Rekha life Story: मशहूर अभिनेत्री रेखा ने अपनी जिंदगी में जो हासिल किया वह फिल्मी उपलब्धियों तक ही सीमित रहा. पति, बच्चे और घरगृहस्थी का सुख उन के लिए सपना ही रहा जिस का उन्हें मलाल रहा भी हो तो उन्होंने इसे सार्वजनिक तौर पर कभी व्यक्त नहीं किया. एक अधूरी सी जिंदगी जीती रहीं रेखा के लिए चेन्नई से मुंबई तक का सफर आसान न था. अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर जो मुकाम उन्होंने हासिल किया वह हर किसी को नहीं मिलता.

साल 2026 का स्वतंत्रता दिवस विदेशों में भी पूरे उत्साह और धूमधाम से भारतीयों ने मनाया था. लेकिन आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य की राजधानी मेलबर्न का कुछ ज्यादा ही खास था क्योंकि वहां के भारतीयों ने यह दिन कई नामी फिल्म स्टार्स सहित मशहूर अभिनेत्री रेखा के साथ मनाया और राष्ट्रगान भी गाया था. मेलबर्न में आयोजित 17वें भारतीय फिल्म महोत्सव में शिरकत करने पहुंचीं रेखा को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी.

भीड़ रेखा को देख स्वाभाविक रूप से रोमांचित थी क्योंकि अब तक रेखा को उस ने फिल्मी परदे पर ही देखा था. लेकिन कम ही लोगों को रेखा के फिल्मी सफर और कामयाबी के बारे में मालूम होगा. हालांकि, रेखा उन इनीगिनी ऐक्ट्रैस में से एक हैं जिन की जिंदगी खुली किताब की तरह है. इस किताब के शुरुआती पन्ने बेहद त्रासद हैं जिन में अभाव, अनिश्चितता और पेरैंट्स के अलगाव से उपजी असुरक्षा है. रेखा के फिल्मी सफर को सिलसिलेवार देखें तो समझ आता है कि कामयाबी के जिस मुकाम पर वे आज हैं उसे पाना आसान न था.

निर्देशक और अपने दौर के नामी व कामयाब लेखक अली रजा, जोकि अभिनेत्री निम्मी के पति थे, की साल 1974 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ हालांकि एक चलताऊ मसाला फिल्म थी लेकिन यह फिल्म बौक्स औफिस पर जबरदस्त हिट रही थी. इस फिल्म में वह सबकुछ था जो किसी भी फिल्म को हिट करवाने के लिए जरूरी होता है, मसलन रहस्य, रोमांच, प्यार, सैक्स, मारधाड़, डाकू, तवायफ, पुलिस और ठाकुर साहब वगैरह लेकिन हकीकत में यह फिल्म चली अभिनेत्री रेखा की वजह से थी जिन्होंने
70 के दशक के चलन को धता बताते एक निहायत ही उत्तेजक दृश्य दिया था.

इस सीन को देखने के लिए उस दौर से ले कर स्कूली बच्चे और कालेज के छात्र तक पगला उठे थे जिन्होंने ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ को दसियों बार देखा था और हर बार लाइन में लग कर टिकट खरीदे थे. तब नीचे का टिकट महज
35 पैसे का आता था लेकिन यह रकम उस दौर में कम न होती थी. कम रकम इस लिहाज से कही जा सकती है कि वे इतने पैसे में तालाब से नहा कर निकलती गदराई ऐक्ट्रैस रेखा को लगभग नग्न देख पा रहे थे. जिन्होंने यह फिल्म देखी होगी वे अब बूढ़े हो गए होंगे या फिर दुनिया को अलविदा कह ​दिए होंगे लेकिन शायद ही याददाश्त जाने तक वे तालाब से नहा कर निकलती रेखा का नग्न बदन भूल पाए होंगे.

‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ का एक और आकर्षण नायक सुनील दत्त थे जो तब तक 1957 की ‘मदर इंडिया’ के बाद से कोई दर्जनभर हिट फिल्में दे चुके थे. इस के पहले दर्शकों ने रेखा को उन की पहली फिल्म ‘सावन भादों’ में भी देखा और सराहा था जो एक देहाती अल्हड़ लड़की चंदा की भूमिका में थीं. लेकिन तब फिल्मी पंडितों को रेखा के चलने में शक था क्योंकि वे सांवली और मोटी भी थीं, साथ ही, उन का चेहरामोहरा तब लगने वालों को हिंदी फिल्मों जैसा नहीं लगा था.

रेखा ने एकएक कर सारी आशंकाएं न केवल ध्वस्त कर दीं बल्कि अपनी जबरदस्त अभिनय प्रतिभा का ऐसा लोहा मनवाया कि आज भी उन की कई फिल्मों की मिसाल दी जाती है.

त्रासद बचपन

रेखा उन बेचारी करार दे दी गई अभिनेत्रियों में से एक हैं जिन का बचपन आम बच्चों सरीखा नहीं था. हालांकि उन के पिता जेमिनी गणेशन दक्षिण भारतीय फिल्मों का बड़ा नाम थे लेकिन उन्होंने कभी रेखा को अपना नाम और प्यार नहीं दिया. मां पुष्पवल्ली छोटीमोटी ऐक्ट्रैस थीं जिन की पटरी कभी पति से बैठी नहीं. रेखा के जन्म के बाद तो दोनों के बीच इतनी कड़वाहट आ गई कि दोनों अलग हो गए. इन दोनों ने विधिवत शादी की भी थी या नहीं, यह रहस्य भी अभी तक रहस्य ही है.

रेखा उस वक्त भानुरेखा गणेशन थीं जो मां के हिस्से में आईं. पुष्पवल्ली की माली हालत ठीक नहीं थी, इसलिए पैसा कमाने की गरज से उन्होंने 13 साल की इकलौती बेटी को फिल्मों में ढकेल दिया. ढकेलना शब्द इसलिए भी सटीक बैठता है कि रेखा फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थीं. वे बचपन में मोटी और सांवली भी थीं लेकिन इस हालत में भी वे आकर्षक लगती थीं. उन में एक अपील थी जो हिंदी फिल्मों में आने के बाद निखरती गई.

9वीं क्लास से ही रेखा को पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी थी. जब वे मां के साथ चेन्नई से मुंबई आईं तब अभाव और संघर्ष भी जरूरी घरेलू सामान की तरह उन के साथ लदे थे. लगता नहीं कि तब ही रेखा को यह एहसास हो गया होगा कि उन की जिंदगी में उन का अपना कुछ नहीं है. वे एक अधूरेपन के साथ पैदा हुई थीं जो अब तक साए की तरह उन के साथ है.

उन्होंने इस अधूरेपन से समझौता कर लिया है और इस के साथ जीने की आदत भी डाल ली है, वह भी मुसकराते हुए, मानो यही उन की जिंदगीभर की जमापूंजी है. अब 71 की उम्र में उन के चेहरे की रौनक देखते लगता नहीं कि उन्हें कोई गिलाशिकवा किसी से है और है भी तो वह उन के दिल के बेसमैंट के भी नीचे कहीं दफन है.

प्यार के अधूरे किस्से

रेखा के प्यार के किस्से सच्चेझूठे जैसे भी हों, आज भी चर्चा में रहते हैं. ‘सावन भादों’ के रिलीज होने के तुरंत बाद ही फिल्म इंडस्ट्री में यह हवा फैल गई थी कि वे और नवीन निश्चल एकदूसरे से प्यार करते हैं. 70 के दशक का यह रिवाज था कि जो जोड़ी हिट हो जाती थी उस पर प्यार का ठप्पा झट से लग जाता था.

