US Tariffs: अमेरिका और भारत के रिश्तों में एक बार फिर टैरिफ का संकट खड़ा हो गया है. अमेरिकी संसद ने ऐसा विधेयक पास कर दिया है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देता है. अब यह ट्रंप के मूड पर निर्भर है कि वे इस अधिकार का इस्तेमाल किस पर करें और किस पर नहीं. कितना करें और कितना नहीं.
इस कानून के जरिये अमेरिका उन देशों पर भी आर्थिक दबाव बनाना चाहता है जो रूसी ऊर्जा खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में मदद कर रहे हैं. भारत और चीन इस समय अमेरिका के निशाने पर हैं. ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुतिन और जिनपिंग के साथ जो गर्मजोशी और नजदीकियां ट्रंप ने देखीं, उसके बाद तो वे निश्चित रूप से भारत पर टैरिफ का बोझ डालेंगे.
उल्लेखनीय है कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद काफी बढ़ा दी थी. भारत अपनी जरूरत के 40% से ज्यादा कच्चे तेल का आयात रूस से करता है. इस तरह भारत रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों में शामिल है. रूस से मिलने वाला तेल सस्ता होने के कारण भारतीय रिफाइनरियों के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है.
ऐसे में यदि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिकी टैरिफ का सामना करता है तो अमेरिका को निर्यात होने वाले उत्पादों के दाम में भारी वृद्धि हो जाएगी. जिससे अमेरिकी खरीदार सस्ता विकल्प ढूंढेंगे, जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको, चीन के प्रोडक्ट. नतीजतन भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद, केमिकल्स समेत कई चीजों के ऑर्डर घट जाएंगे. ये भारतीय वस्तुएं अमेरिकी बाजार में महंगी हो जाएंगी और भारतीय निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ेगा.
दूसरी तरफ यदि भारत रूस से तेल की खरीद कम करके दूसरे देशों से ज्यादा तेल खरीदे तो इसका असर रिफाइनिंग लागत से लेकर पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों में दिखेगा. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है. अगर सस्ता रूसी तेल हटता है और अन्य देशों से महंगा तेल आता है तो भारतीय बाजार में महंगाई आसमान छूने लगेगी. जो अभी भी कम नहीं है. भारत के सामने समस्या केवल अमेरिका के साथ व्यापार की नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक लागत की भी है.
अमेरिका रूस को घुटनों पर लाने की कोशिश में है. जो बिल अमेरिकी संसद में पास हुआ है उसमें रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है. अमेरिका पहले भी रूस पर ऐसे प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर चुका है. लेकिन ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल की सप्लाई पर असर पड़ा और दुनिया में तेल की कमी का डर बढ़ गया. जिससे अमेरिकी सरकार को रूस के तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए लगी पाबंदियों में छूट देनी पड़ी. लेकिन अब रूस की बढ़ती आर्थिक ताकत को देख कर अमेरिका फिर सचेत हो गया है. रूस से भारत की निकटता भी उसे चुभ रही है.
मगर भारत के लिए किसी एक देश की नाराजगी या दबाव देखकर अपनी ऊर्जा नीति बदलना संभव नहीं है. भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब से जुड़ी है. भारत को तेल की कीमत, आपूर्ति की सुरक्षा, रुपये की स्थिति, निर्यात बाजार और अमेरिका सहित दूसरे देशों के साथ व्यापार, इन सभी पहलुओं को देख कर आगे बढ़ना होगा.
एक तरफ रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, तो दूसरी तरफ अमेरिका भारतीय निर्यात का एक बड़ा बाजार है. ऐसे में भारत को बीच का ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को अचानक झटका दिए बिना अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते प्रभावित न हों. प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप के दोस्ताने की असल परीक्षा का समय तो अब आया है. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत अमेरिकी दबाव, रूसी तेल की आर्थिक उपयोगिता और अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के बीच किस तरह संतुलन बनाता है. US Tariffs





