CJP Protest: जब भी भारत में कोई बड़ा आंदोलन हुआ है, सत्ता ने पहले उस आंदोलन को बदनाम किया, फिर आंदोलन को लाठी डंडो से कुचलने की कोशिश की लेकिन जब दमन, बर्बरता और हिंसा से भी जनता डरी नहीं तो सत्ता को झुकना पड़ा और समझौते करने पड़े. जून-जुलाई 2026 का आंदोलन भी वैसा ही था. पहले आंदोलन को टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा गया, फिर इंटरनेट बंद किया गया, फिर लाठी डंडे चलाये गये. जब पूरे देश के विश्वविद्यालय सड़क पर आ गए तो धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा और असली कहानी तो इस्तीफे के बाद शुरू हुई.
जून-जुलाई के प्रोटेस्ट का नतीजा सिर्फ एक मंत्री का इस्तीफा नहीं था बल्कि इस आंदोलन ने बीजेपी को मजबूर कर दिया कि वह मंदिर-मस्जिद छोड़ कर सिलेंडर, शिक्षा और रोजगार पर बात करे. सबसे बड़ा उदाहरण 9 अक्टूबर 2026 की यूपी कैबिनेट का है. योगी सरकार को एक ही दिन में 39 बड़े फैसले लेने पड़े, ऐसा पिछले 10 साल में कभी नहीं हुआ और ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि इस आंदोलन में जनता ने हिन्दू मुसलमान के नेरेटिव को तोड़ कर जरुरी मुद्दों पर सरकार को आईना दिखा दिया है.
9 अक्टूबर 2026 को यूपी सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 2 मुफ्त सिलेंडर देने का फैसला किया. इस पर 2,142.78 करोड़ रुपये खर्च होंगे. वही सरकार जो 1,200 रुपये सिलेंडर बेच रही थी, आज 2 सिलेंडर मुफ्त देने पर मजबूर हो रही है. इसके अलावा राज्य के 18 शहरों में 1,725 AC इलेक्ट्रिक बसें शुरू करने का फैसला लिया गया है. 3 नए विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं. महर्षि योगी कृषि विश्वविद्यालय कानपुर, ठाकुर युगराज सिंह फतेहपुर और अजय कुमार गर्ग गाजियाबाद. 75 जिलों में सरदार पटेल स्किल जोन बनाने की घोषणा हुई है. धान खरीद लक्ष्य 62 लाख से बढ़ा कर 65 लाख टन किया गया है. मक्का पर MSP 2,410 रुपये, बाजरा पर 2,900 और ज्वार पर 4,073 रुपये करने का निर्णय किया गया है. ये सब आंदोलन के डर से लिए गए फैसले हैं. यहां तक कि अग्निवीरों को पुलिस, वन, कारागार और परिवहन में 20 प्रतिशत आरक्षण और 3 साल उम्र में छूट भी इसी दबाव में दी गई है.
यह ऐतिहासिक फैसले सिर्फ यूपी की डबल इंजन वाली सरकार के नहीं हैं बल्कि ज्यादातर बीजेपी की राज्य सरकारों ने ऐसे ही फैसले लिए हैं. बिहार की डबल इंजन सरकार ने पेपर लीक पर नया और सख्त कानून बनाया है, बंगाल में छात्रवृत्ति 30 प्रतिशत तक बढ़ाई गई, असम में सरकारी नौकरियों में लोकल युवाओं के लिए 75 फीसदी कोटा का फैसला लिया गया. ये वही राज्य हैं जहां बीजेपी पिछले साल तक सिर्फ हिंदू-मुसलमान और घुसपैठिया की राजनीति कर रही थी. आज शिक्षा और रोजगार पर फैसले लेने पड़ रहे हैं और यह सब जनता के सड़कों पर आने के कारण हुआ है.