नवीन निश्चल को शायद रेखा से इश्क के चर्चों से कुछ हासिल नहीं हो रहा था. दूसरे उन्हें अपने भविष्य के राजकपूर या दिलीप कुमार हो जाने का भी गुमान था लिहाजा उन्होंने रेखा से जल्द कन्नी काट ली. मुंबई में रेखा का पहला अनुभव ही बहुत कड़वा था. ‘सावन भादों’ भले ही उन की पहली प्रदर्शित फिल्म थी लेकिन उन की साइन की गई पहली हिंदी फिल्म ‘अनजाना सफर’ थी जिस में उन के अपोजिट विश्वजीत चटर्जी थे.

इस फिल्म की शूटिंग महबूब स्टूडियो में हुई थी. एक दृश्य में विश्वजीत को रेखा का चुंबन लेना था. रेखा तब महज
15 साल की थीं और इस दृश्य को फिल्माने में जो उन के साथ हुआ उस के लिए वे बिलकुल तैयार न थीं.

कमसिन रेखा को सैट पर देखते ही उम्र में उन से 25 साल बड़े विश्वजीत सुधबुध खो बैठे थे. उन्होंने जानबूझ कर एक के बाद एक दर्जनभर जबरिया चुंबन रेखा के होंठों के वहशियों की तरह ले डाले जिस से रेखा न केवल सहम गई थीं बल्कि डर कर रोने भी लगी थीं. यह फिल्म ‘दो शिकारी’ नाम से 1979 में रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर ज्यादा चली नहीं थी. जबकि तब तक रेखा कई हिट फिल्में दे चुकी थीं और किसी फिल्म में उन का होना ही उस की सफलता की गारंटी माना जाता था.

इस हादसे से जैसेतैसे उबरीं रेखा का नाम नवीन निश्चल के बाद अभिनेता विनोद मेहरा से तेजी और इतनी शिद्दत से जुड़ा था कि उन्हें पतिपत्नी मान लिया गया था. विनोद मेहरा के साथ रेखा की मानिक चटर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘घर’ काफी सफल रही थी जिस में रेखा ने बलात्कार पीड़िता गृहिणी के रोल में जान डाल दी थी. रेखा और विनोद मेहरा की कथित शादी बड़ी रहस्यमय थी जिस के बारे में साल 2004 में सिम्मी ग्रेवाल के एक शो में रेखा ने खंडन किया था कि उन्होंने विनोद मेहरा से कभी शादी नहीं की.

70 के दशक में फिल्म इंडस्ट्री जितनी बदली उतनी पहले कभी नहीं बदली थी. साल 1976 से इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन और रेखा के इश्क के चर्चे होने लगे जिस की शुरुआत ‘दो अनजाने’ फिल्म से हुई थी. इस के बाद इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई सुपर हिट फिल्में दीं जिन में ‘आलाप’, ‘खून पसीना’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘मिस्टर नटवरलाल’, ‘सुहाग’, ‘राम बलराम’ और ‘सिलसिला’ उल्लेखनीय हैं.

अमिताभ उन दिनों टौप पर थे तो रेखा भी उन्नीस न थीं जिन्होंने कौमेडी के साथसाथ समानांतर सिनेमा ‘उत्सव’, ‘कलियुग’, ‘विजेता’ और ‘उमराव जान’ जैसी फिल्मों के जरिए अपनी ऐक्टिंग की धाक जमा ली थी. अमिताभ और रेखा की जोड़ी को गोल्डन जोड़ी कहा जाने लगा था. इन के इश्क में हकीकत का तड़का ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म से लगा था जिस में रेखा तवायफ जोहरा बाई की भूमिका में थीं. यों तो प्रकाश मेहरा की इस फिल्म के सारे फ्रेम कसे हुए थे पर वह फ्रेम ऊपर और नीचे दोनों तबकों के दिलोदिमाग में गहरे तक बैठ गया था जिस में रेखा कहती हैं कि, ‘जोहरा अब नाचेगी तो सिर्फ सिकंदर के लिए.’

