UPSC Exam: संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विसेज परीक्षा 2025 के फाइनल रिजल्ट में कुल 1,009 कैंडिडेट्स ने परीक्षा पास कर आईएस, आईपीएस समेत अन्य पदों को हासिल कर लिया. सवाल यह है कि क्या सच में यूपीएससी (यूनियन सर्विस पब्लिक कमीशन) की परीक्षा एक गांव में पढ़ने वाले कैंडिडेट के लिए भी उतनी ही आसान है जितनी एक शहर में पढ़ने वाले कैंडिडेट के लिए. क्या यूपीएससी सिविल सर्विसेज की परीक्षा अपनेआप में पूरी तरह से सब के लिए बराबर है.

कुछ सालों के प्रश्नपत्र देखें तो साफ पता चलता है कि यूपीएससी द्वारा सिविल सर्विसेज की परीक्षा का प्रश्नपत्र का जो स्तर है वह अब एक ग्रामीण और ह्यूमैनिटीज विषय से पढ़ कर आए कैंडिडेटों के लिए काफी कठिन कर दिया गया है और जानबूझ कर यूपीएससी अब इस तरह के प्रश्नपत्र बनाने लगा है जो इंजीनियरिंग या साइंस बैकग्राउंड से जुड़े कैंडिडेट्स के लिए लाभदायक साबित हो रहे हैं जो महंगे कोचिंग इंस्टिट्यूटों से पढ़ कर आए हैं.

संघ लोक सेवा आयोग का यह दावा है कि उस के प्रश्नपत्र का स्तर समान रहता है, वह शहर और ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने वाले दोनों तरह के कैंडिडेट्स के लिए समान है, बेशक उन का शिक्षा का बैकग्राउंड कोई सा भी हो, चाहे वह आर्ट्स से हो, साइंस बैकग्राउंड से हो या फिर कौमर्स बैकग्राउंड से. असल में आयोग का यह दावा खोखला और धूर्तता से भरा है.

जिस तरह पिछले कुछ सालों में यूपीएससी के प्रश्नपत्र देखे गए हैं, वे कुछ और ही बयां करते हैं. हालांकि हर साल जब संघ लोक सेवा आयोग पदों की भरती के संदर्भ में नोटिफिकेशन जारी करता है, तब वह पूरे परीक्षा पैटर्न समेत प्रारंभिक परीक्षा से ले कर मेन्स की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार तक की सभी जानकारी देता है.

जैसे 2025 की परीक्षा के संदर्भ में 2025 जनवरी में नोटिफिकेशन आया. उस में पेज नंबर 30 पर बोल्ड लैटर्स में सैक्शन 3, सिलेबस फौर दि एग्जामिनेशन यानी परीक्षा के लिए सिलेबस के पार्ट ए यानी भाग ए में प्रारंभिक परीक्षा के सिलेबस के बारे में बताया गया.

यूपीएससी की सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा 2 चरणों में होती है, पहली में सामान्य जानकारी से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं और दूसरी में गणित, तार्किक विचार और विश्लेषणात्मक क्षमता, संचार कौशल सहित पारस्परिक कौशल और सामान्य मानसिक क्षमता से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं.

अब यूपीएससी के नोटिफिकेशन में जो इन 2 पेपरों का सिलेबस लिखा है वह इस प्रकार है:

पेपर I

  • राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की समसामयिक घटनाएं.
  • भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन.
  • भारतीय एवं विश्व भूगोल- भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल.
  • भारतीय राजनीति एवं शासन- संविधान, राजनीतिक व्यवस्था, पंचायती राज, सार्वजनिक नीति, अधिकार मुद्दे आदि.
  • आर्थिक और सामाजिक विकास- सतत विकास, गरीबी, समावेशन, जनसांख्यिकी, सामाजिक क्षेत्र की पहल आदि.
  • पर्यावरण पारिस्थितिकी, जैवविविधता और जलवायु परिवर्तन पर सामान्य मुद्दे जिन के लिए विषय विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं है.

