KM Shivalinge Gowda: कर्नाटक के आबकारी मंत्री 68 वर्षीय केएम शिवलिंगे गौड़ा निहायत ही सज्जन व्यक्ति हैं. जैसा कि सीधे सादे लोगों के साथ होता है कि अक्सर अपनी साफगोई के चलते वे विवादों में फंस जाते है. ऐसा ही शिवलिंगे के साथ हुआ. बीती 20 सितम्बर को हासन जिले के `प्रजा सेवा आंदोलन` कार्यक्रम में बड़ी मासूमियत से यह वह कह बैठे कि अगर कोई अधिकारी समय पर और ईमानदारी से काम करता है तो ख़ुशी से `सम्मान` के तौर पर उसे कुछ दे देना गलत नहीं है बस इतना कहना था कि खासतौर से भाजपा ने उन पर चढ़ाई कर दी कि शिवलिंगे रिश्वत को जायज ठहराने की हिमायत कर रहे हैं. और जब सरकार रिश्वत के खिलाफ है तो मंत्री अधिकारियों को `सम्मान` के नाम पर पैसे देने की बात क्यों कर रहे हैं.
इन सियासी विवादों से परे देखा जाए तो शिवलिंगे की बात में इस लिहाज से दम है कि घूसखोरी कभी बंद नही की जा सकती ठीक वैसे ही जैसे दहेज़ और दान दक्षिणा चढ़ावा बगैरह बंद नहीं किए जा सकते. फिर हल्ला अकेले रिश्वत पर ही क्यों. क्या सिर्फ इसलिए कि यह किसी आदमी की जेब में जाती है, देवी, देवता, भगवान के मन्दिर में रखी दानपेटी में नहीं जाती या फिर पंडित को उसी `सम्मान` से नहीं दी जाती जिस `सम्मान` का जिक्र शिवलिंगे ने बड़े सम्मान से किया था.
नीचे यानी मृत्युलोक में दी जाने बाली घूस से बड़े बड़े काम आसानी से हो जाते हैं और न दो जरा सा काम होने में भी सदियां बीत जाती हैं. लेकिन उपर बाले को चढ़ाए गए पैसो के बाबत कोई गारंटी नहीं कि वांछित काम हो ही जायेगा देश में ढूंढे से इनेगिने लोग ही मिलेंगे जिन्होंने कभी घूस का लेनदेन नहीं किया होगा. पर देश में ढूंढे से एक आदमी भी नही मिलेगा जिसने कभी उपर बाले को पैसे नहीं चढ़ाए हों.
जाहिर है घूस का रिवाज या चलन धर्म की देन है जिसके तहत कहा यह जाता है कि सब कुछ ऊपर बाला ही करता है. जब यह बात एक थ्योरी के रूप में स्थापित और मान्य हो गई तो धर्म के ठेकेदारों ने लोगों की सहूलियत के लिए मंदिर, मस्जिद और चर्च बना डाले जिससे घूस या चढ़ावा देने बालों को इधर उधर भटकना न पड़े. और कहीं ऊपर बाले के नाम पर कोई अपात्र पैसे न ले ले. इस घूस के पात्र होते हैं पंडे, पुजारी, मौलवी, काजी और फादर बगैरह जो एक खास जाति के होते हैं मसलन हिन्दुओं में ब्राह्मण.
धर्म स्थलों में लोग एक रु से लेकर करोड़ों रु चढ़ाते हैं तो उसके पीछे कोई श्रद्धा, आस्था नहीं होती बल्कि लालच होता है. कोई हजार दो हजार रु चढ़ाकर बेटी की शादी की मन्नत मांगता है तो इसी को बेरोजगार बेटे को नौकरी चाहिए रहती है. कुंआरे शादी के लिए घूस देते हैं तो बीमार आदमी स्वस्थ हो जाने धर्म स्थल की दानपेटी के मुंह में नोट ठूँसता नजर आता है. छात्रों को पास होना रहता है इसलिए वे भगवान को घूस देते हैं तो मुकदमा लड़ रहे जीत की ख्वाहिश लिए जेब ढीली करते हैं
इधर नीचे बालों के मंदिर उनके दफ्तर होते हैं जहाँ बिना घूस के फाइल इंच भर भी नहीं सरकती. ऐसे में कोई अगर अपना काम करवाने के एवज में पैसे देता है तो उसमे गलत क्या है सिवाय इसके कि घूस का लेनदेन कानूनन जुर्म है. सवाल यह कि फिर चढ़ावा जुर्म क्यों नहीं जबकि दोनों का `नेचर` एक ही है
एक और अहम फर्क यह है कि ऊपर बाले के पास किसी चीज की कमी नहीं. वह चाहे तो पल भर में राजा को रंक और रंक को राजा बना दे. फिर उसे घूस क्यों. जबकि उसे नीचे बालों से कोई काम ही नहीं पड़ता. इधर नीचे सरकारी दफ्तरों में विराजे भगवानो की अपनी अलग समस्याएं और परेशानिया होती हैं. किसी को दो करोड़ के बंगले के लिए घूस चाहिए रहती है तो कोई अपनी बेटी के ब्याह के लिए दहेज़ की रकम जुटाने के लिए घूस लेता है. किसी को बड़ी गाडी की ख्वाहिश होती है तो किसी की पत्नी को ज्वेलरी का शौक रहता है जो न मिले तो वह पति से कलह करते उसे घूस लेने के लिए उकसाती है .
घर में शांति बने रहे इस बाबत घूस कोई लेता है तो कौन सा गुनाह करता है. बेटी की शादी अच्छे घर में अच्छे वर से हो जाए इसके लिए घूस अपराध क्यों. सभी काम करवाने बाले `याचकों` को साहब की बेटी की शादी के लिए कुछ न कुछ `कंट्रीव्यूट` करना चाहिए इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है. किसी साहब को छोटी गाडी में चलने में गिल्ट फील होता है तो उसकी यह कुंठा या हीनभावना दूर करने की जिम्मेदारी काम करवाने बालों की नहीं तो किसकी है.
घूस पर एतराज जताने के बजाय सोचा यह जाना चाहिए कि सिस्टम चलाने बालों की ये इच्छाएं और जरूरते अगर सेलरी से पूरी नहीं हो रही हैं तो हम घूस देकर इन्हें पूरा करेंगे जिससे ये लोग बेफिक्री से टेंशन फ्री होकर काम कर पाएं. केएम शिवलिंगे गौड़ा की मंशा नेक थी कि जनता के काम वक्त पर हों और लोग हैं कि उन पर वेवजह चढ़ाई किए जा रहे हैं.
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