Ahmedabad School Controversy: मलाला यूसुफजई और ऐन फ्रैंक की किताबों पर आपत्ति से लेकर किताब पढ़ने वालों पर लाठी चलाने तक, सवाल सिर्फ पुस्तकों का नहीं, विचारों पर पहरे का है. अहमदाबाद की घटना से यह सवाल उठता है कि स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ना चाहिए क्या यह सड़कों पर उतरने वाली दंगाइयों की भीड़ तय करेगी?

अहमदाबाद के आनंद निकेतन स्कूल में मलाला यूसुफजई की पुस्तक I Am Malala और ऐन फ्रैंक की The Diary of a Young Girl को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल दो किताबों का विवाद नहीं रह गया है. यह मामला एक बड़े सवाल में बदल गया है कि आखिर हमारे स्कूल बच्चों को क्या पढ़ने देंगे, क्या सोचने देंगे और किस तरह के सवाल पूछने देंगे? और यही वह सवाल है जिससे कॉकरोच जनता पार्टी का ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान भी जुड़ता है.

एक साधारण घटना से शुरू हुए विवाद ने तब बड़ा रूप ले लिया जब उसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े दक्षिणपंथी संगठनों – बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के लोग भी कूद पड़े. दरअसल 11 अगस्त को आनंद निकेतन स्कूल, शिलाज कैंपस की कैंटीन में एक बच्चे के खाने में कांच का टुकड़ा निकल आया, जिसके बाद कुछ अभिभावकों ने विरोध किया. एक बच्चे के खाने में कांच निकलना निश्चित रूप से गंभीर मामला है. स्कूल प्रबंधन से जवाब मांगा जाना चाहिए था, भोजन की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए थी और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए था कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो. लेकिन देखते ही देखते मामला कैंटीन से निकलकर स्कूल की लाइब्रेरी तक पहुंच गया. कुछ अभिभावकों ने आरोप लगाया कि बच्चों को मलाला यूसुफजई की किताब ‘I Am Malala’ और ऐन फ्रैंक की किताब ‘The Diary of a Young Girl’ पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है और इसे धार्मिक भेदभाव के रूप में पेश किया गया.

फिर जो हुआ, वह किसी भी लोकतांत्रिक और शिक्षित समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. अभिभावकों के विरोध प्रदर्शन में बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के लड़के भगवा लहराते लाठी डंडों के साथ घुस पड़े और स्कूल में तोड़फोड़ शुरू कर दी. उन्होंने वहां भगवा झंडे और पोस्टर लहराए और फर्नीचर-खिड़कियों के शीशे आदि तोड़ कर आक्रोश दिखाया कि स्कूल में दूसरे धर्मों की किताबें क्यों पढ़ाई जा रही हैं और गैर-हिंदू शिक्षकों को स्कूल में क्यों रखा गया है?

दक्षिणपंथी गुटों की उग्रता से डर कर स्कूल ने इन पुस्तकों को अपनी अनिवार्य रीडिंग सूची से हटाकर वैकल्पिक कर दिया. स्कूल ने शिक्षा सलाहकार/कंसल्टेंट मुन्नाज़ा शम्स के साथ आगे काम न करने का भी फैसला किया. इसके साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी ने भी स्कूल को नोटिस थमा दिया और इन किताबों को रखने के लिए ₹10,000 का जुर्माना लगा दिया.

यहीं से मामला किताबों से आगे बढ़कर स्कूल की अकादमिक स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न बन गया. दक्षिणपंथी समूहों की गुंडागर्दी के खिलाफ Student and Youth Collective Ahmedabad (SYCA) और Gujarat Reads Anyway ने 27 अगस्त को अहमदाबाद के वस्त्रापुर स्थित AUDA Garden में एक शांतिपूर्ण सामूहिक रीडिंग सेशन आयोजित किया और सार्वजानिक रूप से कोई 40 लोगों द्वारा दोनों पुस्तकों को पढ़ा गया. I Am Malala और The Diary of a Young Girl के अलावा भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी, चे ग्वेरा और जॉर्ज ऑरवेल की 1984 जैसी किताबें भी पढ़ी जा रही थीं. उनका संदेश साफ था कि अगर किसी किताब को स्कूल में पढ़ने से रोका जाता है, तो उस किताब को सार्वजनिक रूप से पढ़कर उसके पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता है.

