Protest: हर तानाशाही की एक ही कहानी होती है और इस कहानी का एक अंत भी होता है. पहले राजा खुद को नॉन-बायोलॉजिकल समझ लेता है, फिर धर्म उसे अवतार घोषित कर देता है और फिर जनता को कहा जाता है कि राजा से सवाल पूछना पाप है. 810 साल पहले इंग्लैंड में यही हुआ था और आज दिल्ली में यही हो रहा है इसलिए जंतर-मंतर की ओर कूच करने वाली जनता सिर्फ एक प्रोटेस्ट नहीं कर रही, वो भारत का दूसरा मैग्नाकार्टा लिख रही है.
1215 से पहले इंग्लैंड के राजा जॉन ने देश को लूट लिया था. फ्रांस से जंग हारने के बाद खजाना खाली था तो उसने जनता पर बेतहाशा टैक्स लगा दिया. चर्च ने उसका साथ दिया और जनता से कहा कि राजा को सत्ता सीधे ईश्वर से मिली है इसलिए राजा जो करे वो सही है. धर्म का आशीर्वाद मिलते ही राजा जॉन ने खुद को गोड का रिप्रेजेन्टेटिव घोषित कर दिया.
राजा की तानाशाही बढ़ती गई और राजा के साथ धर्म के दलालों की अय्याशी भी चरम पर पहुंच गई. राजा के टैक्स और धर्म की लूट से तंग आकर बैरन्स यानी उस समय के किसान और आम लोग विद्रोह पर उतर आए. राजा ने उन्हें कुचलने के लिए सेना भेजी लेकिन जनता को कंट्रोल करना मुश्किल था. 15 जून 1215 को टेम्स नदी के किनारे रनीमेड में राजा जॉन को घेर लिया गया. बैरन्स ने राजा से जबरन एक दस्तावेज पर दस्तखत करवाए, उसी दस्तावेज का नाम था - मैग्नाकार्टा, यह असल में जनता का अधिकार पत्र था और यही मैग्नाकार्टा, यूरोप में डेमोक्रेसी का पहला श्वेत पत्र साबित हुआ.
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