यह सिलसिला साल 1981 में प्रदर्शित यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ फिल्म तक चला था जो एक खास मकसद से बनाई गई थी. आप इसे प्रतीकात्मक तौर पर दोनों की बायोपिक भी कह सकते हैं. परिपक्व प्रेमत्रिकोण पर बनी ‘सिलसिला’ में रेखा के सामने जया थीं या जया के सामने रेखा थीं, यह तय कर पाना बेहद मुश्किलभरा काम है. आज तक कोई विश्लेषक यह तय नहीं कर पाया कि किस ने ज्यादा अच्छी ऐक्टिंग की थी पत्नी की भूमिका में जया ने या फिर प्रेमिका बनी रेखा ने जो रियल लाइफ में भी क्रमश: अमिताभ की पत्नी और प्रेमिका थीं.

जो भी हो, तब यह फिल्म अमिताभ बच्चन के कैरियर की डूबती नैया पार लगाने के लिए बेहद जरूरी हो गई थी. उस फिल्म में अपने दौर की 2 धाकड़ नायिकाएं एक तरह से वास्तविक जिंदगी को परदे पर साकार कर रही थीं. हकीकत में भी रेखा कभी अमिताभ को जया से छीन नहीं पाईं और शायद इस का ज्यादा मलाल भी उन्हें अब न होता हो लेकिन तब अमिताभ से ध्यान बंटाने के लिए उन्होंने कामयाब बिजनेसमैन मुकेश अग्रवाल से शादी कर ली थी जिस का हश्र फिल्मों सरीखा ही हुआ. शादी के 6 महीने बाद ही मुकेश ने आत्महत्या कर ली थी जिस का जिम्मेदार रेखा को ही ठहराया गया था.

उसी दौरान उन का नाम उस दौर के दिग्गज पाकिस्तानी क्रिकेटर और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से भी जुड़ा था जो इन दिनों जेल में हैं. साल 1985 में इमरान-रेखा के इश्क के चर्चे बहुत आम थे और मीडिया रिपोर्ट्स में तो यह तक दावा किया गया था कि दोनों शादी करने वाले हैं और इस बाबत पुष्पवल्ली ने तैयारियां भी कर ली हैं. लेकिन यह सब कथिततौर तक ही सीमित रहा. बाद में एक इंटरव्यू में इमरान ने बगैर रेखा का नाम लिए कहा था कि वे किसी ऐक्ट्रैस के साथ क्वालिटी टाइम तो गुजार सकते हैं पर उस के साथ शादी करने की बात सोच भी नहीं सकते.

सभी को दी टक्क

अकेले जया बच्चन को ही नहीं बल्कि रेखा ने ड्रीम गर्ल के खिताब से नवाजी गईं हेमा मालिनी को भी कड़ी चुनौती दी थी जिन के साथ 2 ही फिल्मों में काम किया. पहली थी 1972 में आई ‘गोरा और काला’ जिस में जुबिली कुमार यानी राजेंद्र कुमार डबल रोल में थे. यह फिल्म सुपर हिट रही थी और 1975 में प्रदर्शित ‘धर्मात्मा’ ने भी तगड़ा बिजनैस किया था. दोनों ही फिल्मों में हेमा और रेखा का आमनासामना न के बराबर हुआ था लेकिन जितना भी हुआ उस में रेखा भारी पड़ी थीं.

अपनी समकालीन अभिनेत्रियों पर रेखा हमेशा हावी नजर आईं, तो इस की वजह उन की अकड़ ठसक या स्टारडम नहीं बल्कि ऐक्टिंग ही थी. निर्देशक रमेश तलवार की 1981 में आई फिल्म ‘बसेरा’ एक ऐसी ही पारिवारिक फिल्म थी जिस में रेखा को अपनी पागल हो गई बड़ी बहन राखी के पति शशि कपूर से शादी करनी पड़ती है. इस फिल्म में रेखा ने बहुत ही सटीक और जमीनी ऐक्टिंग कर दर्शकों व समीक्षकों का दिल जीत लिया था. इस के पहले पारिवारिक हास्य फिल्म ‘खूबसूरत’ के लिए रेखा को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था.

