Air Hostess SC: एयर होस्टेस शब्द एक चलन भर की देन है नहीं तो इसकी जगह अब फ्लाइट अटेंडेंट या केबिन क्रू शब्द ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. जिससे लैंगिक भेदभाव की बू नहीं आती. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने कैसे एयर होस्टेस को पुरुषों के बराबर ला खड़ा किया यह जानना कम दिलचस्प नहीं है. लेकिन इसके पहले इस नौकरी से ताल्लुक रखती कुछ बातें समझ लेना ज्यादा जरुरी है. जिनमे से पहली यह है कि 80 के दशक तक एक एयर होस्टेस की जो इमेज दिमाग में रहती थी वह एक फिट, स्लिम और आकर्षक युवती की होती थी. जिसका सेक्सी दिखना अघोषित अनिवार्यता या अहर्ता हुआ करती थी. लड़कियों में तब आज से ज्यादा क्रेज इस रोमांचक नौकरी को हासिल कर लेने का होता था.
यह आकर्षण बेवजह भी नहीं था वजह लड़कियां उड़ना चाहती थीं, देश विदेश घूमना चाहती थीं और अच्छी सेलरी भी चाहती थीं. यह सब उन्हें इस नौकरी से मिलता था. लेकिन 80 के दशक तक उन्हें पुरुषों जिन्हें फ्लाइट अटेंडेंट या केबिन क्रू कहा जाता है के मुकाबले न के बराबर सहूलियतें और अधिकार मिले हुए थे. मसलन उन्हें 35 की उम्र में ही रिटायर कर दिया जाता था और नौकरी के लिए ये कड़ी शर्तें थोपी जाती थीं. 1 – अगर वे नौकरी के शुरूआती चार साल में शादी कर लें 2 – पहली बार प्रिगनेंट हों और 3 – 35 साल की उम्र पूरी कर लें तो उनकी नौकरी चली जाएगी
लेकिन अब इनमे से एक शर्त भी लागू नहीं है तो इसकी वजह एक एतिहासिक मुकदमा एयर इंडिया बनाम नरगेश मिर्जा 1981 है. 80 के दशक तक लड़कियों को मन मारकर ये थोपी गई शर्तें मानना पडती थीं. जो एक एयर होस्टेस नरगेश मिर्जा को गैरबराबरी की लगीं तो उन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया.
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए न्याय की मांग की थी कि लिंग यानी सेक्स और उम्र की बिना पर पर पुरुषों यानी केबिन क्रू के मुकाबले भेदभाव किया जाना एक तरह की मनमानी है. नरगेश की तरफ से मुख्य दलीले तब के चर्चित वकील निरंजन अल्वा व नारायण नेट्टर ने रखीं थीं कि उक्त शर्तें प्राकृतिक न्याय और मानाधिकारों के खिलाफ हैं और आकर्षण व युवावस्था सर्विस के पैमाने नहीं हो सकते.
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच का फैसला जस्टिस सैय्यद मुर्तजा फजल अली ने सुनाया था. उन्होंने इन दलीलों से इत्तफाक रखते हुए एयर होस्टेस की रिटायर्मेंट की उम्र 45 साल कर दी थी जो बाद में किश्तों में बढ़ते बढ़ते पुरुषों के बराबर 58 हो गई. शादी और प्रिगनेंसी की शर्तें भी फैसले से हटा ली गईं थी. यह सब आर्टिकल 14 के चलते मुमकिन हुआ जिसे एक लाइन में कहें तो वह लाइन है, कानून की नजर में सब समान या बराबर हैं.
यह बड़ा सुरक्षा कवच इस लिहाज से है कि यह 1 – सरकार और उसकी पुलिस जैसी एजेंसियों की मर्जी या मनमानी पर अंकुश लगाता है 2 – धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ अन्याय करने से रोकता है 3 – अगर किसी नागरिक को लगता है कि उसके साथ असमान व्यवहार हुआ है तो वह आर्टिकल 14 का हवाला देते सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है. महिलाओं ने इस फैसले का हवाला देते हुए बेंकिंग, मिलिट्री, पुलिस और कार्पोरेट कम्पनियों में पुरुषों के बराबर दर्जा और सहूलियतें हासिल कीं.