SYCA का कहना था कि स्कूलों को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की जगह नहीं बल्कि आलोचनात्मक सोच, विमर्श और स्वतंत्र विचार का स्थान होना चाहिए. लगभग 150 विद्यार्थियों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के लोगों ने बाद में स्कूल की अकादमिक स्वायत्तता के समर्थन में एक बयान पर हस्ताक्षर भी किए.

अभी यह पठन-पाठन का कार्यक्रम चल ही रहा था कि तभी शाम करीब 5:30 – 6 बजे कुछ लोग लाठियों-डंडों के साथ वहां पहुंचे. उन्होंने पढ़ने वालों से पूछा कि वे मलाला की किताब क्यों पढ़ रहे हैं? इसके बाद हमलावरों ने लोगों बदसलूकी शुरू कर दी. उन्होंने वहां मौजूद लोगो को डंडों से पीटा और उनकी किताबें फाड़ डालीं. महिलाओं के साथ भी बदसलूकी हुई और एक प्रतिभागी को बाल पकड़कर खींचा गया. एक महिला प्रतिभागी द्वारा बनाए गए वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि कैसे वह उज्जड भीड़ लोगों को भद्दी गलियां और धमकियां दे रही थी.

28 अगस्त को वस्त्रापुर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा, मारपीट/चोट पहुंचाने और धमकी आदि से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धाराएं लगाई गईं. तीन लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया और अन्य की तलाश की बात कही.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उससे जुड़े तमाम दक्षिणपंथी समूहों के हिंसात्मक विचारधारा और दोगले चहरे को इस बात से आंका जा सकता है कि न्यूयॉर्क और ब्रिटेन में तो संघ प्रमुख मोहन भागवत के मुख से मुसलमानों के लिए फूल झड़ते हैं. हाल ही में न्यूयॉर्क में हुए कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि वे मुसलमानों के बिना भारत की कल्पना नहीं करते. बोले कि जो ये कहे कि भारत में मुसलमान नहीं रहेगा वह हिन्दू नहीं है, यह हिंदुत्व नहीं है और वहीं देश के अंदर उनके समर्थक मलाला युसूफ़जई की लिखी किताब पढ़ने पर लाठी डंडे चला रहे हैं. जबकि वह कोई धार्मिक किताब नहीं बल्कि एक लड़की के शिक्षा पाने की जद्दोजहद पर लिखी कहानी है.

सवाल उठा लाजिमी है कि एक तरफ मुसलमानों और दूसरे समुदायों के लिए समावेशी भाषा और दूसरी तरफ देश के भीतर किताब पढ़ने वालों पर लाठी? यह दोगलापन क्यों? यदि संघ सचमुच विविधता, सह-अस्तित्व और समावेश की बात करता है तो उसके विचारों से प्रभावित संगठनों को भी असहमति और विविध विचारों के प्रति उसी तरह लोकतांत्रिक होना चाहिए . किसी व्यक्ति की कही हुई बात का मूल्यांकन उसके शब्दों से ही नहीं, बल्कि उसके संगठन से जुड़े सामाजिक व्यवहार से होता है.

गौरतलब है कि मलाला की किताब कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है. वह एक लड़की की शिक्षा पाने की इच्छा, उसके संघर्ष और उस संघर्ष के दौरान झेले गए खतरों की कहानी है. ऐन फ्रैंक की डायरी भी किसी धर्म के प्रचार का दस्तावेज नहीं, बल्कि नाजी उत्पीड़न के दौर में एक यहूदी किशोरी के जीवन का ऐतिहासिक दस्तावेज है.