पेपर II

  • समझ.
  • संचार कौशल सहित पारस्परिक कौशल.
  • तार्किक विचार और विश्लेषणात्मक क्षमता.
  • निर्णय लेना और समस्या समाधान करना.
  • सामान्य मानसिक क्षमता.

बुनियादी संख्यात्मकता यानी बेसिक न्यूमेरसी (संख्याएं और उन के संबंध, परिमाण के क्रम, आदि) (कक्षा 10 तक का स्तर), डेटा व्याख्या (चार्ट, ग्राफ, तालिकाएं, डेटा पर्याप्तता आदि कक्षा 10 तक का स्तर).

अब यूपीएससी के आधिकारिक नोटिफिकेशन में सिलेबस दिया गया है. उस में पेपर 1 के कई विषयों में साफसाफ लिखा गया है कि विषय विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं है. वहीँ, पेपर 2 के लिए लिखा गया है कि सिलेबस कक्षा 10 तक के स्तर तक का है.

अब यूपीएससी में मेन्स की परीक्षा के लिए जो मैरिट बनती है, वह पेपर 1 में आए नंबरों के आधार पर बनती है, जबकि पेपर 2 सिर्फ क्वालीफाई करना होता है. यानी, पेपर 2, जो 200 नंबर का होता है, में से कैंडिडेट को 33 फीसदी नंबर लाने जरूरी हैं जोकि लगभग 67 नंबर बनते हैं.

इस के बावजूद पिछले कुछ सालों के यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा के प्रश्नपत्र देखें, खासकर पेपर 2, तो कई ऐसे सवाल आए हैं जो 10वीं, 12वीं तो छोडिए, बीए, एमए, बीएससी, इंजीनियरिंग, मैडिसिन सभी के सिलेबसों से बिलकुल उलट हैं या जो साफतौर पर एक विषय से पढ़ाई करने वालों के लिए बनाए गए हैं. उस में इंग्लिश भाषा को काफी तवज्जुह दी गई है और कुछ सालों के प्रश्नपत्र, विशेषकर पेपर 1, में आयोग ने कई सवालों के हिंदी अनुवाद को भी गलत लिखा है जो यूपीएससी के अफसरों के ज्ञान का स्टार बताता है कि वे खुद हिंदी न जानते हैं, जानना चाहते हैं.

इस बारे में यूपीएससी के 2023 के प्रश्नपत्र ज्यादा विवादों में रहे. पेपर 2, जिस में तार्किक विचार, कौशल सहित गणित से जुड़े सवाल अधिक पूछे जाते हैं, हर साल की तरह चर्चा का विषय रहा ही लेकिन यूपीएससी ने सभी सीमाओं को लांघते हुए पेपर 1 में प्रश्न का पैटर्न कुछ इस तरह बदला कि वह पेपर कठिन तो था ही जिस में गणित और तार्किक विचार व विश्लेषणात्मक क्षमता पर जो सवाल पूछे गए वे ह्यूमैनिटीज विषय से पढ़ कर आए कैंडिडेटों से क्या, इंजीनियरिंग, गणित बैकग्राउंड से पढ़ कर आए कैंडिडेटों तक से हल नहीं किए जा सके.

वर्ष 2023 का सिविल सर्विसेज का पेपर 2 कितना कठिन था, इस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2023 में यूपीएससी सिविल सर्विसेज परीक्षा के कटऔफ मार्क्स अब तक सब से कम गए थे, मतलब यह कि इस परीक्षा को पास करने वाले कैंडिडेट बहुत ही कम थे.

यूपीएससी की 2023 की परीक्षा को ले कर कैंडिडेटों और आयोग के बीच काफी विवाद हुआ. सिद्धार्थ मिश्रा व अन्य बनाम संघ लोक सेवा आयोग एक केस हुआ जिस पर 22 अगस्त, 2023 को दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आया.

लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट से पहले कैंडिडेटों ने कैट (सैंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल) का रुख किया वहां पिटीशन डाली थी. लेकिन कैट का जो फैसला आया उसी को कोट करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने भी वही फैसला दिया. कैंडिडेटों ने अपनी पिटीशन में कहा कि पेपर 2 में सिलेबस से बाहर यानी कक्षा 10 के स्तर से ऊपर के सवाल पूछे गए हैं, इसलिए पेपर 2 की जो क्वालीफाई फीसदी है उसे 33 से घटा कर 23 फीसदी कर दिया जाए.

कैंडिडेटों द्वारा डाली गई पिटीशन पर कैट का फैसला आया और उस ने खुद अपने फैसले में कहा कि 2023 के परीक्षा में पेपर 2 में कई ऐसे सवाल हैं जो कक्षा 10 के स्तर तक के अर्थमैटिक के सवाल होने चाहिए थे जबकि वे कक्षा 12 स्तर के सवाल हैं. यहां पर कैट ने फैसला देते हुए कहा कि यह उस तरह के सवाल हैं जिन का उम्मीदवार उच्च इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के दौरान उत्तर देते हैं. लेकिन हम क्वालीफाई की 33 फीसदी को घटा कर 23 फीसदी नहीं कर सकते.

फिर जब दिल्ली हाईकोर्ट में केस गया तो दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कैट के पूरे फैसले को कोट करते हुए वही फैसला दिया और यह कह कर याचिका खारिज कर दी कि पेपर एक विशेषज्ञों की टीम द्वारा बनाया जाता है. हमारे पास विशेषज्ञों का जो पैनल है उस के दृष्टिकोण को चुनौती देने की अथौरिटी हमारे पास नहीं है. और वैसे भी, याचिकाकर्ता में 15 लोग हैं जिन में ज्यादातर मैथ्स और इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से हैं, ह्यूमैनिटीज वाले तो बहुत कम हैं, ऐसे में यह कह कर कि ह्यूमैनिटीज बैकग्राउंड से आए कैंडिडेटों के लिए यह पेपर कठिन था या सिलेबस से बाहर था, इस आधार पर आगे की परीक्षा रोकी नहीं जा सकती और क्योंकि जब तक प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट भी आ गया था, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी.

लेकिन यह मामला तो पेपर की कठिनाई से जुड़ा हुआ है. लेकिन उन स्थितियों में क्या जहां यूपीएससी ने कई बार अपने प्रश्नपत्र में इंग्लिश प्रश्न का हिंदी अनुवाद ही गलत कर दिया. यूपीएससी के सिविल सर्विसेज के पिछले पेपरों में कई बार ऐसा हुआ है जब हिंदी अनुवाद गलत दिया गया है. और यह हाल दोनों पेपर में है. पेपर 2 में लगभग 30 से 35 प्रश्न कौम्प्रिहेंशन के पूछे जाते हैं. कौम्प्रिहेंशन सवालों में ज्यादातर विज्ञान, टैक्नोलौजी, पर्यावरण, दर्शन व अन्य विषय से अधिक आते हैं, जिन को एक्सपर्ट पहले इंग्लिश में बनाते हैं, फिर इन का हिंदी अनुवाद किया जाता है, शायद गूगल से संस्कृतनिष्ठ हिंदी में.

एक दशक के प्रश्नपत्रों को देखें तो यह साफ हो जाता है कि यूपीएससी ने इंग्लिश कौम्प्रिहेंशन का बेहद गलत अनुवाद किया है, जैसे ‘टैबलेट कंप्यूटर’ के लिए ‘गोली कंप्यूटर’, ‘स्टील प्लांट’ के लिए ‘इस्पात पौधा’ और ‘लैंड रिफौर्म्स’ के लिए ‘आर्थिक सुधार’!

यह बात तो रही पेपर 2 की, पेपर 1 की बात करें जिस में सामान्य जानकारी के प्रश्न पूछे जाते हैं. उस में 2020 के पेपर में गांधी-इरविन समझौते से जुड़े एक प्रश्न में इंग्लिश में एक स्टेटमैंट यह दिया गया था:

“विदड्रौल औफ और्डिनैंस प्रौमुल्गेटेड इन कनैक्शन विद द सिविल डिसओबेडियंस मूवमैंट.”

