और खाई हैं औरतों की. अमीरों की औरतें भी निचली खाई पर हैं जबकि बहुत नीचे की खाई में गरीबों की बस्ती की औरतें.
2024 में दुनियाभर के अरबपतियों की संपत्ति में 2 ट्रिलियन डालर की बढ़ोतरी हुई जो आम आबादी की तुलना में तीनगुना तेज है. औक्सफैम की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक डौलर बिलियनेयर्स (अरबपतियों) की संपत्ति 2023 की तुलना में तीनगुना तेजी से बढ़ी है क्योंकि इस बीच टैक कंपनियों के शेयरों में तेज उछाल आया है. टेक कंपनियां न खाना बनाती हैं, न दवाएं, न अस्पताल या स्कूल, न रेलें या हवाई जहाज. वे एयरक्राफ्ट नहीं बनातीं, वे सडक़ें नहीं बनातीं. वे, बस, एयरकंडीशनर कमरों में कंप्यूटर पर टकटक करती हैं. पर इन टैक कंपनियों ने आम जनता को बहका कर धर्म की तरह अपने कब्जे में ले लिया है और सरकारों को जन्म पर पैनी नजर रखने के टूल्स दे दिए हैं. ये कंपनियां गरीबों को और गरीब बना कर अमीर बनी हैं, नया निर्माण कर के नहीं.
क्या इंटरनैट की वजह से पैदा हुई गरीबी?
यह माना जा सकता है कि दुनियाभर में भयंकर गरीबी में भारी कमी आई है. ऐसा इंटरनैट के तेज प्रसार के दौर में हुआ है. लेकिन इसी बीच टैक सैक्टर के अमीर और अमीर हुए हैं. दुनिया की दौलत का बड़ा हिस्सा मुट्ठी टैक बिलियनेयर्स के पास इकट्ठा हुआ है. इंटरनैट गरीबी कम करने में मददगार साबित हुआ लेकिन इंटरनैट ने गरीब और अमीर के बीच की खाई को बढ़ाने में भी बड़ी भूमिका अदा की. इंटरनैट ने कटखने कुत्ते पाले हैं और साथ में गायबैल भी पैदा किए जो पहले से ज्यादा सेहतमंद हैं पर ज्यादा मोटी जंजीरों से बंधे हैं.
वल्र्ड बैंक के अनुसार, 1990 में दुनिया में अत्यंत गरीबी में जीने वाले करीब 2.31 अरब लोग थे यानी दुनिया की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत. 2025 तक यह घट कर 8 प्रतिशत रह गए यानी 1.5 अरब से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले. औसतन हर दिन 1 लाख से ज्यादा लोग. यह गिरावट 1990 के दशक से इंटरनैट के विस्तार के साथ शुरू हुई. 2011 से 2023 के बीच 17 करोड़ से ज्यादा लोग अत्यंत गरीबी से बाहर निकले. अत्यंत गरीबी से निकल कर ये लोग भरपेट खाना खा सकते हैं. 2-4 जोड़ी कपड़े हैं पर न रहने के ढंग के मकान हैं और न स्वास्थ्य सेवाएं. मोबाइल ब्रौडबैंड और इंटरनेट एक्सेस से नाइजीरिया, तेजानिया जैसे देशों में भी इंटरनैट की खपत 10′ प्रतिशत तक बढ़ी और गरीबी 8 प्रतिशत घटी.
गरीबीअमीरी आंकड़ों से यह आभास जरूर होता है कि दुनिया में गरीबी कम करने में इंटरनैट ने अहम भूमिका निभाई लेकिन इसी बीच अमीरी भी बेतहाशा रूप से बढ़ी है. निर्माण गरीबों ने किया पर उस का ज्यादा किसे हुआ? सारी संपदा ऊपर के लोगों के पास इकट्ठा हो गई, इंटरनैट की बड़ी भूमिका से इंटरनैट टैक्नोलौजी ने कुछ हद तक गरीबी कम तो की लेकिन अमीरों को मालामाल कर दिया. ग्लोबल स्तर पर देखें तो दुनियाभर में अमीरी और गरीबी की खाई 1990 के बाद से ही सब से तेजी से बढ़ी है और 1990 से ही टैक बिलियनेयर्स का दबदबा बढ़ा है. अमेजन, गूगल, मेटा, टेस्ला, एआई कंपनियां और ओपन एआई ने नए बिलियनेयर्स बनाए. 2025 में ही एआई की वजह से दर्जनों नए बिलियनेयर्स बने.
