Madrasa Ban: बच्चों के अच्छे भविष्य के मद्देनजर भाजपा सरकार का यह कदम सराहनीय है. देश भर के मदरसों को बंद होना चाहिए और साथ में वे तमाम गुरुकुल और क्रिश्चियन संस्थान भी बंद करवा दिए जाने चाहिए जो बच्चों को धार्मिक शिक्षा देते हैं. बच्चों को धर्म की कोठरी से निकालकर आधुनिक शिक्षा की दुनिया में लाना बहुत जरूरी है. बच्चों के भविष्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के हित में धार्मिक शिक्षा संस्थानों को बंद करवाना एक सराहनीय कदम है.
बच्चों की शिक्षा को धार्मिक दायरों से बाहर निकालकर आधुनिक, वैज्ञानिक और समानतावादी शिक्षा की ओर ले जाने के लिए देश में एक समान नीति होनी चाहिए. इसलिए सवाल केवल 252 मदरसों का नहीं है, बल्कि वे सभी संस्थाएं बंद होनी चाहिए जहां बच्चों को औपचारिक शिक्षा के बजाय धार्मिक शिक्षा दी जाती है – चाहे वे मदरसे हों, गुरुकुल हों या किसी धर्म से जुड़े दूसरे शिक्षण संस्थान.
धार्मिक किताबें और धार्मिक शिक्षा इंसान के दिमाग को संकीर्ण और दकियानूसी बनाती हैं. मदरसों-गुरुकुलों में पढ़ने वाला छात्र खुद को अपने धर्म की एक छोटी सी कोठरी में बंद कर लेता है. उस कोठरी के बाहर जो भी लोग हैं, उन्हें वह दुश्मन समझता है. वह जीवन भर उसी दायरे में सिमटा रहता है. भगवान और अल्लाह के नाम पर डरा रहता है.
जब यह मदरसे-गुरुकुल बंद होंगे, तब शिक्षा प्राप्ति के लिए यह तमाम बच्चे सरकारी स्कूलों की तरफ भागेंगे. वहां कम से कम दूसरे धर्मों के बच्चों के बीच पहुंच कर उन्हें समझ में आएगा कि अब तक पंडित या मौलवी उन्हें दूसरे धर्म के बारे में जो कुछ बताते थे, धर्म की किताबें जो सिखाती थीं, वह कितना झूठ और मिथ्या है.
शिक्षा का उद्देश्य किसी खास धार्मिक पहचान को मजबूत करना नहीं, बल्कि उन्हें एक स्वतंत्र, तार्किक और जिम्मेदार नागरिक बनाना होना चाहिए. बच्चे जब सरकारी स्कूलों में जाएंगे तो उन्हें विज्ञान सवाल पूछना सिखाएगा, गणित तर्क करना सिखाएगी, इतिहास अतीत को समझने की क्षमता देगा और साहित्य उन्हें अलग-अलग मनुष्यों के अनुभवों से परिचित कराएगा.
सरकारी स्कूल इस लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. एक ही कक्षा में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और अलग-अलग जातियों एवं समुदायों के बच्चे साथ पढ़ते हैं. साथ खेलते हैं, दोस्ती करते हैं, एक-दूसरे के घर जाते हैं और धीरे-धीरे समझते हैं कि किताबों में बनाई गई धार्मिक या सामाजिक दीवारों के उस पार भी वैसा ही इंसान रहता है जैसा इस पार. दरअसल जब धार्मिक मान्यताओं को छोटी उम्र में अंतिम और निर्विवाद सत्य के रूप में पढ़ाया जाता है तो बच्चे के भीतर सवाल करने की गुंजाइश और दूसरे समुदाय के लोगों को समझने की क्षमता बहुत कम हो जाती है.
सरकारी स्कूलों में बच्चों को यह जानने का अवसर मिलेगा कि उनके सहपाठी अलग-अलग धर्मों, जातियों, भाषाओं और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आते हैं, लेकिन इन तमाम भिन्नताओं के बावजूद वे सबसे पहले मनुष्य हैं. वे समझेंगे कि जीवन को सफलतापूर्वक चलाने के लिए रोज़े-व्रत, भजन-नमाज से ज्यादा जरूरी है विज्ञान, गणित, अंग्रेजी की पढाई, जिसके बाद मिलने वाली एक अच्छी नौकरी या व्यवसाय उनके और उनके परिवार की जिंदगी को बेहतर बनाएगा.
रही बात सारे बच्चों के लिए पर्याप्त संख्या में सरकारी स्कूल और अच्छी शिक्षा मुहैया करवाने की तो यह बीड़ा देश और राज्यों की सरकारों को उठाना होगा. आवश्यकता आविष्कार की जननी है, ऐसे में जब जरूरत बढ़ेगी तब सरकारी स्कूलों की संख्या भी बढ़ानी पड़ेगी. शिक्षा का स्तर भी बढ़ाना पड़ेगा और शिक्षकों की संख्या भी. बंद हुए मदरसों के बच्चों के लिए तुरंत सरकारी स्कूलों में प्रवेश सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उनकी शिक्षा में व्यवधान न आये. अगर सरकार देश के सभी बच्चों के लिए कम कीमत पर अच्छी शिक्षा मुहैया नहीं कराती और अच्छे शिक्षण संस्थान नहीं बनाती तो इस मुद्दे पर आज एक कॉकरोच जनता पार्टी सरकार को हिला रही है, कल अनेक ऐसी पार्टियां सरकार से सवाल पूछने के लिए खड़ी होंगी. Madrasa Ban