और आयोग ने इस का हिंदी अनुवाद किया यह:

“असहयोग आंदोलन के संबंध में जारी किए गए अध्यादेशों को वापस लेना.”

मतलब, आयोग ने स्टेटमैंट में आंदोलन ही बदल दिया. इंग्लिश में सिविल डिसओबेडियंस मूवमैंट दिया गया है यानी सविनय अवज्ञा आंदोलन की बात हो रही है, जिस के हिंदी अनुवाद में असहयोग आंदोलन कर दिया गया जो नौन कोऔपरेशन मूवमैंट था.

फिर जब आयोग की यह गलती पकड़ी गई तब संघ लोक सेवा आयोग ने कहा कि अगर परीक्षा में कोई भी प्रश्न गलत है, तो उस का इंग्लिश वर्जन सही माना जाएगा. मतलब एक तरह से यह साफ कर दिया गया है कि अगर आप को यह परीक्षा देनी है तो इंग्लिश में प्रश्न तो पढ़ना ही पड़ेगा. तो फिर यह परीक्षा हिंदी माध्यम वाले बच्चों के लिए कैसे बराबर की परीक्षा है. हिंदी की नाटकबाजी सिर्फ वोटों के लिए की जा रही है क्या?

यूपीएससी की सिविल सर्विसेज की परीक्षा आमतौर पर कठिन होती है. इस को भारत के सब से कठिन पेपर में से एक माना जाता है. इस में यूपीएससी यह कैसे कह सकता है कि एक हिंदी माध्यम का कैंडिडेट पहले हिंदी में प्रश्न पढ़े, उस के बाद आयोग की गलती के चलते वह दोबारा उसी प्रश्न को इंग्लिश में भी पढ़े. जिस कैंडिडेट को इंग्लिश न आती हो तो वह क्या करे, यह स्वाभाविक सवाल है.

यह न भूलें कि आजकल 12वीं की परीक्षा में 1 करोड़ 60 लाख से ज्यादा कैंडिडेट बैठते हैं जिन में सीबीएसई के इंग्लिश के प्राइवेट स्कूलों के सिर्फ 19 लाख स्टूडैंट होते हैं. बात साफ है कि परीक्षा सिर्फ इन 19 लाख कैंडिडेट में से आएएएस, आईपीएस आदि बनाए जाने के लिए आयोजित की जाती है.

यूपीएससी की दोगलापंती

वर्ष 2023 के पेपर 2 को ले कर जब दिल्ली हाईकोर्ट और कैट तक ने यह बोल दिया था कि हां, 2023 के पेपर 2 में के कई प्रश्न सिलेबस से बाहर थे, तब भी यूपीएससी ने कोई ऐक्शन नहीं लिया. और अगर बात करें पेपर 1 की, तो 2023 के कई प्रश्न ऐसे हैं जिन को करैंट अफेयर्स के नाम पर कहीं से भी पूछ लिया गया है, जैसे :

* जब केंद्र सरकार किसी क्षेत्र को ‘सामुदायिक रिजर्व’ के रूप में अधिसूचित कर देती है-

  1. राज्य का मुख्य वन्यजीव वार्डन ऐसे वन क्षेत्र का शासी प्राधिकारी बन जाता है.
  2. ऐसे क्षेत्र में शिकार की अनुमति नहीं है.
  3. ऐसे क्षेत्र के लोगों को गैरलकड़ी वन उपज एकत्र करने की अनुमति है.
  4. ऐसे क्षेत्र के लोगों को पारंपरिक कृषि पद्धतियों की अनुमति है.

यह प्रश्न वैसे पर्यावरण पारिस्थितिकी जैसे विषय से जुड़ा है जिस का जिक्र सिलेबस में है, लेकिन सिलेबस में साफ तौर पर लिखा है कि इन विषयों से संबंधित सामान्य मुद्दे के लिए विषय विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है.

