Celebrating Festivals Alone: त्योहार आते ही शहर रोशनी, रंग और रिश्तों की गर्माहट से भर जाते हैं. बाजारों में रौनक होती है, घरों में पकवान बनते हैं और सोशल मीडिया परिवार के साथ मुस्कुराती तस्वीरों से भर जाता है. लेकिन इसी चमक के बीच लाखों लोग ऐसे भी हैं जो अपने परिवार से दूर, किसी छोटे-से कमरे में अकेले रह रहे हैं. कुछ मजबूरी में घर नहीं जा पाते, कुछ ने अपनी जिंदगी का अकेला रास्ता खुद चुना है और कुछ ऐसे हैं जिनके रिश्ते समय के साथ पीछे छूट गए. तो क्या उनके लिए त्योहार की खुशियों के दरवाजे बंद हो जाने चाहिए? बिल्कुल नहीं. अकेले रहना जीवन की कमी या खुशियों से दूर होना नहीं है. त्योहार तो उस रोशनी का नाम है जो अकेले भी अपने भीतर रोशन की जा सकती है.

त्योहार आते ही शहरों का रंग बदल जाता है. बाजार जगमगा उठते हैं, घरों में सफाई शुरू हो जाती है, मिठाइयों की खुशबू गलियों में घूमती हुई घरों तक पहुंचने लगती है और सोशल मीडिया पर हर तरफ परिवार के साथ लोगों की मुस्कुराती तस्वीरें दिखाई देने लगती हैं. कोई घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ रहा है, कोई बस की टिकट तलाश रहा है, कोई अपने गांव जाने की तैयारी कर रहा है तो कोई दोस्तों के साथ त्योहार मनाने का कार्यक्रम बना रहा है. लेकिन इसी चमकते हुए त्योहार के बीच कुछ घर ऐसे भी होते हैं जहां एक कमरा है, एक बिस्तर है, एक मोबाइल फोन है और एक इंसान है.

वह इंसान शायद किसी दूसरे शहर में पढ़ रहा है. हो सकता है वह नौकरी करने के लिए अपने परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर आया हो. वह किसी पीजी में रहता हो, किसी छोटे से किराये के कमरे में या किसी फ्लैट में अकेला रह रहा हो. त्योहार के दिन उसका फोन जरूर बजता है. उधर से आवाज आती है -“बेटा, इस बार घर नहीं आ रहे?”
लेकिन उसके पास उस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं होता है. कई मजबूरियां होती हैं. जेब में पैसे नहीं होते, ट्रेन का टिकट नहीं मिलता, ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलती या कोई और कारण.

क्या त्योहार सिर्फ भरे पूरे परिवारों के लिए हैं?

समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने शादी नहीं करने का फैसला किया है या किसी कारण से अकेले रह रहे हैं. उनके लिए त्योहार समाज की बनाई हुई उस तस्वीर की याद लेकर आता है जिसमें त्योहार का मतलब पति, पत्नी, बच्चे और माँ बाप सहित एक भरा-पूरा घर मान लिया गया है. ऐसे समय में अकेलापन और भी गहरा हो जाता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या त्योहार की खुशी केवल उन्हीं लोगों के लिए है जिनके घर में बड़ा परिवार है?
बिल्कुल नहीं.

अकेले हैं तो क्या गम है? त्योहार मनाने के लिए परिवार का होना जरूरी नहीं है. ख़ुशी किसी परिवार की जागीर नहीं है. खुशियां मनाने के लिए किसी रिश्ते में बंधा होना भी जरूरी नहीं है. और सबसे बड़ी बात यह कि अकेले रहना और अकेला होना एक ही बात नहीं है.

