Manipur Ethnic Violence: मणिपुर तीन साल से हिंसा की आग में झुलस रहा है, बेटियां असुरक्षित हैं और हजारों परिवार बेघर होकर राहत शिविरों में जिंदगी काटने को मजबूर हैं. पहलगाम में आतंकवादी हमले में 26 लोगों की जान चली गई, लेकिन इन त्रासदियों के बीच सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल आज भी कायम हैं. 10 अक्टूबर को दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन रोकने के लिए हजारों केंद्रीय बलों की तैनाती ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. जनता के वोट और सवालों से निपटने के लिए इतनी मुस्तैदी, तो मणिपुर की बेटियों के सम्मान और देशवासियों की जान बचाने के लिए ऐसी तत्परता क्यों नहीं?
जनता 10 अक्टूबर को अपने वोटों का हिसाब मांगने दिल्ली के जंतर मंतर पर न आ सके तो मोदी सरकार ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 85 कम्पनियाँ, सशस्त्र सीमा बल की 10 कम्पनियाँ, रैपिड एक्शन फ़ोर्स की 7 कम्पनियाँ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की 7 कम्पनियाँ, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों समेत लगभग 23,000 केंद्रीय बल कर्मियों को पलक झपकते दिल्ली बुला लिया. लगभग 450-500 अतिरिक्त महिला सैन्य कर्मियों की तैनाती की गई. बैरिकेडिंग, सीसीटीवी, बॉडी कैमरे और ड्रोन जैसी व्यवस्थाएं भी कर लीं. मगर न तो मणिपुर, न अरुणाचल प्रदेश जहाँ चीन घुसा चला आ रहा है और न पहलगाम जैसे संवेदनशील इलाकों में इस तरह की कोई सुरक्षा व्यवस्था नजर आती है. मोदी-शाह के लिए उनकी कुर्सियों की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है, देश की जमीन चली जाए, या नागरिकों की जानें जाएं, उन्हें कोई मतलब नहीं है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए 10 अक्टूबर को मोदी सरकार ने जितनी फोर्स दिल्ली में लगाई वह मणिपुर या पहलगाम में क्यों नहीं लगाई गई थी? क्या बेटियों का सम्मान और देशवासियों की जान की कोई कीमत नहीं है? देश के एक नौकर ज्ञानेश कुमार को बचने के लिए देश तथाकथित चौकीदार ने जनता के खिलाफ इतनी बड़ी फ़ोर्स तैनात कर दी. पहले इन दोनों नौकरों ने मिल कर जनता का वोट चुराया और अब गुंडागर्दी पर आमादा हैं.
मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया. लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, बड़ी संख्या में लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए और महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उनकी नंगी परेड कराये जाने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया.
मणिपुर की महिलाओं के साथ हुई भयावह घटनाओं के वीडियो सामने आने के बाद देश ने शर्म, आक्रोश और न्याय की मांग की. सवाल उठे कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने में व्यवस्था कहां विफल हुई? हिंसा से प्रभावित लोगों को सामान्य जीवन लौटाने में इतनी कठिनाइयां क्यों झेलनी पड़ीं? राज्य में शांति बहाल करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई दे रही है? देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री मणिपुर जाकर वहां की स्थिति का जायजा क्यों नहीं ले रहे और वहां की जनता को यह आश्वासन क्यों नहीं दे रहे हैं कि दोबारा मणिपुर की बेटियों के साथ ऐसा घृणित कृत्य नहीं होगा?
यहां सवाल किसी एक घटना की तुलना दूसरी घटना से करने का नहीं, बल्कि सवाल प्राथमिकताओं का है. अगर राजधानी में किसी संवैधानिक अधिकारी के खिलाफ विरोध को नियंत्रित करने के लिए सरकार इतनी बड़ी फ़ोर्स का इंतजाम आननफानन में कर सकती है, तो हिंसा से जूझ रहे मणिपुर में नागरिकों की सुरक्षा, महिलाओं के सम्मान, राहत शिविरों में रह रहे परिवारों की मदद और स्थायी शांति के लिए उसी स्तर की गंभीरता क्यों नहीं दिखाई दी. आज तीन साल हो गए, मणिपुर आज भी उसी तरह जल रहा है, नागरिक असुरक्षित हैं, बेटियों की इज्जत दांव पर है मगर मोदी सरकार एक चुनाव आयुक्त को उसकी कुर्सी पर बनाये रखने के लिए पूरा दम लगाए हुए है.
यह घटना इस बात को स्थापित करती है कि ज्ञानेश कुमार वह तोता है, जिसमें मोदी सरकार की जान कैद है. तोता बोल पड़ा या तोते को कुर्सी से हटाया गया तो पूरी की पूरी सरकार ढह जाएगी.
पहलगाम की त्रासदी और सुरक्षा पर सवाल
पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकवादी हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी. इस हमले ने देश को गहरे सदमे में डाल दिया था. पर्यटकों की हत्या ने राष्ट्रीय सुरक्षा, खुफिया तंत्र, आतंकवाद से मुकाबले और संवेदनशील पर्यटन क्षेत्रों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए थे.
आतंकवादी हमला और किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने की परिस्थिति एक जैसी नहीं होती. दोनों के लिए सुरक्षा व्यवस्था की प्रकृति, उद्देश्य और तैनाती की जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं. लेकिन इससे सरकार की जवाबदेही का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता है.
जब देश के नागरिक आतंकवादी हमले में मारे जाते हैं, तब सरकार का पहला दायित्व उनकी सुरक्षा व्यवस्था की कमियों की समीक्षा करना, पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाना और भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना होता है. देश जानना चाहता है कि सुरक्षा में कहां चूक हुई, खतरे का आकलन कैसे किया गया और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या बदलाव किए गए?
देश की जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि सुरक्षा के मामले में हुई गलतियों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
यदि सरकार राजधानी में किसी विरोध-प्रदर्शन के लिए की गई सुरक्षा व्यवस्था का औचित्य बता सकती है, तो उसे पहलगाम जैसे हमलों के बाद सुरक्षा संबंधी सवालों का भी उतनी ही स्पष्टता से जवाब देना चाहिए.
राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल राजधानी में रास्ते बंद कर देना नहीं है. राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ देश के नागरिकों को आतंकवाद, हिंसा और असुरक्षा से बचाना भी है. जो लम्बी चौड़ी फ़ोर्स मोदी-शाह ने हवाई जहाज़ों से दिल्ली बुला ली, आखिर ये फोर्सेस संवेदनशील जगहों पर, सीमा क्षेत्रों में उसी मुस्तैदी से क्यों नहीं तैनात की जाती है?
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