1981 में ही प्रदर्शित एक और फिल्म ‘एक ही भूल’ में उन्होंने शबाना आजमी को जरा भी स्पेस नहीं दिया था हालांकि इस फिल्म के हीरो जितेंद्र के साथ उन की जोड़ी जमने लगी थी. इन दोनों की फिल्मों का अपना एक अलग ही फ्लेवर होता था. ऐसी ही एक फिल्म ‘मांग भरो सजना’ में रेखा के सामने मौसमी चटर्जी थीं जिस के भावुक दृश्यों में रेखा ज्यादा प्रभावी साबित हुई थीं. शुद्ध व्यावसायिक मसाला फिल्म ‘राम बलराम’ में जीनत अमान रेखा के सामने ज्यादा टिक नहीं पाई थीं.

इन फिल्मों ने चौंकाया भी

1980 के लगभग सौ फिल्मों में अभिनय कर चुकीं रेखा ने अपने सुनहरे दिनों में कुछ ऐसी भी फिल्मों में काम किया जिस से दर्शक चौंके भी थे.

मीरा नायर की 1997 में आई  ‘कामसूत्र’ और बासु भट्टाचार्य निर्देशित फिल्म ‘आस्था’ जिस में नायक ओम पुरी थे. इन फिल्मों में हालांकि सैक्स और सहवास दृश्यों की भरमार थी लेकिन उन में सैक्स वर्जनाओं को ले कर एक मैसेज भी था. रेखा 90 के दशक तक इतना नाम कमा चुकी थीं कि दर्शकों और उन के प्रशंसकों ने उन्हें इन भूमिकाओं में खारिज कर दिया था.

इस के पहले ‘कलियुग’, ‘विजेता’ और ‘उत्सव’ जैसी कला फिल्मों में उन्होंने अपनी ऐक्टिंग की गहरी छाप छोड़ी थी. श्याम बेनेगल की 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कलियुग’ में तो उन्हें एक चुनौतीपूर्ण भूमिका मिली थी. आज महाभारत होता तो कैसा होता, यह इस फिल्म में व्यापारिक घरानों की लड़ाई के जरिए बताया गया था. इस फिल्म को तब मास्को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दिखाया गया था और उसे फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था.

रेखा होने के मायने

रेखा की जिंदगी देख कहा जा सकता है कि जो उन्होंने चाहा वह उन्हें कभी नहीं मिला. अपने दौर के मशहूर शायर निदा फाजली की यह गजल उन पर फिट बैठती है- ‘कभी किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता…’ लेकिन बहैसियत एक ऐक्ट्रैस रेखा को जो प्यार और प्रशंसा मिली वह भी हर किसी को नहीं मिलती. उन्होंने जो भी हासिल किया अपने दम पर किया. फिल्म इंडस्ट्री में उन का कोई गाैडफादर नहीं था. यह सहज ही साबित हो गया कि अभिनय उन के खून में है और वे बनी ही ऐक्टिंग के लिए हैं. साल 2010 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था. इस के बाद 2012 में राज्यसभा के लिए भी रेखा को मनोनीत किया गया था.

तीन दशकों तक रेखा ने जम कर शानदार ऐक्टिंग की, सैट पर खूब मौजमस्ती की, भीतर से रोते हुए मुसकराती रहीं. रेखा ने जताया कि कोई भी औरत बदसूरत नहीं होती बशर्ते वह सलीके से रहे और अपनी सेहत व फिटनैस पर ध्यान देती रहे. एक वक्त में अभिनेता शशि कपूर ने उन्हें बदसूरत और मोटी कह कर बेइज्जत किया था लेकिन बाद में वही शशि कपूर अपनी फिल्मों में उन्हें लेने को तड़पा करते थे और यही रेखा होने के अपने अलग मायने हैं.

जिस पूर्णता की तलाश में रेखा जिंदगीभर भटकती रहीं, जिसे वे प्यार में ढूंढ़ती रहीं वह रेगिस्तान के पानी की तरह है जो होता नहीं है, बस, उस के होने का भ्रम भर होता है. Rekha life Story

 

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