बदलाव के इस तूफान में केंद्र सरकार भी बची नहीं है. जून-जुलाई के बाद केंद्र को NEET में सुधार का वादा करना पड़ा, आयुष इंटर्न का स्टाइपेंड 12,000 से 15,000 करना पड़ा, आंगनवाड़ी वर्कर्स को अतिरिक्त साड़ी और भत्ते देने पड़े. ये छोटे फैसले लगते हैं लेकिन यह छोटे फैसले ही साबित करते हैं कि जब जनता जागती है तब सत्ता को धर्म की राजनीति छोड़ कर काम की राजनीति पर आना पड़ता है.
पिछले 12 साल से बीजेपी का एक ही फॉर्मूला था, हिंदू-मुसलमान लेकिन इस आंदोलन ने उस फॉर्मूले को फेल कर दिया. आज बीजेपी को मजबूर होकर सिलेंडर, बस, विश्वविद्यालय और MSP पर बात करनी पड़ रही है क्योंकि जनता ने जंतर-मंतर पर आकर बता दिया है कि उसे चढ़ावे और दक्षिणा की राजनीति नहीं, काम की राजनीति चाहिए.
कुल मिलाकर यह आंदोलन इस बात का सबूत है कि लोकतंत्र में सड़क अभी भी जिंदा है. क्रांति एक दिन में नहीं आती लेकिन हर आंदोलन सत्ता को 10 कदम पीछे धकेलता है और जनता को 10 कदम आगे लाता है. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ शुरुआत थी, असली जीत यह है कि आज डबल इंजन की सरकारों को धर्म छोड़ कर सिलेंडर और शिक्षा पर फैसले लेने पड़ रहे हैं. यही मैग्नाकार्टा है, यही जनता का नया अधिकार पत्र है जो जंतर-मंतर की सड़क पर लिखा जा रहा है.
जब धर्म की दुकान बंद हुई तो असली बदलाव शुरू हुआ
बीजेपी की राजनीति पिछले 12 साल से सिर्फ दो पिलर पर ही टिकी थी, एक धर्म का धंधा और दूसरा अपर कास्ट का हित. जून-जुलाई के आंदोलन ने इन दोनों पिलर को हिला दिया है. धर्म की राजनीति का सच यह है कि बीजेपी ने राम को वोट का प्रोडक्ट बनाया. मंदिर के नाम पर चंदा लिया, ईडी, सीबीआई का डर दिखा कर इलेक्टोरल बॉन्ड लिया और फिर उसी पैसे से मीडिया खरीदा, विधायक और सांसद खरीदे और चुनाव में धांधली करवा कर अपनी सरकारें बनवाई लेकिन जब स्टूडेंट्स सड़कों पर उतरे और उन्होंने सरकार से सवाल किया कि मंदिर से नौकरी मिलेगी क्या? जब किसान सड़कों पर आये और पूछा कि मस्जिद तोड़ने से MSP मिलेगी क्या? तो बीजेपी के पास कोई जवाब नहीं था. जून से अक्टूबर तक जंतर-मंतर पर खड़ी भीड़ में दलित भी है, मुसलमान भी है, जाट भी है, यादव भी है और ब्राह्मण भी है. सब एक ही नारा लगा रहे हैं. हम भारत के लोग हैं हमें नफ़रत नहीं, शिक्षा और रोजगार चाहिए.
यहीं बीजेपी की अपर कास्ट वाली राजनीति भी फेल हो गई. बीजेपी ने हमेशा से 10 फीसदी द्विजों को 90 फीसदी देश का मालिक बना कर रखा. पेपर लीक में कोचिंग माफिया को फायदा पहुँचाया जो अपर कास्ट का है. यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर वही 10 फीसदी वाले लोग हैं. प्राइवेट नौकरी में HR भी वही 10 फीसदी. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जब शिक्षा मंत्रालय की फाइलें खुलीं तो पता चला कि कैसे NEET और NET में अपर कास्ट लॉबी ने पूरा सिस्टम कैप्चर कर रखा था.