इन किताबों को पढ़ना किसी बच्चे को किसी धर्म में परिवर्तित करना नहीं है. बल्कि ऐसी किताबें बच्चों को यह समझने का अवसर देती हैं कि दुनिया में दूसरे लोगों के अनुभव क्या रहे हैं, धार्मिक हिंसा और कट्टरता मनुष्य की जिंदगी को किस तरह प्रभावित करती है और शिक्षा तथा स्वतंत्रता का मूल्य क्या है?

यहां सवाल केवल यह नहीं है कि स्कूल ने कौन-सी किताब रखी और कौन-सी नहीं रखी. असली सवाल यह है कि क्या किसी स्कूल की अकादमिक नीति का निर्धारण तर्क, शिक्षा-विज्ञान और बच्चों की जरूरतों से होगा या फिर लाठी-डंडे लेकर पहुंचने वाले समूहों के दबाव से? क्योंकि यदि किसी किताब को लेकर आपत्ति है तो उसके लिए लोकतांत्रिक रास्ते मौजूद हैं.

किसी को उक्त किताबें पसंद न हों तो वह आलोचना कर सकता है. किसी अभिभावक को आपत्ति हो तो वह स्कूल प्रबंधन से सवाल कर सकता है. अगर स्कूल को लगे कि कोई किताब बच्चों की आयु के उपयुक्त नहीं है तो वह उस किताब को लाइब्रेरी से हटा सकता है, लेकिन किसी सार्वजनिक पार्क में बैठकर किताब पढ़ने वालों को डंडों से रोकना एक बिल्कुल अलग स्तर की घटना है. यह शिक्षा-विवाद से आगे जाकर पढ़ने की स्वतंत्रता, विचार की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का प्रश्न बन जाता है. किताब पढ़ने वालों पर लाठी चलाना और किताबें फाड़ देना शिक्षा संबंधी बहस नहीं है, बल्कि यह असहमति को हिंसा से दबाने की कोशिश है.

यहीं से मामला कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से जुड़ता है. क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी का ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान इसी बुनियादी सवाल को उठाता है कि हमारे स्कूलों की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?

क्या हमें ऐसे स्कूल चाहिए जहां कैंटीन का खाना सुरक्षित हो, बच्चों के लिए साफ पानी और साफ शौचालय हों, शिक्षक पर्याप्त संख्या में हों, प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय बेहतर हों, खेल के मैदान उपलब्ध हों और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले? या हमें ऐसे स्कूल चाहिए जहां यह तय करने के लिए भीड़ पहुंचे कि कौन-सी किताब हिंदू है और कौन-सी गैर-हिंदू? स्कूल की समस्या का समाधान स्कूल को बेहतर बनाना है, स्कूल को वैचारिक अखाड़ा बनाना नहीं.

‘स्कूल ठीक करो’ का मतलब यही है कि हम स्कूलों को राजनीतिक और धार्मिक दबावों से मुक्त करें. वहां बच्चों को विज्ञान पढ़ने दें, इतिहास पढ़ने दें, साहित्य पढ़ने दें, अलग-अलग विचारों के लेखकों को पढ़ने दें और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बच्चों को सवाल पूछने का अवसर दें. क्योंकि जिस बच्चे को केवल अपने विचार से सहमत किताबें पढ़ाई जाएंगी, वह शायद परीक्षा पास कर ले, लेकिन जरूरी नहीं कि वह एक बेहतर नागरिक बन पाए.

एक लोकतांत्रिक समाज को ऐसे नागरिक चाहिए जो मलाला को पढ़ सकें और उससे असहमत भी हो सकें. ऐन फ्रैंक को पढ़ सकें और इतिहास को समझ सकें. गांधी को पढ़ सकें और उनकी आलोचना कर सकें. भगत सिंह को पढ़ सकें और उनके विचारों पर बहस कर सकें. नेहरू को पढ़ सकें और उनसे सवाल कर सकें. ऑरवेल को पढ़ सकें और सत्ता के चरित्र पर विचार कर सकें.