इंटरनैट को बेच कर कुछ कंपनियां और कुछ लोग दुनिया की सारी संपदा हड़प रहे हैं स्किल-बायस्ड टैक चेंज से हाईस्किल वाले अमीर होते हैं और लोस्किल वाले पीछे रह जाते हैं. इंटरनैट से गरीबों को फायदा जरूर हुआ लेकिन इस की वजह से असमानता भी तेजी से बढ़ी है क्योंकि इंटरनैट स्केलेबल टैक को बढ़ावा देता है. कुल मिला कर देखा जाए तो असमानता का मुख्य कारण इंटरनैट ही है. सरकारों ने डिफैंस और अपने लोगों पर सर्विलैंस के लिए इंटरनैट को खूब पैसा दिया. बैंकों ने कर्जदारों की गिरेबान पकड़े रहने के लिए इंटरनैट को पाला. पोर्न व धर्म की इंडस्ट्री ने भी इंटरनैट को खूब पैसा दिया है और इन के मालिकों को अमीर बनाया है. इंटरनैट गरीबों के गले में पड़ा नेकलेस की तरह जंजीर है जिस की डोर इंटरनैट मालिकों के हाथ में है.
इंटरनैट का मालिक कौन है
इंटरनैट का कोई एक मालिक नहीं है. यह दुनियाभर के हजारोंलाखों स्वतंत्र नैटवक्र्स से चलता है. इंटरनैट को कोई सिंगल एंटिटी कंट्रोल नहीं करती. इंटरनैट असल में जियो, एयरटेल, बीएसएनएल जैसे आईएसपी, यूनिवर्सिटी, कंपनियां और सरकारों के महागठबंधन से चलता है. कोई कंपनी या व्यक्ति पूरे इंटरनैट को बंद नहीं कर सकता लेकिन कुछ मुट्ठीभर कंपनियां और इन कंपनियों के संस्थापक ही आज इंटरनैट के बड़े हिस्से को कंट्रोल करते हैं.
पूरी दुनिया में इंटरनैट का जाल समुद्र के नीचे बिछी केबल्स के कारण है. इसे बिछाने में पहले अलगअलग टैलीकाम कंपनियां जिम्मेदार थीं लेकिन अब यह गूगल, मेटा, अमेजन और माइक्रोसाफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों के हाथों में हैं.
इंटरनैट के जरिए जिस कंटैंट को दुनिया के 18 अरब लोग रोज इस्तेमाल करते हैं उस का पूरा कंट्रोल मुट्ठीभर कंपनियों के हाथ में है. गूगल, यूट्यूब, मेटा, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, अमेजन, ईकौमर्स, क्लाउड, माइक्रोसौफ्ट, अजूरे, एप्पल, ऐप स्टोर. ये पांचसात कंपनियां इंटरनैट का ज्यादातर यूजर एक्सपीरियंस, एडवरटाइजिंग, क्लाउड और ऐप डिस्ट्रीब्यूशन को कंट्रोल करती हैं. इन कंपनियों के मालिक इंटरनैट की वजह से दुनिया की सारी दौलत जमा किए बैठे हैं. जब आम आदमी इंटरनैट का इस्तेमाल कर के खुश होता है तो असल में वह अपने को बांधी जंजीर में एक और कड़ी को खुद जोड़ता है. यह धर्म के बाद खुद की गुलामी का नमूना है.