आंदोलन ने इसी लॉबी को तोड़ा. आज जब यूपी सरकार को 3 नए विश्वविद्यालय खोलने पड़ रहे हैं, जब 20 फीसदी आरक्षण अग्निवीरों को देना पड़ रहा है, जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जो ज्यादातर OBC, SC समाज से आती हैं, उन्हें साड़ी और भत्ता देना पड़ रहा है तो यह अपर कास्ट की राजनीति की हार ही है.
बीजेपी को अब समझ आ रहा है कि सिर्फ “हिंदू खतरे में है” कह कर OBC, SC, ST का वोट नहीं लिया जा सकता क्योंकि वही OBC, SC, ST आज पूछ रहा है कि हिंदू तो हम भी हैं फिर नौकरी सिर्फ तुम्हारे बेटे को क्यों मिल रही है? सिलेंडर के दाम हमारे लिए क्यों बढ़ रहे हैं? धान की MSP तुम्हारे व्यापारी दोस्त क्यों तय करेंगे? इसलिए आज बीजेपी धर्म की राजनीति से हट कर सिलेंडर और बस पर आई है लेकिन यह मजबूरी में आई है, मन से नहीं और जनता बीजेपी की यह मजबूरी भी पहचान चुकी है.
चढ़ावे की राजनीति और कुर्सी बचाने का मॉडल
बीजेपी की धर्म की राजनीति असल में चढ़ावे का बिजनेस मॉडल है. पिछले 10 साल में हर चुनाव से पहले एक नया मंदिर, एक नई मूर्ति, एक नया कॉरिडोर लॉन्च होता है क्योंकि जब बीजेपी के पास विकास का कोई मॉडल नहीं है तो उसे यही चढ़ावे का मॉडल ही चलाना पड़ता है. 2024 में इलेक्टोरल बॉन्ड की लिस्ट खुली तो पता चला कि मंदिर बनाने वाली कंपनियों ने ही बीजेपी को 385 करोड़ का चंदा दिया था. यानी भगवान के नाम पर जनता से चढ़ावा और उसी चढ़ावे से पार्टी को चंदा. यह धर्म नहीं, यह मनी लॉन्ड्रिंग का नया तरीका है और इस मनी लॉन्डरिंग की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार है अपर कास्ट को हमेशा के लिए मैनेजर बना कर रखना. बीजेपी ने कभी भी OBC, SC, ST को मालिक नहीं बनने दिया. मालिक हमेशा 10 फीसदी वाला ही रहा, बाकी 90 फीसदी को सिर्फ वोटर और लेबर बना कर रखा.
बीजेपी के कोर वोटर में अपर कास्ट को लगता है कि बीजेपी उसकी जाति की श्रेष्टता बचा रही है इसलिए वह महंगाई भूल जाता है. OBC को लगता है कि मुसलमान से खतरा है इसलिए वह नौकरी भूल जाता है. SC-ST को लगता है कि हिंदू धर्म खतरे में है इसलिए वह संविधान और आरक्षण पर लगातार होता हमला भूल जाता है. यह डिवाइड एंड रूल अंग्रेजों से भी खतरनाक है.
2026 के आंदोलन ने इस खेल को खत्म किया. जब JNU से लेकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी तक के छात्रों ने एक साथ कहा कि हमें हॉस्टल चाहिए, फीस कम चाहिए तो सवर्ण छात्र भी उसी लाइन में था और दलित छात्र भी. जब किसान ने कहा कि हमें MSP चाहिए तो जाट किसान और यादव किसान एक ही ट्रैक्टर पर थे. धर्म की राजनीति वहीं फेल हो गई जब सड़कों पर रोजी रोटी की बात शुरू हुई. आज बीजेपी को इसीलिए सिलेंडर और बस की बात करनी पड़ रही है क्योंकि उसे पता चल गया है कि अगर वह फिर से सिर्फ धर्म और सिर्फ अपर कास्ट के हितों पर चुनाव लड़ेगी तो जंतर मंतर की भीड़ 2029 में वोट बन जाएगी और बीजेपी की सत्ता हमेशा के लिए मिट जाएगी.