श्याम नारायण 36 वर्षीय समाजसेवी हैं. पढ़ाई ख़त्म करने के बाद वह एक एनजीओ से जुड़ कर समाजसेवा के काम में लग गए. वह देश भर में घूम घूम कर एनजीओ का काम करते हैं. विदेश भी जाते हैं. उन्होंने शादी नहीं की. इसके पीछे उनके अपने कारण हैं. वह शादी को एक बंधन के तौर पर देखते हैं. समाजसेवा के जिस काम में वे हैं उसमें उनका भ्रमण एक जगह से दूसरी जगह होता ही रहता है. ऐसे में शादी करके किसी एक स्थान पर टिक जाना उनको पसंद नहीं आया. लिहाजा उन्होंने ताउम्र अकेले रहने का फैसला लिया. परिवारवालों ने शादी करने का बहुत दबाव बनाया तो उन्होंने परिवार से दूरी बना ली है. वे एक तरह से बिलकुल अकेले हैं. मगर त्योहारों की खुशियां वे पूरी धूमधाम से मनाते हैं. वे जिस शहर में भी होते हैं अपने रहने की जगह को सजाते हैं. मिठाइयां खरीदते हैं. आसपास के घरों में बधाई देते हैं. दीवाली पर दीये जलाकर घर को रौशन करते हैं और होली में आसपास के लोगों के साथ रंग खेलते हैं. अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करते हैं और कमैंट्स का इंतज़ार करते हैं. श्याम नारायण को देख कर कोई कह नहीं सकता कि भरी जवानी में वे अकेले हैं.

त्योहार को सामाजिक परीक्षा मत बनाइए

पण्डे पुजारियों, मौलाओं, पादरियों और धर्म के दूसरे ठेकेदारों ने त्योहारों को एक ऐसी सामाजिक परीक्षा बना दिया है जिसमें अगर आपके आसपास परिवार नहीं है तो यह समझाया जाता है कि आप अधूरे हैं. आप अकेले हैं तो आप में निश्चित ही कोई अवगुण होगा. परिवार से अनबन होगी. आप बदचलन होंगे आदि आदि.
त्योहार आया नहीं कि लोग सवाल पूछने लगते हैं –
“घर क्यों नहीं गए?”
“अकेले त्योहार कैसे मनाओगे?”
“शादी कब करोगे?”
“कोई दोस्त नहीं है क्या?”
“परिवार के बिना त्योहार में क्या रखा है?”
ऐसे सवाल सामने वाले के अकेलेपन को और बड़ा कर देते हैं. ऐसे सवाल खासकर उन महिलाओं के लिए कष्टकारी होते हैं जो शादी नहीं करतीं या जो तलाकशुदा हैं और अकेली रह रही हैं. समाज यह मानने को तैयार नहीं है कि कोई महिला अपने जीवन को अपने तरीके से जी सकती है और फिर भी खुश रह सकती है.

कई बार अकेले रह रहे लोगों को अपने चारों तरफ परिवारों की तस्वीरें देखकर लग सकता है कि शायद उसके जीवन में कुछ कमी है. लेकिन कमी आपके जीवन में नहीं बल्कि कमी उस सोच में है जो खुशी का सिर्फ एक मॉडल स्वीकार करती है. जबकि खुश रहने के लिए शादीशुदा होना जरूरी नहीं है. परिवार के साथ रहना खूबसूरत है, लेकिन अकेले रहना किसी अपराध की सजा नहीं है.

घर की याद आए तो उसे महसूस कीजिए, दबाइए नहीं

ऐसा नहीं है कि अकेले रह रहे लोगों को अपने घर परिवार की याद नहीं आती. मां के हाथ की मिठाई याद नहीं आती या पिता की आवाज याद नहीं आती. सब याद आता है. भाई-बहन की लड़ाई याद आती है. बचपन का घर याद आता है. ऐसी भावनाओं को दबाने की भी जरूरत नहीं है. उदास होना या कुछ याद करके रो देना कमजोरी नहीं बल्कि आपकी संवेदनशीलता है. त्योहार है और माँ की याद आ रही है तो फ़ोन कर लीजिए. भाई-बहनों और रिश्तेदारों से भी बात कर लीजिए. मगर इसके साथ ही अपने वर्तमान जीवन को, वर्तमान जगह को अपना घर-परिवार मानिये और उसके साथ खुशियों को महसूस करिये.

त्योहार को सिर्फ उस घर से मत जोड़िए जहां से आप आए हैं. जिस कमरे में आप रह रहे हैं, उसे भी अपना घर समझिये. उसे सजाइये. बहुत पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है. कुछ फूल, एक छोटी सी लाइट, दीये, मोमबत्तियां, रंगोली या अपनी पसंद की कोई सजावट भी आपको भरपूर ख़ुशी दे सकती है. सफाई कीजिए, बिस्तर ठीक कीजिए, पर्दे बदल दीजिए, अपनी पसंद का संगीत चलाइए, कहने का मतलब यह कि जिस कमरे में आप रोज लैपटॉप खोलते हैं, पढ़ाई करते हैं, ऑफिस का काम करते हैं और रात को सो जाते हैं, उसी कमरे में त्योहार के दिन थोड़ा रंग भर दीजिए.