दुनिया के तमाम बड़े सैल्फमेड टैक बिजनैसमेन ज्यादातर मिडिलक्लास से आए और उन्होंने स्केलेबिलिटी और नैटवर्क इफैक्ट पैदा किए. एक बार प्लेटफौर्म बना तो करोड़ों यूजर्स जोडऩा मुश्किल नहीं था. शुरुआती यूजर्स लगभग मुफ्त मिले, इसलिए मार्जिनल कास्ट जीरो रही. फिर जितने ज्यादा यूजर्स बढ़ते गए उतनी ज्यादा वैल्यू क्रिएट होती गई. फेसबुक और गूगल सर्च का नैटवर्क फैला तो नैटवर्थ भी बढ़ती चली गई. यूजर्स को लगता है कि वे फ्री सर्विस यूज करते हैं लेकिन असल में उन्हें समय, इंट्रेस्ट और डेटा बेचा जाता है. टारगेटेड ऐड्स से बहुत हाई प्रौफिट बनाया जाता है.
अमेजन का बिजनैस किताबों से शुरू हुआ और आज यह किताबों को ही निगल गया. आज मार्केटप्लेस और क्लाउड अमेजन के प्रौफिट का मुख्य स्रोत है. आईपीओ के बाद शेयर की वैल्यू आसमान छू गई. जेफ बेजास, मार्क जुकरबर्ग, लारी पेज और सर्जी ब्रिन जैसे लोग अरबों डौलर के मालिक बन गए. इन तमाम अमीरों ने डिजिटल प्लेटफौर्म बनाए जिन का फायदा उन शेयरधारकों को गया जो खुद कंपनियों के मालिक थे. जब आप इन प्लेटफौर्मों को इस्तेमाल करते हैं तो एकएक कर के स्वतंत्र विचारों और पुस्तकों को मारते हैं, यह न सोचें कि आप वैचारिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं.
एआई से किस का फायदा?
कोई हर इनोवेशन अमीरों के हित के लिए ही होता हैं. कंप्यूटर, इंटरनैट, बिजली, ट्रेन और हवाइजहाज के आविष्कार ने दुनिया को बदला लेकिन इस का फायदा सब से पहले अमीरों को मिला. आज एआई का जमाना है लेकिन यह भी गरीबों के किसी काम का नहीं. ओपन एआई, गूगल, माइक्रोसौफ्ट, एन विडिया जैसी एआई टूल्स बनाने वाली कंपनियां अमेरिका और चीन में हैं और एआई से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा इन कंपनियों के मालिकों के पास जाता है. आईएमआर 2025 रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई से दौलत की असमानता काफी बढ़ेगी. अमीर लोग एआई में निवेश कर के कैपिटल रिटर्न से फायदा उठा रहे हैं जबकि इस का मजदूर वर्ग पर नकारात्मक असर पड़ रहा है. एआई कैपिटल स्टौक जितना ज्यादा होगा उतनी ज्यादा असमानता बढ़ेगी.
यूएनडीपी की 2025 रिपोर्ट कहती है कि एआई से देशों के बीच असमानता बढ़ रही है. इस से अमीर देश ज्यादा तेजी से आगे बढ़ेंगे और गरीब देश पीछे छूट जाएंगे. वैश्विक स्तर पर देखें तो 2030 तक एआई से 16 ट्रिलियन तक जीडीपी बढ़ सकती है लेकिन इस का 80 प्रतिशत फायदा सिर्फ 10 देश मिल कर उठाएंगे, बाकी 150 से ज्यादा देश इन 10 देशों पर आश्रित रहेंगे. अमेरिका में टौप 1 प्रतिशत लोगों की दौलत पहले से ही बहुत ज्यादा है और एआई के आने के बाद से टैक अरबपतियों की संपत्ति और बढ़ रही है. कुल मिला कर बात यह है कि आज एआई पूरी तरह अमीरों का खिलौना बन गया है.