एक तरफ कहते हैं कि विषय विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है दूसरी तरफ इस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं जिन के लिए फौरेस्ट एक्ट समेत वाइल्डलाइफ एक्ट तक पढ़ना जरूरी है वह भी काफी गहराई तक.

सो, यह यूपीएससी का खुला दोगलापन है. कभी वह कहता है कि कक्षा 10 के स्तर तक के सवाल पूछे जाएंगे. कभी कहता है विषय विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है. फिर प्रश्न विषय की गहराई तक और सिलेबस के बाहर कक्षा 12 के क्रमचय और संयोजन (पर्मुटेशन एंड कौम्बिनेशन) जैसे टौपिक्स से पूछे जाते हैं. या तो यूपीएससी यह साफ कर दे और कैंडिडेटस से कह दे और अपने सिलेबस व नोटिफिकेशन में भी लिख दे कि उसे विषय विशेषज्ञता चाहिए और वह कक्षा 12वीं तक के इंग्लिश माध्यम वाले सवाल भी पूछ सकता है, तो कैंडिडेट उसी तरह से तैयारी करें. कम से कम कैंडिडेट को परीक्षा हौल में धोखा तो न मिले कि जो सिलेबस तैयार कर के वह गया था, उस से बाहर के प्रश्न पूछे जा रहे हैं.

वास्तव में यूपीएससी का यह हाल सिर्फ सिविल सर्विसेज परीक्षा तक सीमित नहीं है, ऐसे टेढ़े सवाल वह सीडीएस (कंबाइंड डिफैंस सर्विसेज) में भी पूछता है. यूपीएससी के आधिकारिक नोटिफिकेशन में सीडीएस का सिलेबस दिया गया है जहां सामान्य ज्ञान के सिलेबस का भी जिक्र है. उस में यह लिखा है:

सामान्य ज्ञान में समसामयिक घटनाओं और रोजमर्रा के अवलोकन तथा उन के वैज्ञानिक पहलुओं के अनुभव के बारे में ज्ञान शामिल हैं, जिस की किसी शिक्षित व्यक्ति से अपेक्षा की जा सकती है, जिस ने किसी वैज्ञानिक विषय का विशेष अध्ययन नहीं किया है. इस पेपर में भारत के इतिहास और भूगोल पर ऐसे प्रश्न भी शामिल होंगे जिन के उत्तर उम्मीदवार को विशेष अध्ययन के बिना ही देना चाहिए.

सिलेबस में साफ लिखा हुआ है कि भारत के इतिहास के भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जिस के लिए उम्मीदवार को किसी विशेष अध्ययन की जरूरत नहीं है. लेकिन अभी पिछले महीने 13 अप्रैल को सीडीएस एग्जाम हुआ, उस में एक प्रश्न यह था-

भारत में यूरोपियों द्वारा युद्ध के लिए उपयोग किए गए शस्त्रों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. फ्लिंट-लौक वाली बंदूकें बरसाती मौसम (वेट) वेदर में भी कार्य कर सकती थीं.
  2. संगीन (बायोनेट) के जुड़ने से बंदूक निकट समाघात (क्लोज कौम्बैट) में अधिक प्रभावी और खतरनाक शस्त्र बन गया.
  3. पिटवां लोहे (रौट आयरन) के तोप के बैरल को ले जाना और चलाना आसान था.

यह प्रश्न कहने के लिए इतिहास का है लेकिन अब क्या कैंडिडेट कौन सी बंदूक किस मौसम में चल सकती है, इस तरह की जानकारी ले कर घूमे. क्या यह अमेरिका है जहां किसी भी लोकल शौप पर बंदूक मिल जाती है और आप लगभग हर बंदूक के बारे में जान सकते हो. और यह प्रश्न बि 150 साल पुराने युद्धों का है. द्वितीय विश्व युद्ध तक रौट आयरन की तोपें न के बराबर इस्तेमाल हो रही थीं.