खुद से कहिए कि यह मेरा घर है. आज इस घर में भी त्योहार है. अपने लिए कुछ अच्छा खाना बनाइए. भारतीय त्योहारों में भोजन का ख़ास हिस्सा है. अगर बजट कम है तो कोई साधारण-सी चीज बनाइए जैसे खीर, सेवईं, पुलाव, पूड़ी-सब्जी या हलवा. बात महंगे खाने की नहीं है बल्कि यह महसूस करने की है कि त्योहार आपके लिए है.

दोस्तों को परिवार बनने दीजिए

शहरों में रहने वाले युवाओं के पास एक खूबसूरत विकल्प है – दोस्त. कई बार नौकरी या पढ़ाई के लिए घर से दूर आने के बाद दोस्त ही परिवार बन जाते हैं. त्योहार पर उन दोस्तों को फोन कीजिए जो आपके आसपास रहते हैं. उन्हें अपने घर पर इनवाइट करिये. हो सकता है सामने वाला भी आपकी तरह अकेला हो और सिर्फ किसी के बुलाने का इंतजार कर रहा हो. एक छोटा-सा ग्रुप बनाइए और पार्टी करिये. त्योहार मनाने के लिए बड़ी पार्टी नहीं चाहिए. चार अच्छे दोस्त ही काफी हैं. उन लोगों को खासतौर से बुलाइये जो आपके जैसे अकेले रह रहे हैं. हम अक्सर अपने अकेलेपन में इतने डूब जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हमारे आसपास भी बहुत से लोग अकेले हैं. आपके ऑफिस का वह सहकर्मी जो हॉस्टल में रहता है. आपकी बिल्डिंग में रहने वाली वह लड़की जो दूसरे शहर से आई है. वह पड़ोसी अंकल जिनके बच्चे विदेश में रहते हैं. वह बुजुर्ग महिला जिनके घर में त्योहार के दिन भी सन्नाटा रहता है. इन लोगों को जोड़िए. यकीन मानिये इनके साथ त्योहार मनाने की ख़ुशी घर-परिवार के लोगों के साथ मनाये त्योहार की ख़ुशी से कहीं ज्यादा होगी.

अकेली रहने वाली महिलाएं और समाज का दबाव

जिन लड़कियों ने शादी नहीं की, जिनका तलाक हो गया या जो विधवा हैं और अकेली रह रही हैं, त्योहार आते ही समाज उनको तिरस्कार और उपेक्षा के शब्दवाणों से भेद-भेद कर यह एहसास दिलाने लग जाता है कि तुम अकेली हो. चुभते हुए सवाल, मसलन ”अरे अभी तक शादी नहीं की?” “अकेले कब तक रहोगी?” “त्योहार पर घर सूना लगता होगा.” आदि.

इन सवालों से परेशान होने की जरूरत नहीं है. आपको अपने जीवन का हिसाब हर किसी को देने की जरूरत नहीं है. अगर आपने शादी नहीं की है तो इसका मतलब यह नहीं कि आपकी जिंदगी रुकी हुई है. आपकी नौकरी है, आपका घर है, आपके दोस्त हैं, आपकी पसंद है, आपकी यात्राएं हैं, आपकी किताबें हैं, आपके सपने हैं, आपकी उपलब्धियां हैं और सबसे बड़ी बात यह कि आप कुछ भी करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं. आपको किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है. आप खुद अपनी मर्जी की मालिक हैं. आपके ऊपर यह दबाव भी नहीं है कि सुबह सबसे पहले उठ कर स्नान करो, जाकर पूजा की तैयारियों में जुटो, खुद भूखे रह कर बाकी सबके लिए मालपुआ बनाओ, त्योहार का सारा बोझ सिर्फ अपने कंधे पर उठाओ और बाकी सब इंजॉय करें. तो इस त्योहार पर आप अपनी मर्जी की दिनचर्या बनाएं. चाहें तो अकेले घूमने जा सकती हैं. कोई नई जगह देख सकती हैं. किसी दोस्त को घर बुला सकती हैं. अपनी पसंद की फिल्म देख सकती हैं. किसी क्लब या डिस्को में जा सकती हैं, कोई किताब पढ़ सकती हैं. घर सजा सकती हैं और दोस्तों को बुला कर बढ़िया खाना बना सकती हैं. इस त्योहार में अकेलेपन की बात तो मन में लाने की जरूरत ही नहीं है. हां, इसके लिए इस ख़ास दिन सोशल मीडिया से बिलकुल दूर रहें. खुद के साथ रहें, तभी असली ख़ुशी मिलेगी.