इंटरनैट के कारण गैरजरूरी आदतों का शिकार बनती दुनिया
इस में दो राय नहीं की इंटरनेट ने पूरी दुनिया को जोड़ दिया है लेकिन साथ ही यह लाखों लोगों को गैरजरूरी आदतों का शिकार भी बना रहा है. आज की दुनिया में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, रील्स, गेमिंग और ओटीटी प्लेटफौम्र्स ने ऐसी आदतें पैदा कर दी हैं जो पहले नहीं थीं. ये आदतें धीरेधीरे जीवन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य और रिश्तों को खोखला कर रही हैं.
स्क्रौलिंग की लत ने इंसान को किसी लायक नहीं छोड़ा. समय की ऐसी बरबादी इंटरनैट से पहले की पीढ़ी के बस की बात नहीं थी. बस यों ही फीड में नीचेनीचे सरकते रहने की आदत ने आम आदमी को बरबाद कर दिया है. लोग बिना किसी उद्देश्य के स्क्रीन पर घंटों बिताने लगे हैं. हर 2 से 5 मिनट में नोटिफिकेशन चैक करने की कंपल्सन हो गई है, हर 2 से 5 मिनट में फोन उठा कर देखना कि कोई लाइक, मैसेज या अपडेट तो नहीं आया.
15-30 सैकंड की शौट्र्स, रील्स या वीडियो देखतेदेखते 1-2 घंटे निकल जाना कोई बड़ी बात नहीं है, जैसे रात में देर तक जागना. दिनभर व्यस्त रहने के बाद रात को फुरसत में स्क्रीन पर लगे रहना. फोन देखते हुए बिना भूख के खाना. औनलाइन शौपिंग और गेमिंग की लत. छोटीछोटी खरीदारी या गेम में पैसा लगाना. इंटरनैट की वजह से पैदा हुई इन गंदी आदतों के नतीजे बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं. नींद की कमी आम बात हो गई है. आंखों में तनाव, सिरदर्द, गरदन व कमर दर्द यह नई पीढ़ी का हिस्सा हो गया है. इस से एकाग्रता और प्रोडक्टिविटी में भारी गिरावट हुई है.
रियल लाइफ रिश्तों में दूरी हो गई है. परिवार और दोस्तों से बातचीत कम हो गई है. इस से डिप्रैशन, एंग्जायटी और आत्मसम्मान की कमी जैसी समस्याएं पैदा होने लगी हैं. 2026 के इकोनौमिक सर्वे में भी डिजिटल एडिक्शन को युवाओं की प्रोडक्टिविटी और मैंटल हैल्थ के लिए बड़ा खतरा बताया गया है. आम भारतीय औसतन रोज 3-5 घंटे सिर्फ सोशल मीडिया पर बिताते हैं और बच्चे 2 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम ले रहे हैं.
इंटरनैट और ईश्वर दोनों गरीबों के किसी काम के नहीं
न तो इंटरनैट की तकनीक और न ही धर्म पर आस्था ने दुनिया से भूख, बेरोजगारी और शोषण जैसी समस्यायों को हल किया, इसलिए यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इंटरनैट तकनीक और ईश्वर दोनों ही अमीरों के लिए ज्यादा फायदेमंद हैं. डिजिटल तकनीक और धर्म के बिजनैस से जुड़े लोग दुनिया में टौप पर हैं. लेकिन इन से गरीबों को कुछ हासिल नहीं होता. गरीबों की पीढिय़ां एआई से नौकरी खोने में और मंदिर का घंटा बजाने, मसजिदों के चक्कर लगाने व चर्चों में दुआ करने में रह जाती हैं.
जिस तरह आज इंटरनैट और एआई ्रढ्ढ के मालिक दुनिया की सारी संपत्ति पर कुंडली मारे बैठे हैं वैसे ही धर्म के ठेकेदारों के पास भी दुनिया की अकूत दौलत इकट्ठा है. ईश्वर के नाम पर मंदिर, मसजिद, मजार, त्योहार, धार्मिक आयोजन और कांवड़ यात्रा में गरीब सब से ज्यादा दिखते हैं. इस भीड़ में अमीर नजर नहीं आते. असल में अमीरों ने गरीबों के लिए भगवान के सिवा कुछ नहीं छोड़ा.