इस का साफ अर्थ है कि यूपीएससी जानबूझ कर अपनी परीक्षा को कठिन बना रहा है. ठीक है यूपीएससी एक संवैधानिक संस्था है, उस की अपनी एक साख है कि उस जैसा कठिन पेपर दुनिया में और भारत में कोई नहीं बना सकता. इसलिए वह अपनी साख बनाने के लिए इस तरह के टेढ़े प्रश्न पूछता है. लेकिन कठिन और अटपटे सवाल में फर्क होता है. एक कैंडिडेट का माइंडसैट चैक करना अलग चीज है, उस के लिए अलग तरह से प्रश्न सैटअप किए जाते हैं, लेकिन यह कि कौन सी बंदूक किस मौसम में चलती है, इस तरह के प्रश्न सिर्फ और सिर्फ परीक्षा को, बस, कठिन बनाने के लिए हैं.

आयोग में नहीं है ट्रांसपेरैंसी

संघ लोक सेवा आयोग यह तो चाहता है कि उस के यहां से पास हुए आईएएस, आईपीएस समेत अन्य अधिकारी लोग निडरता, निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करें. साथ ही, प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता बनाएं रखें लेकिन हकीकत में खुद आयोग इन सब चीजों से कोसों दूर है. ऐसा इसलिए क्योंकि यूपीएससी अपनी सिविल सर्विसेज प्रारंभिक परीक्षा के उत्तर, साल के अंत में जब फाइनल सिलैक्टेड कैंडिडेट्स का रिजल्ट आ जाता है, तब जारी करता है.

हालांकि, कई बार कैंडिडेट्स द्वारा आयोग से शिकायत की गई है कि आयोग जब सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट 15 से 20 दिनों में दे देता है तो फिर वह इस की उत्तरपुस्तिका भी तभी क्यों नहीं जारी कर देता, क्यों वह इसे साल के अंत में जारी करता है.

बात सिर्फ इतनी सी नहीं है. यूपीएससी के सिविल सर्विसेज प्रारंभिक परीक्षा की उत्तरपुस्तिका के नाम पर भी बस 1 पेज की पीडीएफ होती है, जिस में बस औप्शन लिखे होते हैं, जैसे प्रश्न 1 का उत्तर औप्शन B. बस, इस तरह उत्तर बताया जाता है, मतलब कौन सा कथन आयोग ने सही माना है, कौन सा गलत और  किसी कथन को गलत या सही क्यों माना है, इस बारे में कोई जानकारी नहीं. न ही इस की जानकारी आरटीआई वगैरह डालने पर मिलती है.

बात करें 2023 के प्रश्नपत्र की, हर साल जब परीक्षा होती है सिविल सर्विसेज एग्जाम की तो उस के 2 से 3 दिनों के भीतर सभी कोचिंग इंस्टिट्यूट अपनी तरफ से उत्तरपुस्तिका जारी कर देते हैं और साल के अंत में यूपीएससी व कोचिंग इंस्टिट्यूट की उत्तरशीट में लगभग 4 से 5 प्रश्न का ही अंतर होता था जहां उत्तर मैच नहीं करते थे. लेकिन 2023 की परीक्षा में यह अंतर 15 प्रश्न का था.

इस का सीधा सा मतलब है कि प्रश्नपत्र में कई ऐसे प्रश्न और उन के कथन हैं, जिन को आयोग गलत मानता है और कोचिंग इंस्टिट्यूट सही मानते हैं, लेकिन वे प्रश्न और कथन कौन से हैं, इस की जानकारी न आयोग कभी देता है, न कभी देगा. नतीजतन, यूपीएससी के प्रश्नपत्र में कैंडिडेट हमेशा उलझा रहेगा.

ये प्रश्न कठिन शायद इसलिए भी बनाए जाते हैं ताकि कोचिंग इंस्टिट्यूटों के माध्यम से इन्हें पैसे वालों को बेचा जा सके. यह केवल अंदाजा है पर ऐसा होता है लेकिन इस का सुबूत नहीं है. ऐसा संभव इसलिए है क्योंकि इस देश में बेईमानी तो उस राममंदिर तक में हो रही है जिस के लिए पंडितों ने 150 साल से ज्यादा जिद की. UPSC Exam

लेखक – बलराम सिंह पाल

 

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