सोशल मीडिया की चमक को अपनी खुशी का पैमाना मत बनाइए

सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह इसलिए क्योंकि जब आप फेसबुक या इंस्टाग्राम खोलेंगे तो देखेंगे कि कोई अपने परिवार के साथ है, कोई कपल फोटो डाल रहा है, कोई नए कपड़े और ज्वेलरी दिखा रहा है, कोई विदेश में त्योहार मना रहा है, कोई अपने बच्चों के साथ तस्वीर डाल रहा है और देखते-देखते आपको लगेगा कि पूरी दुनिया खुश है और केवल आप अकेले हैं. सोशल मीडिया उन तमाम लोगों की असल जिंदगी नहीं दिखाता. वह एक छलावा भर है जो लोगों की ऊपरी ख़ुशी दिखाता है. जिंदगी का चुना हुआ हिस्सा दिखाता है. जिस तस्वीर में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा है, उस तस्वीर के बाहर की परेशानियां आपको दिखाई नहीं जातीं. इसलिए त्योहार पर सोशल मीडिया को खुशी का पैमाना हरगिज मत बनाइए. कुछ समय के लिए फोन बंद कर दीजिये और बाहर निकल कर वास्तविक दुनिया से रूबरू होइए.

अपनी खुशी किसी और के चेहरे की मुस्कान में देखिये

अकेलेपन से बाहर निकलने का सबसे सुंदर तरीका है किसी दूसरे के लिए कुछ करना. त्योहार के दिन किसी जरूरतमंद को खाना खिला दीजिये. अपनी बिल्डिंग के सफाई कर्मी या गार्ड को मिठाई का डिब्बा दे दीजिये. सड़क पर घूमते किसी गरीब बच्चे को एक जोड़ी नए जूते या कपड़े खरीद दीजिये. किसी वृद्धाश्रम या अनाथालय में उनकी जरूरत का सामान भेंट कर आइये. यकीन मानिये इन कामों से जो ख़ुशी आपको भीतर तक महसूस होगी वह परिवार या ससुराल वालों के साथ त्योहार मनाने में कभी महसूस ही नहीं होती है.

त्योहार का असली अर्थ ख़ुशी बांटना है. त्योहार का मतलब केवल नए कपड़े, मिठाई, पूजा, परिवार और फोटो नहीं है. त्योहार का अर्थ है रोजमर्रा की जिंदगी से थोड़ा बाहर निकलना. नए लोगों को अपने करीब लाना. अपने भीतर रोशनी पैदा करना और दूसरों की जिंदगी में थोड़ी खुशी जोड़ना.

आज लाखों युवा अपने घरों से दूर हैं. लाखों महिलाएं अकेली रह रही हैं. लाखों बुजुर्ग अपने बच्चों से दूर हैं. करोड़ों लोग नौकरी, पढ़ाई, कारोबार या बेहतर जिंदगी की तलाश में अपने पुराने शहरों से निकल चुके हैं. यह नई दुनिया है. इस नई दुनिया में परिवार का अर्थ भी बदल रहा है. अब परिवार केवल वह नहीं जो हमारे साथ एक छत के नीचे रहता है. परिवार वह भी हो सकता है जिसे हमने जिंदगी के सफर में चुना है. कोई दोस्त, कोई पड़ोसी, कोई सहकर्मी या कोई ऐसा इंसान जिससे सालों बाद बात हुई और लगा कि वह अपना है. रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते, अपनापन भी रिश्ते बनाता है. Celebrating Festivals Alone

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