Democracy in India: लोकतंत्र में सत्ता की असली ताकत जनता का विश्वास होती है. सरकार की मजबूती का पैमाना यह नहीं होता कि वह कितने प्रदर्शनकारियों को राजधानी में घुसने से रोक सकती है, बल्कि यह होता है कि वह कितने लोगों को बिना डर के अपनी बात कहने का मौका देती है. लेकिन जब सत्ता जनता के सवालों से ही घबराने लगे, जब सरकार के लिए नागरिकों की आवाज से ज्यादा महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे किसी अधिकारी की सुरक्षा हो जाए और जब हक की आवाज उठाने के लिए दिल्ली आने वाले लोगों को रोकने में भारी भरकम पुलिस बल तैनात करना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र के भीतर कहीं न कहीं गंभीर बेचैनी जन्म ले चुकी है.
10 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों को रोकने की कार्रवाई ने यही सवाल खड़ा किया है. आखिर जनता के सवालों का सामना करने के बजाय सरकार को इतनी सख्ती लागू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? राजधानी की सड़कों पर सुरक्षा के इतने व्यापक इंतजाम किस खतरे से निपटने के लिए किए गए थे? क्या अपने मताधिकार, चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवाल उठाने वाले नागरिक देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं?
यह सवाल किसी एक अधिकारी को बचाने और उसे कुर्सी पर बिठाये रखने या न रखने का नहीं है. यह सवाल उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर है, जिसमें निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता कटघरे में है और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की कसम उठा कर सत्ता में आयी सरकार की नीति-नीयत पर प्रश्नचिन्ह लग गया है.
ज्ञानेश कुमार की सुरक्षा बनाम सत्ता बचाने की छटपटाहट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में खुद को देश का चौकीदार बताते रहे हैं. लेकिन चौकीदार का पहला कर्तव्य किसकी रखवाली करना है? किसी कुर्सी की, किसी राजनीतिक दल की, किसी सरकारी अधिकारी की या देश के नागरिकों के अधिकारों की?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में सरकारी पद पर बैठा हर व्यक्ति जनता के प्रति जवाबदेह होता है. प्रधानमंत्री हों, मुख्यमंत्री हों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त हों या कोई भी अन्य संवैधानिक पदाधिकारी, इनमें से कोई भी जनता से ऊपर नहीं है. पद की गरिमा का अर्थ सवालों से छूट नहीं, बल्कि सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी है.
यदि किसी संवैधानिक अधिकारी के खिलाफ सवाल उठ रहे हैं, प्रदर्शन हो रहा है, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है. अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है मगर सुरक्षा के नाम पर लोकतंत्र का दमन करते हुए जनता के शांतिपूर्ण विरोध की गुंजाइश पूरी तरह समाप्त कर देना, रास्ते बंद कर देना और देश के नागरिकों को अपने ही देश की राजधानी में पहुंचने से रोकना लोकतांत्रिक देश में स्वीकार्य नहीं है.
हिंसा रोकने के लिए पुलिस बल की जरूरत हो सकती है, लेकिन जनता की असहमति को संभावित हिंसा कहकर लोकतंत्र को संदेह की जेल में बंद कर देना तानाशाही है.
विडंबना देखिए कि जिस व्यवस्था में जनता के वोट से सरकार बनी, उसी व्यवस्था में जब जनता चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, तो जवाब देने के बजाय उसके सामने बैरिकेड खड़े किये जा रहे हैं, उसको आगे बढ़ने से रोकने के लिए सड़कों पर कीलें ठोंकी जा रही हैं, लाठियां मार मार कर पुलिस वैन में ठूंसा जा रहा है उन्हें डिटेन करके जानवरों की तरह बाड़ों में भरा जा रहा है और पुलिस
क्या अब लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी शिकायत दर्ज कराने से पहले यह प्रमाण देना होगा कि वे सत्ता को असहज नहीं करेंगे? Democracy in India