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने कुछ मुट्ठीभर यूट्यूबर्स या इन्फल़एंसर्स की जिंदगी बदली लेकिन करोड़ों गरीबों के पास आज भी स्मार्टफोन, डेटा, स्किल्स या मौका ही नहीं है. गरीबों के लिए ईश्वर और इंटरनैट दोनों ही किसी काम के नहीं. ईश्वर, अल्लाह, गौड या भगवानों की दिनरात चापलूसी करने से गरीबी नहीं मिटती. इंटरनैट भी सिर्फ टाइमपास है, इस का भी कोई फायदा नहीं.
लूट का जरिया बन गया है इंटरनैट
भारत में इंटरनैट कभी दुनिया में सब से सस्ता था लेकिन हाल के सालों में टैरिफ बढऩे से ये गरीब के लिए बोझ बनता जा रहा है. 2016 में जियो के आने के बाद डाटा की कीमतें बहुत गिर गईं. 2025 तक पीएम मोदी ने खुद कहा था कि भारत में 1 जीबी डाटा की कीमत एक कप चाय से भी कम है. यह सस्ता डाटा डिजिटल इंडिया, यूपीआई औनलाइन पढ़ाई, जौब सर्च आदि के लिए बहुत फायदेमंद रहा लेकिन 2025-2026 में जियो, एयरटेल और बीआई ने कई बार टैरिफ बढ़ाए हैं.
कंपनियां कहती हैं कि 5जी नैटवर्क, स्पैक्ट्रम की ऊंची कीमत, इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और एआरपीयू यानी प्रति यूजर औसत दर की वजह से कीमतें बढ़ानी पड़ रही हैं. गरीब परिवारों के लिए मोबाइल अब सिर्फ कालिंग नहीं, बल्कि जरूरी चीज बन गया है. बच्चों की पढ़ाई, सरकारी योजनाओं की जानकारी, बैंकिंग, काम की तलाश यह सब इंटरनैट डाटा पर निर्भर हो गया है. लेकिन सस्ते प्लान बंद हो रहे हैं जबकि बेसिक प्लान महंगे हो गए हैं. लोग मजबूरन महंगे प्लान ले रहे हैं. यह एक तरह से लूट की चेन जैसा ही है क्योंकि जरूरत बन जाने के बाद कंपनियां कीमत बढ़ा रही हैं.
आम आदमी को डाटा महंगा कर कंपनिया तो लूट ही रही हैं, इंटरनैट पर साइबर फ्रौड के जरिए भी आम आदमी को जम कर लूटा जा रहा है. पिछले 6 सालों में भारत में साइबर फ्रौड से 52,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की ठगी हुई है. सिर्फ 2025 में ही लगभग 20,000 करोड़ रुपए की लूट हुई. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में डिजिटल फ्रौड से 54,000 करोड़ की लूट को सीधी डकैती और लूट बताया है. यह रकम कई छोटे राज्यों के बजट से ज्यादा है. डिजिटल फ्रौड करने वाले एयरटेल और जियो से डेटा की चोरी करवाते हैं और सब की मिलीभगत होती है.
ग्रामीण और छोटे शहरों में ठगी 400 प्रतिशत तक बढ़ी है. ठग पुलिस/सीबीआई, ईडी बन कर फोन करते हैं, डराते हैं, और पैसे ट्रांसफर करवाते हैं. फेक कौल मर्ज कर के ओटीपी चुराते हैं, पीआई से पैसे उड़ा लेते हैं. फर्जी जौैब या लोन के नाम पर केवाईसी के नाम पर ठगी होती है. एआई से वौयस और वीडियो क्लोन कर के ठगते हैं. मैसेज या ईमेल में लिंक भेज कर बैंक डिटेल्स चुराते हैं.