पढ़ने का अर्थ सहमत होना नहीं है. पढ़ने का अर्थ अपने दिमाग के दरवाजे खोलना है. किताब से डरने वाला समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता है. दुनिया के इतिहास में किताबों से डरने वाली ताकतों की कमी नहीं रही है. तानाशाहों ने किताबें जलाईं, सरकारों ने किताबों पर प्रतिबंध लगाए और कट्टरपंथियों ने लेखकों को धमकाया, लेकिन विचारों को दबाने की हर कोशिश अंततः समाज को कमजोर करती है.

किताब का जवाब दूसरी किताब हो सकता है. तर्क का जवाब तर्क हो सकता है. आलोचना का जवाब आलोचना हो सकता है. लेकिन किताब का जवाब लाठी नहीं हो सकता है.

27 अगस्त के रीडिंग सेशन पर हमला इसलिए गंभीर है क्योंकि वहां बैठे लोग किसी हिंसक प्रदर्शन में शामिल नहीं थे. वे सार्वजनिक स्थान पर किताब पढ़ रहे थे. यदि किसी को उनकी पसंद की किताब से आपत्ति थी तो वह वहां आकर अपनी बात रख सकता था, बहस कर सकता था, अपनी किताब लेकर बैठ सकता था. लेकिन यदि किताबें फाड़ी जाएं, लोगों को पीटा जाए, महिलाओं के साथ बदसलूकी हो और धमकियां दी जाएं तो मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार तक पहुंच जाता है.

‘स्कूल ठीक करो’ का असली अर्थ

इस पूरे प्रकरण से हमें तय करना होगा कि हम अपने स्कूलों से क्या चाहते हैं. हमें ऐसे स्कूल चाहिए जहां बच्चों को अच्छा और सुरक्षित भोजन मिले. जहां शिक्षक बिना डर के पढ़ा सकें. जहां किसी शिक्षक की नियुक्ति उसकी धार्मिक पहचान देखकर तय न हो. जहां लाइब्रेरी में किताबों की संख्या बढ़े, घटे नहीं. जहां बच्चे मलाला को पढ़ सकें, ऐन फ्रैंक को पढ़ सकें, भगत सिंह को पढ़ सकें, गांधी को पढ़ सकें, आंबेडकर को पढ़ सकें, नेहरू को पढ़ सकें, प्रेमचंद को पढ़ सकें, ऑरवेल को पढ़ सकें और दुनिया भर के लेखकों को पढ़ सकें.

और फिर उनसे पूछा जाए कि तुमने क्या समझा? न कि यह पूछा जाए कि तुमने यह क्यों पढ़ा?

इसलिए ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान केवल स्कूल की इमारत, डेस्क-कुर्सी या पाठ्यक्रम ठीक करने का अभियान नहीं है. यह उस मानसिकता को ठीक करने का अभियान भी है जो बच्चों के हाथ में किताब देखकर डर जाती है. स्कूल तभी ठीक होंगे जब वहां लाठी की जगह किताब होगी, डर की जगह सवाल होंगे और आदेश की जगह संवाद होगा.

और सबसे जरूरी बात यह कि स्कूल तभी सचमुच स्कूल होंगे जब बच्चों को यह अधिकार होगा कि वे किताब पढ़कर खुद तय करें कि उन्हें उससे सहमत होना है या असहमत. क्योंकि जिस समाज को किताब से डर लगता है, वह अपने बच्चों के भविष्य को खोखला कर उसमें सिर्फ भय भरता है.

मलाला की किताब से शिकायत शायद इसलिए है कि वह ज्यादा दकियानूसी इस्लामी समाज में अगर पढाई कर जोर देगी तो हिन्दू औरतों को भी रास्ता मिलेगा. यह हर धर्म और सनातनियों की मंजूर नहीं है. ऐन्ने फ्रैंक ने हिटलर की फौजों के खिलाफ लिखा और हिटलर वही है जिसने धर्म का नया वर्जन नाजिज्म के नाम पर दिया और आराएसएस के अब चहेते सुभाष चंद्र बोस को पैसा देकर पाला था. Ahmedabad School Controversy

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