अखबार, किताबें और विचारों को खत्म करने की साजिश
इंटरनैट के जरिए अखबार, किताबें और विचारों को खत्म करने की साजिश चल रही है, जैसी सभी धर्मों की रही है. इंटरनैट ने मीडिया और पढऩे की आदतों को बदल दिया है. इंटरनैट ने लोगों की एकाग्रता भंग की है जिस से किताबों और पत्रिकाओं का मार्केट खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. दरअसल यह विचारों को खत्म करने की साजिश है. इंटरनैट ने अखबारों की कमाई को बुरी तरह प्रभावित किया है. विज्ञापन से होने वाली आमदनी, जो अखबारों की मुख्य कमाई थी, अब गूगल, फेसबुक, मेटा के पास चली गई. नतीजतन, अखबार सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हो गए. यहीं से विचारों की गुलामी शुरू हुई. अखबार निष्पक्ष नहीं रह पाए और पत्रकारिता सत्ता की चापलूसी बन कर रह गई.
अमीरी और गरीबी के बीच इतना अंतर क्यों
1995 से 2025 तक का ट्रैंड दिखाता है कि संपत्ति बहुत कम हाथों में केंद्रित हो रही है. जब शेयर, रियल एस्टेट और दूसरे एसेट्स की कीमतें जीडीपी से तेज बढ़ती हैं तो एसेट्स रखने वाले अमीर और अमीर हो जाते हैं. द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की मात्र 0.001 प्रतिशत आबादी यानी महज 60,000 लोगों के पास दुनिया की आधी आबादी से तीनगुना संपत्ति है. 2026 की स्थिति यह है कि महज 10 प्रतिशत आबादी के पास दुनिया की कुल संपत्ति का 75 प्रतिशत हिस्सा इकट्ठा हो चुका है और 90 फीसदी आबादी 25 प्रतिशत संसाधनों में गुजारा कर रही है. ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडैक्स के अनुसार, दिसंबर 2025 तक दुनिया के शीर्ष 10 सब से अमीर लोगों की कुल संपत्ति 2 ट्रिलियन डौलर हो चुकी है.
अब यहां सवाल यह है कि इस में अमीरों का क्या दोश है? यह तो बिजनैस है. अगर इस से अमीरों को फायदा हो रहा है, तो इस में बुरा क्या है?
क्या अमीरों की वजह से बढ़ी गरीबी
बिजनैस करना, मुनाफा कमाना, अमीर बनना गलत नहीं है बल्कि यही चीजें अर्थव्यवस्था को चलाती हैं, नौकरियां पैदा करती हैं, नई चीजें बनाती हैं और कुल मिला कर गरीबी भी कम करती हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या अमीरों का दोष है कि गरीब और गरीब हो रहा है?
देखा जाए तो बहुत से अमीर इंटरप्रेन्योर्स ने लाखों नौकरियां पैदा की हैं जैसे इनफोसिस, रिलायंस, टाटा, फ्लिपकार्ट, जोमौटो. अगर ये बिजनैस होते तो लाखों लोग आज भी गरीब होते. कैपिटलिज्म का यही फायदा है जो वैल्यू क्रिएट करता है, उसे रिवार्ड मिलता है और सोसाइटी को भी फायदा पहुंचता है. लेकिन गरीबी बढ़ रही है, यह सच्चाई है.
भारत की बात करें तो वल्र्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2026 के अनुसार, ऊपर के 10 प्रतिशत लोग नैशनल इनकम का 58 प्रतिशत हड़प रहे हैं. इन में भी सब से ऊपर के 1 प्रतिशत लोग राष्ट्रीय इनकम के 22 प्रतिशत के मालिक बने बैठे हैं और नीचे के 50 प्रतिशत सिर्फ 15 प्रतिशत पर गुजारा कर रहे हैं. ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों के पास कुल संपत्ति का 65 प्रतिशत है और सब से ऊपर के मात्र एक प्रतिशत अमीरों के पास कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत इकट्ठा है. नीचे के 50 प्रतिशत लोगों के पास सिर्फ 6 प्रतिशत संसाधन हैं.
किसी भी देश की इकोनौमी का सब से बड़ा सच यह है कि ऊपर के 20 प्रतिशत आबादी का इनकम शेयर बढऩे से जीडीपी ग्रोथ घटती है और नीचे के 20 प्रतिशत आबादी का इनकम शेयर बढऩे से जीडीपी ग्रोथ बढ़ती है. अमीर कंपनियां या लोग मोनोपौली बनाते हैं जिस से काम्पिटिशन कम होता है और मजदूरी घटती जाती है. परिणाम यह होता है की छोटे बिजनैस दबते चले जाते हैं. इस से इकोनौमी में गरीब आदमी की भागीदारी घटती है. अमीर लोग लौबिंग करते हैं और टैक्स नियमों के लूपहोल का फायदा उठाते हैं. इस से जनता के टैक्स का रुपया अमीरों की जेबों में चला जाता है. सरकारों के पास पब्लिक इन्वैस्टमैंट, एजुकेशन और हैल्थ के लिए पैसा नहीं बचता. गरीब परिवार एजुकेशन और हेल्थ में पिछड़ जाते हैं जिस से अगली पीढ़ी भी गरीब बनी रहती है. अमीरगरीब का गैप बढऩे से समाज में तनाव बढ़ता है, स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं और क्राइम बढ़ते हैं. अमीरी खुद समस्या नहीं लेकिन जब वह कंसंट्रेटेड हो और सिस्टम को अपने फेवर में मोड़ ले, तब गरीबों का सत्यानाश तो होना ही है.
भारत में भी यही हो रहा है. जियो ने इंटरनैट सस्ता किया लेकिन इस से अमीर टैक बिजनैस घरानों का दबदबा बढ़ा चला गया और छोटे बिजनैस मरते चले गए. गरीब मजदूर जो इंटरनैट के आने से पहले गरीब थे, आज भी गरीब हैं और संघर्ष कर रहे हैं.
आम आदमी के बीच बेहतर शिक्षा और स्किल तभी पहुंच पाएगी जब पॉलिसी और टैक्स सिस्टम नीचे के लोगों के हित में हों, अमीरों से ज्यादा लें और इसे जनता के वैलफेयर में खर्च करें.
फ्रांस की इनफौर्मो कनैक्ट एकेडमी के एक रैंकिग रौयल्स के अनुमान के अनुसार दुनिया के जानेमाने उद्योगपति या बिजनैसमैन कब ट्रिलियनपति (डौलरों में) बनेंगे, यह नीचे देखें. ट्रिलियन का अर्थ 1000 अरब होता है.
2027 एलन मस्र्क : टेस्ला इलैक्ट्रिक कार, ट्विटर एक्स, स्टारङ्क्षलक
2028 : जेनसन हुआंग : कोफाउडर, एन विडिया एआई प्लेटफौर्म
2028 : गौतम अडानी : हर तरह का उद्योग – नरेंद्र मोदी के चहेते
2028 : प्रजागो पंगस्तु : इंडोनेशिया के उद्योगपति
2030 : बर्नार्ड एसनौल्ट : फ्रांस की एलवीएमएच सौफ्टवेयर
2030 : मार्क जुकरबर्ग : फेसबुक, इंस्टाग्राम के मालिक
2030 : फिल नाइट : जूते बनाने वाली कंपनी नाइक
2033 : मुकेश अंबानी : भारत के रिलायंस व जियो के मालिक
2033 : माईकल डेल : डेल टैक्नोलौजी के मालिक
2034 : स्टीव बाल्मर : सौफ्टवेयर से जुड़े
ये सब आंकड़े केवल शेयरों के आज के दामों पर बनाए गए हैं और इन में शेयर बाजार में उतारचढ़ाव, जियोपौलिटिकल बदलाव, सरकारों के बदलने, जनविद्रोह की आशंकाओं का खयाल नहीं रखा गया है. Internet and Poverty




